Wednesday, 4 January 2017

दिल अब भी धड़कता है

आसमान कितना खुला और उदार है... धऱती कितनी तंग। लेकिन इसके तंग होने में धरती का क्या दोष है? धरती भी तो उतनी ही उदार और खुली हुई रही होगी न कभी? कभी... कभी... कब कभी? जब सभ्यताओँ की शुरुआत नहीं हुई थी। तो इंसानों ने ही धरती को इस कदर नर्क बना दिया है। कितना सहज जीवन हुआ करता होगा न... शुरुआत में। देखते-देखते कितने द्वीप उभर आए हैं, मुश्किलों के। सहज, सरल से जीवन में हमने ही कितने व्यवधान बो लिए हैं। रेड सिग्नल पर खड़ी गाड़ियों के बीच खड़ी गाड़ी में बैठे दिनकर को चौराहे पर पड़ रहे धूप के पैटर्न को देखकर विचारों पर विचार आ रहे हैं। यहाँ भी धूप कितनी कटी-फटी पहुँच रही है। पास में आकर खड़ी हुई गाड़ी ने पूरी ताकत से ब्रेक लगाया था, लगा कि रगड़कर चली आ रही है। नजर फिर बिल्डिंगों, बैनरों की ओट से ताँक-झाँक कर सड़क पर उतरती धूप पर पड़ी।
जया कहती है पड़ोसी ने हमारे हिस्से ही धूप चुरा ली...
अरे धूप का भी कोई हिस्सा होता है?
होता क्यों नहीं है...? वह घऱ के पीछे की जरा सी कच्ची जमीन पर आसपास के तीन-तीन मंजिला घरों से रूक जाने वाली धूप को लेकर दुखी थी। पहले इसी हिस्से पर सर्दी की कच्ची धूप पसर जाया करती थी। कितने सारे काम यहाँ बैठे-बैठे और धूप लेते-लेते कर लिया करती थी। स्कूल जाने तक तो धूप का सुनहरापन मन में भी उतर जाता था। पूरा दिन ताजगी बनी रहती थी। सर्दियों में सुबह की धूप के लिए तो डॉक्टर भी कहने लगे हैं कि अमृत है। लेकिन हर तरह के अमृत का दाम चुकाना होता है। जया कहती है कि अब इस अमृत का दाम क्या देकर चुकाऊँ???
अब क्या घर बदल लें! - उसकी झल्लाहट तीखी हो जाती है। दिनकर को भी समझ नहीं आता करें तो क्या करें। विचारों का प्रवाह रूका क्योंकि पीछे खड़ी गाड़ी का हॉर्न चीखा था। ओह सिग्नल ऑन हो गया है। उसने चाभी घुमाई, क्लच दबाकर गियर बदला और एक्सीलरेटर पर पैर का दबाव बढ़ाया गाड़ी सरसराती हुई चौराहा क्रॉस कर गई। उसे एकाएक लगा जैसे उसकी गाड़ी नहीं बल्कि वह स्वयं ही चौपायों की तरह चौराहा क्रॉस कर रहा है। चाभी घुमाते हुए उसे लगा जैसे वह अपने ही कान मरोड़ रहा है, बोनट उसे अपना ही चेहरा लगा, पहियों की जगह अपने हाथ और पैर नजर आने लगे और बॉडी की जगह उसे खुद का ही धड़... उफ् ये क्या हो रहा है? जिस तरह गाड़ी को मसल मेमोरी से चलाते हैं, उसी तरह जीवन भी जैसे मसल मेमोरी से ही चल रहा है। जैसे जीवन भी गाड़ी की तरह ही हो... मशीन... मशीनी। उसने न आए पसीने को पोंछने के लिए अपने उल्टे हाथ ही हथेली को कनपटी पर लगाया। आँखों को जोर से मींचा और फिर खोल दिया... ओ... ओ... ओ... दूसरा सिग्नल आ पहुँचा था।
यह भी ऑफ, हर दिन लगातार आठ सिग्नल पार करने में १५ मिनट एक्स्ट्रा लग जाते हैं। कहाँ-कहाँ क्या-क्या बचाएँ? घर पर आती धूप को, नौकरी को... नौकरी से आती पगार को, भागते समय को, बेचैन मन को...! किस-किस को बचाएँ? फिर उसी विचार ने मन को बुझा दिया। फिर वही जगह, वही लोग, वही काम... क्या करें कि किसी सूरत अर्थवान होने की अनुभूति हो। कई बार लगता है कि पूरा जीवन ही अर्थहीन है। पिछले कई दिनों से तो अपना काम भी अर्थहीन लगने लगता है। जो भी हम कर रहे हैं, उसका क्या औचित्य है। और जब मन औचित्य पर अटक जाता है तब शायद उसी तरह मैकेनिकल होने का अहसास होता है, जैसा इन दिनों होने लगा है।
गाड़ी प्रेस में पहुँच गई थी। बाहर खड़े गार्ड ने सलाम ठोंका। दिनकर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। मन को फैलने-सिकुड़ने की मोहलत न देते हुए वह गाड़ी पार्किंग की तरफ ले गया। दूर तक गाड़ी लेकर गया, तब जाकर गाड़ी पार्क करने के लिए जगह दिखी। टू-व्हीलर ही कितना अच्छा था। जरा-सी जगह की जरूरत होती है, न हो तो बाहर ही खड़ा किया जा सकता है। लेकिन जया ने तो जैसे जिद्द ही पकड़ ली थी। श्लोक का आखिरी साल है। अब उस पर हर महीने बड़ी रकम खर्च नहीं करनी होगी। उसका प्लेसमेंट भी अच्छी जगह हो गया है। हम दोनों मिलकर इतना तो कमा ही लेते हैं कि एक छोटी गाड़ी अफोर्ड कर सकते हैं, फिर तुम्हारा दफ्तर भी तो दूर है। मेरा तो यहीं है और उस पर भी स्कूल की बस लेने आ जाती है। नहीं मानी थी जया और आखिर में काले रंग की मारुति अल्टो घर में आ गई थी।
कभी-कभी दिनकर को गुस्सा भी आता था। कितना काम बढ़ गया है। कार को साफ करने में भी समय लगता है, निकालने और पार्क करने में भी। जगह की भी मारा-मारी है और पेट्रोल का खर्च बढ़ा है वो अपनी जगह। बस जया को ही संतोष है कि धूप-बरसात में सुरक्षा रहती है। गाड़ी पार्क कर बिल्डिंग तक आने में भी ५ मिनट लगते हैं। जाता दिसंबर है, इस बार सर्दी भी कुछ ज्यादा ही कड़ी परीक्षा ले रही है। वार्मर पहना है, उस पर शर्ट। स्वेटर और उस पर कोट... फिर भी सर्द हवा ठिठुरा रही है। गाड़ी में आते इस सर्दी का असर महसूस नहीं हुआ था। जया का गोल-मटोल मुस्कुराता गोरा चेहरा और माथे पर बड़ी दिपदिपाती बिंदी याद आ गई।
जिस वक्त दिनकर दफ्तर पहुँचते हैं, अमूमन रिपोर्टरों की मीटिंग खत्म हो चुकी होती है। सारे रिपोर्टर्स अपनी-अपनी फील्ड में जाने की तैयारी करने के लिए कैंटीन में नाश्ता-चाय कर रहे होते हैं और दफ्तर सुनसान रहता है। आज भी आलम वही है। आजकल हर दिन दफ्तर में दाखिल होते ही उसे अजीब-सी उदासीनता घेर लेती है। हालाँकि दिन भर के काम के बीच वह कहीं दब जाती है, लेकिन जैसे ही फुर्सत मिलती है, वह फिर से सिर उठाने लगती है। महसूस होने लगता है कि वह एक और दिन को बेकार करने के लिए यहाँ आ गया है। खासतौर पर अखबार को देखकर उसे अजीब तरह की कोफ्त होती है। उसे लगता है जैसे बेवजह अखबार के पन्ने काले करते रहते हैं... कुछ भी तो ऐसा नहीं होता है, जिसे कोई भी पढ़ना चाहे... कभी-कभी उसे ये भी लगता है कि यदि अखबार से व्यापार नहीं जुड़ा होता तो पत्रकारिता का काम कब का बंद हो चुका होता। या फिर सही पत्रकारिता किए जाने की गुंजाइश होती। जो भी हो, इस वक्त तो वह इस काम से बुरी तरह से आजिज़ आ चुका है।
सीढ़ी चढ़कर अपने केबिन में पहुँचते ही सबसे पहले उसने घंटी बजाकर प्यून को बुलाया। पानी... बोलकर टेबल पर पड़ी डाक, अखबार और पत्रिकाएँ टटोलने लगा। आज ही संडे वाला इश्यू जाएगा और आज से ही नए के लिए प्लानिंग करनी पड़ेगी। अखबार तो देखने ही होंगे। एकाएक एक अच्छी रिपोर्ट पढ़ी। हिमालय के एक पानी की किल्लत वाले गाँव में दो बहनों की कोशिश से कैसे वहाँ पानी की समस्या दूर हुई। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद दिनकर ने उसे इंटरनेट पर सर्च करना शुरू किया। कुछ और तथ्य उसे उस बारे में मिले, उसने सोचा इस बार के सन्डे वाले अंक में इस स्टोरी को दिया जा सकता है। दो-एक साइट को बुकमार्क किया और कुछ नोट्स लिए। फिर मेल चेक किए। मोटा-मोटा कंटेंट देखा ताकि तय हो सके कि क्या लिया जा सकता है। एक अनजान नाम से मेल देखा... अमूमन तो लेखकों के नाम से परिचित ही होते हैं, कभी-कभार ही कोई अनजान नाम सामने आता है। उसमें भी ज्यादातर कचरा निकलता है, लेकिन दिनकर का ध्यान उन खूबसूरत फोटो पर पड़ा, जो उसने अपने लेख के साथ भेजे थे। कुल तीन फोटो थे, तीनों ही फोटो में जगह-जगह टँगी घंटियाँ थी। बस एंगल अलग-अलग थे। कंटेंट का शीर्षक था 'न्याय के देवता गोलू'। जाने कब के संस्कार हैं कि देवी-देवता, भूत-प्रेत, रीति-रिवाज जैसी चीजों को मार्क्सवादी नहीं होने के बावजूद इस तरह का कंटेंट देने से हमेशा बचा करता है। इसलिए उसे ऐसे ही छोड़ दिया। इतना काम करने-करने में ही एक बज गया। सिगरेट और चाय की तलब लगने लगी।
केबिन से बाहर निकला तो देखा उसका पूरा स्टाफ आ चुका है। अभिवादन का लेन-देन करके दिनकर कैंटीन की तरफ चला गया। दोपहर की मीटिंग में मीड-वीक के इश्यू की प्लानिंग करेंगे। धूप थोड़ी उदार हो गई थी। हवा जरा कम हो गई थी। दोपहर की धूप में कोट में हल्की गर्मी लगने लगी तो कोट उतारकर बाँह पर टाँग लिया। कैंटीन में अभी इक्का-दुक्का लोग ही नजर आ रहे थे। संपादकीय से तो कोई भी नहीं था। हाँ अकाउंट्स, सर्कुलेशन, मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, लायब्रेरी, स्टोर आदि विभागों के कर्मचारी ही इस वक्त यहाँ नजर आ सकते हैं। आधे घंटे बाद जब लंच टाइम होता है, तब यहाँ बैठने की जगह नहीं मिल पाती।
चाय का गिलास काउंटर पर रखकर दिनकर कंपाउंड से ही बाहर निकल गया। वीआयपी रोड पर हर मौसम लगभग एक-सा ही होता है। सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े बंगले बने हुए हैं, जिनकी बाउंड्री-वॉल से बंगलों की दूसरी मंजिल ही नजर आती है। और नजर आते हैं, बाउंड्री-वॉल की हद को तोड़कर बाहर की तरफ झाँकते पेड़ और बेलें। सड़क के दोनों तरफ लगे हुए गुलमोहर और सफेदा के पेड़ों से धूप छनकर आ रही थी, कोट की जरूरत फिर से महसूस होने लगी। सिगरेट को होंठो के बीच दबाए हुए ही दिनकर ने बाँह पर टँगा कोट उतारकर पहना। दूर गुलमोहर के पेड़ के नीचे एक छोटी-सी गाड़ी देखकर उसे कौतूहल हो आया। उसमें एक सफेद रंग का टैंक कसा हुआ था। वह एक लोडिंग रिक्शा जैसा था। करीब जाकर देखा तो वह साइकल और गाड़ियों के पंक्चर बनाने वाली मोबाइल-शॉप थी। दिनकर को अचानक एक तरह की निराशा महसूस हुई। वह पूरी दृश्य उसके मन में फोटो की तरह 'सेव' हो गया... सामाजिक विद्रूप... विसंगति... का चित्र स्मृति के अलबम में जैसे मढ़ गया। एक तरफ आलीशान बंगला था और दूसरी तरफ ये मोबाइल-शॉप... उसे बहुत सारी पुरानी चीजें याद आ गई।
कुछ दिन पहले ही उसने अपने रविवार के सप्लीमेंट में किसानों की आत्महत्या पर स्टोरी की थी। क्वार्टरली मीटिंग में मार्केटिंग-हेड ने उस दिन का अखबार उनकी सीट की तरफ फेंकते हुए पूछा था 'कौन सिलेक्ट करता है, इस तरह की वाहियात स्टोरीज को??? सन्डे को रीडर हल्का-फुल्का पढ़ना चाहता है और आप इस तरह की सैड स्टोरीज छापते हैं। कौन पढ़ेगा हमारा अखबार...?' जिस तरह से चीफ एडिटर ने दिनकर को देखा था, उसे लगा कि उसके हाथों हजारों पाठकों की हत्या हो गई हो जैसे...।
हालाँकि दिनकर पत्रकारिता में आया तो ग्लैमर में था, कई साल रिपोर्टिंग की और उसके ग्लैमर का मजा लिया। धीरे-धीरे उसका रिपोर्टिंग से मोहभंग होने लगा। उस एक घटना ने रिपोर्टिंग के उसके सारे जुनून को एक झटके में उतार दिया। वह बहुत मेहनत करके और बहुत जोखिम उठाकर शहर के एक नामी डॉक्टर के क्लिनिक में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के गोरखधंधे को लेकर आया था। उसने बहुत वक्त लगाया था, कॉपी लिखने में भी चार दिन लगाए थे। चीफ एडिटर से उसने इस विषय पर जब चर्चा की तो वे बहुत उत्साहित दिखे थे। तब तक दिनकर ने डॉक्टर का नाम नहीं बताया था। उन्होंने पूछा भी नहीं था। रिपोर्ट लिख दी थी और छपने दे दी। दिनकर का काम पूरा हुआ और वह निश्चिंत होकर घर चला गया। हालाँकि ऐसा करते हुए उसे १० साल हो गए हैं, फिर भी मेहनत से लाई गई स्टोरी के छपने पर बिल्कुल ऐसा अहसास होता है जैसा किसी स्टार को उसकी फिल्म के रीलिज होने पर होता होगा... बहुत धुकधुकी लगी रहती है। हर वक्त मोबाइल फोन की रिंग पर चेतना लगी रहती है। अभी कोई प्रशंसा का फोन आए। चूँकि दिनकर के यहाँ अखबार जरा देर से आता है, इसलिए भी पूरा ध्यान फोन की रिंग पर था। कोई रिंग नहीं आई। एकाध आई थी तो वो भी किसी की छुट्टी के लिए थी। कुढ़कर अखबार का ही इंतजार किया। अखबार हाथ में आया तो उसने बहुत उत्सुकता से उसे उठाया था। पहले से लेकर आखिर तक हर पन्ने को देख लिया। उसकी रिपोर्ट कहीं थी ही नहीं। सोचा कोई वजह रही होगी, रिपोर्ट नहीं छपने की। अगले दिन वह खुद रूका। उसने अपने सामने ही पेज लगवाया। अपनी रिपोर्ट को ठीकठाक प्लेस करने के बाद वह इत्मीनान से घर आ गया। लेकिन अगले दिन भी रिपोर्ट नदारद थी।
दिन भर मन में उथल-पुथल बनी रही। शाम को जैसे ही पांडेजी दफ्तर आए, सीधे ही केबिन में जा पहुँचा। मेरी रिपोर्ट क्यों रोकी जा रही है? इतने सीधे सवाल से वो जरा अचकचा गए।
रोकी नहीं है, उस पर थोड़ा काम करना बाकी है। - उन्होंने अपने सामने पड़ी मैग्जीन पर नजर गड़ाते हुए कहा।
तो मुझे बताया होता। मैं खुद कर लेता। - दिनकर को जैसे जिद्द-सी आ गई है।
तुमने डॉक्टर से बात की? - सीई ने चीर देने वाली नजर से उसे देखा और तल्ख होकर पूछा।
डॉक्टर का वर्जन भी तो दिया है। - दिनकर जो रिपोर्ट की कॉपी साथ लेकर आया था। खोलकर दिखाने लगा।
डॉक्टर त्रिवेदी तुम पर ब्लैकमेलिंग का इल्जाम लगा रहे हैं। उनका कहना है कि तुमने उनसे २५ लाख रुपयों की माँग की है और धमकी दी है कि यदि वो रकम तुम्हें नहीं दी तो तुम ये रिपोर्ट छाप दोगे। - पांडे ने सीधे दिनकर की तरफ देखते हुए कहा।
तो आपने उनसे बात की है...? - दिनकर को सारी बात समझ आ गई। - कह दीजिए कि आपकी बात उनसे हुई है और आपको उन्होंने रिपोर्ट रोकने के लिए रकम ऑफर की है। यही सब तो हो रहा है मीडिया में आजकल...। - दिनकर फट पड़ा था।
मिस्टर दिनकर ओझा... आप अपने आप को समझते क्या हैं? कभी अपनी कॉपी पढ़कर देखी है? रिपोर्टर की कॉपी ऐसी होती है? वो तो आप पुराने आदमी हैं, इसलिए रिपोर्टिंग कर रहे हैं, अन्यथा आपको तो प्रूफ में होना चाहिए। बस भाषा की जुगाली कर सकते हैं... लेकिन पत्रकारिता इससे आगे की चीज है। सिर्फ अच्छा लिखने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता है। इसलिए आपने अपना काम किया, अब आगे मुझे देखना है। आखिर मुझे मैनेजमेंट को जवाब देना होता है आपको नहीं। इस अखबार में जो कुछ भी प्रकाशित होता है उसकी जिम्मेदारी मेरी है, आपकी नहीं। इसलिए यह तय भी मैं ही करूँगा कि क्या छपेगा और क्या नहीं। आप अभी जा सकते हैं। - पांडे जैसे न जाने कब का गुस्सा उतार रहा था।
दिनकर ने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया था। तुरंत तो कोई फैसला नहीं लिया, लेकिन छुट्टी का आवेदन दे दिया था। तीन महीने की छुट्टी के बाद लौटा तो पांडे का तबादला हो गया था। मुक्ति की साँस ली, लेकिन तय किया कि मेनस्ट्रीम पत्रकारिता नहीं करनी है। नए संपादक मुंतजिर आलम आए थे, वे दिनकर को साहित्य के हवाले से जानते थे, इसलिए उन्हें मैग्ज़ीन सेक्शन में ट्रांसफर कर दिया। कुछ समय बाद मैग्जीन हेड रिटायर हुए तो दिनकर को वो जिम्मेदारी मिल गई। उसके बाद से जीवन कुछ सुकून में गुजर रहा है।
लेकिन नौकरियों में कितने दिन सुकून रह सकता है? खासतौर पर जब नौकरी अखबार की हो। और तब मुश्किलें और ज्यादा हो जाती है, जब अपना काम खुद आपको भी सुकून दे पाने में असमर्थ हो... दिनकर कुछ गंभीर, कुछ अर्थवान करना चाहता है, लेकिन मैनेजमेंट के अपने पूर्वाग्रह और स्वार्थ है। पाठक क्या पढ़ना चाहता है, वह खुद भी नहीं जानता है। या शायद वो वही पढ़ना चाहते हैं जो मीडिया में छापा-दिखाया जाता है। शायद इसलिए भी दिनकर दिनों दिन निराश हो रहा है। किसी को भी ऐसी रिपोर्ट्स की जरूरत नहीं होती है। उस पर गंभीर स्टोरी... सीधे सवाल करेंगे, आखिर कौन पढ़ना चाहता है ये सब...? पाठक तो बस चुप रहता है। जो भी परोस दो, भकोस लेता है। उनके पास तो नजरिया होता ही नहीं है। न संपादक संतुष्ट न पाठक... और खुद दिनकर भी तो संतुष्ट नहीं है। कोई भी तो संतुष्ट नहीं है। रिव्यू मीटिंग में जैसा कि होता है, सर्कुलेशन नहीं बढ़ने का ठीकरा हमेशा की तरह संपादकीय के सिर फोड़ दिया गया। संपादकीय विभाग फिर से कठघरे में है।
दिनकर चलते-चलते ऐन उस गाड़ी के सामने जा खड़ा हुआ। उस पट्टी पर बैठे उस नौजवान ने दिनकर को आश्चर्य से देखा। दिनकर के भीतर का सोया हुआ रिपोर्टर जाग गया। उसने मुस्कुराकर उस लड़के को देखा और पूछा 'कब से लगा रहे हो यहाँ ये गाड़ी?'
उसने उदासीनता से जबाव दिया 'पिछले सप्ताह से ही। क्यों कोई दिक्कत है?'
'अरे नहीं, नहीं... मैं तो बस जानना चाहता हूँ। अपने बारे में कुछ बताओ???' - दिनकर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे आश्वस्त करना चाहा। उसके चेहरे का तनाव थोड़ा ढीला हुआ।
'मेरे अब्बा का लोडिंग रिक्शा है, थोड़ा बहुत लोन लेकर ये मोबाइल गैरेजनुमा चीज बनाई है, देखते हैं, क्या होता है!' - उसने आसमान की तरफ हाथ उठाए और फिर छोड़ दिए।
'नाम क्या है तुम्हारा?' - दिनकर ने पूछा।
'जावेद सिद्दीकी... '
'अच्छा तो जावेद यहाँ क्यों लगाया है? क्या लगता है कि यहाँ काम मिलेगा?' - दिनकर ने आत्मीयता दिखाने के लिए नाम लेकर सवाल पूछा।
'कह नहीं सकता, मैंने तो यहाँ बस इसलिए गाड़ी लगाई है कि यहाँ पुलिसवाले कम नजर आते हैं और बड़े लोगों की बस्ती है तो कोई गुंडागर्दी नहीं होगी। दो सप्ताह पहले नदी पार वाली बस्ती के पास लगाई थी तो जितनी कमाई नहीं हुई, उससे ज्यादा तो पुलिसवालों को और गली के ठेकेदारों को हफ्ता दे दिया।' - उसके कहने में निराशा उभर कर आई।
'फिर...?'
'फिर क्या... देखेंगे। यदि काम चल निकला तो ठीक, नहीं तो जो अब्बा किया करते थे, वही मैं भी करूँगा। लोडिंग रिक्शा से माल यहाँ से वहाँ करूँगा। और क्या...?' - उसने इस दफा अपने हाथ झटके।
'अच्छा अभी तक कितने ग्राहक आए हैं? कब से बैठे हो यहाँ?'
अबके उसमें थोड़ा उत्साह जागा... 'अभी तक चार लोगों की गाड़ी के पंक्चर सुधार चुका हूँ। एक तो सामने वाले बंगले में जाकर सुधारा...। और अभी तो दिन बाकी है।' उसके उत्साह से दिनकर के मन में भी उत्साह जागा, और फिर बुझ गया। कम से कम इसके अब्बा ने इसे अपनी मर्जी का करने तो दिया। सफलता-असफलता एक अलग मामला है।
'कितना लेते हो एक पंक्चर सुधारने का जावेद...?' - दिनकर ने सवाल किया। तभी सामने एक ऑटो आकर रूका, उसमें से झाँक कर एक लड़की ने पूछा 'भैय्या मेरी गाड़ी पंक्चर हो गई आप ठीक कर देंगे?'
जावेद ने दिनकर की तरफ अस्तव्यस्त नजर से देखा। दिनकर ने उससे हाथ मिलाया 'फिर कभी मिलेंगे दोस्त... मैं यहीं रोशन सवेरा के दफ्तर में काम करता हूँ। मुलाकात होती रहेगी।'
दिनकर पलटकर दफ्तर की तरफ जाने लगा। उसका मन डूब रहा था। उसे फिर से अपने काम से ऊब महसूस होने लगी। न काम करने में स्वतंत्रता, न आनंद... न संतुष्टि... न किसी के लिए कुछ कर पाने का सुख, न मनमाफिक पैसा... आखिर इस काम से मिल क्या रहा है? उल्टे हर दिन कुछ-न-कुछ ऐसा हो जाता है, जिससे जमीर उछलकर सामने आ जाता है और सवाल पूछने लगता है।
दफ्तर पहुँचा तो प्यून एक सर्कुलर लेकर सामने आ खड़ा हुआ। नए आए एडिटर हेड ऑफ द डिपार्टमेंट्स की मीटिंग लेना चाहते हैं। आज शाम चार बजे कांफ्रेंस रूम में इकट्ठा होना है। फिर से वही सब... दिनकर ने खीझकर खुद से ही कहा। हर नया आया बंदा नई तरह से बाँग देता है। बचपन में सुनी थी कहावत 'नया-नया मुल्ला ज्यादा बाँग देता है' अभी याद आ गई। उसे हँसी भी आई... मुल्ला बाँग देता है कि मुर्गा...? और नया मुर्गा कैसा होगा?

मीटिंग से एक नया फरमान निकलकर आया कि अब हर सप्ताह अखबार की रिव्यू मीटिंग होगी और पूरे अखबार के बारे में किसी भी डिपार्टमेंट का हेड अपनी राय रख सकता है। एक और नई बेवकूफी। अब इन संपादक को कौन समझाए कि अपनी व्यक्तिगत खुन्नस भी इसके माध्यम से निकाली जा सकेगी। दूसरे संपादकों से क्या पूछना...? पूछना ही है तो सर्कुलेशन वालों से पूछ लो, मार्केटिंग वालों से पूछ लो। आजकल अखबार तो वही चलाते हैं न... वही तो बताते हैं कि पाठक क्या पढ़ना चाहता है और आप क्या कचरा छाप रहे हैं। संपादक होकर भी कंटेंट की अकल नहीं है आपमें...। दिनकर के मन में जहर उफन-उफन कर आ रहा था।
ठीक है, देखते हैं, ये भी कितना लंबा चलता है। हर नया बंदा आकर कुछ बदलाव करने का भ्रम तो फैला ही सकता है। ये भी वही कर रहे हैं। लेकिन कोई यह नहीं सोच रहा है कि आखिर जो अखबार हम पाठकों तक पहुँचा रहे हैं, उसे किसी को क्यों पढ़ना चाहिए? क्या है ऐसा जिसके लिए कोई तीन रूपया या चार रुपया हर दिन का खर्च करे। हम आखिर उसके जीवन में अपनी पन्नों से क्या बदल देते हैं? दिनकर को रह-रहकर ये विचार आने लगा है कि असल में अखबार के माध्यम से हम समाज का कोई भला नहीं कर रहे हैं और उल्टे लोगों को गुमराह ही कर रहे हैं। इसी वजह से हर नए संपादक से उसकी अनबन चलती रहती है। कई बार उसने सोचा जो हो, वह अपनी पीड़ा किसी से नहीं कहेगा। जब कुछ बदलना ही नहीं है तो किसी से भी कुछ कहने का फायदा क्या है? और इसलिए इस मीटिंग का विचार ही उसे फालतू लग रहा है। लेकिन अब नए संपादक का यही आदेश है तो देखते हैं क्या होता है।


उस दिन जब दिनकर दफ्तर पहुँचा तो हर दिन से थोड़ी ज्यादा ही गहमा-गहमी थी। अमूमन हर दिन स्क्रीन पर बैठे हुए दिखते चेहरे उसे मुस्कुराते हुए हलो कर रहे हैं, पूछ रहे हैं कि कैसे हैं? तो उसमें यह अहसास जागा कि मशीन होते जीवन में अभी कुछ ऐसा बचा हुआ है जो धड़कता है... मुस्कुराता है। नहीं तो अखबार के दफ्तर की गहमा-गहमी में यदि कोई सीट पर काम करते-करते मर जाए तो पड़ोस के टर्मिनल पर बैठे हुए साथी को तब पता चले, जब वह कहे कि चलो यार चाय पीकर आते हैं और वह कोई जवाब ही न दें। इतने मशीनी हो गए हैं, हम और इससे ज्यादा मशीनी होने की हमसे उम्मीद की जाती है। तो आज पहली वीकली रिव्यू मीटिंग है। दिनकर को लगा कि उसने तो इस पूरे हफ्ते कोई होमवर्क किया ही नहीं है। उसकी पूरी ऊर्जा मैग्जीन्स के पन्नों को भरने में ही चली जाती है। न्यूज सेक्शन को भी वह स्टोरी पिक करने की तरह ही देखता है। अखबार को पाठक के नजरिए से पढ़ ही नहीं पाता है।
अभी मीटिंग होने में कुछ देर है, तो सोचा कुछ होमवर्क कर ही लूँ। क्या पता कुछ बोलना ही पड़ जाए। अभी तक वह बोलने से बचता रहा है। जब आवाज सुनी ही नहीं जाती तो कहने की जहमत भी क्यों उठाना? फिर भी उसने इस महीने की फाइल मंगवाई और एक नजर अखबार देखने लगा। उसने देखा कि तीन दिन तक लगातार शहर के एक बड़े उद्योगपति की बेटी की शादी का कवरेज हुआ और वह भी फ्रंट पेज पर फ्लायर के तौर पर...। अजीब बात है इस पर उसका ध्यान गया ही नहीं, क्यों? क्या इसलिए कि उसकी रूचि इस बात में नहीं है कि रईस अपने बच्चों की शादी कैसे करते हैं? तो क्या लोक-रूचि इसमें है इसलिए इस खबर को इतना कवरेज दिया जाना चाहिए? अब लोक-रूचि तो सट्टे के नंबरों में भी है, और सेक्स की पोजिशन पर भी... तो क्या अखबार को यह सब छापना चाहिए? उसने बेजार होकर अखबार को टेबल पर पटक दिया।
क्या कहूँगा, यदि पूछा जाएगा तो? दिनकर ने सोच लिया, यदि पूछा जाएगा तो जो लगा, वही कहेगा। क्योंकि उसे यही लगता है। और वही हुआ भी... नंबर लगते-लगते दिनकर का नंबर भी लग ही गया। कह दिया कि 'इस तरह तीन-तीन दिन फ्रंट पेज पर किसी रईस के यहाँ की शादी का कवरेज वेस्टेज ऑफ स्पेस है... क्यों इस खबर को इतना कवरेज दिया जाना चाहिए था, मेरी समझ में नहीं आ रहा है।' जो डेस्क एडिटर थे, उनके जवाब देने की बारी थी। उन्होंने कहा 'इसलिए कि यह खबर हर अखबार में अच्छे कवरेज के साथ जानी थी, गई... और दूसरा पाठक इस तरह की खबर पढ़ना चाहते हैं।' वही तर्क... दिनकर का मन हुआ कि पूछे 'ऐसा किस पाठक ने आपको बताया?' लेकिन चुप रह गए। दिनकर को जो संदेह था, वही हुआ, फ्रंट पेज के डेस्क एडिटर थोड़ा भी जब्त नहीं रख पाए और दिनकर के सप्लीमेंट्स पर टिप्पणी की। 'जिस तरह की स्टोरी आप अपने सप्लीमेंट्स में लगा रहे हैं, वे यूथ ओरिएंटेड नहीं है। याद रखना होगा कि अब घरों में निर्णय की ताकत युवाओं के पास है। वे चाहेंगे वही अखबार घर में आएगा और यदि आप उन पर कॉन्सन्ट्रेट नहीं करते हैं तो वे भी आपका अखबार नहीं पढ़ेंगे। आपको अपनी समझ अपडेट करनी होगी।'
दिनकर मुस्कुराकर रह गया। एडिटर ने भी अपने हाव-भाव से यही संकेत दिया कि वे भी उनसे सहमत है। यही होना था, यही हुआ। कितना भी जब्त करो, मन उखड़ ही जाता है। उसी मन से डेस्क पर पहुँचा था दिनकर। सोचा अब धर्म-कर्म-पाखंड... भूत-प्रेत की कहानियाँ और सेंसेशनल चीजें ही सप्लीमेंट में दूँगा। उसी उद्विग्न मनस्थिति में उसने अपना मेल अकाउंट लॉग इन किया था। बिना मकसद के स्क्रोल करता रहा बहुत देर तक... कर्सर बिना वजह ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर ले जा रहा था। मन काम से उचट गया था। किसी का कहा याद आ गया कि पत्रकारिता थैंकलेस जॉब है। यूं ही आदतन उसने माउस क्लिक किया तो वो मंदिर वाला मेल खुल गया। गुस्सा तो था ही चिढ़ भी थी तो उसने तय कर लिया कि अब चाहे जो कंटेंट हो, वह उसे पर्यटन वाले सेक्शन में जरूर छाप देगा। क्यों नहीं मंदिर भी पर्यटन का हिस्सा हो सकते हैं? जब उस मेल को देखा तो वह हिमाचल के किसी अनजान से मंदिर के बारे में लेख था। उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प थी। पढ़ते-पढ़ते दिनकर का गुस्सा कुछ शांत हुआ। मान्यता ये है कि गोलू देवता न्याय के देवता है। यदि आपका कोई केस लंबे समय से कोर्ट में अटका हुआ है और आप परेशान हैं तो इस मंदिर में बाकायदा अर्जी देकर उसे सुलझाने की प्रार्थना करें। गोलू देवता न्याय करेंगे। यहां सब कागजी कार्रवाई होती है। मन्नत पूरी होने के बाद भक्त मंदिर परिसर में घंटी बाँधते हैं। थोड़ा गुस्सा था और थोड़ा मंदिर की दिलचस्प कहानी, दिनकर ने उस लेख को देने का फैसला कर लिया। मेधावी को उन्होंने वह लेख एडिट करने के लिए दिया। और फिर से अखबारों और पत्रिकाओं में खो गए।
शाम होते-होते गुस्सा और चिढ़ जरा कम हो गई थी, जाने समय का असर था या फिर शरीर के शिथिल होने का। शाम की चाय के दौरान दिनकर को लगा कि गले में कुछ खिंचाव सा है। थोड़ी देर बाद ही आँखें जलने का अहसास हुआ और सिर भारी-भारी लगने लगा। हालाँकि अभी कुछ डाक पढ़ने की बची हुई थी, लेकिन मन स्थिर नहीं हो रहा था। इसलिए वह घंटा भर पहले ही घर के लिए निकल गया।
हर दिन वे दफ्तर से निकल कर सीधे ही घर पहुंचना चाहता है दिनकर। गहरी उदासीनता उसके इर्द-गिर्द पसरी हुई महसूस होती है। सुबह-शाम वह उसी उदासीनता को जैसे कंधे पर बैग की तरह लादकर चलता है।
शाम का भारीपन घर पहुँचते-पहुँचते बुखार में तब्दील हो गया। जया थोड़ी घबरा गई, जिद्द करने लगी डॉक्टर के पास चलते हैं। लेकिन हम भारतीय अपनी छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज तो खुद ही कर लेते हैं। 'अरे क्रोसिन ले लूँगा... बुखार उतर जाएगा। गले में इंफेक्शन हो गया है, उस वजह से बुखार आता ही है, तुम्हें तो पता है।' - जया को समझाकर क्रोसिन और एक एंटीबायोटिक ली और सो गया। आधी रात को स्वेटिंग हुई और हल्का-फुल्का लगने लगा। लगा कि बुखार उतर गया। दूध बिस्किट खाकर फिर सो गया। लेकिन सुबह होते-होते फिर से बुखार चढ़ने लगा।
जया ने स्कूल से छुट्टी ली और डॉक्टर को दिखाने ले गई। वायरल फीवर था। दवाइयों के बाद भी तीन-चार दिन तक बुखार चढ़त-उतरता रहा। कमजोरी इतनी आ गई कि सप्ताह की छुट्टी के बाद भी दिनकर की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह दफ्तर जाए। वैसे भी लंबा अर्सा बीत गया था छुट्टी लिए हुए। एक तरह से आराम ही हो गया।


इतने दिन की छुट्टी के बाद भी काम पर लौटने को लेकर उदासीनता ही पसरी हुई थी। जब कुछ नया करने के लिए कोई स्कोप ही न हो... तो उत्साह आएगा कहाँ से...? कहीं ऐसा तो नहीं कि समय पर मेरी पकड़ ही छूट चुकी है। मैं समय की चाल को समझने में असफल हो रहा हूँ। संदेह और भी हताश कर रहा है। किंतु काम तो करना ही है न... हाँ आज खुद के इंसान होने की तस्दीक जरूर हुई। हवा, धूप, छाया, फूल, भँवरे, खुश्बू सब कुछ का अहसास हुआ। यूँ लगा जैसे वह रिवाइव हुआ हो। गार्ड ने हाल-चाल पूछे। सन्मति से मुस्कुराकर तबीयत पूछी। प्यून ने पूछा 'कहीं बाहर गए थे क्या सर?'
पार्किंग से बिल्डिंग तक पहुँचने में ही घबराहट होने लगी। एकबारगी तो लगा कि १० मिनट नीचे ही बैठ जाएँ और फिर सीढ़ियाँ चढ़े। लेकिन फिर यह सोचकर सीढ़ियाँ चढ़ गया कि किसी ने देखा तो खामखाँ चार और सवालों के जवाब देने होंगे और फिर कई लोगों को इतने दिनों की छुट्टी और बीमारी की कैफियत देनी होगी। इसलिए अपनी घबराहट को एक तरफ रखकर दिनकर तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ गया। लेकिन अपनी चेयर पर बैठते-बैठते ही आँखों के आगे अँधेरा छा गया। ठंडे पसीने का रेला सिर से निकलकर कानों के पीछे से बहने लगा। उसने टेबल पर अपना सिर रख दिया। मुँह सूखने लगा था, लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ी। जेब से जैसे-तैसे विटामिन-सी की गोली निकाली और मुँह में डालकर सिर फिर से टेबल पर रख दिया। लगभग १० मिनट तक ऐसे ही रहने के बाद जैसे उसे होश आया था। थोड़ा स्वस्थ होकर घंटी बजाई, प्यून से पानी मंगवाया और कैंटीन फोन किया। 'भाई एक स्ट्रांग कॉफी मेरी टेबल पर भिजवा दो।' विजय ने आवाज पहचान ली थी। गिलास उठाकर पानी का एक बड़ा घूँट लिया और सिर कुर्सी की पुश्त से टिका दिया। थोड़ी ही देर में कॉफी आ गई। आज न जाने क्यों उसे लगा कि कोई ऐसा होता, जिसके साथ बैठकर वह कॉफी पीता। दिमाग पर जोर डाला अभी कौन-कौन है दफ्तर में? सन्मति... नहीं... लड़की को कॉफी ऑफर करना... नहीं। पता नहीं वह क्या सोच ले। अखबार का बंडल सामने खींच लिया। कॉफी का एक घूँट लिया और अखबार की फाइल खोली ही थी कि फोन बजा।
'हलो... मन्ने रोशन सवेरा के आफिस में बात करनी है।'- आवाज किसी देहाती की लगी थी।
'हाँ आप वहीं बात कर रहे हैं।' - चलो कोई नहीं तो किसी से बात ही सही, सोचकर दिनकर ने कहा।
'एक दिन तुम्हारे पेपर में एक न्यूज छपी थी, कोई मंदिर की।' - उसने टूटी-फूटी बात कही।
'किस दिन का अखबार था...? क्या न्यूज थी?'
'रे धर्मू कुण दन को पेपर थो रे...?' - उसने माउथपीस को लगाए हुए ही किसी और से पूछा। दिनकर को सुनकर हँसी आई। 'रूको साब, हूँ देखी के बतऊ तमने।'
'ऊ कोई मंदर की बात थी। जिम्मे न्याय होए। घंटी-घंटी वाला फोटू था जिम्मे। दिन तो कई पतो नी म्हने।' - उसने ब्योरा तो पूरा दिया, लेकिन तारीख नहीं बता पाया।
'ओ... गोलू देवता...?' - दिनकर को भी वह फोटो की वजह से याद रहा, इन सज्जन को भी।
'हओ, वोईज... तुम मने बताओगा कई कि वां कसे जाऊँ?' - उसने बड़ी विनम्रता से पूछा।
'भाई ये अखबार का दफ्तर है, किसी ट्रेवल एजेंट का नहीं। बेहतर होगा कि आप किसी ट्रेवल एजेंट से बात करे या फिर इंटरनेट पर सर्च कर लें।' - कहकर दिनकर ने फोन रख दिया। लोग भी अखबार के दफ्तर को क्या समझते है? दिनकर व्यंग्य से मुस्कुराया। फिर वह इंटरनेट सर्फ करने लगा। कहानियों की एक वेबसाइट मिली। उसे खोलकर वह कहानी पढ़ने लगा कि फिर से फोन बजा।
'साब भोत जरूरी है, तम मन्ने बता दो कि मैं किस तरै वां जऊँ और कितरा पैसा लगेगा।' - उसने सीधे ही कहा।
'भाई कहाँ लगाया है?' - दिनकर मैग्ज़ीन पढ़ते हुए झल्ला गए थे। और उन्होंने फोन बिना उसका जवाब सुने पटक दिया था। कितने काम होते हैं यहाँ, सोलंकी जी कहा करते थे कि प्रेस ऐसी जगह है जहाँ काम कभी खत्म ही नहीं होता है। और इस भाई को लग रहा है जैसे हम यहाँ कॉल सेंटर खोले बैठे हैं। आप फोन करेंगे, हम एट योर सर्विस करेंगे। हूँह...।
दिनकर फिर से लग गया था रूटीन के कामों में। अभी एक पोलिटिकल राइट अप का कन्क्लूजन शुरू ही किया था कि फिर से फोन बजा।
'म्हारी सुण लो भाईजी... भोत परेशान हूँ...' - इससे पहले कि वह इसके आगे कुछ कहे, दिनकर ने चिढ़कर कहा 'अरे ये कॉल सेंटर नहीं है जो कभी भी मुँह उठाकर फोन कर लो और आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। ये अखबार का दफ्तर है यार...। हमें इतनी फुर्सत नहीं होती कि आपकी मदद कर पाएँ।'
दूसरी तरफ से फोन कट गया। दिनकर ने आश्चर्य से रिसिवर को देखा और सिर झटककर रख दिया। फिर से अपने काम में लग गया। दिनकर ने अपना राइट अप पढ़कर फिर से एडिट किया और पेज पर फ्लो कर दिया। आज का काम पूरा हुआ। बॉडी को स्ट्रेच किया और कुर्सी की पीठ से सिर टिका दिया। शांति-सी महसूस हुई। एकाएक उस देहाती की आवाज जैसे फिर से कानों में सुनाई देने लगी। मन थोड़ा बेचैन हो गया। वैसे भी यहाँ किसी के लिए क्या कर देते हैं, अपने अखबार के माध्यम से तो गुमराह ही करते हैं। यदि उसकी कोई मदद कर पाएं तो।
ब्राउजर में जाकर गोलू देवता का मंदिर टाइप किया तो कई सारे पेजेस की लिस्ट सामने आ गई। थोड़ा धैर्य से एक-दो काम के पेजेस को क्लिक किया और पढ़ने लगा। कुछ चीजें नोट की....। फिर इंडियन रेल वेबसाइट खोली रूट को समझने की कोशिश करने लगा तो सवाल उठा कि उन भाई को जाना कहाँ से है? अरे यार... उसे ग्लानि होने लगी। उससे कितने खराब लहजे में बात की... बेचारा मदद ही तो माँग रहा था। फिर भी अपने शहर से ही उसने नैनीताल तक के रूट और ट्रेन के टिकटों की जानकारी निकाली और सब नोट कर लिया। अपने अनुभवों के आधार पर पूरे खर्च का भी अनुमान लगा लिया और एक कागज पर लिखकर अपने ड्रॉवर में सुरक्षित रख दिया। कुछ ठीक लग रहा था तो सोचा चाय पीने चला जाए। लेकिन फिर लगा कि इस बीच उस 'भाई' का फोन आया तो। नाम भी तो पता नहीं है कि वह रिसेप्शन पर कुछ बता कर जाए। बार-बार दिनकर को ग्लानि-सी महसूस हो रही थी। चाय की तलब थी, लेकिन अनूठी जिम्मेदारी उसने खुद ही ले ली थी। अब क्या करे? उसने कैंटीन फोन कर चाय का ऑर्डर दिया।
अब उसे इंतजार है, बस एक फोन का। कहीं फोन की घंटी बजती वह अपनी टेबल पर पड़े फोन को घूरने लगता। शाम होने लगी थी, मन उदास होने लगा था। ऐसा न हो कि उसकी डाँट सुनकर वह अब कभी फोन न करे। उसे लगा यदि ऐसा होगा तो वह बहुत दिनों तक नॉर्मल नहीं हो पाएगा। बाहर दिनकर के स्टॉफ को लगने लगा कि आज सर सुबह से ही केबिन में क्यों जमे हुए हैं?
उसने मन लगाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए, इस विचार से वह मुस्कुरा दिया कि इस तरह का इंतजार तो उसने बस नीरजा के कैंटीन आने का ही किया होगा। पूरी चेतना जैसे कान हो गई थी... जैसे ही घंटी बजी उसने अपना रिसिवर उठा लिया। किसी और का फोन था, निराश हो गया। ६ बजने वाली थी... अब... बस आधा घंटा और है वह दफ्तर में। अब तो जैसे मन प्रार्थना करने लगा। दम जैसे साधा हुआ है, फिर से फोन की घंटी बजी... हलो... उसे लगा जैसे बरसों बाद उसने नीरजा की ही आवाज सुनी। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
'साब प्लीज मेरी मदद कर दो। मैं भोत परेशान हूं, अनपढ़ हूँ कई नी मालम है... कर दोगा तो भगवान तमारो भोत भलो करेगा।' - उसने फिर से उसी दीनता से कहा।
लेकिन दिनकर बहुत उत्साह में आ गया। 'आप लिख सकते हैं? नहीं लिख सकते तो किसी और को फोन दें, मैं लिखवा देता हूँ।'
'हू लिखी लूंगा... तुमतो बोलो साब... भगवान तमारो भोत भलो करेगा। तमारा नाना-नानी खूब तरक्की करे... साब।' - उसके कहने से दिनकर का मन भीगने लगा था। उसने अब तक जो भी नोट किया था। वो सब उसे लिखवा दिया। और कहा 'यदि कुछ और भी जानना हो तो कल दिन में और फोन कर लेना। और हाँ, यदि फैसला आपके पक्ष में आए तो मुझे जरूर याद करना।' - कहते-कहते न जाने कैसे उसका गला भर आया।
उस ग्रामीण ने फोन रखने से पहले उसे बहुत सारे आशीर्वचन दिए... ‘तम खूब तरक्की करो, तमारा नाना-नानी तमारो नाम रोशन करे... तम खूब लंबा जियो.... सदा खुश रहो। भगवान तमारी सदैव भली करे.....’ आदि... आदि। इसी फोन के इंतजार में दिनकर शाम से अपने केबिन में बैठे हुए थे। बात हो जाने के बाद एक गहरी और निश्चिंत साँस ली थी। सामान समेटा और घर के लिए निकल गया था।
गाड़ी के शीशे से दिखता डूबता सूरज उसे पहली बार इतना सुंदर लगा। सिग्नल पर गर्दन हिलाने वाले खिलौने लिए खड़ी लड़की से उसने खिलौने खरीदे... पैसे चुकाते हुए उसके गाल को प्यार से सहलाया। उसकी मीठी-सी मुस्कुराहट को उसने आँखों में कैद कर लिया। घर पहुँचकर उसने चिल्लाकर जया को पुकारा और ताला ढूँढने लगा। जया ने आश्चर्य से उसे देखा...
दिनकर ने जया से कहा 'चलो...।'
'कहाँ?'
'आज कुछ शॉपिंग करते हैं।' - दिनकर ने उसके कंधों को घेरते हुए कहा।
'शॉपिंग... मगर क्या?'
'तुम तो चलो...।' - दिनकर ने उसे दरवाजे से बाहर ढकेल दिया।
'लेकिन चेंज तो कर लूँ?'
'नहीं, ऐसी ही अच्छी लग रही हो। बस चलो।'
गाड़ी चलाते हुए दिनकर को मुग्ध होकर देखती जया ने सोचा... 'आज तुम बहुत अलग लग रहे हो... बहुत अच्छे भी...। '