Wednesday, 4 January 2017

दिल अब भी धड़कता है

आसमान कितना खुला और उदार है... धऱती कितनी तंग। लेकिन इसके तंग होने में धरती का क्या दोष है? धरती भी तो उतनी ही उदार और खुली हुई रही होगी न कभी? कभी... कभी... कब कभी? जब सभ्यताओँ की शुरुआत नहीं हुई थी। तो इंसानों ने ही धरती को इस कदर नर्क बना दिया है। कितना सहज जीवन हुआ करता होगा न... शुरुआत में। देखते-देखते कितने द्वीप उभर आए हैं, मुश्किलों के। सहज, सरल से जीवन में हमने ही कितने व्यवधान बो लिए हैं। रेड सिग्नल पर खड़ी गाड़ियों के बीच खड़ी गाड़ी में बैठे दिनकर को चौराहे पर पड़ रहे धूप के पैटर्न को देखकर विचारों पर विचार आ रहे हैं। यहाँ भी धूप कितनी कटी-फटी पहुँच रही है। पास में आकर खड़ी हुई गाड़ी ने पूरी ताकत से ब्रेक लगाया था, लगा कि रगड़कर चली आ रही है। नजर फिर बिल्डिंगों, बैनरों की ओट से ताँक-झाँक कर सड़क पर उतरती धूप पर पड़ी।
जया कहती है पड़ोसी ने हमारे हिस्से ही धूप चुरा ली...
अरे धूप का भी कोई हिस्सा होता है?
होता क्यों नहीं है...? वह घऱ के पीछे की जरा सी कच्ची जमीन पर आसपास के तीन-तीन मंजिला घरों से रूक जाने वाली धूप को लेकर दुखी थी। पहले इसी हिस्से पर सर्दी की कच्ची धूप पसर जाया करती थी। कितने सारे काम यहाँ बैठे-बैठे और धूप लेते-लेते कर लिया करती थी। स्कूल जाने तक तो धूप का सुनहरापन मन में भी उतर जाता था। पूरा दिन ताजगी बनी रहती थी। सर्दियों में सुबह की धूप के लिए तो डॉक्टर भी कहने लगे हैं कि अमृत है। लेकिन हर तरह के अमृत का दाम चुकाना होता है। जया कहती है कि अब इस अमृत का दाम क्या देकर चुकाऊँ???
अब क्या घर बदल लें! - उसकी झल्लाहट तीखी हो जाती है। दिनकर को भी समझ नहीं आता करें तो क्या करें। विचारों का प्रवाह रूका क्योंकि पीछे खड़ी गाड़ी का हॉर्न चीखा था। ओह सिग्नल ऑन हो गया है। उसने चाभी घुमाई, क्लच दबाकर गियर बदला और एक्सीलरेटर पर पैर का दबाव बढ़ाया गाड़ी सरसराती हुई चौराहा क्रॉस कर गई। उसे एकाएक लगा जैसे उसकी गाड़ी नहीं बल्कि वह स्वयं ही चौपायों की तरह चौराहा क्रॉस कर रहा है। चाभी घुमाते हुए उसे लगा जैसे वह अपने ही कान मरोड़ रहा है, बोनट उसे अपना ही चेहरा लगा, पहियों की जगह अपने हाथ और पैर नजर आने लगे और बॉडी की जगह उसे खुद का ही धड़... उफ् ये क्या हो रहा है? जिस तरह गाड़ी को मसल मेमोरी से चलाते हैं, उसी तरह जीवन भी जैसे मसल मेमोरी से ही चल रहा है। जैसे जीवन भी गाड़ी की तरह ही हो... मशीन... मशीनी। उसने न आए पसीने को पोंछने के लिए अपने उल्टे हाथ ही हथेली को कनपटी पर लगाया। आँखों को जोर से मींचा और फिर खोल दिया... ओ... ओ... ओ... दूसरा सिग्नल आ पहुँचा था।
यह भी ऑफ, हर दिन लगातार आठ सिग्नल पार करने में १५ मिनट एक्स्ट्रा लग जाते हैं। कहाँ-कहाँ क्या-क्या बचाएँ? घर पर आती धूप को, नौकरी को... नौकरी से आती पगार को, भागते समय को, बेचैन मन को...! किस-किस को बचाएँ? फिर उसी विचार ने मन को बुझा दिया। फिर वही जगह, वही लोग, वही काम... क्या करें कि किसी सूरत अर्थवान होने की अनुभूति हो। कई बार लगता है कि पूरा जीवन ही अर्थहीन है। पिछले कई दिनों से तो अपना काम भी अर्थहीन लगने लगता है। जो भी हम कर रहे हैं, उसका क्या औचित्य है। और जब मन औचित्य पर अटक जाता है तब शायद उसी तरह मैकेनिकल होने का अहसास होता है, जैसा इन दिनों होने लगा है।
गाड़ी प्रेस में पहुँच गई थी। बाहर खड़े गार्ड ने सलाम ठोंका। दिनकर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। मन को फैलने-सिकुड़ने की मोहलत न देते हुए वह गाड़ी पार्किंग की तरफ ले गया। दूर तक गाड़ी लेकर गया, तब जाकर गाड़ी पार्क करने के लिए जगह दिखी। टू-व्हीलर ही कितना अच्छा था। जरा-सी जगह की जरूरत होती है, न हो तो बाहर ही खड़ा किया जा सकता है। लेकिन जया ने तो जैसे जिद्द ही पकड़ ली थी। श्लोक का आखिरी साल है। अब उस पर हर महीने बड़ी रकम खर्च नहीं करनी होगी। उसका प्लेसमेंट भी अच्छी जगह हो गया है। हम दोनों मिलकर इतना तो कमा ही लेते हैं कि एक छोटी गाड़ी अफोर्ड कर सकते हैं, फिर तुम्हारा दफ्तर भी तो दूर है। मेरा तो यहीं है और उस पर भी स्कूल की बस लेने आ जाती है। नहीं मानी थी जया और आखिर में काले रंग की मारुति अल्टो घर में आ गई थी।
कभी-कभी दिनकर को गुस्सा भी आता था। कितना काम बढ़ गया है। कार को साफ करने में भी समय लगता है, निकालने और पार्क करने में भी। जगह की भी मारा-मारी है और पेट्रोल का खर्च बढ़ा है वो अपनी जगह। बस जया को ही संतोष है कि धूप-बरसात में सुरक्षा रहती है। गाड़ी पार्क कर बिल्डिंग तक आने में भी ५ मिनट लगते हैं। जाता दिसंबर है, इस बार सर्दी भी कुछ ज्यादा ही कड़ी परीक्षा ले रही है। वार्मर पहना है, उस पर शर्ट। स्वेटर और उस पर कोट... फिर भी सर्द हवा ठिठुरा रही है। गाड़ी में आते इस सर्दी का असर महसूस नहीं हुआ था। जया का गोल-मटोल मुस्कुराता गोरा चेहरा और माथे पर बड़ी दिपदिपाती बिंदी याद आ गई।
जिस वक्त दिनकर दफ्तर पहुँचते हैं, अमूमन रिपोर्टरों की मीटिंग खत्म हो चुकी होती है। सारे रिपोर्टर्स अपनी-अपनी फील्ड में जाने की तैयारी करने के लिए कैंटीन में नाश्ता-चाय कर रहे होते हैं और दफ्तर सुनसान रहता है। आज भी आलम वही है। आजकल हर दिन दफ्तर में दाखिल होते ही उसे अजीब-सी उदासीनता घेर लेती है। हालाँकि दिन भर के काम के बीच वह कहीं दब जाती है, लेकिन जैसे ही फुर्सत मिलती है, वह फिर से सिर उठाने लगती है। महसूस होने लगता है कि वह एक और दिन को बेकार करने के लिए यहाँ आ गया है। खासतौर पर अखबार को देखकर उसे अजीब तरह की कोफ्त होती है। उसे लगता है जैसे बेवजह अखबार के पन्ने काले करते रहते हैं... कुछ भी तो ऐसा नहीं होता है, जिसे कोई भी पढ़ना चाहे... कभी-कभी उसे ये भी लगता है कि यदि अखबार से व्यापार नहीं जुड़ा होता तो पत्रकारिता का काम कब का बंद हो चुका होता। या फिर सही पत्रकारिता किए जाने की गुंजाइश होती। जो भी हो, इस वक्त तो वह इस काम से बुरी तरह से आजिज़ आ चुका है।
सीढ़ी चढ़कर अपने केबिन में पहुँचते ही सबसे पहले उसने घंटी बजाकर प्यून को बुलाया। पानी... बोलकर टेबल पर पड़ी डाक, अखबार और पत्रिकाएँ टटोलने लगा। आज ही संडे वाला इश्यू जाएगा और आज से ही नए के लिए प्लानिंग करनी पड़ेगी। अखबार तो देखने ही होंगे। एकाएक एक अच्छी रिपोर्ट पढ़ी। हिमालय के एक पानी की किल्लत वाले गाँव में दो बहनों की कोशिश से कैसे वहाँ पानी की समस्या दूर हुई। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद दिनकर ने उसे इंटरनेट पर सर्च करना शुरू किया। कुछ और तथ्य उसे उस बारे में मिले, उसने सोचा इस बार के सन्डे वाले अंक में इस स्टोरी को दिया जा सकता है। दो-एक साइट को बुकमार्क किया और कुछ नोट्स लिए। फिर मेल चेक किए। मोटा-मोटा कंटेंट देखा ताकि तय हो सके कि क्या लिया जा सकता है। एक अनजान नाम से मेल देखा... अमूमन तो लेखकों के नाम से परिचित ही होते हैं, कभी-कभार ही कोई अनजान नाम सामने आता है। उसमें भी ज्यादातर कचरा निकलता है, लेकिन दिनकर का ध्यान उन खूबसूरत फोटो पर पड़ा, जो उसने अपने लेख के साथ भेजे थे। कुल तीन फोटो थे, तीनों ही फोटो में जगह-जगह टँगी घंटियाँ थी। बस एंगल अलग-अलग थे। कंटेंट का शीर्षक था 'न्याय के देवता गोलू'। जाने कब के संस्कार हैं कि देवी-देवता, भूत-प्रेत, रीति-रिवाज जैसी चीजों को मार्क्सवादी नहीं होने के बावजूद इस तरह का कंटेंट देने से हमेशा बचा करता है। इसलिए उसे ऐसे ही छोड़ दिया। इतना काम करने-करने में ही एक बज गया। सिगरेट और चाय की तलब लगने लगी।
केबिन से बाहर निकला तो देखा उसका पूरा स्टाफ आ चुका है। अभिवादन का लेन-देन करके दिनकर कैंटीन की तरफ चला गया। दोपहर की मीटिंग में मीड-वीक के इश्यू की प्लानिंग करेंगे। धूप थोड़ी उदार हो गई थी। हवा जरा कम हो गई थी। दोपहर की धूप में कोट में हल्की गर्मी लगने लगी तो कोट उतारकर बाँह पर टाँग लिया। कैंटीन में अभी इक्का-दुक्का लोग ही नजर आ रहे थे। संपादकीय से तो कोई भी नहीं था। हाँ अकाउंट्स, सर्कुलेशन, मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, लायब्रेरी, स्टोर आदि विभागों के कर्मचारी ही इस वक्त यहाँ नजर आ सकते हैं। आधे घंटे बाद जब लंच टाइम होता है, तब यहाँ बैठने की जगह नहीं मिल पाती।
चाय का गिलास काउंटर पर रखकर दिनकर कंपाउंड से ही बाहर निकल गया। वीआयपी रोड पर हर मौसम लगभग एक-सा ही होता है। सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े बंगले बने हुए हैं, जिनकी बाउंड्री-वॉल से बंगलों की दूसरी मंजिल ही नजर आती है। और नजर आते हैं, बाउंड्री-वॉल की हद को तोड़कर बाहर की तरफ झाँकते पेड़ और बेलें। सड़क के दोनों तरफ लगे हुए गुलमोहर और सफेदा के पेड़ों से धूप छनकर आ रही थी, कोट की जरूरत फिर से महसूस होने लगी। सिगरेट को होंठो के बीच दबाए हुए ही दिनकर ने बाँह पर टँगा कोट उतारकर पहना। दूर गुलमोहर के पेड़ के नीचे एक छोटी-सी गाड़ी देखकर उसे कौतूहल हो आया। उसमें एक सफेद रंग का टैंक कसा हुआ था। वह एक लोडिंग रिक्शा जैसा था। करीब जाकर देखा तो वह साइकल और गाड़ियों के पंक्चर बनाने वाली मोबाइल-शॉप थी। दिनकर को अचानक एक तरह की निराशा महसूस हुई। वह पूरी दृश्य उसके मन में फोटो की तरह 'सेव' हो गया... सामाजिक विद्रूप... विसंगति... का चित्र स्मृति के अलबम में जैसे मढ़ गया। एक तरफ आलीशान बंगला था और दूसरी तरफ ये मोबाइल-शॉप... उसे बहुत सारी पुरानी चीजें याद आ गई।
कुछ दिन पहले ही उसने अपने रविवार के सप्लीमेंट में किसानों की आत्महत्या पर स्टोरी की थी। क्वार्टरली मीटिंग में मार्केटिंग-हेड ने उस दिन का अखबार उनकी सीट की तरफ फेंकते हुए पूछा था 'कौन सिलेक्ट करता है, इस तरह की वाहियात स्टोरीज को??? सन्डे को रीडर हल्का-फुल्का पढ़ना चाहता है और आप इस तरह की सैड स्टोरीज छापते हैं। कौन पढ़ेगा हमारा अखबार...?' जिस तरह से चीफ एडिटर ने दिनकर को देखा था, उसे लगा कि उसके हाथों हजारों पाठकों की हत्या हो गई हो जैसे...।
हालाँकि दिनकर पत्रकारिता में आया तो ग्लैमर में था, कई साल रिपोर्टिंग की और उसके ग्लैमर का मजा लिया। धीरे-धीरे उसका रिपोर्टिंग से मोहभंग होने लगा। उस एक घटना ने रिपोर्टिंग के उसके सारे जुनून को एक झटके में उतार दिया। वह बहुत मेहनत करके और बहुत जोखिम उठाकर शहर के एक नामी डॉक्टर के क्लिनिक में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के गोरखधंधे को लेकर आया था। उसने बहुत वक्त लगाया था, कॉपी लिखने में भी चार दिन लगाए थे। चीफ एडिटर से उसने इस विषय पर जब चर्चा की तो वे बहुत उत्साहित दिखे थे। तब तक दिनकर ने डॉक्टर का नाम नहीं बताया था। उन्होंने पूछा भी नहीं था। रिपोर्ट लिख दी थी और छपने दे दी। दिनकर का काम पूरा हुआ और वह निश्चिंत होकर घर चला गया। हालाँकि ऐसा करते हुए उसे १० साल हो गए हैं, फिर भी मेहनत से लाई गई स्टोरी के छपने पर बिल्कुल ऐसा अहसास होता है जैसा किसी स्टार को उसकी फिल्म के रीलिज होने पर होता होगा... बहुत धुकधुकी लगी रहती है। हर वक्त मोबाइल फोन की रिंग पर चेतना लगी रहती है। अभी कोई प्रशंसा का फोन आए। चूँकि दिनकर के यहाँ अखबार जरा देर से आता है, इसलिए भी पूरा ध्यान फोन की रिंग पर था। कोई रिंग नहीं आई। एकाध आई थी तो वो भी किसी की छुट्टी के लिए थी। कुढ़कर अखबार का ही इंतजार किया। अखबार हाथ में आया तो उसने बहुत उत्सुकता से उसे उठाया था। पहले से लेकर आखिर तक हर पन्ने को देख लिया। उसकी रिपोर्ट कहीं थी ही नहीं। सोचा कोई वजह रही होगी, रिपोर्ट नहीं छपने की। अगले दिन वह खुद रूका। उसने अपने सामने ही पेज लगवाया। अपनी रिपोर्ट को ठीकठाक प्लेस करने के बाद वह इत्मीनान से घर आ गया। लेकिन अगले दिन भी रिपोर्ट नदारद थी।
दिन भर मन में उथल-पुथल बनी रही। शाम को जैसे ही पांडेजी दफ्तर आए, सीधे ही केबिन में जा पहुँचा। मेरी रिपोर्ट क्यों रोकी जा रही है? इतने सीधे सवाल से वो जरा अचकचा गए।
रोकी नहीं है, उस पर थोड़ा काम करना बाकी है। - उन्होंने अपने सामने पड़ी मैग्जीन पर नजर गड़ाते हुए कहा।
तो मुझे बताया होता। मैं खुद कर लेता। - दिनकर को जैसे जिद्द-सी आ गई है।
तुमने डॉक्टर से बात की? - सीई ने चीर देने वाली नजर से उसे देखा और तल्ख होकर पूछा।
डॉक्टर का वर्जन भी तो दिया है। - दिनकर जो रिपोर्ट की कॉपी साथ लेकर आया था। खोलकर दिखाने लगा।
डॉक्टर त्रिवेदी तुम पर ब्लैकमेलिंग का इल्जाम लगा रहे हैं। उनका कहना है कि तुमने उनसे २५ लाख रुपयों की माँग की है और धमकी दी है कि यदि वो रकम तुम्हें नहीं दी तो तुम ये रिपोर्ट छाप दोगे। - पांडे ने सीधे दिनकर की तरफ देखते हुए कहा।
तो आपने उनसे बात की है...? - दिनकर को सारी बात समझ आ गई। - कह दीजिए कि आपकी बात उनसे हुई है और आपको उन्होंने रिपोर्ट रोकने के लिए रकम ऑफर की है। यही सब तो हो रहा है मीडिया में आजकल...। - दिनकर फट पड़ा था।
मिस्टर दिनकर ओझा... आप अपने आप को समझते क्या हैं? कभी अपनी कॉपी पढ़कर देखी है? रिपोर्टर की कॉपी ऐसी होती है? वो तो आप पुराने आदमी हैं, इसलिए रिपोर्टिंग कर रहे हैं, अन्यथा आपको तो प्रूफ में होना चाहिए। बस भाषा की जुगाली कर सकते हैं... लेकिन पत्रकारिता इससे आगे की चीज है। सिर्फ अच्छा लिखने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता है। इसलिए आपने अपना काम किया, अब आगे मुझे देखना है। आखिर मुझे मैनेजमेंट को जवाब देना होता है आपको नहीं। इस अखबार में जो कुछ भी प्रकाशित होता है उसकी जिम्मेदारी मेरी है, आपकी नहीं। इसलिए यह तय भी मैं ही करूँगा कि क्या छपेगा और क्या नहीं। आप अभी जा सकते हैं। - पांडे जैसे न जाने कब का गुस्सा उतार रहा था।
दिनकर ने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया था। तुरंत तो कोई फैसला नहीं लिया, लेकिन छुट्टी का आवेदन दे दिया था। तीन महीने की छुट्टी के बाद लौटा तो पांडे का तबादला हो गया था। मुक्ति की साँस ली, लेकिन तय किया कि मेनस्ट्रीम पत्रकारिता नहीं करनी है। नए संपादक मुंतजिर आलम आए थे, वे दिनकर को साहित्य के हवाले से जानते थे, इसलिए उन्हें मैग्ज़ीन सेक्शन में ट्रांसफर कर दिया। कुछ समय बाद मैग्जीन हेड रिटायर हुए तो दिनकर को वो जिम्मेदारी मिल गई। उसके बाद से जीवन कुछ सुकून में गुजर रहा है।
लेकिन नौकरियों में कितने दिन सुकून रह सकता है? खासतौर पर जब नौकरी अखबार की हो। और तब मुश्किलें और ज्यादा हो जाती है, जब अपना काम खुद आपको भी सुकून दे पाने में असमर्थ हो... दिनकर कुछ गंभीर, कुछ अर्थवान करना चाहता है, लेकिन मैनेजमेंट के अपने पूर्वाग्रह और स्वार्थ है। पाठक क्या पढ़ना चाहता है, वह खुद भी नहीं जानता है। या शायद वो वही पढ़ना चाहते हैं जो मीडिया में छापा-दिखाया जाता है। शायद इसलिए भी दिनकर दिनों दिन निराश हो रहा है। किसी को भी ऐसी रिपोर्ट्स की जरूरत नहीं होती है। उस पर गंभीर स्टोरी... सीधे सवाल करेंगे, आखिर कौन पढ़ना चाहता है ये सब...? पाठक तो बस चुप रहता है। जो भी परोस दो, भकोस लेता है। उनके पास तो नजरिया होता ही नहीं है। न संपादक संतुष्ट न पाठक... और खुद दिनकर भी तो संतुष्ट नहीं है। कोई भी तो संतुष्ट नहीं है। रिव्यू मीटिंग में जैसा कि होता है, सर्कुलेशन नहीं बढ़ने का ठीकरा हमेशा की तरह संपादकीय के सिर फोड़ दिया गया। संपादकीय विभाग फिर से कठघरे में है।
दिनकर चलते-चलते ऐन उस गाड़ी के सामने जा खड़ा हुआ। उस पट्टी पर बैठे उस नौजवान ने दिनकर को आश्चर्य से देखा। दिनकर के भीतर का सोया हुआ रिपोर्टर जाग गया। उसने मुस्कुराकर उस लड़के को देखा और पूछा 'कब से लगा रहे हो यहाँ ये गाड़ी?'
उसने उदासीनता से जबाव दिया 'पिछले सप्ताह से ही। क्यों कोई दिक्कत है?'
'अरे नहीं, नहीं... मैं तो बस जानना चाहता हूँ। अपने बारे में कुछ बताओ???' - दिनकर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे आश्वस्त करना चाहा। उसके चेहरे का तनाव थोड़ा ढीला हुआ।
'मेरे अब्बा का लोडिंग रिक्शा है, थोड़ा बहुत लोन लेकर ये मोबाइल गैरेजनुमा चीज बनाई है, देखते हैं, क्या होता है!' - उसने आसमान की तरफ हाथ उठाए और फिर छोड़ दिए।
'नाम क्या है तुम्हारा?' - दिनकर ने पूछा।
'जावेद सिद्दीकी... '
'अच्छा तो जावेद यहाँ क्यों लगाया है? क्या लगता है कि यहाँ काम मिलेगा?' - दिनकर ने आत्मीयता दिखाने के लिए नाम लेकर सवाल पूछा।
'कह नहीं सकता, मैंने तो यहाँ बस इसलिए गाड़ी लगाई है कि यहाँ पुलिसवाले कम नजर आते हैं और बड़े लोगों की बस्ती है तो कोई गुंडागर्दी नहीं होगी। दो सप्ताह पहले नदी पार वाली बस्ती के पास लगाई थी तो जितनी कमाई नहीं हुई, उससे ज्यादा तो पुलिसवालों को और गली के ठेकेदारों को हफ्ता दे दिया।' - उसके कहने में निराशा उभर कर आई।
'फिर...?'
'फिर क्या... देखेंगे। यदि काम चल निकला तो ठीक, नहीं तो जो अब्बा किया करते थे, वही मैं भी करूँगा। लोडिंग रिक्शा से माल यहाँ से वहाँ करूँगा। और क्या...?' - उसने इस दफा अपने हाथ झटके।
'अच्छा अभी तक कितने ग्राहक आए हैं? कब से बैठे हो यहाँ?'
अबके उसमें थोड़ा उत्साह जागा... 'अभी तक चार लोगों की गाड़ी के पंक्चर सुधार चुका हूँ। एक तो सामने वाले बंगले में जाकर सुधारा...। और अभी तो दिन बाकी है।' उसके उत्साह से दिनकर के मन में भी उत्साह जागा, और फिर बुझ गया। कम से कम इसके अब्बा ने इसे अपनी मर्जी का करने तो दिया। सफलता-असफलता एक अलग मामला है।
'कितना लेते हो एक पंक्चर सुधारने का जावेद...?' - दिनकर ने सवाल किया। तभी सामने एक ऑटो आकर रूका, उसमें से झाँक कर एक लड़की ने पूछा 'भैय्या मेरी गाड़ी पंक्चर हो गई आप ठीक कर देंगे?'
जावेद ने दिनकर की तरफ अस्तव्यस्त नजर से देखा। दिनकर ने उससे हाथ मिलाया 'फिर कभी मिलेंगे दोस्त... मैं यहीं रोशन सवेरा के दफ्तर में काम करता हूँ। मुलाकात होती रहेगी।'
दिनकर पलटकर दफ्तर की तरफ जाने लगा। उसका मन डूब रहा था। उसे फिर से अपने काम से ऊब महसूस होने लगी। न काम करने में स्वतंत्रता, न आनंद... न संतुष्टि... न किसी के लिए कुछ कर पाने का सुख, न मनमाफिक पैसा... आखिर इस काम से मिल क्या रहा है? उल्टे हर दिन कुछ-न-कुछ ऐसा हो जाता है, जिससे जमीर उछलकर सामने आ जाता है और सवाल पूछने लगता है।
दफ्तर पहुँचा तो प्यून एक सर्कुलर लेकर सामने आ खड़ा हुआ। नए आए एडिटर हेड ऑफ द डिपार्टमेंट्स की मीटिंग लेना चाहते हैं। आज शाम चार बजे कांफ्रेंस रूम में इकट्ठा होना है। फिर से वही सब... दिनकर ने खीझकर खुद से ही कहा। हर नया आया बंदा नई तरह से बाँग देता है। बचपन में सुनी थी कहावत 'नया-नया मुल्ला ज्यादा बाँग देता है' अभी याद आ गई। उसे हँसी भी आई... मुल्ला बाँग देता है कि मुर्गा...? और नया मुर्गा कैसा होगा?

मीटिंग से एक नया फरमान निकलकर आया कि अब हर सप्ताह अखबार की रिव्यू मीटिंग होगी और पूरे अखबार के बारे में किसी भी डिपार्टमेंट का हेड अपनी राय रख सकता है। एक और नई बेवकूफी। अब इन संपादक को कौन समझाए कि अपनी व्यक्तिगत खुन्नस भी इसके माध्यम से निकाली जा सकेगी। दूसरे संपादकों से क्या पूछना...? पूछना ही है तो सर्कुलेशन वालों से पूछ लो, मार्केटिंग वालों से पूछ लो। आजकल अखबार तो वही चलाते हैं न... वही तो बताते हैं कि पाठक क्या पढ़ना चाहता है और आप क्या कचरा छाप रहे हैं। संपादक होकर भी कंटेंट की अकल नहीं है आपमें...। दिनकर के मन में जहर उफन-उफन कर आ रहा था।
ठीक है, देखते हैं, ये भी कितना लंबा चलता है। हर नया बंदा आकर कुछ बदलाव करने का भ्रम तो फैला ही सकता है। ये भी वही कर रहे हैं। लेकिन कोई यह नहीं सोच रहा है कि आखिर जो अखबार हम पाठकों तक पहुँचा रहे हैं, उसे किसी को क्यों पढ़ना चाहिए? क्या है ऐसा जिसके लिए कोई तीन रूपया या चार रुपया हर दिन का खर्च करे। हम आखिर उसके जीवन में अपनी पन्नों से क्या बदल देते हैं? दिनकर को रह-रहकर ये विचार आने लगा है कि असल में अखबार के माध्यम से हम समाज का कोई भला नहीं कर रहे हैं और उल्टे लोगों को गुमराह ही कर रहे हैं। इसी वजह से हर नए संपादक से उसकी अनबन चलती रहती है। कई बार उसने सोचा जो हो, वह अपनी पीड़ा किसी से नहीं कहेगा। जब कुछ बदलना ही नहीं है तो किसी से भी कुछ कहने का फायदा क्या है? और इसलिए इस मीटिंग का विचार ही उसे फालतू लग रहा है। लेकिन अब नए संपादक का यही आदेश है तो देखते हैं क्या होता है।


उस दिन जब दिनकर दफ्तर पहुँचा तो हर दिन से थोड़ी ज्यादा ही गहमा-गहमी थी। अमूमन हर दिन स्क्रीन पर बैठे हुए दिखते चेहरे उसे मुस्कुराते हुए हलो कर रहे हैं, पूछ रहे हैं कि कैसे हैं? तो उसमें यह अहसास जागा कि मशीन होते जीवन में अभी कुछ ऐसा बचा हुआ है जो धड़कता है... मुस्कुराता है। नहीं तो अखबार के दफ्तर की गहमा-गहमी में यदि कोई सीट पर काम करते-करते मर जाए तो पड़ोस के टर्मिनल पर बैठे हुए साथी को तब पता चले, जब वह कहे कि चलो यार चाय पीकर आते हैं और वह कोई जवाब ही न दें। इतने मशीनी हो गए हैं, हम और इससे ज्यादा मशीनी होने की हमसे उम्मीद की जाती है। तो आज पहली वीकली रिव्यू मीटिंग है। दिनकर को लगा कि उसने तो इस पूरे हफ्ते कोई होमवर्क किया ही नहीं है। उसकी पूरी ऊर्जा मैग्जीन्स के पन्नों को भरने में ही चली जाती है। न्यूज सेक्शन को भी वह स्टोरी पिक करने की तरह ही देखता है। अखबार को पाठक के नजरिए से पढ़ ही नहीं पाता है।
अभी मीटिंग होने में कुछ देर है, तो सोचा कुछ होमवर्क कर ही लूँ। क्या पता कुछ बोलना ही पड़ जाए। अभी तक वह बोलने से बचता रहा है। जब आवाज सुनी ही नहीं जाती तो कहने की जहमत भी क्यों उठाना? फिर भी उसने इस महीने की फाइल मंगवाई और एक नजर अखबार देखने लगा। उसने देखा कि तीन दिन तक लगातार शहर के एक बड़े उद्योगपति की बेटी की शादी का कवरेज हुआ और वह भी फ्रंट पेज पर फ्लायर के तौर पर...। अजीब बात है इस पर उसका ध्यान गया ही नहीं, क्यों? क्या इसलिए कि उसकी रूचि इस बात में नहीं है कि रईस अपने बच्चों की शादी कैसे करते हैं? तो क्या लोक-रूचि इसमें है इसलिए इस खबर को इतना कवरेज दिया जाना चाहिए? अब लोक-रूचि तो सट्टे के नंबरों में भी है, और सेक्स की पोजिशन पर भी... तो क्या अखबार को यह सब छापना चाहिए? उसने बेजार होकर अखबार को टेबल पर पटक दिया।
क्या कहूँगा, यदि पूछा जाएगा तो? दिनकर ने सोच लिया, यदि पूछा जाएगा तो जो लगा, वही कहेगा। क्योंकि उसे यही लगता है। और वही हुआ भी... नंबर लगते-लगते दिनकर का नंबर भी लग ही गया। कह दिया कि 'इस तरह तीन-तीन दिन फ्रंट पेज पर किसी रईस के यहाँ की शादी का कवरेज वेस्टेज ऑफ स्पेस है... क्यों इस खबर को इतना कवरेज दिया जाना चाहिए था, मेरी समझ में नहीं आ रहा है।' जो डेस्क एडिटर थे, उनके जवाब देने की बारी थी। उन्होंने कहा 'इसलिए कि यह खबर हर अखबार में अच्छे कवरेज के साथ जानी थी, गई... और दूसरा पाठक इस तरह की खबर पढ़ना चाहते हैं।' वही तर्क... दिनकर का मन हुआ कि पूछे 'ऐसा किस पाठक ने आपको बताया?' लेकिन चुप रह गए। दिनकर को जो संदेह था, वही हुआ, फ्रंट पेज के डेस्क एडिटर थोड़ा भी जब्त नहीं रख पाए और दिनकर के सप्लीमेंट्स पर टिप्पणी की। 'जिस तरह की स्टोरी आप अपने सप्लीमेंट्स में लगा रहे हैं, वे यूथ ओरिएंटेड नहीं है। याद रखना होगा कि अब घरों में निर्णय की ताकत युवाओं के पास है। वे चाहेंगे वही अखबार घर में आएगा और यदि आप उन पर कॉन्सन्ट्रेट नहीं करते हैं तो वे भी आपका अखबार नहीं पढ़ेंगे। आपको अपनी समझ अपडेट करनी होगी।'
दिनकर मुस्कुराकर रह गया। एडिटर ने भी अपने हाव-भाव से यही संकेत दिया कि वे भी उनसे सहमत है। यही होना था, यही हुआ। कितना भी जब्त करो, मन उखड़ ही जाता है। उसी मन से डेस्क पर पहुँचा था दिनकर। सोचा अब धर्म-कर्म-पाखंड... भूत-प्रेत की कहानियाँ और सेंसेशनल चीजें ही सप्लीमेंट में दूँगा। उसी उद्विग्न मनस्थिति में उसने अपना मेल अकाउंट लॉग इन किया था। बिना मकसद के स्क्रोल करता रहा बहुत देर तक... कर्सर बिना वजह ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर ले जा रहा था। मन काम से उचट गया था। किसी का कहा याद आ गया कि पत्रकारिता थैंकलेस जॉब है। यूं ही आदतन उसने माउस क्लिक किया तो वो मंदिर वाला मेल खुल गया। गुस्सा तो था ही चिढ़ भी थी तो उसने तय कर लिया कि अब चाहे जो कंटेंट हो, वह उसे पर्यटन वाले सेक्शन में जरूर छाप देगा। क्यों नहीं मंदिर भी पर्यटन का हिस्सा हो सकते हैं? जब उस मेल को देखा तो वह हिमाचल के किसी अनजान से मंदिर के बारे में लेख था। उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प थी। पढ़ते-पढ़ते दिनकर का गुस्सा कुछ शांत हुआ। मान्यता ये है कि गोलू देवता न्याय के देवता है। यदि आपका कोई केस लंबे समय से कोर्ट में अटका हुआ है और आप परेशान हैं तो इस मंदिर में बाकायदा अर्जी देकर उसे सुलझाने की प्रार्थना करें। गोलू देवता न्याय करेंगे। यहां सब कागजी कार्रवाई होती है। मन्नत पूरी होने के बाद भक्त मंदिर परिसर में घंटी बाँधते हैं। थोड़ा गुस्सा था और थोड़ा मंदिर की दिलचस्प कहानी, दिनकर ने उस लेख को देने का फैसला कर लिया। मेधावी को उन्होंने वह लेख एडिट करने के लिए दिया। और फिर से अखबारों और पत्रिकाओं में खो गए।
शाम होते-होते गुस्सा और चिढ़ जरा कम हो गई थी, जाने समय का असर था या फिर शरीर के शिथिल होने का। शाम की चाय के दौरान दिनकर को लगा कि गले में कुछ खिंचाव सा है। थोड़ी देर बाद ही आँखें जलने का अहसास हुआ और सिर भारी-भारी लगने लगा। हालाँकि अभी कुछ डाक पढ़ने की बची हुई थी, लेकिन मन स्थिर नहीं हो रहा था। इसलिए वह घंटा भर पहले ही घर के लिए निकल गया।
हर दिन वे दफ्तर से निकल कर सीधे ही घर पहुंचना चाहता है दिनकर। गहरी उदासीनता उसके इर्द-गिर्द पसरी हुई महसूस होती है। सुबह-शाम वह उसी उदासीनता को जैसे कंधे पर बैग की तरह लादकर चलता है।
शाम का भारीपन घर पहुँचते-पहुँचते बुखार में तब्दील हो गया। जया थोड़ी घबरा गई, जिद्द करने लगी डॉक्टर के पास चलते हैं। लेकिन हम भारतीय अपनी छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज तो खुद ही कर लेते हैं। 'अरे क्रोसिन ले लूँगा... बुखार उतर जाएगा। गले में इंफेक्शन हो गया है, उस वजह से बुखार आता ही है, तुम्हें तो पता है।' - जया को समझाकर क्रोसिन और एक एंटीबायोटिक ली और सो गया। आधी रात को स्वेटिंग हुई और हल्का-फुल्का लगने लगा। लगा कि बुखार उतर गया। दूध बिस्किट खाकर फिर सो गया। लेकिन सुबह होते-होते फिर से बुखार चढ़ने लगा।
जया ने स्कूल से छुट्टी ली और डॉक्टर को दिखाने ले गई। वायरल फीवर था। दवाइयों के बाद भी तीन-चार दिन तक बुखार चढ़त-उतरता रहा। कमजोरी इतनी आ गई कि सप्ताह की छुट्टी के बाद भी दिनकर की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह दफ्तर जाए। वैसे भी लंबा अर्सा बीत गया था छुट्टी लिए हुए। एक तरह से आराम ही हो गया।


इतने दिन की छुट्टी के बाद भी काम पर लौटने को लेकर उदासीनता ही पसरी हुई थी। जब कुछ नया करने के लिए कोई स्कोप ही न हो... तो उत्साह आएगा कहाँ से...? कहीं ऐसा तो नहीं कि समय पर मेरी पकड़ ही छूट चुकी है। मैं समय की चाल को समझने में असफल हो रहा हूँ। संदेह और भी हताश कर रहा है। किंतु काम तो करना ही है न... हाँ आज खुद के इंसान होने की तस्दीक जरूर हुई। हवा, धूप, छाया, फूल, भँवरे, खुश्बू सब कुछ का अहसास हुआ। यूँ लगा जैसे वह रिवाइव हुआ हो। गार्ड ने हाल-चाल पूछे। सन्मति से मुस्कुराकर तबीयत पूछी। प्यून ने पूछा 'कहीं बाहर गए थे क्या सर?'
पार्किंग से बिल्डिंग तक पहुँचने में ही घबराहट होने लगी। एकबारगी तो लगा कि १० मिनट नीचे ही बैठ जाएँ और फिर सीढ़ियाँ चढ़े। लेकिन फिर यह सोचकर सीढ़ियाँ चढ़ गया कि किसी ने देखा तो खामखाँ चार और सवालों के जवाब देने होंगे और फिर कई लोगों को इतने दिनों की छुट्टी और बीमारी की कैफियत देनी होगी। इसलिए अपनी घबराहट को एक तरफ रखकर दिनकर तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ गया। लेकिन अपनी चेयर पर बैठते-बैठते ही आँखों के आगे अँधेरा छा गया। ठंडे पसीने का रेला सिर से निकलकर कानों के पीछे से बहने लगा। उसने टेबल पर अपना सिर रख दिया। मुँह सूखने लगा था, लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ी। जेब से जैसे-तैसे विटामिन-सी की गोली निकाली और मुँह में डालकर सिर फिर से टेबल पर रख दिया। लगभग १० मिनट तक ऐसे ही रहने के बाद जैसे उसे होश आया था। थोड़ा स्वस्थ होकर घंटी बजाई, प्यून से पानी मंगवाया और कैंटीन फोन किया। 'भाई एक स्ट्रांग कॉफी मेरी टेबल पर भिजवा दो।' विजय ने आवाज पहचान ली थी। गिलास उठाकर पानी का एक बड़ा घूँट लिया और सिर कुर्सी की पुश्त से टिका दिया। थोड़ी ही देर में कॉफी आ गई। आज न जाने क्यों उसे लगा कि कोई ऐसा होता, जिसके साथ बैठकर वह कॉफी पीता। दिमाग पर जोर डाला अभी कौन-कौन है दफ्तर में? सन्मति... नहीं... लड़की को कॉफी ऑफर करना... नहीं। पता नहीं वह क्या सोच ले। अखबार का बंडल सामने खींच लिया। कॉफी का एक घूँट लिया और अखबार की फाइल खोली ही थी कि फोन बजा।
'हलो... मन्ने रोशन सवेरा के आफिस में बात करनी है।'- आवाज किसी देहाती की लगी थी।
'हाँ आप वहीं बात कर रहे हैं।' - चलो कोई नहीं तो किसी से बात ही सही, सोचकर दिनकर ने कहा।
'एक दिन तुम्हारे पेपर में एक न्यूज छपी थी, कोई मंदिर की।' - उसने टूटी-फूटी बात कही।
'किस दिन का अखबार था...? क्या न्यूज थी?'
'रे धर्मू कुण दन को पेपर थो रे...?' - उसने माउथपीस को लगाए हुए ही किसी और से पूछा। दिनकर को सुनकर हँसी आई। 'रूको साब, हूँ देखी के बतऊ तमने।'
'ऊ कोई मंदर की बात थी। जिम्मे न्याय होए। घंटी-घंटी वाला फोटू था जिम्मे। दिन तो कई पतो नी म्हने।' - उसने ब्योरा तो पूरा दिया, लेकिन तारीख नहीं बता पाया।
'ओ... गोलू देवता...?' - दिनकर को भी वह फोटो की वजह से याद रहा, इन सज्जन को भी।
'हओ, वोईज... तुम मने बताओगा कई कि वां कसे जाऊँ?' - उसने बड़ी विनम्रता से पूछा।
'भाई ये अखबार का दफ्तर है, किसी ट्रेवल एजेंट का नहीं। बेहतर होगा कि आप किसी ट्रेवल एजेंट से बात करे या फिर इंटरनेट पर सर्च कर लें।' - कहकर दिनकर ने फोन रख दिया। लोग भी अखबार के दफ्तर को क्या समझते है? दिनकर व्यंग्य से मुस्कुराया। फिर वह इंटरनेट सर्फ करने लगा। कहानियों की एक वेबसाइट मिली। उसे खोलकर वह कहानी पढ़ने लगा कि फिर से फोन बजा।
'साब भोत जरूरी है, तम मन्ने बता दो कि मैं किस तरै वां जऊँ और कितरा पैसा लगेगा।' - उसने सीधे ही कहा।
'भाई कहाँ लगाया है?' - दिनकर मैग्ज़ीन पढ़ते हुए झल्ला गए थे। और उन्होंने फोन बिना उसका जवाब सुने पटक दिया था। कितने काम होते हैं यहाँ, सोलंकी जी कहा करते थे कि प्रेस ऐसी जगह है जहाँ काम कभी खत्म ही नहीं होता है। और इस भाई को लग रहा है जैसे हम यहाँ कॉल सेंटर खोले बैठे हैं। आप फोन करेंगे, हम एट योर सर्विस करेंगे। हूँह...।
दिनकर फिर से लग गया था रूटीन के कामों में। अभी एक पोलिटिकल राइट अप का कन्क्लूजन शुरू ही किया था कि फिर से फोन बजा।
'म्हारी सुण लो भाईजी... भोत परेशान हूँ...' - इससे पहले कि वह इसके आगे कुछ कहे, दिनकर ने चिढ़कर कहा 'अरे ये कॉल सेंटर नहीं है जो कभी भी मुँह उठाकर फोन कर लो और आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। ये अखबार का दफ्तर है यार...। हमें इतनी फुर्सत नहीं होती कि आपकी मदद कर पाएँ।'
दूसरी तरफ से फोन कट गया। दिनकर ने आश्चर्य से रिसिवर को देखा और सिर झटककर रख दिया। फिर से अपने काम में लग गया। दिनकर ने अपना राइट अप पढ़कर फिर से एडिट किया और पेज पर फ्लो कर दिया। आज का काम पूरा हुआ। बॉडी को स्ट्रेच किया और कुर्सी की पीठ से सिर टिका दिया। शांति-सी महसूस हुई। एकाएक उस देहाती की आवाज जैसे फिर से कानों में सुनाई देने लगी। मन थोड़ा बेचैन हो गया। वैसे भी यहाँ किसी के लिए क्या कर देते हैं, अपने अखबार के माध्यम से तो गुमराह ही करते हैं। यदि उसकी कोई मदद कर पाएं तो।
ब्राउजर में जाकर गोलू देवता का मंदिर टाइप किया तो कई सारे पेजेस की लिस्ट सामने आ गई। थोड़ा धैर्य से एक-दो काम के पेजेस को क्लिक किया और पढ़ने लगा। कुछ चीजें नोट की....। फिर इंडियन रेल वेबसाइट खोली रूट को समझने की कोशिश करने लगा तो सवाल उठा कि उन भाई को जाना कहाँ से है? अरे यार... उसे ग्लानि होने लगी। उससे कितने खराब लहजे में बात की... बेचारा मदद ही तो माँग रहा था। फिर भी अपने शहर से ही उसने नैनीताल तक के रूट और ट्रेन के टिकटों की जानकारी निकाली और सब नोट कर लिया। अपने अनुभवों के आधार पर पूरे खर्च का भी अनुमान लगा लिया और एक कागज पर लिखकर अपने ड्रॉवर में सुरक्षित रख दिया। कुछ ठीक लग रहा था तो सोचा चाय पीने चला जाए। लेकिन फिर लगा कि इस बीच उस 'भाई' का फोन आया तो। नाम भी तो पता नहीं है कि वह रिसेप्शन पर कुछ बता कर जाए। बार-बार दिनकर को ग्लानि-सी महसूस हो रही थी। चाय की तलब थी, लेकिन अनूठी जिम्मेदारी उसने खुद ही ले ली थी। अब क्या करे? उसने कैंटीन फोन कर चाय का ऑर्डर दिया।
अब उसे इंतजार है, बस एक फोन का। कहीं फोन की घंटी बजती वह अपनी टेबल पर पड़े फोन को घूरने लगता। शाम होने लगी थी, मन उदास होने लगा था। ऐसा न हो कि उसकी डाँट सुनकर वह अब कभी फोन न करे। उसे लगा यदि ऐसा होगा तो वह बहुत दिनों तक नॉर्मल नहीं हो पाएगा। बाहर दिनकर के स्टॉफ को लगने लगा कि आज सर सुबह से ही केबिन में क्यों जमे हुए हैं?
उसने मन लगाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए, इस विचार से वह मुस्कुरा दिया कि इस तरह का इंतजार तो उसने बस नीरजा के कैंटीन आने का ही किया होगा। पूरी चेतना जैसे कान हो गई थी... जैसे ही घंटी बजी उसने अपना रिसिवर उठा लिया। किसी और का फोन था, निराश हो गया। ६ बजने वाली थी... अब... बस आधा घंटा और है वह दफ्तर में। अब तो जैसे मन प्रार्थना करने लगा। दम जैसे साधा हुआ है, फिर से फोन की घंटी बजी... हलो... उसे लगा जैसे बरसों बाद उसने नीरजा की ही आवाज सुनी। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
'साब प्लीज मेरी मदद कर दो। मैं भोत परेशान हूं, अनपढ़ हूँ कई नी मालम है... कर दोगा तो भगवान तमारो भोत भलो करेगा।' - उसने फिर से उसी दीनता से कहा।
लेकिन दिनकर बहुत उत्साह में आ गया। 'आप लिख सकते हैं? नहीं लिख सकते तो किसी और को फोन दें, मैं लिखवा देता हूँ।'
'हू लिखी लूंगा... तुमतो बोलो साब... भगवान तमारो भोत भलो करेगा। तमारा नाना-नानी खूब तरक्की करे... साब।' - उसके कहने से दिनकर का मन भीगने लगा था। उसने अब तक जो भी नोट किया था। वो सब उसे लिखवा दिया। और कहा 'यदि कुछ और भी जानना हो तो कल दिन में और फोन कर लेना। और हाँ, यदि फैसला आपके पक्ष में आए तो मुझे जरूर याद करना।' - कहते-कहते न जाने कैसे उसका गला भर आया।
उस ग्रामीण ने फोन रखने से पहले उसे बहुत सारे आशीर्वचन दिए... ‘तम खूब तरक्की करो, तमारा नाना-नानी तमारो नाम रोशन करे... तम खूब लंबा जियो.... सदा खुश रहो। भगवान तमारी सदैव भली करे.....’ आदि... आदि। इसी फोन के इंतजार में दिनकर शाम से अपने केबिन में बैठे हुए थे। बात हो जाने के बाद एक गहरी और निश्चिंत साँस ली थी। सामान समेटा और घर के लिए निकल गया था।
गाड़ी के शीशे से दिखता डूबता सूरज उसे पहली बार इतना सुंदर लगा। सिग्नल पर गर्दन हिलाने वाले खिलौने लिए खड़ी लड़की से उसने खिलौने खरीदे... पैसे चुकाते हुए उसके गाल को प्यार से सहलाया। उसकी मीठी-सी मुस्कुराहट को उसने आँखों में कैद कर लिया। घर पहुँचकर उसने चिल्लाकर जया को पुकारा और ताला ढूँढने लगा। जया ने आश्चर्य से उसे देखा...
दिनकर ने जया से कहा 'चलो...।'
'कहाँ?'
'आज कुछ शॉपिंग करते हैं।' - दिनकर ने उसके कंधों को घेरते हुए कहा।
'शॉपिंग... मगर क्या?'
'तुम तो चलो...।' - दिनकर ने उसे दरवाजे से बाहर ढकेल दिया।
'लेकिन चेंज तो कर लूँ?'
'नहीं, ऐसी ही अच्छी लग रही हो। बस चलो।'
गाड़ी चलाते हुए दिनकर को मुग्ध होकर देखती जया ने सोचा... 'आज तुम बहुत अलग लग रहे हो... बहुत अच्छे भी...। '


Sunday, 25 December 2016

कितने मौसम.... कितनी रातें.... !

बारिश

तन्मय जब ऑफिस से निकला था, तब लग नहीं रहा था कि इतनी तेज बारिश होगी। ठीक है कि बारिश के मौसम में यदि बारिश नहीं होगी तो कब होगी, लेकिन इतनी धुआँधार कि कुछ सूझ ही नहीं रहा हो, तभी तो उसे यहाँ अपनी गाड़ी खड़ी करनी पड़ी थी। बबूल के पेड़ के नीचे जिस वक्त उसने अपनी गाड़ी टिकाई थी, तब आसपास का नज़ारा धुँधला रहा था। गाड़ी पर तेज पड़ती बूँदों की टपर-टपर और शीशों पर जमती भाप... अपनी गाड़ी टिकाकर उसने अपने शरीर को थोड़ा रिलेक्स किया था ... उसे एकाएक सलोनी याद आ गई... यही मौसम था, सलोनी जब मैंने तुम्हें पहली बार मार्क किया था... हाँ देखा तो कई बार था, लेकिन उस दिन पहली बार मैंने तुम्हें बार-बार देखा औऱ देखना चाहा था, तुम मुझे उस दिन कुछ खास लगी थी, कितनी अजीब बात है कि लगातार चार साल साथ ऱहे फिर भी मैं तुम्हें ये बात बता नहीं पाया। हरे रंग के सलवार कमीज में लगातार हो रही बारिश में कॉलेज के लॉन की सीढ़ी पर तुम्हें भीगते देखकर एक-साथ पता नहीं क्या-क्या उभरा था। मैं कॉरीडोर में खड़ा था औऱ तुम कॉरीडोर की तरफ पीठ कर सीढ़ियों पर बैठी थी, बारिश में भीग रही थी ... तुम्हारी हिलती हुई पीठ ये बता रही थी कि तुम रो रही थी। उज्वला के उस संबोधन कल्लो को सुनकर तुम अवाक थी, ये तो वहीं कॉरीडोर में खड़े-खड़े ही तुम्हारे चेहरे के भावों से समझ आ गया था, लेकिन तुम इतनी हर्ट हुई थी कि तुम्हें रोना आ जाएगा, ये हम समझ नहीं पाए थे।
हे भगवान तुम आज फिर क्यों याद आ रही हो? तन्मय ने कार की सीट को थोड़ा पीछे किया और रेडियो ऑन कर दिया। कव्वाली शायद शुरू ही हुई है – मेरे नामुराद जुनून का है इलाज कोई तो मौत है... ओह लूनी... फिर तुम। उस दिन भी बारिश ही हो रही थी। कैंटीन में कोने की टेबल पकड़ कर हम लोग बैठे थे। यलो सूट और मेजैंटा दुपट्टा... तुम जब भी याद आती हो अपने कपड़ों के रंग के साथ याद आती हो... समझ नहीं पाता ऐसा क्यों होता है?
तुम शायद कॉफी सिप कर रही थी और एकाएक तुमने कप टेबल पर रख दिया। पीठ को कुर्सी से टिका दिया और आँखें बंद कर ली थी। उस कोलाहल में भी तुमने रेडियो पर बज रही कव्वाली को सुन लिया था। ये इश्क-इश्क है इश्क-इश्क... और खत्म होती कव्वाली के खिंचाव को मैंने तुम्हारे चेहरे के भावों में पढ़ा था। तुम्हारी आँखें तब भी बंद थी, लेकिन एक-एक बूँद आँसू ढ़लक पड़ा था। जब तुमने आँखें खोली थी तो तुम्हारे चेहरे पर जो कुछ नजर आया वो मुझसे सहा नहीं गया था, मैं बाहर हो रही बारिश को देखने लगा था। जब थोड़ी देर बाद तुम सहज हुईं थीं तो मैंने तुमसे पूछा था – रोईं क्यों थीं?
तब तुम जोर से हँसी थी... रोईं नहीं थी, डूबी थीं।
तुम चुप हो गईं थी। बहुत देर बाद तुमने मुझसे कहा था, कभी इस कव्वाली को अँधेरे में अकेले तेज आवाज में सुनना... तुम खुद को बदलता हुआ महसूस करोगे। और आश्चर्य है कि तुम्हारे जाने के बाद ऐसा कोई दिन आ ही नहीं पाया कि वो कव्वाली भी हो, अँधेरा भी औऱ अकेलापन भी... आज भी... इस घनघोर बारिश में वॉल्यूम तेज करने की ही सहूलियत है, बस... वैसे घनघोर बारिश में काफी कुछ अँधेरे जैसा ही हो रहा है, लेकिन अकेलापन कहाँ से लाऊँ... यहाँ तो तुम हो...। फिर भी आज जैसा तुमने कहा था, उसके बहुत अरीब-करीब-सा ही समाँ है। ... तेरा इश्क मैं कैसे छोड़ दूँ, मेरी उम्र भर की तलाश है... बंद आँखें और तुम्हारी हँसती तस्वीर... सच में डूबने का सामान है... औऱ इंतेहा ये है कि बंदे को खुदा करता है इश्क... एक सनसनी-सी बदन में दौड़ गई थी, ठीक उस दिन की तरह, जब इसी तरह की बारिश में मैंने तुम्हें अपने गले लगाया था। बारिश में लुभाते तीखे मरून और हरे रंग के कपड़ों में तुम्हारा चेहरा आसमान की तरफ था और तुम्हें देखते ही मेरे अंदर कुछ तूफान की तेजी से उमड़ने लगा था, तभी तो
वो अहसास जिसे मैं अपनी नींद से भी दूर रखता था, जिसे मैंने कभी अपने अंदर भी नहीं आने दिया था, वो मैं तुमसे कह गया था, अनायास... मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ... सलोनी... मेरी लूनी...। बाहर भीग रहा था, लेकिन अंदर कहीं धीमी-धीमी-सी तपन थीं... तुम्हारी धड़कन मेरी धड़कनों को थपकियाँ दे रही थी... औऱ मैं पागल हो रहा था... बस... मेरा खुद पर भी इख्तियार नहीं था, जिंदगी में पहली बार मैंने महसूस किया था कि हमारे चाहने और हमारे करने के बीच कभी-कभी एक बड़ी-सी खाई बन जाती है, हम खुद अपने आप को भी संभाल नहीं पाते हैं, हम करना क्या चाहते हैं और क्या कर बैठते हैं? तभी तो कोई तर्क, विचार, डर कुछ भी नहीं होता है, हम खालिस चाह में बदल जाते हैं, दिल रूपी माँस के लोथड़े की बजाए धड़कते-जिंदा दिल में…। मुझे पता नहीं है कि तुम इसे सुनती हो तो तुम्हारे अंदर क्या बदलता है, लेकिन मुझे भी कुछ तो अनूठा महसूस हुआ है।
कितनी अजीब बात है, हम एक-दूसरे की धड़कन की आवाज तक को चाहे पहचानते हो, लेकिन अहसासों के लिए हमें कहे हुए शब्दों पर ही भरोसा करना होता है और शब्द... उनकी भी तो सीमा है... गूँगे का गुड़... तुम्हीं से सुना था। उस दिन तो तेज धूप थीं, तुमने कहा था कि बारिश के दिनों में क्वांर जैसी तीखी धूप... सचमुच धरती गर्म हो रही है। हम बस स्टॉप पर खड़े थे, कैसा इत्तफाक था कि बस स्टॉप पर हम दोनों ही थे। बहुत देर से बस का इंतजार कर रहे थे, लेकिन कोई बस नहीं आ रही थी, वो तो बहुत देर बाद पता चला था कि शहर में कहीं बस-ऑपरेटरों और प्रशासन के बीच कुछ तनातनी हुई है, इसलिए तुरंत बसें चलना बंद हो गई थीं। तो एकाएक तेज अँधड़ चला और तीखी-जलाती धूप की जगह काले-भँवर बादल आकर बरसने लगे थे। तेज-तिरछी बौछारें बस स्टॉप के अंदर आकर हमें भिगो रही थी, एकाएक तुम स्टॉप से निकलकर खुले में पहुँच गई, मैं तुम्हें भीगते देख रहा था। गहरे बैंगनी रंग के कपड़े पहने हुए थे तुमने और एकाएक तुमने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया था... मेरे अंदर मीठी-सिहरन दौड़ गई थी, मैंने तुम्हारा हाथ थाम लिया था और मैं भी तुम्हारे साथ भीगने लगा था... ये तो बहुत बाद में समझ में आया था कि तुम बहुत तरल हो, पानी की तरह, बिना किसी ग्रंथि के... बहती हुई। मेरे लिए तो दावत थी, लेकिन तुम्हारे लिए तो मात्र दाल-भात...। मेरी जगह कोई ओर भी होता, तब भी तुमने यही किया होता। जब हम फिर से बस स्टॉप पर आए थे तो तुमने कहा था… बारिश में भीगना... क्या सुख है, कितना... जैसे गूँगे का गुड़... बता ही नहीं पाए कि मीठा है औऱ कितना... !
हे भगवान, अब... तुम्हारी याद से ही नशा होने लगा है लूनी... ओह... तन्मय की आँखें भारी हो गई थी और उसने सीट पर ही खुद को स्ट्रेच कर आँखें मूँद ली थी। रेडियो चल ही रहा था... तेरा ना होना जाने... क्यूँ होना ही है, ना है ये पाना, ना खोना ही है...। मूँदी आँखों में पानी भर आया था, क्या सचमुच? तुमने ऐसी जिद्द क्यों की यार...? क्या बुरा होता यदि हम दोनों ही इस समय साथ होकर ये सुनते, महसूस करते... ? यूँ है तो सब कुछ, और सच पूछो तो ऐसी कोई खराश भी हर वक्त महसूस नहीं होती है, लेकिन जब होती है तो फिर सहने की सीमा के आखिरी सिरे पर होती है, बहुत कुछ तोड़-फोड़ कर देने का मन करता है और सबसे पहले गुस्सा तुम पर आता है.... क्यों किया ऐसा? क्यों.... क्यों?

गर्मी

बहुत दिनों बाद सलोनी को ऐसी छुट्टी और ऐसा अकेलापन मिल पाया है। फागुन की शुरुआत है, लंबी-सी शाम को सलोनी ने इसी छोर से थाम लिया था। छत पर अपनी आराम कुर्सी पर आकर बैठी, चाय का कप... धीमी सी आवाज में चल रहा संतुर... पश्चिम की ओर उतरता सूरज और उसकी नर्म पड़ती धूप, हल्की शॉल सा गुनगुनापन बिखेर रही थी। शाम होते-होते तक सूरज की सारी तल्खियाँ झर गईं थीं, किरणों के ताप के गिर जाने से वो एक सिंदुरी रंग की बॉल सा नजर आ रहा था, उसका रंग बिल्कुल वैसा लग रहा था, जैसा उस दिन मैंने पहना था, जब तुमने मुझसे कहा था कि – मुझे हमेशा ऐसा लगता है लूनी कि तुम रंगों को नहीं रंग तुमको पहनते हैं।
मुझे पहली बार लगा था कि तुम भी मुझे प्यार करने लगे हो, वैसा ऐसा कुछ नहीं था मुझमें कि तुम्हें मुझसे प्यार हो जाए। लेकिन प्यार में कहाँ तर्क चल पाते हैं। इससे पहले तक तो मैं ये भी नहीं जानती थीं कि तुम्हारी जिंदगी में मैं कहाँ हूँ, क्या हूँ? आखिर तुम्हारी जिंदगी में स्मिता जैसी परी थी, जिसके साथ जब भी मैं तुम्हें देखती थी तो मुझे पता नहीं क्यों तुम पर दया आया करती थी, क्यों...? पता नहीं। शायद इसलिए कि स्मिता की वजह से सारे लड़के तुमसे खार खाए हुए नजर आते थे, और खुद स्मिता... हो सकता है, ये गलत हो, लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि वह खुद को प्रिंसेस की तरह प्रेजेंट करती थीं और तुम उसके ग़ुलाम... माफ करना, जैसे रज़िया सुल्तान का प्रेमी याकूत...सलोनी मुस्कुराने लगी थी।
शायद यही दिन थे, वो... तुम और मैं लायब्रेरी में ही बैठे थे, सब जा चुके थे और बाहर निकले तो सूनी सड़कें मिली थी। शाम बस उतर ही रही थी। तब मैंने तुम्हें कहा था कि तुम स्मिता के साथ याकूत की तरह लगते हो... मैंने रात को ही फिल्म देखी थी और तुमने शायद पहले ही देख रखी थीं... तुम झपटे थे मुझ पर, तेज गुस्से में... मेरा पैर उलझा था और मैं धड़ाम से गिरी थी पगडंडी से घास के मैदान पर... पीठ के बल... पता नहीं क्या वजह रही थी, सब कुछ इतना अप्रत्याशित हुआ कि गिर जाने के झटके से या फिर चोट लगने की वजह से भौंचक थी और मुझे रोना आ गया था। बड़े-बड़े आँसू निकल आए... तभी तुमने मेरी आँखों से गिरने वाले आँसुओं को अपने होंठों में समेट लिया और मेरा सिर तुम्हारी छाती से टिक गया...। थोड़ी देर तक हम वैसे ही रहे। मैं वैसे ही सिसक रही थी और तुम इतने फनी तरीके से मुझे मना रहे थे, जैसे बच्चों को मनाया जाता है। चॉकलेट... ओके आइसक्रीम... और मैं हँसी रोककर झूठमूट गुस्सा हो रही थी फिर मैंने जिद करते हुए कहा था नहीं बर्फ का गोला...। तुम्हारे चेहरे पर बहुत बुरे भाव उभरे थे और उसी में तुमने मुझे झिड़का था – बर्फ का गोला? पागल हुई हो क्या? पता भी है उसमें सैकरीन होता है,...
हाँ...हाँ पता है और ये भी पता है कि उससे गला खराब होता है... लेकिन मुझे वही खाना है। - मैंने फिर रूठने का नाटक करते हुए कहा था।
ओके...- तुमने हथियार डाल दिए। - लेकिन कहाँ मिलेगा...?
कैंपस में तो मिलने का सवाल ही नहीं उठता है। लेकिन कभी-कभी नियति भी हमें सरप्राइज कर देती है। हमें एक बर्फ के गोले वाला साइकल पर आते हुए मिला। वो भी यूनिवर्सिटी के पार्क के बाहर वाले रास्ते पर...। मैंने पूछा तुम लोगे... तुमने फिर बुरा-सा मुँह बनाया – नहीं, मैं नहीं खाता।
मैं जानती थी कि तुम ना ही कहोगे। तुम तो आइसक्रीम खाओगे... मटके की कुल्फी भी तुम्हें कहाँ पसंद आएगी। मैंने तुम्हें कहा था – मुझे बर्फ का गोला खाना इसलिए भी पसंद है क्योंकि जिस रंग का गोला हम खाते हैं ना होंठों का रंग वैसा ही हो जाता है।
तुमने मुझे कहा था – तुम कितनी बच्ची हो... ?
तो... मैंने तमककर पूछा था, क्या बच्चा होना बुरा है?
तुमने बाँहों में घेर लिया था। मैंने उससे ऑरेंज और खस बनाने को कहा। तुम बहुत आश्चर्य से मुझे देख रहे थे। हम गोला लेकर पार्क के अंदर आ गए। मैंने तुमसे पूछा भी था – हैव...?
लेकिन तुम वैसे ही बने हुए थे... मैंने चिढ़ाया था – बुड्ढे... तुमने मुझे भींच लिया था।
मैंने बड़े मजे से चुस्की ले-लेकर गोला खत्म किया। ये देखने के लिए कि अब होंठो का रंग कैसा हो गया है उन्हें थोड़ा आगे किया और आँखों की पुतलियों को नीचे झुकाया... तभी तुमने झटके से मेरे होंठो को चूम लिया था और मैं बुरी तरह से हड़बड़ा गई थी। पता है मैं तुम्हें कभी कह नहीं पाई कि तुमने कितनी बार मुझे चौंकाया है।
होली के एक दिन पहले की याद है, मुझे रंग पसंद है, इसलिए होली भी। अगले दिन तो कॉलेज बंद होना था, इसलिए एक दिन पहले सुबह जल्दी उठ गई थी। बिल्डिंग के बच्चों को चॉकलेट का लालच देकर गुब्बारों में पानी भरवाया था। भाभी के बड़े से शॉपिंग बैग में सारे गुब्बारे रखकर मैं ऑटो से कॉलेज पहुँची थी। कॉरीडोर में ही तुम, आस्था, तपन, संजना, प्रतीक राजबीर और रोशनी दिखे थे। ऑटो वाले को पैसे दिए और अपने बैग में से गुब्बारे निकाल-निकाल कर मैं फेंकने लगी थी। इस काम में मैं इतनी मशगूल हो गई थी कि मुझे ये भी ध्यान नहीं रहा कि सामने से डॉ. त्रिपाठी तेजी से चले आ रहे हैं और रोशनी पर गुब्बारे का निशाना साधा तो डॉ. त्रिपाठी को लगा... वे एकाएक तमतमा गए... मुझे डर लगा... पता नहीं क्या कहेंगे। कितने सख्त तो थे वे... उनकी क्लास में बैठते हुए मुझे तो हमेशा डर लगता था, क्योंकि क्लास में बैठे हुए भी मेरा ध्यान पता नहीं कहाँ-कहाँ हुआ करता था। और वो पता नहीं कैसे ताड़ लेते थे कि आपका ध्यान क्लास में नहीं है। और मैं पता नहीं कितनी बार पकड़ाई में आई कि वो मुझसे चिढ़ने लगे थे... तो अब... ! तभी तुम तेजी से लपकते हुए उनके पास गए और अपने हाथ को पीछे कर मुझे भी इशारे से बुलाया। तुमने उनके पैर छुए... सर होली के लिए अग्रिम शुभकामना... और फिर मुझे भी आँखों के इशारे से उनके पैर छूने का आदेश दिया। डॉ. त्रिपाठी नर्म हो गए थे खूब सारे आशीर्वाद दिए थे, तुम्हें तो खैर... लेकिन मुझे भी।
मन... तुम जानते हो, मुझे उस क्षण लगा कि काश तुम मेरे पिता-बड़े भाई होते... कितनी बार और कितने सालों तक मैंने तुममें अपने सिर पर तनी छत की तरह का आश्वासन पाया था। कितनी ऊष्मा... कितना गहरा आश्वासन...बस होने-करने की आजादी... बिना किसी तरह के सवाल-जवाब के... बिना डर, बिना अपराध के अहसास के... तुम गलती करो... मैं हूँ ना संभालने के लिए। पता नहीं तुमने कभी महसूस किया या नहीं, बस इतना-सा आश्वासन ही आपको कैसे सहज-सरल औऱ तरल कर देता है, कितने बच्चों को मिल पाता है? मुझे नहीं मिल पाया। बहुत सारे लोगों की इज़्ज़त और विश्वासों के बोझ को लेकर एक लड़की कैसे गलतियाँ कर सकती है? यूँ भी लड़कियों की गलती तो हमेशा-से ही अक्षम्य होती है। मतलब गलती करने की गलती तो वे कभी कर ही नहीं सकती,
हमेशा ही अच्छी लड़की के सिंड्रोम से ग्रस्त मैं... पता नहीं कहाँ-कैसे तुम्हारे प्यार में बुरी लड़की होती चली गई थी।

सर्दी

शाम को मैं ऑफिस से जल्दी घर आ गया था, थोड़ा बुखार-सा लग रहा था। डॉक्टर से दवा लेता हुआ, घर पहुँचा था। आरती पीहू को लेकर अपनी माँ के घर गई हुई हैं, तो खुद ही बीमार और खुद ही तीमारदार होना है। मैं पहुँचा तो कुसुम खाना बना रही थी, उससे खिचड़ी बनवाई, खाई और दवा लेकर जल्दी ही सो गया। तेज बुखार से बदन दर्द कर रहा था। दवा के असर होने तक तो दर्द में पूरी तरह से डूब ही चुका था। पता नहीं रात का कौन-सा समय रहा होगा, जब तेज गर्मी और पसीने के साथ बुखार उतर गया और दर्द भी चला गया। तेज दर्द के बाद की राहत और कड़े परिश्रम से पाई सफलता की अनुभूति एक-सी ही होती है। एक धुला-पुँछापन होता है, बड़ा सात्विक-सा अहसास होता है... अरे...! ये सब कहाँ से आ रहा है... ओह लूनी... ये तुम हो। खासी ठंड के बीच सुबह से ही बादलों का जमघट था। ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी। जब कुसुम आई तो उससे तेज अदरक वाली कड़क चाय बनवाई और खिड़की के पर्दे खोल दिए। बारिश शुरू हो चली थी। ऐसा भी कब होता है? दर्द से निकलने के बाद गहरी, सात्विक शांति... साफ-सुथरा और उदास-सा सौंधापन... तुम अक्सर कहती थी, बीमारी के बाद हम बिल्कुल नए हो जाते हैं... नए-नकोर... सब पुराना जो हमारे अंदर जंक होता है, बह जाता है और जो काम का होता है, वो भी धुल-पुँछकर चमकने लगता है। सच तुमसे अलग होने के बाद आज पहली बार उसे मैं ठीक उस तरह से महसूस कर पा ऱहा हूँ, जिस तरह से तुमने कहा है। कितनी अजीब तरह का पागलपन था तुम्हारे अंदर ... पता नहीं कहाँ हो और उस पागलपन का क्या करती होगी? कभी-कभी खुद से ही पूछता हूँ – क्या वो आँच अब भी तुम्हारे चेहरे पर नजर आती है? क्या कोई आग अब भी तुम्हारे अंदर दहकती है?
मुझे याद आ रहा है जब हम सब अपने प्रोजेक्ट से सिलसिले में राहुल के गाँव गए थे। यही दिन थे, राहुल ने हमें अपने और अपने रिश्तेदारों के खेत दिखाए। हम सब खेत में ही मटर खा रहे थे, तब तुमने पूछा था – तुम्हारे गाँव में कोई फूलों की खेती करता है?
हम सबने एक साथ पूछा था – फूलों की खेती...!
हाँ
राहुल ने जबाव दिया था – हाँ एक परिवार करता है, लेकिन हम उस तरफ नहीं जाते हैं, कुछ पारिवारिक झगड़े हैं।
लेकिन मुझे वो खेत देखना है, क्या वो रजनीगंधा लगाते हैं? – तुम अब जिद्द पर आ गई थी।
हाँ, शायद...- राहुल ने जवाब दिया था।
तब तो मुझे उस खेत में जाना ही है। हम सबने तुम्हें बहुत समझाया, लेकिन तुम अपनी जिद्द पर अड़ी रही। तुमने कहा - ठीक है, मैं खुद ही उन लोगों से मिल लूँगी। और... और तुम गईं थीं वहाँ... औऱ जब लौटी थी तो हाथ में रजनीगंधा के स्टिक्स लेकर... बिल्कुल बौराई-बौराई सी। और फिर... जब उनका लड़का शहर आया था, तब तुमसे मिलने कॉलेज भी आया था और ... तन्मय को हँसी आ गई थी। फिर वो बार-बार तुमसे मिलने आने लगा था, तुम खीझी भी थी दो-एक बार लेकिन उसका आना बंद नहीं हुआ था। जब मैंने तुमसे कहा था कि वो तुम पर चांस मार रहा है तो तुम कितने दिनों तक मुँह फुलाए रही थी...? बोलो लूनी क्या तुम उन दिनों का हिसाब मुझे दो सकती हो...? अचानक तन्मय उदास हो गया, फिर मैंने भी तुम्हें मनाने की कोशिश कहाँ की... तुम ही क्यों मेरे पास भी तो उन दिनों का हिसाब नहीं है।
मुझे याद है उन दिनों तुम अक्सर प्रेरणा मैम की क्लास बंक करके घर चली जाती थी। तुम बस शाम तक अपने घर पहुँच जाना चाहती थी, और सर्दियों में तो यूँ भी शाम बहुत जल्दी होती थी और छोटी भी… तो लगभग हर दिन सवा तीन वाली क्लास बंक करके चली जाती थी, एक दिन जब पिछले रास्ते से तुम जा रही थी, तभी प्रेरणा मैम सामने पड़ी थी और उन्होंने तुमसे पूछा था – सलोनी तुम मेरी क्लास में क्यों नहीं आ रही हो...?
और तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं था, तुम हड़बड़ा गई थी और तुमने कहा था – क्योंकि शाम जल्दी हो जाती है... और प्रेरणा मैम सहित सारे ही ठहाके मार कर हँस दिए थे। कभी-कभी तुम्हारी बातें बड़ी अजीब हुआ करती थीं, तुम कहती थीं कि तुम्हें शाम इसलिए पसंद हैं, क्योंकि वो उदास करती है... तो क्या उदास होने के लिए तुम बेचैन हुआ करती थी? उस दिन सेमिनार का आखिरी दिन था और शाम को संजुक्ता पाणिग्रही का ओडिसी था... हाँ ओडिसी..., जिसे मैंने कथक कह दिया था और तुमने मेरे सिर पर एक चपत लगाई थी... कथक नहीं, ओडिसी...। मैंने भी लापरवाही से कहा – हाँ क्या फर्क पड़ता है, दोनों ही तो डांस हैं...
तो तुमने सीधे मेरी आँखों में आँखे डाल कर सवाल किया था – सचमुच फर्क नहीं पड़ता...? स्मिता या मैं... दोनों ही तो लड़कियाँ हैं? मुझे नहीं पता था कि तुम्हें कहाँ और कब ऐसा लगा था कि मैं तुमसे सचमुच प्यार कर बैठा हूँ... स्मिता के बावजूद...।
उस दिन सेकंड सैशन से निबटते-निबटते ही चार बज चुकी थी, तुम्हारा घर जाना और लौटकर आना संभव नहीं था... उस दिन मैंने पहली बार तुम्हें शाम को देखा था और शायद पहली ही बार उदास होते भी। टी-ब्रेक के बाद हमारा काम यूँ भी खत्म हो जाया करता था, इसलिए सब इधर-उधर हो गए थे... तुम भी... थोड़ी देर तो मुझे अहसास ही नहीं हुआ था, लेकिन जब याद आया कि आज तुम घर नहीं जाने वाली हो तो, तुम्हें ढूँढना शुरू किया। तुम फूड टेंट के पीछे एक कुर्सी लगाकर बैठी थी, मैं जब तुम्हें ढूँढता हुआ वहाँ पहुँचा तो एकाएक मुझे लगा कि – तुम पूरा-का-पूरा आसमान ओढ़े बैठी हो... हालाँकि तुम्हारे कपड़ो का रंग गहरा आसमानी... नहीं डार्क ब्लू था, फिर भी... तुम्हारी आँखों में शाम उतर आई थी... गीली-सीली-सी...। और जब मैंने आकर तुम्हें जगाया था, तब तुम बुरी तरह से खिन्न नजर आई थी... क्या हुआ? – मेरे पूछने पर तुमने कुछ भी नहीं कहा था, बस ‘कुछ नहीं’ में गर्दन हिला दी थी।
तुम कभी-कभी बहुत अजीब तरीके से बिहेव करती थी... उस दिन मैंने तुम्हें बहुत उदास पाया था... बहुत-बहुत, इतना कि मैं डर गया था। आखिर तुम्हें तो मैंने कभी भी उदास नहीं देखा था। मैं बहुत असमंजस में था कि क्या कहूँ, कैसे कहूँ? तुम्हें इस उदासी से कैसे बाहर निकालूँ? देखता हूँ कि थोड़ी ही देर बाद तुमने चहक कर कहा था – कितना अच्छा लग रहा है ना मन...? और मैं तुम्हारे चेहरे को पढ़कर जानने की कोशिश कर रहा था कि क्या सचमुच तुम्हें अच्छा लग रहा है या फिर तुम मुझे बहला रही हो, लेकिन तुम्हारा चेहरा उस वक्त पूरी तरह से पारदर्शी था, चमक रहा था उस अच्छे लगने से जिसे अभी-अभी तुमने कहा था।
और... और यही वो दिन थे, जब तुमने कहा था कि – अब हमें इस खूबसूरत सपने को अपनी यादों में जिंदा रखना है।
मैंने चौंक कर पूछा था – क्या मतलब है इस बात का? – उस वक्त मेरा प्लेसमेंट हो चुका था, मुझे दो महीने बाद सिंगापुर जाना था औऱ मैं तुमसे शादी करके तुम्हारे साथ जाना चाहता था, मैं तुम्हें ये बता भी चुका था, लेकिन तुम... तुम्हारे अंदर पता नहीं क्या चल रहा था?
मतलब... बिल्कुल साफ है... प्यार रात का सपना है, यदि उसे शादी में कंवर्ट कर दो तो वो टूट जाएगा। न वो बचेगा न उसकी खुशनुमा यादें... हम शादी में कंवर्ट करके उसे सड़ा नहीं सकते हैं। - तुमने कहा था।
मतलब तुम मुझसे शादी नहीं करना चाहती हो? – मैं तिलमिला गया था।
नहीं... – तुमने कहा था, आँखों में आँसू उतर आए थे, तुम्हारी, फिर भी तुम दृढ़ थीं।
मैंने एक तरह से तुम्हारी चिरौरी की थी, - मैं तुम्हारे पापा से बात कर लूँगा ना... हैव फेथ ऑन मी।
नहीं... मैं तुमसे शादी करना ही नहीं चाहती... – तुमने बहुत संयत होकर कहा था
मुझ पर पागलपन सवार होने लगा था। - क्यों – मैं लगभग चीखने लगा था - तुम मुझे क्या समझती हो? क्या मैं खिलौना हूँ, जब तक तुम्हें मेरा साथ अच्छा लगा मेरे साथ रही, फिर एकाएक एक दिन कह देती हो कि अब बस...। मैडम ये फैसला तुम अकेली नहीं ले सकती हो...।
तुम बहुत संयत होकर सुनते रही। कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, मैं बहुत देर तक चीखता रहा और फिर थककर चुप हो गया। तुम्हें पता है, वो शायद पहली और आखिरी बार हुआ है कि मुझे तुम्हारे कपड़ों का रंग याद नहीं है।
थोड़ी देर बाद तुम खड़ी हो गई... मैं अपना सिर पकड़कर तुम्हारे सामने बैठा था, मुझे नहीं पता चला कि तुम खड़ी हो गई हो, तुमने कहा – तो ठीक है, शादी का फैसला भी तुम अकेले नहीं ले सकते हो..., मैं नहीं करना चाहती हूँ, अब बोलो तुम क्या करने वाले हो?
मैं अवाक था... और अब मजबूर भी... लेकिन क्यों? आई प्रॉमिस मैं कुछ भी नहीं सड़ने दूँगा, कुछ भी नहीं टूटने दूँगा। भरोसा तो रखो...
नहीं...- फिर तुमने सीधे मेरी आँखों में झाँका। जिस पराएपन और बेरूखी से तुमने मुझसे नहीं कहा था, मैंने ऐसा कभी तुम्हें देखा ही नहीं था। मैं झटके से खड़ा हुआ और तुम्हें जोर से धक्का दिया और तेजी से वहाँ से चला गया। फिर कभी मैंने पलट कर तुम्हें नहीं देखा न ही तुम्हारे बारे में जानना चाहा और न ही सुनना...।
करीब साल भर बाद तुम्हारा एक लेटर मिला था, जिसमें तुमने अपना पक्ष रखा था और कहा था कि – ‘हमने रिश्ते को शिद्दत से जिया है और हम अब इसे एक मीठी कसक और याद के साथ अपने साथ रखें। बस इतना ही मैंने चाहा था, यदि ये गलत है तो फिर मुझे माफ कर देना, क्योंकि मुझे यही सही लगा था।‘
मेरे लिए तुम्हारे इस पत्र का कोई औचित्य ही नहीं बचा था, तुम मुझे अकेला छोड़कर चली गईं थी, अपनी जिद्द और कथित सपनों के लिए। बहुत साल मुझे तुमसे शिकायत रही, लेकिन उसका फायदा क्या रहा, तुम्हारे बारे में बाद में मुझे कभी कुछ भी सुनने को नहीं मिला। बल्कि यूँ कहूँ कि हकीकत ये है कि मैंने ही तुम्हारे बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। मैंने वो शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया और फिर कभी-कभी पलट कर वहाँ नहीं गया। बल्कि मैंने हर उस शख़्स से अपना रिश्ता तोड़ दिया, जो कभी तुमसे जुड़ा हुआ था। आज मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ, क्योंकि मैं स्थिर हो गया हूँ, अब तुम मुझे जब भी याद आती हो, बहुत मीठा-सा कुछ लगने लगता है। शायद उम्र ने सारी कड़वाहट धो डाली है। सुनो लूनी गज़ल चल रही है – तुम भी उस वक्त याद आते हो, जब कोई आसरा नहीं होता...। अब तो यूँ भी सब कुछ ठहर गया है, शायद इसलिए यादों की जुगाली ही बाकी रह जाती है, भविष्य में कुछ होता नहीं और वर्तमान पूरी तरह से ठहरा हुआ है...। कभी-कभी मैं भी तुम-सा हो जाता हूँ, सच अब भी...। उम्र के फासलों के इस पार फिर मैं वही मैं हो जाता हूँ और तुम वही तुम...। सारा गुजरा वक्त कहीं गुम हो जाता है, मेरी दुनिया जो दिखाई देती है, वो भी कहीं अदृश्य हो जाती है, तुम्हारी दुनिया का तो मुझे कोई पता ही नहीं है तो वो तो कोई मसला ही नहीं है, तुम वैसी ही बेलौस, बिंदास और खुली हुई-सी मेरे साथ होती हो, जैसी हुआ करती थी। मेरा दिमाग कहता है कि तुम सही थी, क्योंकि तुमने वो देखा था, जिसे मैं नहीं देख पाया। तुम्हें मैं किसी भी तरह याद कर सकता हूँ, जी सकता हूँ, साथ हो सकता हूँ। साथ होती तो शायद ये संभव नहीं हो पाता..., लेकिन दिल नहीं मानता है। वो कहता है तुमने अपनी जिद्द को जिंदा रखने के लिए मेरे साथ खिलवाड़ किया है, पता नहीं कौन सही है?

बसंत-पतझड़

हॉल में काफी गहमा-गहमी थी। स्टेज पर चलने वाले कार्यक्रमों की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं था। हर कोई अपने पुराने दिनों को पुराने रिश्तों और दोस्तों के बीच जिंदा कर लेना चाहता था। पता नहीं सलोनी को क्यों उम्मीद नहीं थी कि तन्मय आएगा। और तन्मय को भी ये उम्मीद नहीं थी कि सलोनी आएगी। लेकिन कोई आस तो होगी, तभी तो दोनों इस अलम्नाई मीट में आए थे। तो जब तन्मय संजना के हस्बैंड से बात कर रहा था, तभी उसकी नजर गेट की तरफ पड़ी थी। सलोनी... पीली कांजीवरम में...। पता नहीं कैसे कदम उसी ओर बढ़ गए। ये बेखुदी थी... तो क्या दूरियों में भी कुछ ऐसा रह जाता है, जो दिल की तरह ही लगातार धड़कता रहता है, लेकिन हमें उसकी इतनी आदत होती है, कि हम उसका धड़कना महसूस ही नहीं कर पाते। वो बहुत बेखयाली में वहाँ पहुँच तो गया था, लेकिन सामने जाते ही समझ नहीं पाया कि क्या करे तो थोड़ी दूर ही ठिठक गया...। सलोनी ने आगे बढ़कर उसे बाँहों में ले लिया। तन्मय के अंदर कुछ पिघलकर बह निकला।
कितने सालों बाद... – वो बुदबुदाया था, लेकिन सलोनी ने सुन लिया था।
पंद्रह... – वो उसी तरह खिलखिलाई थी। - देखो अभी तक सेंसेज वैसे ही हैं।
तुम... सचमुच नहीं बदली। अभी भी वैसी ही हो।
क्यों... ?- उसने आँख मारकर पूछा था – बदल जाना चाहिए था?
तन्मय ने थोड़ा झेंपते हुए कहा था – पता नहीं, लेकिन इतने सालों में सब बदल जाते हैं। तो यही एक्सपेक्टेड होता है ना... ?
वो फिर खुलकर हँसी। - और यदि ऐसा नहीं हो तो... – सीधे आँखों में झाँका था। - निराशा होती है... ? – जवाब का इंतजार किया थोड़ी देर फिर बोली - तुम भी तो नहीं बदले। - फिर थोड़ा हट कर उसे तौलती नजरों से देखा, फिर बोली – पहले ही बड़े-बड़े लगते थे, अब थोड़ा और बड़े लगने लगे हो... ।
धीरे-धीरे सारे दोस्तों ने आकर उसे घेर लिया। अकेली आई हो? – राजवीर ने पूछा था।
नहीं... अनिरुद्ध और बिहाग भी है, दोनों आ रहे हैं।
दिनभर दोस्तों से मिलने का क्रम चलता रहा। शाम को कल्चरल प्रोग्राम था, स्थानीय वोकल क्लासिकल आर्टिस्ट गाने वाले थे। अनिरुद्ध और बिहाग ने सलोनी से अलग अपना प्रोग्राम बनाया था। रात के खाने के बाद कैंपस के लॉन में ही सारे पुराने दोस्त जमा हुए थे। अलग-अलग गुजरे अपने वक्तों की जुगाली करते हुए। तभी राहुल ने गाना शुरू किया था – हम हैं राही प्यार के हमसे कुछ ना बोलिए...। धीरे-धीरे सभी उसके गाने में शामिल होते चले गए और फिर ये सामूहिकता सोलो गानों की माँग में बदल गई। सलोनी और प्रियंका साथ में बैठी थीं। कुछ के स्पाउस साथ थे तो ज्यादातर सोने जा चुके थे। सलोनी ने ब्लैक कलर का सलवार कमीज पहना था। तन्मय ने उसे पहली बार ब्लैक कपड़ों में देखा था, वह सोच रहा था, तब सलोनी ब्लैक कलर क्यों नहीं पहनती थीं, उस पर कितना अच्छा लग रहा है। प्रतीक ने जब सीटी बजाते हुए आए तुम याद मुझे गाने लगी हर धड़कन सुनाया। प्रियंका ने सुनाया ओ सजना बरखा बहार आई.... तन्मय सोच रहा था, सलोनी क्या गाएगी और कैसा, क्योंकि इससे पहले कभी सोचा ही नहीं कि सलोनी गाती होगी, गा सकती होगी या कैसा गाती होगी...? सलोनी ने सुनाया – एक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवां रहने दिया/ जानकर हमने उन्हें नामेहरबां रहने दिया.... तन्मय कहीं डूब गया, सलोनी का गला तो मीठा है, लेकिन वो सुरीली भी है, ये आज पता चला। वो सोच रहा है कि हम समझते हैं कि हमने किसी को पूरा जान लिया, लेकिन ये बड़ा भ्रम होता है, क्योंकि जान लेना अभी है, जबकि हर क्षण कुछ नया जुड़ता-बढ़ता या घटता है। फिर क्या किसी का होना क्या इतना ही होता है कि अपनी समझ के दायरे में समा ही जाए? हम अपने होने को खुद भी कितना जान पाते हैं...? ये तुम ही कहती थीं ना सलोनी.... फिर वहीं आकर अटक गया वो ...। तन्मय की बारी आई तो उसने सबको सैड कर दिया बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी... गाकर। तन्मय के खतम करते न करते तपन ने शुरू कर दिया - ओए तू रात खड़ी थी छत पे नी मैं समझा के चाँद निकला... और सारे ही झूमने लगे। वक्त गुजर रहा था, सबने एक-दूसरे का पता लिया, कांटेक्ट नंबर लिए और फिर से मिलने का वादा किया, सब अपने-अपने रास्ते चले गए। सलोनी पता नहीं किस चीज का इंतजार कर रही थी और तन्मय भी।
रात बहुत घनी हो गई थी। सलोनी थोड़ा आगे बढ़ी तो सूखे पत्तों की चर्रमर्र हुई। तो... – तन्मय ने उसकी तरफ देखा। सलोनी ने हाथ आगे बढ़ाया और तन्मय ने थाम लिया। दोनों साथ-साथ चलने लगे। तुमने मुझे अपना कांटेक्ट नंबर नहीं दिया – तन्मय ने बहुत सहजता से पूछा।
सलोनी ने सुबह वाली मुस्कान बिखेर कर कहा – मैंने लिया भी तो नहीं...!
उसे ध्यान आया, अरे हाँ... – तो ले लो...
नहीं, मन... वो सब इसलिए नहीं हुआ था कि फिर बूँद-बूँद खुद को भरते रहे। - वो बहुत गंभीर थी।
हुआ नहीं था, किया था... – तन्मय न चाहते हुए भी तल्ख हो गया था।
ठीक है, किया था, और मैंने ही किया था। क्या तुम्हारी जिंदगी में अब भी कुछ कम है? - उसका हाथ तन्मय के हाथ में पसीज रहा था। - बहुत सोचकर जवाब देना।
कभी-कभी लगता है, हाँ है...
और अक्सर....
अक्सर तो... – तन्मय हड़बड़ा गया
रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है, यही ना... ! – सलोनी ने उसकी बात पूरी की।
तन्मय जवाब नहीं दे पाया, लेकिन उसने सलोनी के चेहरे की तरफ देखा। वो गर्दन झुकाए थी, कुछ बचा रही थी या फिर ...?
हाँ, कहो... क्योंकि यही सच है। मन, .... मैं नहीं चाहती थी कि हम एक-दूसरे के जीवन में बस यूँ ही रह जाए। रूटीन की तरह... बिना किसी ऊष्मा, गर्माहट या फिर तड़प के...।
लेकिन हम अब भी ऐसे ही हैं ना... मैं आरती के साथ और तुम अनिरूद्ध के साथ... ? – तन्मय ने जान-बूझकर चोट की थी।
हाँ, यही तो... यही तो मैं नहीं चाहती थी कि जो उन्माद वैसे जिया है, वो रूका हुआ पानी हो जाए। हम एकदूसरे को जब भी याद आते हैं, तब तीखी तड़प महसूस होती है.... होती है ना...! – सलोनी तन्मय के बिल्कुल सामने आ खड़ी हुई। वो हड़बड़ा गया।
हाँ... – एकाएक उसका मन हुआ कि सलोनी को बाँहों में ले लें, लेकिन फिर रूक गया।
बस... क्योंकि याद... ख्वाहिश... और उम्मीद, यही तो वो चीजें है, जिनके सिरे पकड़कर जिंदगी रंग-बिरंगी होती है, हर दिन नई होती है। पता है, सपने पूरे हो जाने का मतलब है उनका मर जाना। जिंदगी कभी मरती नहीं है, हर मरे हुए सपने की कब्र पर एक नया सपना जन्म लेता है। मैं तुम्हारी जिंदगी में मरा हुआ सपना बन कर नही रहना चाहती थी, और न ये चाहती थी कि तुम्हारे साथ ऐसा हो...। – उसका गला रूँध गया, वो चुप हो गई।
‘लेकिन इसकी कितनी बड़ी कीमत दी है, मैंने, तुमने सोचा है? कितनी रातें, कितने मौसम….।’
‘तो क्या मैं इससे अलग रही?’- सलोनी ने बीच में से ही बात लपक ली।
बहुत देर तक दोनों ही चुपचाप चलते रहे। रात गुजरती जा रही थी और दोनों अँधेरे के बीच अपने-अपने जज्बातों को कुछ खोलते, कुछ छुपाते एक-दूसरे का हाथ थामे चलते रहे। एकाएक वो उनींदे अँधेरे से निकलकर सड़क की धुँधली-शांत रोशनी में आ खड़े हुए। कैम्पस से निकलकर मुख्य सड़क पर... यहाँ दूर-दूर तक शांति थी। सूनी-सी सड़क के दोनों ओर जल रही स्ट्रीट लाइट और दूर-दूर तक फैला सन्नाटा...।
सलोनी ने ही चुप्पी तोड़ी – मन... सोचो, यदि हम पति-पत्नी होते तो बच्चों की पढ़ाई, उनका भविष्य, तुम्हारे भाई की शादी, मेरी माँ की बीमारी, हमारे भविष्य की प्लानिंग, राशन की किटकिट, बिजली का बिल, टेलीफोन का बिल, मकान की किश्त, हमारे ईगो, हमारे सामाजिक संबंध, रसोई गैस के खत्म होने से लेकर ट्रांसफर या फिर प्रमोशन जैसी कितनी गैर-जरूरी चीजों से हमारा सरोकार हो जाता और मूल चीज कहीं हाशिए पर चली जाती। सपना मर जाता.... हम बस सामाजिक संबंधों के दायरे में कैद हो जाते, ख्वाहिशें मर जाती और हकीकत ही हमारे बीच रह जाती। अभी हम ये सोच तो सकते हैं कि यदि हम साथ होते तो कैसा होता... तब हो सकता है, हम ये सोचने की बजाए शायद ये सोचते कि ये यदि ये नहीं होता तो हमारा जीवन कैसा होता... यदि साथ रहते हुए हम ये सोचते तो कितना बुरा होता... सोचो....।
मुझे पता नहीं है, शायद तुम ही सही हो, लेकिन दिल कहता है कि यदि वैसा होता तो हम उसे मरने नहीं देते, दिमाग कहता है कि रूका पानी हर हाल में सड़ता ही है... मैं अभी निश्चित नहीं हूँ, कि मैं सही हूँ या गलत। - तन्मय ने जवाब दिया।
और मेरे सही या गलत होने को लेकर क्या कहना है आपका... – सलोनी फिर मस्ती में लौट आई।
तुम गलत हो.... – तन्मय ने हाथ की पकड़ कड़ी कर कहा।
तो... माफ कर सकते हो?
कर दिया यार... माफ करना भी मजबूरी है, प्यार जो... - तुरंत सलोनी ने उसके होंठों पर हाथ रखकर उसे रोक दिया। दोनों चलते-चलते शहर के उस होटल के नीचे आ खड़े हुए जहाँ सलोनी ठहरी हुई है।
दोनों एक दूसरे के सामने थे। तन्मय जानता था कि अब पता नहीं कब मिले, मिलें या कि नहीं मिले। - केन आई हग यू...? – तन्मय ने पूछा था
सलोनी ने बाँहें फैला दी... – अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले... वो बुदबुदा रही थी। तन्मय की आँखों में पानी तैरने लगा था। वो देख नहीं पाया कि सलोनी की आँखों में भी वही उतर गया था। दोनों अलग हुए, सलोनी तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ गई... तन्मय ने उसे आखिर तक जाते हुए देखा और फिर उस सूनी सड़क पर चल दिया... जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले... सलोनी की छोड़ी हुई लाइन को गुनगुनाते हुए।

Sunday, 10 November 2013

अनुभवों के इस पार...

माँ को हमेशा ही ये दुख रहा है कि इस लड़की का घर के किसी काम में मन नहीं लगता है। कभी उन्हें बेटी की माँ होने का सुख भी नहीं मिला। अपनी छोटी बहन की छोटी-छोटी बेटियाँ घर का काम करती और माँ को आराम देती, लेकिन उनकी बेटी घर के काम में जरा भी हाथ नहीं बँटाती थी। कोई पढ़ने-लिखने में ऐसा तीर भी नहीं मार रही थी कि लगे चलो, घर के काम नहीं तो कम-से-कम पढ़ाई में तो अव्वल आ रही है। उसने माँ को किसी भी मोर्चे पर गर्व करने का मौका नहीं दिया। बाद के सालों में हमेशा उसे ये महसूस होता रहा। अक्सर त्यौहारों के मौकों पर जब घर का काम बढ़ जाता, तब माँ को बहुत ही ज्यादा इस बात का अहसास होता कि काश उनकी बेटी भी उनके काम में हाथ बँटाए तो उन्हें थोड़ी राहत हो। जब कभी माँ ने उससे ये कहा... उसने ये कह कर माँ को चुप करा दिया कि आपसे जितना बने आप उतना ही क्यों नहीं करती हैं? दुनिया में सब काम मोल होता है। सब काम आप खुद ही क्यों करना चाहती हैं?
समझ में तो माँ को भी नहीं आता कि उन्हें ऐसी क्या ज़िद्द होती है कि वो घर का हर काम खुद करना चाहती हैं? अब दीपावली के कामों को ही देख लो... सफाई के बाद भी कितने काम ऐसे होते हैं, जो दीपावली के ऐन दिन तक चलते हैं या फिर उसी दिन किए जाते हैं। न तो वो किसी काम को मिस करती है और न ही किसी और से करवाती है। यहाँ तक कि एक बार खुद पापा ने कहा था कि इतने हैक्टिक शेड्यूल में रंगोली बनाना कोई जरूरी तो नहीं है, मत बनाओ...। तो माँ ने चिढ़कर कहा था कि ‘तो क्या दीपावली बिना रंगोली के ही निकल जाने दूँ?’ दादी ने सुझाया कि ‘बाजार में इतनी बड़ी-बड़ी रंगोली तैयार मिलती है, (उनका मतलब स्टिकर से था) वो ही लाकर लगा देते हैं। दो घंटे कमर और गर्दन तोड़कर बनाती हो और अगले दिन उसे झाड़ू से साफ कर दो... ये भी कोई बात हुई भला’, लेकिन माँ ने कभी किसी का कहा माना है जो अब मानती...! हर दीपावली पर यही सब कुछ दोहराया जाता...। यूँ रोली को बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन जब माँ रोली पर खिझती थी, तब उसे लगता था कि जब माँ से होता नहीं है तो इतना सब करती ही क्यों है? माँ खुद ही नहीं जानती रोली को क्या बताती... बस सब ऐसा ही चलता रहा।
शादी होकर ससुराल आई तो सासूमाँ को भी ऐसा ही सब कुछ करते देखा। माँ की तरह सासूमाँ से भी उसने यही कहा कि चूँकि ‘मैं मदद नहीं करा सकती है, इसलिए क्यों नहीं हम सब मोल करवा-मंगवा ले...।’ लेकिन माँ की ही तरह सासूमाँ ने भी इंकार कर दिया। उनके पास अपने तर्क थे... ‘घर का शुद्ध होता है’, ‘जिस तरह से हम कर सकते हैं, कामवाले थोड़ी करते हैं’, ‘पैसा कितना लगता है’, ‘बाजार से कितना और क्या-क्या आएगा’, ‘फिर त्यौहार पता ही कैसे लगेगा’ या फिर ‘जो कुछ पारंपरिक तौर पर बनता है, वो सब थोड़ी बाजार में मिल जाता है’। रोली का अब भी घर के कामों में बहुत मन नहीं रमता था। हालाँकि थोड़ा-थोड़ा करने लगी थी, लेकिन बहुत ज्यादा तब भी नहीं। फिर सासूमाँ ने उस पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी डाली भी नहीं थी। जिंदगी बहुत मजे में कट रही थी। उसने माँ और सासूमाँ की एप्रोच को ‘दुनिया की सारी माँओं’ के एक जैसे होने के खाँचे में डाल दिया था, क्योंकि आखिर माँ और सासूमाँ में बहुत सारी असमानताएँ थी, लेकिन इस मामले में दोनों ही एक-जैसी निकलीं।
उस साल दिवाली पर सब कुछ गड़बड़ हो गया। बरसात कुंवार के आखिर तक खिंचती चली आई... बरसात-गर्मी, गर्मी-बरसात में सासूमाँ बीमार हो गई। सफाई जैसे-तैसे कामवालों के भरोसे खींची... बस खींच ही ली थी। वो भी समझ रही थीं, कैसे हो सकता है। मुश्किल नौकरी के बीच घर के काम और उस पर त्यौहार के अतिरिक्त काम, उनकी बेबसी ये कि वे खुद कोई मदद कर पाने की स्थिति में नहीं थी। अक्षत भरसक मदद कर रहे थे, लेकिन वो भी बार-बार वही कह रहे थे, जो कुछ अब तक रोली कहती आई थी। जितना हो, बस उतना ही करो... लेकिन रोली थी कि जाने से पहले बहुत कुछ निबटा कर जाती और देर से आती तब भी आकर भिड़कर काम करती। थककर सोती और सुबह उठकर फिर से वही चक्की। दिन-रात, रात-दिन एक कर उसने बहुत सारे काम किए...। आखिर में मिठाई बनाने की बारी आई, जाने कैसी हुलस थी कि हर चीज़ खुद बनाना चाही थी रोली ने। सासूमाँ और अक्षत दोनों ने ही उससे कितना कहा कि बाज़ार से जो चाहो खरीदा जा सकता है। बहुत मत बनाओ... उस शाम मठरी, चक्की, चिवड़ा, चकली, सेंव, लड्डू, शकरपारे की थालियाँ भरकर जब उसने डायनिंग टेबल पर सजाई तो जाने कैसा संतोष का भाव उभरकर आया, उसे जो महसूस हुआ उसके लिए उसके पास शब्द नहीं थे, बस भाव थे... तृप्त, संतृप्त...। सबकुछ उसने अक्षत की मदद से बनाया, कुछ बहुत अच्छा बना और कुछ में कसर रह गई... लेकिन उसने बनाया। लेकिन रंगोली रह गई... अरे, रंगोली के बिना दिवाली कैसी... ? अगली सुबह जल्दी उठकर उसने रंगोली बनाई, बंदनवार सजाए... सोफा-कवर, कुशन-कवर, पर्दे और चादरें बदलीं... और सुकून से सबकुछ को निहारने लगी तो लगा बहुत दिन बाद वो खुद के बहुत आकर बैठी। इतने वक्त में उसे खुद का ख़याल ही नहीं आया। उसने खुद से सवाल किया ‘आखिर, कितने सालों से पहले वह माँ को फिर सासूमाँ को कहती आई कि इतना मर-भिड़कर त्यौहार मनाने का फायदा क्या है? सारा बाज़ार आखिर क्यों सजा होता है, त्यौहार के लिए? और अब खुद ने भी वही सब किया...!’ रोली उलझ गई... इतने दिनों से लगी रही और अब जब त्यौहार के मुहाने पर खड़ी है, सवाल आ खड़ा हुआ, ‘जिस सबका उसने विरोध किया, वही सब उसने भी किया... क्यों???’ चैतन्यता में पैदा हुआ सवाल रात भर में छनकर अवचेतन में उतर गया। नींद एक तरफ अवचेतन की प्रक्रिया दूसरी तरफ... नींद में ही जवाब भी उभरा था। खुद करने के बाद जो मिलता है उसे ही आनंद कहा जा सकता है। बिना किए आनंद की सृष्टि नहीं होती। पहली बार उसे महसूस हुआ था कि वो खुद दीवाली मना रही है। जो कुछ माँ और सासूमाँ करती रहीं, उसका सार अब समझ में आया। कर्म से ही आनंद की उत्पत्ति होती है, अकर्मण्यता सिर्फ उदासीनता को ही पोसती है। नरक चौदस की सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह बहुत हल्की-फुल्की थी... सबकुछ उसने अपने मन-मुताबिक कर डाला था। बस गिफ्ट्स नहीं खरीद पाई थी। ओ... चलो, जल्दी खाना निबटाकर ये भी आज कर डालूँ, आखिर कल ही तो है दीपावली...। शरीर की अनिच्छा के बावजूद मन तरंगित था और उसी की तरंग में उसने बिस्तर छोड़ दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र 151
कर्म से ही रस की निष्पत्ति संभव है.


Wednesday, 4 September 2013

सहना-होना

जाने किसका नुकसान बड़ा है, या किसका दुख बड़ा है, लेकिन लगभग पांच महीने बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा कि शायद मैंने अपने दुख को बड़ा समझ लिया है। उस दोपहर जब मैं उससे मिला तो वह अपनी खिड़की के नीचे दीवार से पीठ लगाए बैठा था, हमेशा की तरह कमरे का दरवाजा खुला हुआ था पश्चिम की तरफ खुलती खिड़की से आती धूप की कतरनें उसके सिर से गुज़रकर कमरे के बीचों बीच बिछी हुई थी। वो बेख़याली में था... इतना कि मैं चलकर कमरे के बीचों बीच तक पहुँच गया था, धूप के जिस चोकोर टुकड़े को वो एकटक देख रहा था, मैंने उसे काट दिया था... तब भी वो उसे ही देख रहा था। कुछ देर मैं ऐसे ही खड़ा रहा, उसकी धूप पर अपने शरीर को टिकाए हुए... एकाएक वो लौटा खुद में... मुझे देखकर वो खड़ा हो गया। खिड़की की चोखट पर दोनों हथेलियाँ टिकाए, जैसे वो खुद को मेरे हवाले कर रहा हो... जाने क्या था उसकी आँखों में कि मेरा अपराध बोध गहराने लगा था। पाँच महीने गुज़र गए थे, मैंने पलटकर उसे देखा नहीं था।
इतना ही वक्त लगा था, मुझे ये समझने में कि चाहे हम दोनों के दुख की शक्लें अलग-अलग हैं, उसकी तासीर एक सी है और एक-सी तासीर वाले दुख को साथ-साथ ही बहना चाहिए। क्योंकि दुख की तासीर ही तरल है... आँसू की शक्ल-सी। मैंने उसके चेहरे की तरफ नज़र की तो उसके चेहरे का कातर भाव सहा नहीं गया... मैं खुद को रोक नहीं पाया। दौड़कर उससे लिपट गया... वो शायद किसी और चीज़ की उम्मीद कर रहा था, मेरे इस व्यवहार से वो हतप्रभ रह गया। जाने किस विचार ने उसके हाथों को जकड़ा लेकिन फिर उसका दुख भी बहने लगा था... उसने मुझे कस लिया था। हम दोनों रोते रहे थे, न जाने कितनी देर तक। या शायद रो नहीं रहे थे, दुख का संवाद सुन रह थे, वैसे ही एक दूसरे के गले लगे हुए।
जब हम अलग हुए तो वो सॉरी-सॉरी कह रहा था। मैंने उसके सिर को थपथपाया था... जाने कैसे इतना बड़प्पन आ गया था कि अपनी ही उम्र के दोस्त को सांत्वना दे रहा था, उसी दुख के लिए, जो उसी शिद्दत के साथ मेरे भीतर भी बह रहा था। हम दोनों बहुत देर तक साथ बैठे... मौन, अव्यक्त। मैं उससे सुनना चाहता था, कुछ कहना भी... लेकिन हम दोनों में से कोई कुछ भी नहीं बोला... और मैं यूँ ही चला आया था। आने के बाद लगा था कि मैं उसके पास बहुत कुछ भूल आया हूँ, या फिर शायद छोड़ ही आया हूँ।

वो इन दिनों खुद से बहुत-बहुत नाराज़ था, इतना कि बुखार में पड़ा रहता, लेकिन कोई ट्रीटमेंट नहीं लेता, कहीं दर्द हो रहा हो, वो उसे सहता रहता है। पूर्वा का स्यूसाईड नोट जो उसने उसे पोस्ट किया था, अक्सर वो उसे पढ़ता रहता था। उस शाम अपने कमरे की खिड़की से टिककर उसने पहली बार मुझे बताया था कि ‘पूर्वा के न रहने के लगभग 20 दिन बाद मुझ ये नोट पोस्ट से मिला था। और इस एक नोट ने मुझे खत्म कर दिया... इतनी पीड़ा तो उसके न रहने पर भी नहीं थी, जितनी इस नोट के मिलने से मिली है।’ मैं जानता था कि ये उसकी नितांत अपनी पूँजी है... क्योंकि पूर्वा ने ये मुझे नहीं लिखा था, उसे लिखा था। इसलिए मैंने ये जानने की कोशिश ही नहीं की कि आखिर उसने इसमें लिखा क्या है? पता नहीं शायद वो रेनडमली इसे पढ़ रहा था शुरुआत से, लेकिन मुझे सुना रहा था ‘जबसे तुमसे मिली हूँ, बस खुद के साथ द्वंद्व में ही रहती हूँ। तुमसे मिलने के बाद मेरी खुद को लेकर और दुनिया को लेकर समझ गड्डमड्ड हो गई है। खुद को लेकर आजकल सबसे ज्यादा संशय में रहने लगी हूँ। क्योंकि अब तक मैंने अपने बारे में जो जाना, समझा है, तुम मुझे मेरे बारे में जो बता रहे हो, बिल्कुल उलट है...। मैं इतनी बुरी तरह से उलझ गई हूँ कि मुझे अपने-आप से वितृष्णा होने लगी है। हो सकता है तुम मुझे ऐसा नहीं कह रहे हो, लेकिन मेरे भीतर जो पहुँचता है, वो इसी तरह पहुँचता है। पता है, ऐसा होता है कि जो मैं अनजाने या फिर अनचाहे कर देती हूँ, उससे मुझे खुद ही बहुत ग्लानि और चिढ़ होती है, लेकिन जब तुम उसे पाइंट आउट करते हो, तो लगता है कि आय हेट दिस... मतलब मुझे अपने ‘उस होने’ से घृणा होने लगती है। मैं ये भी जानती हूँ कि तुम सब कुछ सहज भाव में करते हो, कहते हो... लेकिन बस इससे आगे की मेरी समझ चुक जाती है...। मैं एक किस्म के पागलपन में फँस जाती हूँ, मुझे लगने लगता है कि मैं अपने होने को बदल दूँ... साफ कर दूँ मैं उसे जो मैं हूँ। और बस जो शुरू होता है, उसे त्रास कह लो, संघर्ष कर लो, जुनून कह लो फिर कुछ और... मैंने बहुत कोशिश की कि मैं खुद को वैसे कर लूँ जैसा तुम चाहते हो, लेकिन मैं यहाँ भी हार गई। अब मैं न तो वह रही जो मैं थी और न ही वह जो तुमने चाहा था। और दुनिया को लेकर भी मेरी सारी समझ मेरे अपने स्वभाव से उपजी है, मुझे लगता है कि मुझे वो सब कुछ जानने की कतई जरूरत नहीं है, जो मुझे सचेत करे, चौकन्ना बनाएँ। आखिर क्यों मुझे उस सबको जानना चाहिए जो मुझसे मेरी सहजता छीन सकता है। ये मेरी बुराई ही है कि मैं दिखाई देने के पार जाकर नहीं देखती। असल में मैं देखना चाहती ही नहीं, सोचती हूँ, उससे हासिल क्या होगा?
ऐसा सोचना बहुत पेनफुल था, करना तो फिर... लेकिन फिर लगा कि आय हैव नो ऑप्शंस... तुम जो हो वो हो, लेकिन मैं वो भी नहीं हूँ जो मैं हूँ और वो भी नहीं जो तुम चाहते हो। बहुत मुश्किल वक्त था, जब मुझे निर्णय करना था। तुम शायद समझ पाओ कि मेरे लिए खुद को खत्म करना आसान लगा बनिस्बत इसके कि इस रिश्ते को खत्म कर दूँ। सोचकर देखो कि किस तरह की मजबूरी रही होगी मेरी।
मैं एक जीत चाहती हूँ तुम पर, जीते जी न सही मर कर ही। वैसे तो नहीं जीत पाती, इसलिए...।’ वो रूक जाता है... एक धीमी-सी कराह उभरती है और डूब जाती है, उसी अँधेरे मौन में जिसमें से उसकी आवाज़ आ रही थी। बहुत देर तक सब कुछ बिल्कुल शांत रहता है।

उस दिन वो पूर्वा की लिखी हुई कतरनें लेकर बैठा था... मेरे सामने। एक-एक करके उसने उसे अपने पलंग पर बिखरा दिया था। देख, क्या-क्या लिखा करती थीं वो, कितना कुछ। फिर एकाएक चुप हो गया, हवा में खो गई उसकी नज़र... फिर लौट आया उसने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा... सिसकी रोकते हुए कहा-‘अब सोचता हूँ तो लगता है कि किसको लिखकर दिया था उसने ये सब... किसको? मुझे....? कौन हूँ मैं, और क्या किया मैंने उसके लिखे का... मुझे क्यों...? क्या मैं इसके लायक हूँ...?’ वो फिर से शून्य में खो गया और सिसकने लगा।
पूर्वा मेरी हमज़ाद... जुड़वाँ। आयडेंटिकल नहीं थे, लेकिन कुछ गहरे जुड़ा हुआ था, हम दोनों के बीच। साथ-साथ बड़े हो रहे थे, उसका हर बदलाव मैं देख रहा था, महसूस कर रहा था। यहाँ तक कि उसके बड़े होने की घटना को भी मैं ही देख रहा था। मलय दाखिल हुआ था, हमारी जिंदगियों में। मेरा दोस्त होकर। जैसे मैंने उसके दोस्त हैरिस को स्वीकार किया था, उसने मलय को, लेकिन हैरिस को लौटना पड़ा था, मलय ठहर गया था। पूर्वा मुझसे छुपाने लगी थी, कुछ... बहुत कुछ। मैं जान नहीं पाया था, लड़कियों के बड़े होने का सबसे पहला संकेत गोपनीयता हुआ करती है, ये मैं आज जान पा रहा हूँ। पूर्वा की डायरी मुझे नहीं मिली होती तो यकीन ही नहीं होता कि मलय और पूर्वा के बीच कुछ बहुत गहरा, बहुत गाढ़ा सृजित हो रहा था। जब मैंने पहले पहल उसकी डायरी पढ़ी थी तो मुझे लगा था कि मैं ठगा गया हूँ। मैंने जाना था कि मैं उसके हरेक मूवमेंट का गवाह हूँ, साक्षी भी, लेकिन मैं नहीं था। मलय था, इसलिए मैं बहुत हर्ट था। वक्त लगा था, ये जानने में कि भाई कब दूर हो जाता है? और कब कोई और उसकी बहन की जिंदगी में करीब हो जाता है। तो क्या देह भी रिश्तों की सीमा है... ये बड़ा खतरनाक सवाल था, और मैं इससे बचना चाह रहा था, क्योंकि पूर्वा मेरी बहन थी। हाँ थी... वो अब नहीं थीं... नहीं मेरी बहन तो वो अब भी थी, लेकिन वो नहीं थी। मर गई थी, अपनी जान उसने खुद ली थी। पूरी डायरी पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा था कि पूर्वा एब्नॉर्मल थीं। क्योंकि मैं मनोविज्ञान पढ़ रहा हूँ तो मैंने समझा कि वो एक उलझा हुआ किरदार थी।
उस रात हम दोनों देर तक यूँ ही टहलते रहे थे। मलय में बदलाव देख रहा था, गहरा बदलाव। हाँलाकि वो डूबता-उतराता लगता था, लेकिन फिर भी कभी-कभी ऐसा लगता था कि वो, वो नहीं है। उस रात हम दोनों बहुत देर तक चुपचाप टहलते रहे थे। फिर एकाएक उसने कहा था ‘समीर, मैं जब खुद को देखता हूँ तो लगता है कि मैं इस सबको डिज़र्व करता हूँ। आखिर सिर्फ उसने ही नहीं, मैंने भी तो उससे प्यार किया था। मैं उसके स्तर पर जाकर उसे क्यों नहीं समझ सका? मैं क्यों नहीं समझ सका कि उसमें एक बहुत छोटी बच्ची है, जो ज़हनी तौर पर बहुत नाज़ुक है, मैं क्यों नहीं समझ सका कि सारी दुनिया के आगे जो बहुत परिपक्व और मैच्योर नज़र आने की कोशिश करती है वो पूर्वा असल में एक खोल में है... खोल के भीतर वो बहुत नाज़ुक और बहुत संवेदनशील है। और जब मैंने उसे नहीं समझा है तो जाहिर है कि इस दुख का हकदार भी हूँ मैं...। तुम्हें पता है, उसने ऐसा क्यों किया? ’
इस बार उससे मिलना बहुत लंबे समय बाद हुआ था। कुछ दुनियादारी के काम थे, सो बाहर था। जब हम मिले तो चलते हुए नदी के किनारे जा पहुँचे थे। तीन-चार महीनों के अंतराल में मैंने पाया कि वो बहुत बदल गया है। घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए वो दूसरी तरफ देख रहा था। लगा कि वो बहुत स्थिर हो गया है। इतना कि न दुख नज़र आता है और न ही सुख। जब मैंने उसकी आँखों में देखा तो लगा कि वो पारदर्शी हो गया है। मैंने नज़रे झुका ली, वो शायद बहुत कुछ समझ गया। ‘पता है दुख जीवन का सच है। और कोई चाहे कुछ भी कह ले लेकिन अगला-पिछला जन्म कुछ नहीं होता है, जो कुछ भी होता है, यहीं होता है। मैंने उससे प्यार तो किया, लेकिन उसकी कद्र तक नहीं पहुँच पाया। मुझे लगता है कि मैंने उससे जितना प्यार किया, लगभग उतनी ही तकलीफ भी दी... तो जब तक वो थी, तब तक मैंने प्यार को भोगा और अब उसके नहीं होने पर उस तकलीफ को सहूँगा जो मैंने उसे दी थी। हिसाब बराबर... ।’ हालाँकि ये मेरे मन में ये सवाल तब तक नहीं उठा था, लेकिन जब उसने कहा तो लगा कि वो खुद को देखने लगा है, दूर से। ‘... लेकिन सोचता हूँ कि उस गुनाह का क्या और कहाँ हिसाब होगा, जिसकी वजह से उसने अपनी जान ली। आखिर तो जाने-अनजाने वजह तो मैं ही हूँ ना!’ मेरे लिए कुछ भी कहने की कोई गुंजाईश नहीं थी। ‘होगा... होगा... किसी वक्त उस सबका भी हिसाब होगा। अभी मेरी सज़ा पूरी हुई नहीं है। मैंने कहीं पढ़ा था कि हर दुख किसी गुनाह का परिणाम है, अब लगता है भोगा सच लिखा होगा लिखने वाले ने।’ मैंने उसकी तरफ देखा, भावहीन चेहरा था, जैसे वो किसी और के बारे में बात कर रहा हो। मैंने याद किया आज दिन भर में एक बार भी उसकी आँखें नहीं भीगी... एक बार भी उसकी आवाज़ नहीं लरज़ी, लगा कि वो शायद अपने दुख से बाहर आ गया है, लेकिन तुरंत ही लगा कि यदि दुख से बाहर आ गया होता तो इतना निर्लिप्त होकर दुख को नहीं सोचता-कहता... तो क्या उसने खुद को खुद से अलग कर लिया है? मुझे याद आया उसने एक दिन कहा था... ‘आजकल मैं अक्सर खुद से अलग हो जाता हूँ, देखता हूँ कि आखिर इस दुख से मुझे कहाँ-कहाँ दुख रहा है। पता है, कभी-कभी खुद को तड़पते देखते हुए अजीब-सा नशा होता है... जैसे मैं अपने किसी दुश्मन को तड़पते हुए देख रहा हूँ। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ, कि मैं क्या कर रहा हूँ और मुझे हो क्या रहा है?’ मैं उसकी तरफ देख रहा था और वो झुककर नदी के पानी में अपना अक्स... मुझे दो-दो मलय दिख रहे थे, शायद ऐसा हो भी रहा हो।
कहानी का मॉरल - सूत्र 139
ज्ञान का लक्ष्य इंसान को 'भोक्ता' से 'दृष्टा' बनाना है



Friday, 5 April 2013

बेखुदी का बड़ा सहारा है....


तू नींद की गोलियां कब से लेने लगी?
अरे... मैं पूर्वा के क्लिनिक में हूं। आजकल वो खुद को ही चौंकाने लगी है। कभी रात-रात भर जाग कर निकालने में... कभी ऑफिस में पागलों की तरह काम करते हुए, जब सब चले जाते हैं और ऑफिस बंद करना होता है तब प्युन आकर कहता है, ऑफिस बंद करना है, तो कभी 60 की स्पीड पर पुल चढ़ती गाड़ी में रिवर्स गियर लगाते हुए या फिर चलती गाड़ी में न्यूट्रल गियर लगाते हुए...। अब तो वो इतनी चौंकने लगी है कि जब वो नहीं चौंकाती है तब भी चौंकती है।

कितनी देर से बालों में कंघी घुमाती जा रही है उसे खुद भी याद नहीं.... रक्षा जब घर भर की सफाई करके जाने लगी तब उसने ही टोका... दीदी, क्या हुआ?
क्या हुआ!
तब से कंघी कर रही हैं?
ओह... कुछ नहीं ऐसे ही।
क्या कहती... ! कि आजकल धुन-सी सवार रहती है। टहलने निकलती है तो याद ही नहीं पड़ता कि कितनी दूर निकल आई है। चलती ही चली जाती है, बस...। नहाती है तो घंटा-घंटा भर... पानी ही उँडेला करती है। कई बार किताब हाथ में होती है और नज़रें शून्य में, कितनी ही देर तक वो यूँ ही बैठी रहती है।

जानती है कि यदि फोन आएगा तो बजेगा, लेकिन फिर भी चाहे कोई काम कर रही हो, लौट-लौटकर फोन के पास आती है। फोन पास हो तो उठा-उठा कर की-पैड अनलॉक करती है और देखती है कि कहीं ऐसा न हो कि वो काम में मशगूल हो गई हो और कोई मैसेज ही आया हो। अब तो जानने भी लगी है कि अब न तो फोन आएगा... न मैसेज... पर कोई आस है जो उसे मानने से रोके हुए है। दिन में हजार बार फोन के कांटेक्ट नंबर तक जाती है... मैसेज बॉक्स के न्यू मैसेज पर जाती और फिर लौट आती है। दिन में कई-कई बार वो फोन को बंद करती है और खुद से वादा करती है कि अब घंटे भर तक शांति से काम करेगी... घंटे भर बाद फोन चालू करेगी। काम करना शुरू करती है, लेकिन नज़रें घड़ी पर टिकी रहती है... फिर खुद ही को समझाती है ‘यदि किसी और का अर्जेंट कॉल होगा तो...!’ और 10 मिनट नहीं गुज़रते फोन चालू हो जाता...। नहीं... उसे अब उसकी जरूरत नहीं है, आखिर मान क्यों नहीं लेती... वो ही तो कहता था कि ‘मान लो तो आसानी होती है।‘ लेकिन बस मान ही तो नहीं पा रही है। खुद से सवाल पूछती है... आखिर वो क्या कहे, जिससे उसे समझ आए कि अब ये सब खत्म है... क्या और कैसे कहे? वो किन शब्दों में कहेगा, तब तुझे समझ आएगी... किन शब्दों में तू सुनना चाहती है? या कब तक उसकी जिंदगी से जौंक की तरह चिपकी रहना चाहती है, कब तक उसका खून पीते रहना चाहती है, कब तक?
वो समझाती है खुद को... हाँ, अब ये सब खत्म है। आगे सोच, अब क्या? लेकिन वो मान ही नहीं पाती है। उसने ही तो कहा था कि उसकी चिता वो खुद सजाएगा... अरे, ये सब किसी भावुक क्षण में कह दिया, तो क्या उसे जीवन भर ढोएगा... क्यों ढोएगा?

कितने दिनों तक ये होता रहा कि वो रास्ते भर लोगों की शक्लें देखते हुए गंतव्य तक पहुंचती... शायद वो रास्ते में ही नज़र आ जाए। पहले की तरह, जब वो नाराज़ हुआ करती थी तो गाड़ी के सामने खड़ा होकर लिफ़्ट मांगता था। उफान आता था और फिर एकदम बैठ जाता था। नहीं... अब कभी-कभी ऐसा नहीं होगा... वो खुद को समझाना चाहती है। दुखी लोगों की, पात्रों की हिम्मत को नज़ीर बनाती... फिर ज़ब्त छूट जाता। नहीं जानती कब से ऐसा होने लगा है, लेकिन उसे लगता है कि अनंतकाल से ऐसा ही होता आ रहा है।
ये तो सबसे पहले ही तय हो चुका था कि यदि किसी की जिंदगी में भी कोई और दाखिल होगा तो अच्छे दोस्तों की तरह हम एक-दूसरे को बता देंगे... यदि ऐसा कुछ है तो वो मुझे बता सकता था। इस तरह की उदासीनता उसे खोखला कर रही है और ये बात भी उसने कई बार कही है कि झगड़ लो... खींच लो मुझे अपनी तरफ, लेकिन ठंडापन नहीं। नहीं बर्दाश्त होता है... न जाने कितनी बार उसने ख़यालों में फांसी लगा ली है। न जाने कितनी बार उसने ये शहर, ये घर, ये मोबाइल नंबर छोड़ने की योजना बना ली है... लेकिन बस कुछ हो ही नहीं पाता।
पहले तो उसने मैसेज भी किए... फोन भी। वो या तो जवाब नहीं देता, या जवाब ऐसे देता कि वो तिलमिला जाती। धीरे-धीरे उसने हर चीज ज़ब्त करना शुरू कर दी। वो इस रिश्ते को हर हाल में बचाना चाहती थी। जान रही थी कि कुछ सड़ रहा है बहुत बुरी तरह से... अब उसके लिए वो वैसी नहीं बची है। उसकी कोई भी चीज उसे लुभाती नहीं है। बल्कि तो हर चीज उसे चिढ़ाती है... खिझाती है या जाने ऊबाने ही लगी हो। वो सहज थी उदास होती थी तो उसके सामने रो लिया करती थी और उत्साह में होती थी तो नजर आने लगती थी। उसके हर सुख-दुख से उसको वास्ता था, अब वो दुख में तड़प-तड़प कर रह जाती है और उस तक हल्की-सी आँच भी नहीं पहुँचती... यदि वो खुश होती है तब भी वो उदासीन ही बना रहता है। पहले उसकी उदासी, उसका रोना, उसका भटकाव.... उसकी इच्छा, उसका कहा हर चीज का मतलब हुआ करता था। धीरे-धीरे हर मतलब खत्म होने लगा। उसने देखा, लेकिन अनदेखा करती रही।

प्रेम केमिकल लोचा है... तो क्या इसका कोई इलाज नहीं है? ये कभी ठीक नहीं होता? दुनिया में लोग क्या-क्या सह लेते हैं? और मुझसे इतना-सा दुख सहा नहीं जा रहा है! सारे सहने वाले लोग एक-एक कर सामने आते हैं... उसे लगता है कि उनसे पूछे कि कैसे सह लिया...? मुझी से क्यों नहीं सहा जा रहा है? उसे याद आ रहा है कहीं पढ़ा हुआ... सहना ही सच है। और दुख जब घेरता है तो सारे रास्ते पहले ही अवरूद्ध कर देता है। हम दुख के सामने हमेशा ही निहत्थे होते हैं।

वो बार-बार उस दिन की घटना को रिवाइज करती है। उसने खुद को पूरी तरह से खोल कर रख दिया था, नहीं जानती थी गलती कर रही है। बताया था... हाँ उसे टीनएज में एक लड़के से प्यार हुआ था, जिसे वो आज खुद ही प्यार होना नहीं कह पाती है। फिर इस उम्र में किसे प्यार नहीं होता... ? प्यार क्या कहो... बस एक गड़बड़... वो लड़का उसे पसंद करता था। जाहिर है कोई आपको पसंद करे और आप उससे संपर्क में रहें तो थोड़ा बहुत सॉफ्ट कॉर्नर तो हो ही जाता है... बस। ये उस वक्त का सच था। आज वो उससे पूरी तरह से बाहर आ गई है। वो उसके सामने आ खड़ा हो तो उसके भीतर कोई नया परिवर्तन नहीं होगा। यदि इसकी कोई माप है तो माप कर देख लें। एक कॉमन दोस्त उसे कुछ दिन पहले मिला था, और कुछ दिनों से वो उससे संपर्क में है।
उसे लगता है कि उससे संपर्क कहीं न कहीं उसके बारे में जानने के लिए ही है। जबकि वो ये सवाल खुद अपने आप से बीसियों बार पूछ चुकी है कि क्या वो उस लड़के के बारे में कुछ भी जानना चाहती है? वो नहीं जानना चाहती है। ऐसा भी नहीं है कि वो उस लड़के का नाम ही नहीं लेना चाहती है और न ही ऐसा है कि वो उसके बारे में कुछ जानना चाहती हो या उससे मिलना चाहती हो... बस। इतना ही तो कहा था उसने कि ‘तुम जो चाहो समझो, मेरा दिल जानता है कि मुझे उसके बारे में कुछ भी जानने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है। ये कतई जरूरी नहीं है कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, बस वही मेरे साथ भी होता हो... आखिर मेरी बनावट और बुनावट तुमसे अलग है।’ बस... इतना ही तो कहा था और चली आई थी वो...। उसके बाद न तो उसने फोन किया, न मैसेज... मिलना तो खैर रात का सपना ही हो चला है। इन सारे दिनों में उसने खुद से बहुत सारे वादे कर लिए हैं। वो अब किसी बात पर रिएक्ट नहीं करेगी। उसकी नीयत पर, किरदार पर, जीवन पर, दर्शन पर, कर्म पर, रिश्तों पर, जीने-पहनने-खाने के तरीकों पर... किसी भी चीज पर किसी कमेंट का वो बुरा नहीं मानेंगी... यदि मानेंगी तो न तो प्रतिकार करेगी और न ही कहेगी... लेकिन सोचती है कि आखिर इन सारे वादों का हासिल क्या है? ये सब तो तब होगा न जब वो लौटेगा... और अब वो नहीं लौटेगा... कभी नहीं। तुझे खुद ही खुद को संभालना है। यही तुझमें बुराई है कि तू बहुत जल्दी अपनी भावनात्मक निर्भरता खो बैठती है। खो दी है... अब... अब क्या ये सोच...।
सोच चल रही है, गाड़ी चल रही है... खुली खिड़की से गर्म हवा के थपेड़े पड़ रहे हैं। न जाने कब से रेडियो में वो गाना चल रहा है, जिसे वो सख्त नापसंद करती है... लेकिन आजकल उसे कुछ भी नहीं लगता... न अच्छा-न बुरा... लगे तो तब न... जब वो खुद हो पाए। घर बस पहुँचने ही वाली है... बहुत दूर से उसे ‘उसकी’ गाड़ी दिख गई। बहुत सारे भाव आते गए-जाते गए... आसपास दुनिया जैसे सरसरा कर निकलती रही लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सुनाई नहीं दे रहा था सिवाय बिल्डिंग के नीचे खड़ी उस गाड़ी के...। ओ... ओ.... ओ.... गफलत में उसका पैर ब्रेक की बजाए एक्सीलरेटर पर पड़ गया... ओह... सड़क पार करता बच्चा बच गया... न जाने कैसे, तुरंत उसे अपनी गलती समझ आई और पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिया। बच्चे की माँ के साथ-साथ सारे लोग उसकी गाड़ी के आसपास जमा हो गए.... हंगामा होने लगा। सारे लोग कुछ-कुछ कह रहे हैं, लेकिन उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा है उसे बस वो गाड़ी दिखाई दे रही है। वो इस भीड़ को चीरकर उसकी तरफ भागना चाह रही है, लेकिन फँस गई है। उसकी पूरी चेतना बस उस गाड़ी पर लगी हुई है। तभी उसने उसे देखा। वो गाड़ी में बैठकर चला गया...। निराशा गाढ़ी हो गई... लेकिन नीत्शे याद आ गए ‘जो कुछ सड़ रहा है, उसे एक धक्का और दो’... एकसाथ निराशा और स्थिरता चलने लगी है... सोचा देखें कौन जीतता है। उसका ज़हन जैसे युद्धभूमि बना हुआ है... कटे सिर, कटे हाथ-पैर, चिथड़ा और लहूलुहान शरीर... कितना दर्द, कहाँ से आता है और आता है तो जाता क्यों नहीं है? अब किसी भी सवाल-जवाब, सोच-विचार का कोई मतलब नहीं है, वो जा चुका है। उसने भीड़ से माफी माँगी तब छूटी।

वो लगातार सिर पर चल रहे पंखे को घूर रही है। आँखों को कोरों से आँसू बहते जा रहे हैं और वो बस पंखे को एकटक देखती जा रही है। उसने सुना कि फोन बज रहा है, लेकिन ये ध्वनि उस तक पहुँच नहीं पा रही है... फोन बस बजता ही जा रहा है।
कहानी का मॉरल – सूत्र 142
दुख विकल्पहीन है.

Wednesday, 5 September 2012

निर्भरता अभिशाप है

उस दिन फिर दीदी मुझे चकमा देकर निकल गई। बहुत देर तक मैं उनके पीछे लगा रहा, फिर वो मेरे साथ खेलने लगीं जब मैं खेल में डूब गया तो वे धीरे से पिछले दरवाजे से निकल गई। थोड़ी देर बाद जब मैं खेल से उकता गया तो याद आया कि दीदी तो मेरे साथ ही थी। फिर घऱ भर में उन्हें ढूँढा, जब नहीं मिली तो पक्का यकीन हो गया कि वो मुझे छोड़कर चली गई है। मुझे बहुत तेज गुस्सा आया, क्यों तो पता है, लेकिन किस पर पता नहीं। खुद पर या फिर दीदी पर....?
जिद्द पकड़ ली मुझे दीदी के पास जाना है। पहले सबने समझाने की कोशिश की कि दीदी तो डॉक्टर के पास गई है, लेकिन मैं समझ गया कि सब मुझे बहला रहे हैं। नहीं वो अर्पिता दीदी के यहाँ गई है, मुझे पता है। पापा ने कहा - हो सकता है, लेकिन मुझे नहीं मालूम अर्पिता का घर कहाँ है?
मुझे पता है। - मैं बस अड़ गया था। पापा को लेकर जब मैं अर्पिता दीदी के घर पहुँचा तो दीदी उनके साथ बातों में मशगूल थीं और मुझे देखते ही उनके चेहरे पर झुँझलाहट तैर गई। हाँ अर्पिता दीदी जरूर मुझे देखकर खुश हुईं लेकिन मुझे दीदी का झुँझलाना पसंद नहीं आया। पापा मुझे वहाँ छोड़कर लौट गए। फिर मैंने वहाँ क्या किया वो तो कुछ याद नहीं हाँ ये याद रहा कि दो-एक घंटे बाद दीदी के साथ ही घर लौटा।
हम दोनों के बीच एक तो उम्र का फासला था, दूसरे जैसाकि होता है लड़की होने के नाते दीदी जल्दी बड़ी और समझदार हो गई और तीसरा दीदी हमेशा अपने से बड़ी लड़कियों के साथ ही रही इससे हुआ ये कि मैं तो अपनी गति से बड़ा हो रहा था, लेकिन दीदी अपनी उम्र की तुलना में तेज गति से बड़ी हो रही थी, मानसिक और भावनात्मक तौर पर... तो जाहिर है हम दोनों के बीच का फासला कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा था।
फिर पता नहीं कैसे हम दोनों के बीच संवाद की वजहें बनने लगीं। मैं कॉलेज में पहुँच गया था और दीदी कांपीटीटिव एक्जॉम्स की तैयारी करने लग गई थीं। उन्हें पढ़ना पंसद हैं और थोड़ी ज्यादा जागरूक और ज्यादा विचारशील भी हैं। तो दुनिया जहान की बातें होने लगीं हम दोनों के बीच। हम दोनों साथ पढ़ने बैठते तो थे, लेकिन पढ़ते कम और बातें ज्यादा करते थे। दीदी को देर रात तक पढ़ने की आदत थीं और मुझे रात में जल्दी नींद आने लगती थीं, तो जब मुझे नींद आने लगती तब मैं तो सो जाता और दीदी पढ़ने लगतीं।
हम दोनों के बीच एक बाँड-सा बनने लगा था। दुनिया-जहान की बातें, कॉलेज और दोस्तों के अनुभव... रोजमर्रा से जुड़ी बातें, फिर इसमें धीरे से म्यूजिक भी जुड़ने लगा। पता नहीं मुझे वैसा म्यूजिक पसंद है, जैसा दीदी सुनती है या फिर चूँकि दीदी सुनती है इसलिए मुझे भी वैसा सुनने की आदत औऱ फिर शौक लग गया, लेकिन हम दोनों ही साथ-साथ गज़लें और क्लासिकल म्यूजिक सुनते हुए बड़े हुए। साथ-साथ खरीदी करते, हम दोनों एक-दूसरे के साथ कपड़े खरीदने में बड़े कंफर्टेबल हुआ करते थे। तो बाहर घूमना-फिरना भी हम दोनों साथ-साथ करते थे। कह सकते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे के दोस्त भी बन चुके थे।
ये वैसा नया नहीं तो शायद नहीं ही होगा कि मेरे सारे दोस्त सिगरेट और शराब का शौक फरमाते थे। मेरे लिए वो इसलिए भी नया था कि परिवार के साथ-साथ पूरे-पूरे खानदान में मैंने किसी को सिगरेट या शराब पीते हुए नहीं देखा... यही पारिवारिक संस्कार हुआ करते हैं, शायद। लेकिन मैंने घर में कभी किसी से ये सच नहीं छुपाया कि मेरे दोस्त क्या-क्या करते हैं और उल्टे दीदी से तो मैं हमेशा बहुत डिटेल में सब कुछ शेयर करता रहा हूँ।
वो बारिश की ही कोई रात रही होगी। दीदी के डबल कैसेट प्लेयर में जगजीत-चित्रा की बहुत पुरानी गज़लें चल रही थीं... दिल को क्या हो गया खुदा जाने/ क्यूँ है ऐसा उदास क्या जाने... वो आँखें मूँदे डूब कर सुन रही थीं। बाहर तेज बारिश होने लगीं तो जैसे वो समाधि से लौटी थीं। उन्हें कॉफी पसंद है और वो घोंटकर बनाया करती है। मैंने फरमाइश की थी... आयडिया दीदी को भी पसंद आया। वो चीनी, कॉफी और एक छोटा चम्मच दूध को लगभग आधे से एक घंटे तक घोंटती रहती थी, तब तक, जब तक कि चीनी पूरी तरह से घुल ना जाए और कॉफी का रंग गोल्डन ना हो जाए... मुझे भी पता नहीं क्या सूझा था, उसी दौरान मैंने दीदी से पूछ लिया था – यदि किसी दिन मैं भी ड्रिंक करके घर आ जाऊँ तो आपको कैसा लगेगा?
वो एकदम निर्विकार थी, उसी तन्मयता से कॉफी घोंट रही थी, बिना मेरी ओर देखे ही उन्होंने जवाब दिया था – मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।
मैं अवाक्, निरूत्तर दीदी की ओर देख रहा था। समझा नहीं पाऊँगा, उस एक वाक्य से क्या कुछ अंदर घटा था, शब्द नहीं है उसके लिए... उस वक्त मुझे भी सूझ नहीं रहा था क्या कहूँ! बहुत देर तक हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला बस कप के अंदर चम्मच के चलने की आवाजें आती रही। कुछ हम दोनों के बीच से सरसरा कर गुजर गया था। फिर अचानक दीदी ने सिर उठाकर मेरी तरफ गंभीर नजरों से देखा... वैसे यदि कभी तू ट्राय करना चाहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा। फिर उन्होंने गर्दन झुकाकर उसी तन्मयता से कॉफी घोंटते हुए कहा, जिंदगी में अनुभव लेना बुरा नहीं है, किसी भी चीज की निर्भरता बुरी है... अब वो खड़ी हो गईं थीं। मैं उनके कहे को उसी तरह घोंट रहा था, जिस तरह उन्होंने कॉफी घोंटी थी। उन्होंने मेरे बालों में हाथ घुमाते हुए कहा था, चल कॉफी बनाते हैं। उस रात उनके हाथ की खूब सारे झाग वाली कॉफी पीते हुए याद नहीं किन-किन विषयों पर बात हुई, लेकिन ये वाकया कहीं इतने गहरे धँसा हुआ था इसका अंदाजा मुझे आज हुआ।
ऐसा नहीं है कि पीने वाले दोस्तों के साथ मैं पहली बार बैठा था आज... पहले भी कई बार मैं अपने दोस्तों के साथ पीने की पार्टी मनाता था। हमेशा सभ्य दोस्तों को लेकर जाता और नशे में संभालकर लाता रहा था। एक बार मैंने भी सोचा कि आखिर ये शराब क्या बला है पीकर देखी तो जाए, तो घर में बाकायदा मुनादी कर ठसके से गया तो था, लेकिन जिन जैसी लेडिज ड्रिंक को लिम्का की पूरी बोतल में मिलाने के बाद भी उसका स्वाद मैं पचा नहीं पाया था और उसे शौकीन दोस्तों ने खत्म किया। शायद वो मेरा पहला और आखिरी प्रयास था। आज भी अपने कलिग्स के साथ ऐसी ही पार्टी में बैठा था... सर्व हो रही थी और नए ज्वाइन हुए कलिग ने एक पैग मेरे सामने भी रख दिया था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा... मन हुआ कि आज पी ही लूँ... एक बार और कोशिश कर के देखूँ, कैसा लगता है? एकाएक कुछ कौंधा... एकाग्रता से कॉफी घोंटती दीदी का वो निर्विकार चेहरा याद आया जब उन्होंने कहा था – ‘मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।‘ और मैंने मुस्कुराते हुए उस पैग को पड़ोसी के सामने सरका दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र १४०
विश्वास भी बंधन है.

Sunday, 20 May 2012

दर्द की तासीर

बात तो बहुत छोटी थी, लेकिन वहाँ जाकर लगी, जहाँ की जमीन कांक्रीट थी, गहरे जाकर गड़ी थी। पता नहीं किस विषय पर शुरू हुई बहस बढ़ते-बढ़ते झगड़े तक जा पहुँची और सुकेतु ने चिल्ला कर कह दिया कि – ‘तुम मेरे घर से निकल जाओ... अभी....।’ आँखें भर आई थी अश्लेषा की.... वो अवाक् थी... एक-साथ कई चीजें उमड़ी थी... मतलब जिस घर को मैंने अपनी पूरी ऊर्जा, इच्छा और आकांक्षा दे डाली वो मेरा नहीं है...। मतलब कि औरत का कभी कोई घर नहीं होता...! मतलब कि औरत चाहे जो कुछ हो जाए, वो मालिक नहीं हो सकती...! मतलब कि पुरुष जब चाहे उसका अपमान कर सकता है.... मतलब... मतलब... मतलब....।
उस वक्त सुकेतु को अश्लेषा की भरी हुई आँखें, गहरी चोट और पीड़ा नजर ही नहीं आई, वो तो बेहद गुस्से से भरा हुआ था और उसी गुस्से में वो घर से बाहर चला गया था... इससे पहले कि अश्लेषा संभले... धड़ाक् आवाज हुई और सुकेतु बाहर... उसे उसी हाल में छोड़कर। लगातार-लगातार वही-वही विचार उसके जेहन में उठ रहे थे और उसे मथे जा रहे थे। चोट इतनी गहरी थी, कि आँखों के सामने अँधेरा था, विचार और विचार-शून्यता के बीच एक ठहरा हुआ वक्त था। वो कुछ कर रही थी, क्या और क्यों उसे खुद भी नहीं पता था। बस शरीर यंत्र की तरह चल रह था चाय के गिलास साफ कर रही थी, उस बेकली में ही... काँच का गिलास उसे तड़का हुआ नजर आया, लेकिन ना तो उसके अंदर कोई विचार आया, और न ही कोई प्रतिरोध हुआ और उसने उस तड़के हुए गिलास में हाथ डाल दिया... जैसे ही उसने उसमें हथेली घुमाई, तड़के हुए हिस्से से गिलास टूट गया और गिलास का टूटा हुआ हिस्सा अँगूठे और उँगलियों के बीच के हिस्से में घुस गया। खून बहने लगा, लेकिन अश्लेषा को कोई अहसास ही नहीं हुआ, जब गिलास साफ कर डस्टबिन में डाला तब गिलास के उपर गिरी लाल बूँदों से थोड़ी-सी चेतना लौटी... लाल बूँदों के गिरने का स्रोत देखा...। एकाएक भीतर से कुछ थमता महसूस हुआ। दर्द तब भी महसूस नहीं हुआ... खून रिसकर हथेली तक आ गया... उसे कुछ ठंडा और मीठा-सा अहसास होने लगा। बिस्तर पर हाथ टिका दिया और लेट गई। धीरे-धीरे खून की बूँदें चादर पर फैलने लगी...। उसे खून देखकर मजा आने लगा.... खासतौर पर अपना...। खून देखते हुए बार-बार उसकी आँखें भरती-टपकती रही...। पहली बार उसे अपने आँसुओं की भाषा अनजानी लगी, भाव तो फिर भी पकड़ लिया था... दर्द का अहसास नहीं था, खुशी की कोई वजह नहीं थी, उदासी थी, गहरी, अपमानजनित, प्यार-विश्वास से परे... दिल पर लगी चोट का अहसास था, लेकिन खून के टपकने से जैसे किसी तृप्ति का अहसास हो रहा था, कोई वहशी-सी खुशी... जैसे वो वो नहीं है कोई और है, या फिर रिसता खून उसका नहीं किसी और का है, पहली बार उसने जाना कि अपमान का घाव आत्मपीड़न से भी भरा जा सकता है। खून का धब्बा चादर पर फैलने लगा था, पंखे की ठंडी हवा, उन्माद का उतरना, तीखे दर्द के बाद की उदासीनता और गहरे संघर्ष के बाद की थकान थी... रिसते खून और फैलते धब्बों को देखते हुए उसे नींद आ गई...।

ये क्या है? – पता नहीं उसने नींद में सुना था या फिर हकीकत में।
तड़ाक... गाल पर एक भरपूर चाँटा पड़ा था और वो नींद से लौट आई थी। फिर से अपमानित हुई – ये क्या कर रही थीं...? – सुकेतु लौट आया था, खून देखकर बावला हो गया था। कॉटन... डेटॉल... बैंडज... कहाँ है, वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ ढूँढ रहा था। ये सारी चीजें तो अश्लेषा ही संभालती है तो उसे कैसे मिलती... ?
क्या किया...? वो फिर चिल्लाया। - क्या किया...?
हो गया...
हो गया... कैसे?
गिलास का काँच घुस गया।
अश्लेषा ने उसे निर्विकार होकर जवाब दिया... सुकेतु से बर्दाश्त नहीं हुआ.... उसकी गोद में सिर रख लिया वो सिसकने लगा, अश्लेषा की दबी-घुटी सिसकी उभरी तो उसने अपने सीने में उसे समेट लिया... क्या किया ये... क्यों? अश्लेषा चुप...। सिर उठाकर उसने हाथ दिखाया... देखो... कितना अच्छा लग रहा है... खून... हम क्यों डरते हैं? कितना खूबसूरत रंग है... है ना...!
सुकेतु ने उसे देखा, गहरे अर्थ से... - यदि ये मेरा होता तो...?
अश्लेषा बिखर गई... बाँध टूट गया, घुटी हुई सिसकी रूदन में बदल गई...।
सुकेतु ड्रेसिंग करता रहा, अश्लेषा रोती रही।
कहानी का मॉरल – सूत्र-137
आत्मपीड़ा में भी सुख है.