Tuesday, 16 January 2018

कॉफी-मग

मृत्यु का सारा दर्शन चाहे वह पूर्वी हो या फिर पश्चिमी... मरने वाले की दृष्टि से ही है। उसके अपनों के लिए कोई दर्शन नहीं, कोई सांत्वना, कोई राहत नहीं...। उसे तो बस अभाव, दुख, अकेलापन सहना ही सहना है। कोई कितनी भी कोशिश कर ले, जब मन दुखी हो तो नहीं ही बहलता है। डॉ. शुद्धोधन अवस्थी अपने दुख से लड़ते हैं... तो कभी अपनी रिक्तता से लड़ते हैं, जब ये दोनों नहीं होती, तब इस बात पर संघर्ष करते हैं कि उन्हें दुख नहीं है...? छह महीने लगभग हो गए हैं, वैदेही को गुजरे। शुरुआती वक्त बहुत मुश्किल से निकला। आखिर पिछले ४० साल उसी के साथ... उसी के सहारे ही तो कटे। पुरुष मन यह मानने से तो बचता है कि जीवन की दौड़ में एक स्त्री उसका संबल है... अवलंब है। तब तो और भी ज्यादा, जब वह पत्नी हो। परंपरा से तो यही सीखा है कि जिससे आप शादी करें, वह उम्र में... कद में छोटी, आपसे कम पढ़ी-लिखी और यदि कमाती हो तो आपसे कम कमाती और आपसे बेहतर पद पर आसीन नहीं होनी चाहिए। जब ये सब देखा जाता है, तो ऐसे में यह मानना कितना तकलीफदेह होता होगा कि एक स्त्री के बिना उनकी जिंदगी का खाका उतना सुंदर नहीं हो सकता है, जितना उसके होने से होता है।
डॉ. अवस्थी जानते हैं कि उन्होंने जीवन भर सिर्फ पढ़ा और पढ़ाया ही है, बाकी उनके जीवन में सारे रंग वैदेही ने ही भरे हैं, सजाए हैं, उनके जीवन को परिपूर्ण किया है। कितने तो रंग रहे उनके जीवन में...प्रेम के, वात्सल्य, उल्लास, उत्साह, अपनेपन के, सारे ही रंग वैदेही की वजह से ही तो थे। उसके न रहने से कितना सूना-सा हो गया है, सब कुछ।
आज भी वह उसी शिद्दत से याद आ रही है। दोपहर का वक्त है, अमोघ और राजश्री दोनों ही अपने-अपने काम पर चले गए हैं। मोक्ष हॉस्टल... अनु तो अपनी माँ के मरने के १५ वें दिन ही अपने ससुराल लौट गई थी। एकाएक भरापूरा घर वीरान हो गया था। क्या एक स्त्री इतनी परिपूर्ण होती है, कि उसका होना ही घर और मन के सारे कोनों को भरकर गुंजायमान रखता है? डॉ. अवस्थी अब भी इस सवाल से जूझते रहते हैं। गोयाकि इसे मान लेने से ही उनके जीवन का अभाव ज्यादा विकराल, ज्यादा विस्तृत हो जाएगा।
अक्सर सूनी दोपहर उनके कुछ रिटायर्ड सहकर्मी और टाउनशिप में रहने वाले उनके हमउम्र रिटायर्ड लोग उनके घर को अपना डेरा बनाए रहते हैं। लेकिन दोपहर तक का समय बड़ा मुश्किल से गुजरता है। यह वैसा ही समय था, जब बच्चे अपने-अपने काम पर जा चुके थे। सूना घर भांय-भांय कर रहा था, ऐसे में उनका अकेलापन और गहरा हो रहा था। डॉ. अवस्थी अब हर वक्त समय को गुजरते ही देखते रहते हैं। वैदेही थी तब तक तो उत्सव-पर्व-त्योहार सब गुलजार रहा करते थे। कैसे वह हर चीज में रंग की सृष्टि करती रहती थी, डॉ. अवस्थी आज उस सबको समझ पा रहे हैं। कैसे सर्दियों में खाने में रंग-सुगंध भरती थी वह, कैसे गर्मियों में रस-शीतलता... ।
उदास मन से उन्होंने अपने आस-पास पर नजर फेरी थी, वॉल-टू-वॉल विंडो के उस तरफ लॉन में लाल, गुलाबी, सफेद गुलाब खिले थे। रजनीगंधा पर सफेद-गुलाबी कलियाँ झूम रही थीं। ट्रक के टायरों से बने झूलों पर बँधे घुँघरू उत्तर की तरफ से आती ठंडी हवाओं में सिहरकर बज रहे थे। उन्होंने बेदिली से अपनी नजर वहाँ से हटा ली। कहाँ नजर डालूँ? हर तरफ तो वही नजर आती है। कमरे में सामने लगा आदमकद आईना... पलंग की चादर, किताबों की रैक और टेबल पर रखा हुआ टेबल लैंप... छत पर लटका पंखा और नाइट बल्ब... क्या-क्या और कहाँ-कहाँ वैदेही नहीं है? खिड़की पर झूलते पर्दे और पोर्च में लटका विंड शाइम... दरवाजे के इर्द-गिर्द टँगा ग्रामीण जोड़ा और ड्राईंग रूम की दीवार पर लटका अमोघ की शादी का पारिवारिक फोटो... खिड़की के पास लगी तीन फ्रेम में मोक्ष, बुलबुल और श्लोक के बचपन के चित्र... सब कुछ कितना तरतीब से सजाया था उसने। छह महीने की उसकी अनुपस्थिति में भी जैसे वही इस घर में रह रही हो। खुद राजश्री भी तो उसके टेस्ट की कायल थी। अपने भाई की शादी के लिए सारी खरीददारी उसने वैदेही के साथ ही तो की थी। अमोघ इससे बहुत रिलेक्स हो गया था। हालाँकि वैदेही थक जाया करती थी, लेकिन बहू के उत्साह से वह स्वयं भी संचालित रहा करती थी।
डॉ. अवस्थी फिर से उदास हो गए थे। घड़ी की तरफ नजर घुमाई थी, डेढ़ बज गया था। अब खाना खा लेना चाहिए, नहीं तो एसिडिटी हो जाएगी। अब वैदेही तो है नहीं कि सारा किचन निकालकर मेरा इलाज करेगी। राजश्री के करने की अपनी सीमा है, जो पत्नी कर सकती है, वो कोई और नहीं कर सकता है। बेटी भी नहीं, बहन भी नहीं। अब उनका सिर दर्द करने लगा।
बैंगन की सब्जी और मूँग की दाल... अरे ये कोई कांबिनेशन है? भई बैंगन की सब्जी के साथ तो अरहर ही स्वाद देती है। अब कहो तो तुरंत अमोघ कह देगा पापा आपको एसिडिटी की प्रॉब्लम है। बैंगन और अरहर दोनों दिक्कत देती है। कम से कम एक से तो कम दिक्कत हो। कहता तो ठीक ही है, लेकिन जबान की भी अपनी माँग होती है न...! थोड़ी देर के लिए डॉ. अवस्थी ने अपना ट्रांजिस्टर चालू कर लिया। ये भी वैदेही की जिद्द से ही आया था। कितना तो शौक था उसे संगीत का... सामने पड़े पुराने सीडी प्लेयर पर नजर गई तो रैक में पड़ी कई सारी सीडीज भी दिखाई दी। डॉ. अवस्थी उठकर वहाँ चले गए। किशोरी अमोनकर और भीमसेन जोशी को तो वे स्वयं भी सुनते थे, वैदेही ने एक लड़की का एलबम खरीदा था... बहुत सुंदर-सी...। वे उसे ही ढूँढने लगे, कितनी सुंदर ठुमरी गाई है उसने 'रंगी सारी गुलाबी चुनरिया...।' उस रैक को खोला तो ऊँगलियों के पोरों में धूल आ लगी। उसके न रहने के बाद शायद इस रैक को कभी किसी ने खोला तक नहीं है। कुछ सुनना तो दूर की बात है। आजकल की जनरेशन क्या संगीत सुनेगी? फिल्मी गानों से ही ऊपर नहीं आती, सूफी, गजल, लोक नहीं सुने तो फिर शास्त्रीय-उपशास्त्रीय क्या सुनेगी। यूँ भी राजश्री गणित पढ़ाती है, संगीत से तो उसका दूर-दूर का भी नाता नहीं है। कभी अमोघ और अनु भी माँ की तरह गजलें सुनते थे, लेकिन जिंदगी की दौड़ में यह सब पीछे चला गया। अनु तो अब भी सुनती हो, अमोघ को तो कभी सुनते नहीं देखा।
मोक्ष, श्लोक, बुलबुल... ये तो पता नहीं क्या सुनते हैं? कोई शकीरा-वकीरा... या कोई जस्टिन बीबर... और भी पता नहीं क्या-क्या ऊलजुलूल...। डॉ. अवस्थी ने अपना सिर हिकारत से झटका। जिंदगी में शऊर और सलाहियत का इस दौर के बच्चों के लिए कोई मतलब भी नहीं है। बाहर हल्की बारिश होने लगी है... थोड़ी देर में बारिश तेज हो गई। चाय की तलब लगने लगी। अभी वे चाय बनाने के बारे में विचार ही कर रहे थे कि डोरबेल बजी। परमजीत और जावेद थे। बारिश की बूँदों को अपने कपड़ों से झाड़ते हुए खड़े थे।
'अरे, बारिश में?' डॉ. अवस्थी ने दोनों को आश्चर्य से देखा।
'भीतर आ जाएँ?' - जावेद ने पूछा।
'अरे हाँ, आओ-आओ।' - डॉ. अवस्थी दरवाजे के एकतरफ हो गए। - 'कहीं और जा रहे थे?'
'अबे तेरे घर की ओर ही आ रहे थे।' - परमजीत ने जोर से डॉ. अवस्थी के कंधे पर हाथ जमाते हुए कहा।
'बैठो... चाय पिओगे? मैं चाय बनाने ही जा रहा था।' - डॉ. अवस्थी ने पूछा। जावेद ने नजरें चुरा लीं, परमजीत ने कहा - 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं। इतना सोंणा मौसम हो रहा है, चाय क्या व्हीस्की भी पी लेंगे हम तो।' - और हो हो कर हँसने लगा।
डॉ. अवस्थी ने उसे घूरकर देखा तो जावेद जोर-जोर से हँसा।
'ओए तो बात ही की है, कोई माँगी तो नहीं है न!' - परमजीत की सफाई पर जावेद ने ठहाका लगाया। अबकी डॉ. अवस्थी थोड़ा सकुचाकर मुस्कुराए और चाय बनाने चल दिए। चाय और बिस्किट लेकर जब बाहर आए तो जावेद ने रंग-बिरंगे कप पर प्रशंसा की नजर डालते हुए कहा 'डॉ. साहब आपके यहाँ कप बहुत सुंदर होते हैं। कहाँ से लाते हैं?'
डॉ. अवस्थी कुछ बोले इससे पहले ही परमजीत बोल पड़ता है 'ओए तू चाय पी न... सुंदर कप में, फालतू की तफ्तीश क्यों कर रहा है?' डॉ. अवस्थी कहना चाहते थे, वैदेही ही लाती है ये सब। उसे बड़ा पसंद है ऐसा सब करना। लेकिन सोचते ही उदास हो गए। अब कहाँ वैदेही? कितना पागलपन था, उसमें क्रॉकरी को लेकर। कितनी एकसाथ खरीदती थी? ये कप उसने क्रॉफ्ट मेले से खऱीदे थे। तीन तरह के कप पसंद आए थे, वो तो वे स्वयं थे जो उन्होंने कहा कि कोई एक खऱीदो। जो सबसे ज्यादा पसंद आए। आखिर कितने एकसाथ खऱीदोगी? तब उसने ये वाले कप का सेट उठाया था, निराश होकर। राजश्री तो उन्हें देखकर एकदम बावरी ही हो गई थी। एक गहरी साँस ली थी उन्होंने, जैसे दुख बाहर छोड़ा हो। और वर्तमान में लौटे। डॉ. अवस्थी ने पूछा 'तुम दोनों शंभू को लेकर नहीं आए?'
जावेद ने कहा 'शंभूनाथ बीमार हैं। हम गए थे, उसके घर...' और फिर उसने अपनी बात यूँ ही छोड़ दी।
'अरे तो मुझे भी बताया होता, क्या हुआ है?'
'पता नहीं, उसकी कमीनी बहू है न उसने हमें अंदर ही कहाँ जाने दिया...!' - कहते-कहते परमजीत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। डॉ. अवस्थी भी खामोश हो गए। जावेद की आँखों में आँसू की झिल्ली उतर आई। माहौल एकाएक बोझिल हो गया। डॉ. अवस्थी ने कॉर्नर टेबल पर पड़े रिमोट को उठाकर टीवी ऑन कर दिया। बाकी दोनों की नजरें भी टीवी की तरफ उठ गई।
पेरिस के जलवायु सम्मेलन पर रिपोर्ट दिखाई जा रही थी। डॉ. अवस्थी उस पूरी रिपोर्ट को गौर से देख रहे थे, बुदबुदाकर बोले 'कुछ भी होने जाने वाला नहीं है।'
जावेद ने प्रश्नवाचक नजर से उन्हें देखा।
'हाँ, हाँ कुछ भी होने वाला नहीं है। ये कहेंगे कि हमने तो पर्यावरण बर्बाद नहीं किया, वो कहेंगे कि आप ही बर्बाद कर रहे हैं। वो कहेंगे कि हमारी ऊर्जा आवश्यकता के लिए परमाणु रिएक्टर स्थापित करने हैं, अभी ये कहेंगे कि परमाणु ऊर्जा से पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा, बाद में ये ही रिएक्टर लगाने के लिए समझौता करेंगे। न इनकी नीयत है न हमारी औकात... दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी।' - डॉ. अवस्थी ने हिकारत और निराशा से अपनी गर्दन झटकी।
'ओए डॉक्टर तू तो ये बता कि ऐसा क्या हो रहा है कि सारे मिलकर इतना स्यापा मचा रहे हैं? कि इनका अपने-अपने देश में मन नहीं लगता है तो सारे मिलजुल कर पार्टी मना रहे हैं। कुछ नहीं हो तो भी तो बोर हो जाते होंगे न...!' - परमजीत ने डॉ. अवस्थी से पूछा। ट्रांसपोर्ट का कारोबार करने वाले परमजीत के लिए उसकी दुनिया बस उतनी ही है, जहाँ उसके ट्रक गए हैं। बाकी उसकी दुनिया अपना घर, अपना परिवार है। पत्नी है, बेटा-बहू है। चूँकि अब भी सारा कारोबार खुद परमजीत करता है, इसलिए घर में दबदबा है उसका। इसके उलट जावेद ने साइकिल के पंक्चर पका-पकाकर बच्चे को पढ़ाया। बच्चा इंजीनियर हो गया। जावेद की बीवी का दो साल हुए इंतेकाल हो गया। बेटे ने शहर में बुला तो लिया, लेकिन बहू को सुहाता नहीं है। एक मौका नहीं छोड़ती उसे ये जताने का कि यहाँ बुलाकर अहसान किया है। इस मामले में डॉ. अवस्थी किस्मत वाले निकले। बेटा-बहू दोनों नौकरी करते हैं। वैदेही और राजश्री के बीच अच्छी बनती थी। माँ-बेटी की तरह रहा करती थीं दोनों। सभ्य और सुसंस्कृत है राजश्री। दोनों ने बहू-बेटों को आजादी भी दी थी, तो सम्मान अपने-आप मिलने लगा था। ये भी एक बात है कि घर भी डॉ. अवस्थी का है और उन्हें सरकार से अच्छी-खासी पेंशन भी मिलती है। पैसा पास हो तो सब गुलामी करेंगे। लेकिन बात पूरी तरह से ये भी नहीं है। बस कुल मिलाकर सब एक-दूसरे के कंफर्ट का ध्यान रखते हैं। उम्र हो जाने और वैदेही के न होने से अब कभी-कभी डॉ. अवस्थी खीझ भी जाते हैं, लेकिन राजश्री ये नहीं भूलती है कि उसकी पढ़ाई-लिखाई भी तो पापा ने ही करवाई है। वह समझने लगी है कि बूढ़े हो चले हैं, माँ के नहीं होने से अकेले भी। थोड़ा एडजस्ट कर लेना चाहिए। कुल मिलाकर डॉ. अवस्थी को यूँ कोई दिक्कत नहीं है। जो भी है, वह वैदेही के न रहने की है, बस।
'अरे ऐसा नहीं है, कुछ होगा ही तभी तो दुनिया के सारे मुल्क चिंता कर रहे हैं। पूरी दुनिया में कोई तो ऐसा दानिश्वर होगा ही न जो असली मंशा समझता और आज तो कहीं से खड़ा होकर कोई कुछ भी अलाय-बलाय बक दे तो पूरी दुनिया में फैल जाता। तो यदि वो कहेगा तो क्या उस पर कोई मशवरा नहीं किया जाएगा क्या? कुछ गंभीर हो ही रहा होगा, तभी तो ये सब हो रहा है।' - साइकल पंक्चर बनाने वाले जावेद ने अपनी समझ का प्रदर्शन किया।
'है क्यों नहीं? तुझे फर्क दिखाई नहीं देता क्या परमे...?' - डॉ. अवस्थी ने खीझकर पूछा।
'क्या... देखो, पहले सूखा पड़ता था, अकाल पड़ता था। कभी पानी ज्यादा पड़ जाता था तो फसलें खराब हो जाती थी। अनाज मिलना बंद हो जाता था। अब ऐसा कहाँ होता है? कभी अनाज कम हुआ हो, कहीं अकाल पड़ा हो ऐसा तो सुनाई नहीं पड़ता।' - परमजीत ने फिर पूछा।
`अभी कौन-सा महीना चल रहा है?' - डॉ. अवस्थी ने पूछा।
'दिसंबर आया जाता है और क्या?' -परमजीत ने कहा। सबकी चाय खत्म हो गई थी। एक-एक कर कप ट्रे में रखे जा चुके थे।
'तो सर्दी लगी तुझे...!`- डॉ. अवस्थी ने उसे घूरकर देखा।
'हओ... अभी तक सर्दी का नामो-निशान नहीं है। सच कहता है तू डॉक्टर। पर ये तो बता कि ऐसा क्यों हो रहा है?' -परमजीत ने पूछा। डॉ. अवस्थी अभी सोच ही रहे थे कि इस मूढ़मति को कहाँ से और कैसे समझाए कि डोरबेल बजी। डॉ. अवस्थी अपने घुटनों की तकलीफ की वजह से थोड़ा धीरे से उठ पाते हैं। तो उन्हें बैठे रहने का इशारा करते हुए जावेद ने जाकर देखा कि कौन है और फिर दरवाजा खोल दिया। ये उन तीनों के लिए रोजमर्रा का काम है और रजनी बाई का भी। जब वो आती है, तीन-चार बुड्ढे वहाँ बैठे मिलते हैं। इनको भी आदत है उसके आकर काम करने की। उसने किसी की तरफ भी नहीं देखा और तेजी से कप वाली ट्रे उठाकर भीतर जाने लगी। पता नहीं क्या हुआ कि उसके हाथ से ट्रे छूट गई। ट्रे भी टूट गई और कप भी।
डॉ. अवस्थी चिल्लाए 'इतने घरों का काम ले लिया है कि हमेशा हड़बड़ी में ही रहती है। कितना नुकसान कर दिया?' - और उठने को हुए ही थे कि रजनी ने हाथ के इशारे से उन्हें बरजा। 'आप बैठे रहिए, तमाम काँच बिखर गया है।'- उसकी आवाज में उदासी और आत्मीयता की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी। डॉ. अवस्थी अभी उस ध्वनि का अर्थ ग्रहण करते इससे पहले ही परमजीत चिल्लाया 'ओए कुड़िए तू भी वहीं रे... नंगे पैर है। जरा हिली तो कांच पांव में धँस जाएगा। रूक मैं चप्पल लेकर आया।' और परमजीत ने पोर्च में पड़ी स्लीपर हाथ में उठाकर रजनी के पैरों के पास रख दी। जाने क्या हुआ कि रजनी की आँखें जार-जार बहने लगी।
'ओ तेनू हुआ की है? ऐसे क्यों रो री है?' - परमजीत ने उससे स्नेह से पूछा।
'क्या हुआ बेटा... तेरे मियाँ ने पिटाई तो नहीं की न तेरी?'- डॉ. अवस्थी ने भी उससे चिंता से पूछा। इतनी सारी सहानुभूति, इतना सारा प्यार, इतनी चिंता एक औरत कैसे सह सकती है वह और भी जोर से सुबकने लगी।
'हुआ क्या है बेटी?' - अबकी जावेद ने जाकर उसके सिर पर हाथ रखा और पूछा। उसने सुबकते हुए पूछा 'क्या आप मेरे भाई को काम दिलवा सकते हैं?'
अबकी तीनों ने एक-दूसरे की तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देखा। रजनी की आँखें फिर से आँसुओं से भर गई। उसने दो घूँट भीतर उतारे, थोड़ा संयत हुई और बोली 'गाँव में मेरा मायका था, तीन महीने पहले बापू ने आत्महत्या कर ली। आप लोगों को याद हो वो फोटो जिसमें किसान ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी?' - उसने उदास और प्रश्न करती आँखों से देखा था।
'हाँ... हाँ...' - एकाएक डॉ. अवस्थी की आँखों के आगे वह तस्वीर उभर आई थी। उस रात वे सो नहीं पाए थे। अभी कुछ दिनों पुरानी ही तो बात है।
'हाँ फसल बर्बाद होने की वजह से... वही न???'- डॉ. अवस्थी ने उससे पूछा।
'हाँ, वही... कर्ज बहुत हो गया था। हमारे गाँव में लगातार बारिश होती रही और धूप नहीं निकली तो कपास की फसल में कीड़ा लग गया। बापू ने पहली बार कपास की फसल ली थी, कर्ज लिया था बैंक से। लगा था कि पुराने सारे कर्ज चुका देंगे, गिरवी रखी जमीन भी छुड़वा लेंगे... कितना कुछ सोच लिया था। अम्माँ से कित्ते खुश होकर वो सब कहा करते थे। किसे मालूम था कि बीच में वो ही सब छोड़कर चले जाएँगे।' - वह चुप हो गई। आँखों में फिर आँसू भर आए।
'छोटा भाई है, बारहवीं में पढ़ रहा है। बापू के ऐसे अचानक चले जाने से उसका भी पढ़ाई में मन नहीं लगता है। कर्जदारों ने जमीन पर कब्जा कर लिया है। बैंक का कर्ज है तो घर और बैल कुर्क हो गए। अब माँ और भाई हैं, लेकिन जीने के लिए काम तो चाहिए न...? भाई शहर आया तो मेरा घरवाला कहता है कि मैं हाड़तोड़ मेहनत करके कमाता हूँ, मुफ्तखोरों को नहीं खिलाऊँगा, मैं चाहती थी कि भाई अपनी पढ़ाई पूरी कर ले...' - उसने निराशा में ठंडी साँस छोड़ी। 'उसे काम मिल जाता तो शायद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाता... आप उसे कोई काम दे सकते हैं क्या???' उसने एक उम्मीद से परमजीत की तरफ देखा। वह भी जानती थी कि दादाजी तो रिटायर हो गए हैं, जावेद की तो खुद की स्थिति ठीक नहीं है... बस परमजीत ही कुछ काम दिला पाए तो दिलाए।
'हाँ ओए तू मेरे पास भिजवा देना उसको। मैं देखता हूँ, क्या काम कर सकता है। तू लोड मत ले, सब ठीक हो जाएगा।' - परमजीत ने उसे सांत्वना देते हुए कहा।
'आपका बहुत अहसान होगा। मेरा भाई पढ़ जाएगा तो मेरी माँ का बुढ़ापा सुधर जाएगा। मैं उसे आपके पास भेज दूँगी, भगवान आपको खूब बरक्कत दे।' - कहते-कहते वह अपने काम में लग गई। तीनों एकदम से असहज हो गए।
टीवी पर अब भी वही रिपोर्ट चल रही थी। तीनों चुपचाप वही देख रहे थे। तभी डॉ. अवस्थी ने गला खखारकर परमजीत की से कहा 'ये हो रहा है, जलवायु परिवर्तन से...' परमजीत एकाएक उनकी बात को कनेक्ट नहीं कर पाया। उसने उजबक की तरह डॉ. अवस्थी को देखा 'क्या....?'
'अभी सुना नहीं? रजनी क्या कह गई?' - उन्होंने खीझकर परमजीत से कहा। 'तो...?'
'अरे... याद कर जब हम स्कूल-कॉलेज में पढ़ते थे तो दिसंबर ऐसा हुआ करता था??? तूने तो खेती की है, बता क्या इस तरह का मौसम हो तो गेहूँ पकेगा... दाना बनेगा???' ऐसे में क्या तो खेती होगी और क्या लोगों को अनाज मिलेगा?' - चिढ़कर डॉ. अवस्थी ने कहा।
'हाँ, बात तो सही है ओए... गए साल जो सर्दियों में बारिश हुई थी उससे गेहूँ की फसल पूरी बर्बाद हो गई थी, मेरा भांजा बता रहा था। पिछला कर्ज को ठीक से चुका नहीं है, इस बार की फसल पर फिर से मुसीबत...। तो ये सब मौसम में परिवर्तन से हो रहा है?' - परमजीत ने मासूमी से पूछा।
'और नहीं तो क्या...? कोई मौसम अपने समय पर नहीं आता, न जाता है। ठंड जैसे सिकुड़ गई है और गर्मी फैल गई है। बारिश का तो कोई अनुशासन ही नहीं है। जब होना होती है, तब नहीं होती और जब नहीं होना होती है, तब होती रहती है। तो खेती के अतिरिक्त दूसरी और समस्या भी तो होती है न...?'- डॉ. अवस्थी ने सवालनुमा जवाब दिया। दोनों चुप थे, जैसे उनकी बात को समझने की कोशिश कर रहे हो। रजनी का काम पूरा हो गया था। वह बाहर ड्राइंग रूम में आई और परमजीत से बोली 'मैं कल भाई तो आपके घर भेज दूँ क्या?'
'अरे घर क्यों कुडिए.... दफ्तर भेज न... सुबह १२ बजे तक उसे भेज देना। उसके बाद मैं दफ्तर से आ जाता हूँ, देविंदर को कुछ समझ नहीं आता।' - परमजीत ने रजनी से कहा।
'जी कल मैं उसे भेज दूँगी, रोहित नाम है उसका। आप देख लेना, थोड़ा शर्मिला है... लेकिन है ईमानदार और मेहनती भी।' - कहते-कहते रजनी की आँखों में आँसू उतर आए। जावेद गहरी साँस छोड़ते हुए बुदबुदाया... बहन...। परमजीत और डॉ. अवस्थी ने उसकी तरफ देखा तो उसकी आँखों में भी पानी झिलमिला रहा था। मौसम की बात दब कर रह गई। कुछ यहाँ-वहाँ की बात हुई और शाम होने से पहले ही परमजीत और जावेद अपने-अपने घर को रवाना हो गए। डॉ. अवस्थी अब राजश्री और अमोघ का इंतजार करने लगे।
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राजश्री किचन में चाय बनाने आई तो एकाएक उसे कप कम नजर आए। उसने सिंक में देखा, फिर वाश एरिया में जाकर भी देख लिए। एक नजर डॉ. अवस्थी के कमरे में भी कनखियों से झाँककर देख आई। कहीं भी नजर नहीं आए, तो क्या....?
डॉ. अवस्थी को बाहर आते देखकर राजश्री ने पूछ लिया 'पापा, कप फूट गए हैं क्या???'
'अरे हाँ, आज पता नहीं कैसे रजनी से हाथ से ट्रे ही छूट गई... सारे कप...।' कहते-कहते उन्होंने अपनी बात छोड़ दी, गला भर आया। वो सुन नहीं पाए, लेकिन राजश्री कुछ बुदबुदाई... पता नहीं क्या?
दो दिन बाद जब डॉ. अवस्थी दोपहर की चाय बना रहे थे, तब उनकी नजर रैक में रखे उन दो खूबसूरत कॉफी मग पर पड़ी जो शायद कल ही राजश्री लेकर आई थी। ऐसा कभी हुआ तो नहीं, पता नहीं आज क्या हुआ कि उन्होंने उन मग को हाथ में लेकर ललचाई नजर से देखा। कितने खूबसूरत है... दोनों का रंग काला है, हैंडल सफेद और काले रंग के मग पर लाल रंग से बनी दो आँखें और होंठ... कह सकते हैं कि एक मग पर स्त्री और दूसरे पर पुरुष की आँखें और होंठ हैं। एक बारगी तो उन मग को देखकर इस उम्र में भी डॉ. अवस्थी को झुरझुरी हो आई। वो बड़े मग थे, जितने बड़े मग में रात में दूध पिया जाता है या फिर अच्छे मूड और अच्छे मौसम में कॉफी।
बचपन में ही किसी ने शुद्धोधन को बताया था कि ज्यादा कॉफी नहीं पीनी चाहिए, क्योंकि कॉफी दिमाग का ग्रे मैटर कम करती है, इसलिए खूब पसंद होते हुए भी उन्होंने कॉफी पीना बंद-सा ही कर दिया था। हाँ सर्दियों में रात को गर्म दूध पीने का सिलसिला वैदेही का ही शुरू किया हुआ है। शुरुआती सालों में बड़ी बकझक होती थी। इत्ते बड़े होकर कोई दूध पीता है, दूध तो बच्चों को दिया जाता है। लेकिन वैदेही जल्दी हार मान जाए...? पढ़ाते तो डॉ. अवस्थी थे, लेकिन वे भी वैदेही से जीत नहीं पाते थे। फिर एक दिन डॉ. पाटणकर से इसकी चर्चा की तो उन्होंने भी वैदेही की बात की ही तस्दीक की। हाँ सर्दियों में रात में गर्म दूध कई वजहों से स्वास्थ्यकर हुआ करता है। लिजिए बात खत्म हुई। तो तब से परिवार में सर्दियों में गर्म दूध पीना जैसे एक रिचुअल-सा ही हो गया था। राजश्री ने भी अपनाया और अनु ने भी। अभी पिछली सर्दी में ही दोनों अनु के घर रहे थे कुछ दिन... जब उसके सास-ससुर की शादी की ५० वीं वर्षगांठ मनाई गई थी, तब देखा था अनु रात में सभी को दूध गर्म कर दिया करती थी। वैदेही ने बहुत गर्व से अनु को और फिर डॉ. अवस्थी की ओर देखा था। अब बच्चों का पता नहीं बाहर रहकर वे इसका पालन करते हैं या नहीं, लेकिन घर में आकर तो उन्हें पीना ही होता है। एक बार फिर से उन्होंने उन मग्स को गौर से देखा था।
उन्हें यकीन ही नहीं आ रहा है कि ये वे स्वयं हैं। जाने विषय का प्रभाव था कि स्वभाव ही ऐसा था कि भौतिकता के प्रति कभी कोई आग्रह रहा ही नहीं। या शायद ऐसा हो कि चूँकि वैदेही ने ही उनके जीवन में सारी चीजें भरी थी तो उन्हें इसका आकर्षण कभी रहा ही नहीं। जो भी हो उन मग्स के प्रति उनका आकर्षण उन्हें खुद ही चौंका रहा था।
हर रात जब राजश्री ट्रे में कप लेकर आती तो उनमें एक आकर्षक उत्सुकता जागती... शुरुआत में तो वे हसरत से ट्रे की तरफ देखते और निराश होते रहे। फिर कुछ दिन उन्होंने एक तरह की निस्संगता ही धारण कर ली या यूँ कह लें कि निस्संगता का भ्रम स्वयं को देने लगे। राजश्री का उनके कमरे में आना, कप का साइड टेबल पर रखा जाना। इस पूरे वक्त को ही टालते रहते... एक उपाय कर लिया उन्होंने। जैसे ही किचन की लाइट ऑफ होने की आवाज आती हैं डॉ. अवस्थी उठकर या तो बाथरूम चले जाते हैं या फिर पार्टीशन के उस तरफ रैक की ओट में किताबें देखने लगते हैं या फिर बालकनी में जाकर खड़े हो जाते हैं। 'पापा दूध रखा है टेबल पर' सुनने के बाद ही वे लौटते हैं, लेकिन उससे क्या? अपने बेड की तरफ आते ही सबसे पहले उनकी नजर कप पर पड़ती है और वे निराश हो जाते हैं। एक रात उनके मन में एक विचार आया कि चूँकि वो दो ही कप है, इसलिए जाहिर है वो दोनों अमोघ और राजश्री के लिए ही होंगे। यदि मोक्ष आता है तो उसे भी कोई और कप ही मिलेगा। इस विचार ने उन्हें काफी राहत पहुँचाई। अब वे दुविधा से बाहर आ गए हैं, मान लिया है, कि उनके हिस्से में वही हरे रंग का मग होगा जो हर रोज होता है। लेकिन दुविधा क्या कभी खत्म होती है? अमोघ को किसी ट्रेनिंग प्रोग्राम में चार दिन के लिए बाहर जाना पड़ा।
डॉ. अवस्थी की पूरी चेतना रात को आने वाले दूध के मग पर अटक गई। पहले ही दिन वे बेहद उत्सुकता से अपने बेड पर बैठकर राजश्री के दूध लाने का इंतजार करते रहे। जब वह ट्रे लाई तो उसमें एक वही हरा मग था और दूसरा वो काला मग... उन्हें निराशा हुई, खीझ आई, चिढ़ भी आई...। लेकिन क्या करते... क्या कहते? उन पूरे चार दिनों में न जाने कितनी बार उनके मन में मग का विचार आता-जाता रहा। इसके साथ ही खीझ भी होती रही। जैसे वो मग उनके दिमाग में कहीं अटक गया है, मन में कहीं उलझ गया है। आखिर अमोघ भी आ ही गया। फिर से वही होने लगा। बस वो मग डॉ. अवस्थी के मन में अटके ही रहे।
फरवरी आधा गुजर गया था। मौसम में अब भी सर्दियों की खुनक थी। हवा अब पश्चिम की बजाए दक्षिण की तरफ से चलने लगी थी और वहाँ के चक्रवात का असर यहाँ भी हुआ नतीजा दो दिन से मौसम में ठंडक बढ़ी और आज सुबह से ही बादलों का जमावड़ा होने लगा।
खाना खाकर थाली सिंक में रखी ही थी कि बारिश शुरू हो गई। एकाएक उन्हें कौशिकी चक्रवर्ती की सीडी मिल गई। मौसम बदलने से मन भी बदला... आखिर जिंदगी कहाँ ठहरती है? उन्होंने बहुत दिनों बाद फिर से म्यूजिक सिस्टम की धूल झाड़ी... सीडी लगाई। बहुत दिनों बाद मन हुआ कि आज कॉफी पी जाए... वैसी जैसी रिसर्च के दिनों में कई बार यूँ ही लाड़-लाड़ में वैदेही बनाकर पिलाया करती थी... खूब झाग वाली कड़क कॉफी... वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर दिमाग का ग्रे मैटर कम हो या फिर ज्यादा इससे बहुत ज्यादा कुछ बदलता नहीं है। उत्साह में भरकर डॉ. अवस्थी किचन में आए... मग लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो हाथ में वही खूबसूरत मग आया जो अर्से से उनके मन में अटका हुआ है। उन्होंने अपनी आँख मूँद ली... दोनों मग पास-पास ही थे, बिना देखे उन्होंने एक मग उठाया। अपने बचपने पर मुस्कुराए... अच्छा मन कुछ भी करवा सकता है। आँखें खोली तो स्त्री वाला मग... पूरे शरीर में सनसनी-सी फैल गई।
चीनी, कॉफी और एक छोटा चम्मच दूध डालकर वे कॉफी फेंटने लगे। जैसे-जैसे चीनी घुलने लगी मिश्रण का रंग कॉफी से गोल्डन होने लगा... चम्मच घुमाने में एक लय थी, एक लय मन में एक लय कौशिकी की ठुमरी... याद पिया की आए में थी। अतीत-भविष्य से इतर डॉ. अवस्थी आज में स्थित हो गए थे। कॉफी की चीनी उनके मन में भी घुल रही थी।
कॉफी बनाई... कप को हाथ में लेकर इत्मीनान से बॉलकनी के झूले पर बैठ गए। तराना के अटपटे बोल थे, बादलों की गड़गड़ाहट थी। डॉ. अवस्थी समय-काल के परे जा खड़े हुए थे। आँखें मूँद ली थी... जिंदगी प्रवाहित हो रही थी, मन गुनगुना रहा था। सीडी खत्म हो चुकी थी। बादलों का झरना जारी था। कॉफी पीकर मग को उन्होंने वहीं जमीन पर रख दिया था। आनंदातिरेक से आँखें भर रही थी... झर रही थी। बहुत देर तक वे यूँ ही बने रहे, मौन... अचल... विरल...। गहरी साँस से जैसे मौसम की गंध को खींचकर नसों में छोड़ दिया हो.... । डोर बेल की आवाज ने उनकी तंद्रा भंग की... एक आनंदित क्षण की भ्रूण-हत्या हो गई। झुँझलाकर उठे तो उस सुंदर कॉफी मग को पैरों की ठोकर लगी और दीवार से टकराकर क्या बिखरा... जैसे सब कुछ बिखर गया। जाकर दरवाजा खोला, रजनी थी। रजनी को बॉलकनी में एहतियात से जाने और चीनी के टुकड़ों को सावधानी से समेटने की हिदायत देकर वे ड्राइंग रुम में टीवी के सामने आ गए। मन पर फिर से बादल घिर आए। एक तो चोरी से उन मग में कॉफी पीने का अपराध-बोध दूसरा उस सुंदर मग के टूट जाने की निराशा... ।
उदास शाम थी, टीवी पर ऊलजुलूल कार्यक्रम चल रहे थे। अमोघ ने आकर चैनल बदल दिया, अब कोई न्यूज चैनल चलने लगा। मन उदास था तो कौन क्या बोल रहा था और टीवी पर क्या चल रहा था? डॉ. अवस्थी उस सबसे अनजान बैठे हुए थे। मन कहीं और था, वे स्वयं कहीं और...। सबने खाना खाया, डॉ. अवस्थी थोड़ी देर टहलने के लिए बाहर निकल गए। जब वे लौटे रहे थे, तब अमोघ और राजश्री बाहर जा रहे थे। वे अपने कमरे में आ गए। कुछ देर यूँ ही असमंजस में वे कमरे के बीचोंबीच खड़े रहे। उन्हें समझ ही नहीं आया कि वे क्या करें? रैक की तरफ जाकर उन्होंने कुछ किताबों को टटोला... 'अष्टावक्र गीता' पर हाथ गया, वही खींच ली गई। जब मन विचलित हो तो गीता से बेहतर क्या? लेकर अपने बेड पर आ गए। दोनों घर में लौट आए हैं, किचन से चिर-परिचित आवाजें आ रही हैं, लेकिन डॉ. अवस्थी इस सबसे बिल्कुल उदासीन होकर किताब के पन्नों पर अपनी नजर लगाए हुए हैं, ये अलग बात है कि उदास मन तक चाह कर भी आँखें कुछ पहुँचा नहीं पा रही थी। घड़ी में ग्यारह बज रहे थे, साइड टेबल की तरफ उनकी पीठ थी, जब राजश्री ने आकर कप रखा औऱ कहा 'पापा दूध रखा है।'
'ओके बेटा...' - कहकर वे उसी तरह पीठ किए किताब पढ़ते रहे। जब दूध का ध्यान आया तो वे करवट बदल कर बैठे... मग की तरफ हाथ बढ़ाया, आँखों ने पीछा किया... वही अकेला बचा काला कॉफी मग था, जिसका साथी आज बिछुड़ गया है... मन भर आया... अकेलापन सरसरा गया... आँखें बरसने लगी।

परिकथा के जनवरी 2018 के नववर्ष अंक में प्रकाशित मेरी कहानी



Sunday, 10 November 2013

अनुभवों के इस पार...

माँ को हमेशा ही ये दुख रहा है कि इस लड़की का घर के किसी काम में मन नहीं लगता है। कभी उन्हें बेटी की माँ होने का सुख भी नहीं मिला। अपनी छोटी बहन की छोटी-छोटी बेटियाँ घर का काम करती और माँ को आराम देती, लेकिन उनकी बेटी घर के काम में जरा भी हाथ नहीं बँटाती थी। कोई पढ़ने-लिखने में ऐसा तीर भी नहीं मार रही थी कि लगे चलो, घर के काम नहीं तो कम-से-कम पढ़ाई में तो अव्वल आ रही है। उसने माँ को किसी भी मोर्चे पर गर्व करने का मौका नहीं दिया। बाद के सालों में हमेशा उसे ये महसूस होता रहा। अक्सर त्यौहारों के मौकों पर जब घर का काम बढ़ जाता, तब माँ को बहुत ही ज्यादा इस बात का अहसास होता कि काश उनकी बेटी भी उनके काम में हाथ बँटाए तो उन्हें थोड़ी राहत हो। जब कभी माँ ने उससे ये कहा... उसने ये कह कर माँ को चुप करा दिया कि आपसे जितना बने आप उतना ही क्यों नहीं करती हैं? दुनिया में सब काम मोल होता है। सब काम आप खुद ही क्यों करना चाहती हैं?
समझ में तो माँ को भी नहीं आता कि उन्हें ऐसी क्या ज़िद्द होती है कि वो घर का हर काम खुद करना चाहती हैं? अब दीपावली के कामों को ही देख लो... सफाई के बाद भी कितने काम ऐसे होते हैं, जो दीपावली के ऐन दिन तक चलते हैं या फिर उसी दिन किए जाते हैं। न तो वो किसी काम को मिस करती है और न ही किसी और से करवाती है। यहाँ तक कि एक बार खुद पापा ने कहा था कि इतने हैक्टिक शेड्यूल में रंगोली बनाना कोई जरूरी तो नहीं है, मत बनाओ...। तो माँ ने चिढ़कर कहा था कि ‘तो क्या दीपावली बिना रंगोली के ही निकल जाने दूँ?’ दादी ने सुझाया कि ‘बाजार में इतनी बड़ी-बड़ी रंगोली तैयार मिलती है, (उनका मतलब स्टिकर से था) वो ही लाकर लगा देते हैं। दो घंटे कमर और गर्दन तोड़कर बनाती हो और अगले दिन उसे झाड़ू से साफ कर दो... ये भी कोई बात हुई भला’, लेकिन माँ ने कभी किसी का कहा माना है जो अब मानती...! हर दीपावली पर यही सब कुछ दोहराया जाता...। यूँ रोली को बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन जब माँ रोली पर खिझती थी, तब उसे लगता था कि जब माँ से होता नहीं है तो इतना सब करती ही क्यों है? माँ खुद ही नहीं जानती रोली को क्या बताती... बस सब ऐसा ही चलता रहा।
शादी होकर ससुराल आई तो सासूमाँ को भी ऐसा ही सब कुछ करते देखा। माँ की तरह सासूमाँ से भी उसने यही कहा कि चूँकि ‘मैं मदद नहीं करा सकती है, इसलिए क्यों नहीं हम सब मोल करवा-मंगवा ले...।’ लेकिन माँ की ही तरह सासूमाँ ने भी इंकार कर दिया। उनके पास अपने तर्क थे... ‘घर का शुद्ध होता है’, ‘जिस तरह से हम कर सकते हैं, कामवाले थोड़ी करते हैं’, ‘पैसा कितना लगता है’, ‘बाजार से कितना और क्या-क्या आएगा’, ‘फिर त्यौहार पता ही कैसे लगेगा’ या फिर ‘जो कुछ पारंपरिक तौर पर बनता है, वो सब थोड़ी बाजार में मिल जाता है’। रोली का अब भी घर के कामों में बहुत मन नहीं रमता था। हालाँकि थोड़ा-थोड़ा करने लगी थी, लेकिन बहुत ज्यादा तब भी नहीं। फिर सासूमाँ ने उस पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी डाली भी नहीं थी। जिंदगी बहुत मजे में कट रही थी। उसने माँ और सासूमाँ की एप्रोच को ‘दुनिया की सारी माँओं’ के एक जैसे होने के खाँचे में डाल दिया था, क्योंकि आखिर माँ और सासूमाँ में बहुत सारी असमानताएँ थी, लेकिन इस मामले में दोनों ही एक-जैसी निकलीं।
उस साल दिवाली पर सब कुछ गड़बड़ हो गया। बरसात कुंवार के आखिर तक खिंचती चली आई... बरसात-गर्मी, गर्मी-बरसात में सासूमाँ बीमार हो गई। सफाई जैसे-तैसे कामवालों के भरोसे खींची... बस खींच ही ली थी। वो भी समझ रही थीं, कैसे हो सकता है। मुश्किल नौकरी के बीच घर के काम और उस पर त्यौहार के अतिरिक्त काम, उनकी बेबसी ये कि वे खुद कोई मदद कर पाने की स्थिति में नहीं थी। अक्षत भरसक मदद कर रहे थे, लेकिन वो भी बार-बार वही कह रहे थे, जो कुछ अब तक रोली कहती आई थी। जितना हो, बस उतना ही करो... लेकिन रोली थी कि जाने से पहले बहुत कुछ निबटा कर जाती और देर से आती तब भी आकर भिड़कर काम करती। थककर सोती और सुबह उठकर फिर से वही चक्की। दिन-रात, रात-दिन एक कर उसने बहुत सारे काम किए...। आखिर में मिठाई बनाने की बारी आई, जाने कैसी हुलस थी कि हर चीज़ खुद बनाना चाही थी रोली ने। सासूमाँ और अक्षत दोनों ने ही उससे कितना कहा कि बाज़ार से जो चाहो खरीदा जा सकता है। बहुत मत बनाओ... उस शाम मठरी, चक्की, चिवड़ा, चकली, सेंव, लड्डू, शकरपारे की थालियाँ भरकर जब उसने डायनिंग टेबल पर सजाई तो जाने कैसा संतोष का भाव उभरकर आया, उसे जो महसूस हुआ उसके लिए उसके पास शब्द नहीं थे, बस भाव थे... तृप्त, संतृप्त...। सबकुछ उसने अक्षत की मदद से बनाया, कुछ बहुत अच्छा बना और कुछ में कसर रह गई... लेकिन उसने बनाया। लेकिन रंगोली रह गई... अरे, रंगोली के बिना दिवाली कैसी... ? अगली सुबह जल्दी उठकर उसने रंगोली बनाई, बंदनवार सजाए... सोफा-कवर, कुशन-कवर, पर्दे और चादरें बदलीं... और सुकून से सबकुछ को निहारने लगी तो लगा बहुत दिन बाद वो खुद के बहुत आकर बैठी। इतने वक्त में उसे खुद का ख़याल ही नहीं आया। उसने खुद से सवाल किया ‘आखिर, कितने सालों से पहले वह माँ को फिर सासूमाँ को कहती आई कि इतना मर-भिड़कर त्यौहार मनाने का फायदा क्या है? सारा बाज़ार आखिर क्यों सजा होता है, त्यौहार के लिए? और अब खुद ने भी वही सब किया...!’ रोली उलझ गई... इतने दिनों से लगी रही और अब जब त्यौहार के मुहाने पर खड़ी है, सवाल आ खड़ा हुआ, ‘जिस सबका उसने विरोध किया, वही सब उसने भी किया... क्यों???’ चैतन्यता में पैदा हुआ सवाल रात भर में छनकर अवचेतन में उतर गया। नींद एक तरफ अवचेतन की प्रक्रिया दूसरी तरफ... नींद में ही जवाब भी उभरा था। खुद करने के बाद जो मिलता है उसे ही आनंद कहा जा सकता है। बिना किए आनंद की सृष्टि नहीं होती। पहली बार उसे महसूस हुआ था कि वो खुद दीवाली मना रही है। जो कुछ माँ और सासूमाँ करती रहीं, उसका सार अब समझ में आया। कर्म से ही आनंद की उत्पत्ति होती है, अकर्मण्यता सिर्फ उदासीनता को ही पोसती है। नरक चौदस की सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह बहुत हल्की-फुल्की थी... सबकुछ उसने अपने मन-मुताबिक कर डाला था। बस गिफ्ट्स नहीं खरीद पाई थी। ओ... चलो, जल्दी खाना निबटाकर ये भी आज कर डालूँ, आखिर कल ही तो है दीपावली...। शरीर की अनिच्छा के बावजूद मन तरंगित था और उसी की तरंग में उसने बिस्तर छोड़ दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र 151
कर्म से ही रस की निष्पत्ति संभव है.


Wednesday, 4 September 2013

सहना-होना

जाने किसका नुकसान बड़ा है, या किसका दुख बड़ा है, लेकिन लगभग पांच महीने बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा कि शायद मैंने अपने दुख को बड़ा समझ लिया है। उस दोपहर जब मैं उससे मिला तो वह अपनी खिड़की के नीचे दीवार से पीठ लगाए बैठा था, हमेशा की तरह कमरे का दरवाजा खुला हुआ था पश्चिम की तरफ खुलती खिड़की से आती धूप की कतरनें उसके सिर से गुज़रकर कमरे के बीचों बीच बिछी हुई थी। वो बेख़याली में था... इतना कि मैं चलकर कमरे के बीचों बीच तक पहुँच गया था, धूप के जिस चोकोर टुकड़े को वो एकटक देख रहा था, मैंने उसे काट दिया था... तब भी वो उसे ही देख रहा था। कुछ देर मैं ऐसे ही खड़ा रहा, उसकी धूप पर अपने शरीर को टिकाए हुए... एकाएक वो लौटा खुद में... मुझे देखकर वो खड़ा हो गया। खिड़की की चोखट पर दोनों हथेलियाँ टिकाए, जैसे वो खुद को मेरे हवाले कर रहा हो... जाने क्या था उसकी आँखों में कि मेरा अपराध बोध गहराने लगा था। पाँच महीने गुज़र गए थे, मैंने पलटकर उसे देखा नहीं था।
इतना ही वक्त लगा था, मुझे ये समझने में कि चाहे हम दोनों के दुख की शक्लें अलग-अलग हैं, उसकी तासीर एक सी है और एक-सी तासीर वाले दुख को साथ-साथ ही बहना चाहिए। क्योंकि दुख की तासीर ही तरल है... आँसू की शक्ल-सी। मैंने उसके चेहरे की तरफ नज़र की तो उसके चेहरे का कातर भाव सहा नहीं गया... मैं खुद को रोक नहीं पाया। दौड़कर उससे लिपट गया... वो शायद किसी और चीज़ की उम्मीद कर रहा था, मेरे इस व्यवहार से वो हतप्रभ रह गया। जाने किस विचार ने उसके हाथों को जकड़ा लेकिन फिर उसका दुख भी बहने लगा था... उसने मुझे कस लिया था। हम दोनों रोते रहे थे, न जाने कितनी देर तक। या शायद रो नहीं रहे थे, दुख का संवाद सुन रह थे, वैसे ही एक दूसरे के गले लगे हुए।
जब हम अलग हुए तो वो सॉरी-सॉरी कह रहा था। मैंने उसके सिर को थपथपाया था... जाने कैसे इतना बड़प्पन आ गया था कि अपनी ही उम्र के दोस्त को सांत्वना दे रहा था, उसी दुख के लिए, जो उसी शिद्दत के साथ मेरे भीतर भी बह रहा था। हम दोनों बहुत देर तक साथ बैठे... मौन, अव्यक्त। मैं उससे सुनना चाहता था, कुछ कहना भी... लेकिन हम दोनों में से कोई कुछ भी नहीं बोला... और मैं यूँ ही चला आया था। आने के बाद लगा था कि मैं उसके पास बहुत कुछ भूल आया हूँ, या फिर शायद छोड़ ही आया हूँ।

वो इन दिनों खुद से बहुत-बहुत नाराज़ था, इतना कि बुखार में पड़ा रहता, लेकिन कोई ट्रीटमेंट नहीं लेता, कहीं दर्द हो रहा हो, वो उसे सहता रहता है। पूर्वा का स्यूसाईड नोट जो उसने उसे पोस्ट किया था, अक्सर वो उसे पढ़ता रहता था। उस शाम अपने कमरे की खिड़की से टिककर उसने पहली बार मुझे बताया था कि ‘पूर्वा के न रहने के लगभग 20 दिन बाद मुझ ये नोट पोस्ट से मिला था। और इस एक नोट ने मुझे खत्म कर दिया... इतनी पीड़ा तो उसके न रहने पर भी नहीं थी, जितनी इस नोट के मिलने से मिली है।’ मैं जानता था कि ये उसकी नितांत अपनी पूँजी है... क्योंकि पूर्वा ने ये मुझे नहीं लिखा था, उसे लिखा था। इसलिए मैंने ये जानने की कोशिश ही नहीं की कि आखिर उसने इसमें लिखा क्या है? पता नहीं शायद वो रेनडमली इसे पढ़ रहा था शुरुआत से, लेकिन मुझे सुना रहा था ‘जबसे तुमसे मिली हूँ, बस खुद के साथ द्वंद्व में ही रहती हूँ। तुमसे मिलने के बाद मेरी खुद को लेकर और दुनिया को लेकर समझ गड्डमड्ड हो गई है। खुद को लेकर आजकल सबसे ज्यादा संशय में रहने लगी हूँ। क्योंकि अब तक मैंने अपने बारे में जो जाना, समझा है, तुम मुझे मेरे बारे में जो बता रहे हो, बिल्कुल उलट है...। मैं इतनी बुरी तरह से उलझ गई हूँ कि मुझे अपने-आप से वितृष्णा होने लगी है। हो सकता है तुम मुझे ऐसा नहीं कह रहे हो, लेकिन मेरे भीतर जो पहुँचता है, वो इसी तरह पहुँचता है। पता है, ऐसा होता है कि जो मैं अनजाने या फिर अनचाहे कर देती हूँ, उससे मुझे खुद ही बहुत ग्लानि और चिढ़ होती है, लेकिन जब तुम उसे पाइंट आउट करते हो, तो लगता है कि आय हेट दिस... मतलब मुझे अपने ‘उस होने’ से घृणा होने लगती है। मैं ये भी जानती हूँ कि तुम सब कुछ सहज भाव में करते हो, कहते हो... लेकिन बस इससे आगे की मेरी समझ चुक जाती है...। मैं एक किस्म के पागलपन में फँस जाती हूँ, मुझे लगने लगता है कि मैं अपने होने को बदल दूँ... साफ कर दूँ मैं उसे जो मैं हूँ। और बस जो शुरू होता है, उसे त्रास कह लो, संघर्ष कर लो, जुनून कह लो फिर कुछ और... मैंने बहुत कोशिश की कि मैं खुद को वैसे कर लूँ जैसा तुम चाहते हो, लेकिन मैं यहाँ भी हार गई। अब मैं न तो वह रही जो मैं थी और न ही वह जो तुमने चाहा था। और दुनिया को लेकर भी मेरी सारी समझ मेरे अपने स्वभाव से उपजी है, मुझे लगता है कि मुझे वो सब कुछ जानने की कतई जरूरत नहीं है, जो मुझे सचेत करे, चौकन्ना बनाएँ। आखिर क्यों मुझे उस सबको जानना चाहिए जो मुझसे मेरी सहजता छीन सकता है। ये मेरी बुराई ही है कि मैं दिखाई देने के पार जाकर नहीं देखती। असल में मैं देखना चाहती ही नहीं, सोचती हूँ, उससे हासिल क्या होगा?
ऐसा सोचना बहुत पेनफुल था, करना तो फिर... लेकिन फिर लगा कि आय हैव नो ऑप्शंस... तुम जो हो वो हो, लेकिन मैं वो भी नहीं हूँ जो मैं हूँ और वो भी नहीं जो तुम चाहते हो। बहुत मुश्किल वक्त था, जब मुझे निर्णय करना था। तुम शायद समझ पाओ कि मेरे लिए खुद को खत्म करना आसान लगा बनिस्बत इसके कि इस रिश्ते को खत्म कर दूँ। सोचकर देखो कि किस तरह की मजबूरी रही होगी मेरी।
मैं एक जीत चाहती हूँ तुम पर, जीते जी न सही मर कर ही। वैसे तो नहीं जीत पाती, इसलिए...।’ वो रूक जाता है... एक धीमी-सी कराह उभरती है और डूब जाती है, उसी अँधेरे मौन में जिसमें से उसकी आवाज़ आ रही थी। बहुत देर तक सब कुछ बिल्कुल शांत रहता है।

उस दिन वो पूर्वा की लिखी हुई कतरनें लेकर बैठा था... मेरे सामने। एक-एक करके उसने उसे अपने पलंग पर बिखरा दिया था। देख, क्या-क्या लिखा करती थीं वो, कितना कुछ। फिर एकाएक चुप हो गया, हवा में खो गई उसकी नज़र... फिर लौट आया उसने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा... सिसकी रोकते हुए कहा-‘अब सोचता हूँ तो लगता है कि किसको लिखकर दिया था उसने ये सब... किसको? मुझे....? कौन हूँ मैं, और क्या किया मैंने उसके लिखे का... मुझे क्यों...? क्या मैं इसके लायक हूँ...?’ वो फिर से शून्य में खो गया और सिसकने लगा।
पूर्वा मेरी हमज़ाद... जुड़वाँ। आयडेंटिकल नहीं थे, लेकिन कुछ गहरे जुड़ा हुआ था, हम दोनों के बीच। साथ-साथ बड़े हो रहे थे, उसका हर बदलाव मैं देख रहा था, महसूस कर रहा था। यहाँ तक कि उसके बड़े होने की घटना को भी मैं ही देख रहा था। मलय दाखिल हुआ था, हमारी जिंदगियों में। मेरा दोस्त होकर। जैसे मैंने उसके दोस्त हैरिस को स्वीकार किया था, उसने मलय को, लेकिन हैरिस को लौटना पड़ा था, मलय ठहर गया था। पूर्वा मुझसे छुपाने लगी थी, कुछ... बहुत कुछ। मैं जान नहीं पाया था, लड़कियों के बड़े होने का सबसे पहला संकेत गोपनीयता हुआ करती है, ये मैं आज जान पा रहा हूँ। पूर्वा की डायरी मुझे नहीं मिली होती तो यकीन ही नहीं होता कि मलय और पूर्वा के बीच कुछ बहुत गहरा, बहुत गाढ़ा सृजित हो रहा था। जब मैंने पहले पहल उसकी डायरी पढ़ी थी तो मुझे लगा था कि मैं ठगा गया हूँ। मैंने जाना था कि मैं उसके हरेक मूवमेंट का गवाह हूँ, साक्षी भी, लेकिन मैं नहीं था। मलय था, इसलिए मैं बहुत हर्ट था। वक्त लगा था, ये जानने में कि भाई कब दूर हो जाता है? और कब कोई और उसकी बहन की जिंदगी में करीब हो जाता है। तो क्या देह भी रिश्तों की सीमा है... ये बड़ा खतरनाक सवाल था, और मैं इससे बचना चाह रहा था, क्योंकि पूर्वा मेरी बहन थी। हाँ थी... वो अब नहीं थीं... नहीं मेरी बहन तो वो अब भी थी, लेकिन वो नहीं थी। मर गई थी, अपनी जान उसने खुद ली थी। पूरी डायरी पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा था कि पूर्वा एब्नॉर्मल थीं। क्योंकि मैं मनोविज्ञान पढ़ रहा हूँ तो मैंने समझा कि वो एक उलझा हुआ किरदार थी।
उस रात हम दोनों देर तक यूँ ही टहलते रहे थे। मलय में बदलाव देख रहा था, गहरा बदलाव। हाँलाकि वो डूबता-उतराता लगता था, लेकिन फिर भी कभी-कभी ऐसा लगता था कि वो, वो नहीं है। उस रात हम दोनों बहुत देर तक चुपचाप टहलते रहे थे। फिर एकाएक उसने कहा था ‘समीर, मैं जब खुद को देखता हूँ तो लगता है कि मैं इस सबको डिज़र्व करता हूँ। आखिर सिर्फ उसने ही नहीं, मैंने भी तो उससे प्यार किया था। मैं उसके स्तर पर जाकर उसे क्यों नहीं समझ सका? मैं क्यों नहीं समझ सका कि उसमें एक बहुत छोटी बच्ची है, जो ज़हनी तौर पर बहुत नाज़ुक है, मैं क्यों नहीं समझ सका कि सारी दुनिया के आगे जो बहुत परिपक्व और मैच्योर नज़र आने की कोशिश करती है वो पूर्वा असल में एक खोल में है... खोल के भीतर वो बहुत नाज़ुक और बहुत संवेदनशील है। और जब मैंने उसे नहीं समझा है तो जाहिर है कि इस दुख का हकदार भी हूँ मैं...। तुम्हें पता है, उसने ऐसा क्यों किया? ’
इस बार उससे मिलना बहुत लंबे समय बाद हुआ था। कुछ दुनियादारी के काम थे, सो बाहर था। जब हम मिले तो चलते हुए नदी के किनारे जा पहुँचे थे। तीन-चार महीनों के अंतराल में मैंने पाया कि वो बहुत बदल गया है। घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए वो दूसरी तरफ देख रहा था। लगा कि वो बहुत स्थिर हो गया है। इतना कि न दुख नज़र आता है और न ही सुख। जब मैंने उसकी आँखों में देखा तो लगा कि वो पारदर्शी हो गया है। मैंने नज़रे झुका ली, वो शायद बहुत कुछ समझ गया। ‘पता है दुख जीवन का सच है। और कोई चाहे कुछ भी कह ले लेकिन अगला-पिछला जन्म कुछ नहीं होता है, जो कुछ भी होता है, यहीं होता है। मैंने उससे प्यार तो किया, लेकिन उसकी कद्र तक नहीं पहुँच पाया। मुझे लगता है कि मैंने उससे जितना प्यार किया, लगभग उतनी ही तकलीफ भी दी... तो जब तक वो थी, तब तक मैंने प्यार को भोगा और अब उसके नहीं होने पर उस तकलीफ को सहूँगा जो मैंने उसे दी थी। हिसाब बराबर... ।’ हालाँकि ये मेरे मन में ये सवाल तब तक नहीं उठा था, लेकिन जब उसने कहा तो लगा कि वो खुद को देखने लगा है, दूर से। ‘... लेकिन सोचता हूँ कि उस गुनाह का क्या और कहाँ हिसाब होगा, जिसकी वजह से उसने अपनी जान ली। आखिर तो जाने-अनजाने वजह तो मैं ही हूँ ना!’ मेरे लिए कुछ भी कहने की कोई गुंजाईश नहीं थी। ‘होगा... होगा... किसी वक्त उस सबका भी हिसाब होगा। अभी मेरी सज़ा पूरी हुई नहीं है। मैंने कहीं पढ़ा था कि हर दुख किसी गुनाह का परिणाम है, अब लगता है भोगा सच लिखा होगा लिखने वाले ने।’ मैंने उसकी तरफ देखा, भावहीन चेहरा था, जैसे वो किसी और के बारे में बात कर रहा हो। मैंने याद किया आज दिन भर में एक बार भी उसकी आँखें नहीं भीगी... एक बार भी उसकी आवाज़ नहीं लरज़ी, लगा कि वो शायद अपने दुख से बाहर आ गया है, लेकिन तुरंत ही लगा कि यदि दुख से बाहर आ गया होता तो इतना निर्लिप्त होकर दुख को नहीं सोचता-कहता... तो क्या उसने खुद को खुद से अलग कर लिया है? मुझे याद आया उसने एक दिन कहा था... ‘आजकल मैं अक्सर खुद से अलग हो जाता हूँ, देखता हूँ कि आखिर इस दुख से मुझे कहाँ-कहाँ दुख रहा है। पता है, कभी-कभी खुद को तड़पते देखते हुए अजीब-सा नशा होता है... जैसे मैं अपने किसी दुश्मन को तड़पते हुए देख रहा हूँ। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ, कि मैं क्या कर रहा हूँ और मुझे हो क्या रहा है?’ मैं उसकी तरफ देख रहा था और वो झुककर नदी के पानी में अपना अक्स... मुझे दो-दो मलय दिख रहे थे, शायद ऐसा हो भी रहा हो।
कहानी का मॉरल - सूत्र 139
ज्ञान का लक्ष्य इंसान को 'भोक्ता' से 'दृष्टा' बनाना है



Friday, 5 April 2013

बेखुदी का बड़ा सहारा है....


तू नींद की गोलियां कब से लेने लगी?
अरे... मैं पूर्वा के क्लिनिक में हूं। आजकल वो खुद को ही चौंकाने लगी है। कभी रात-रात भर जाग कर निकालने में... कभी ऑफिस में पागलों की तरह काम करते हुए, जब सब चले जाते हैं और ऑफिस बंद करना होता है तब प्युन आकर कहता है, ऑफिस बंद करना है, तो कभी 60 की स्पीड पर पुल चढ़ती गाड़ी में रिवर्स गियर लगाते हुए या फिर चलती गाड़ी में न्यूट्रल गियर लगाते हुए...। अब तो वो इतनी चौंकने लगी है कि जब वो नहीं चौंकाती है तब भी चौंकती है।

कितनी देर से बालों में कंघी घुमाती जा रही है उसे खुद भी याद नहीं.... रक्षा जब घर भर की सफाई करके जाने लगी तब उसने ही टोका... दीदी, क्या हुआ?
क्या हुआ!
तब से कंघी कर रही हैं?
ओह... कुछ नहीं ऐसे ही।
क्या कहती... ! कि आजकल धुन-सी सवार रहती है। टहलने निकलती है तो याद ही नहीं पड़ता कि कितनी दूर निकल आई है। चलती ही चली जाती है, बस...। नहाती है तो घंटा-घंटा भर... पानी ही उँडेला करती है। कई बार किताब हाथ में होती है और नज़रें शून्य में, कितनी ही देर तक वो यूँ ही बैठी रहती है।

जानती है कि यदि फोन आएगा तो बजेगा, लेकिन फिर भी चाहे कोई काम कर रही हो, लौट-लौटकर फोन के पास आती है। फोन पास हो तो उठा-उठा कर की-पैड अनलॉक करती है और देखती है कि कहीं ऐसा न हो कि वो काम में मशगूल हो गई हो और कोई मैसेज ही आया हो। अब तो जानने भी लगी है कि अब न तो फोन आएगा... न मैसेज... पर कोई आस है जो उसे मानने से रोके हुए है। दिन में हजार बार फोन के कांटेक्ट नंबर तक जाती है... मैसेज बॉक्स के न्यू मैसेज पर जाती और फिर लौट आती है। दिन में कई-कई बार वो फोन को बंद करती है और खुद से वादा करती है कि अब घंटे भर तक शांति से काम करेगी... घंटे भर बाद फोन चालू करेगी। काम करना शुरू करती है, लेकिन नज़रें घड़ी पर टिकी रहती है... फिर खुद ही को समझाती है ‘यदि किसी और का अर्जेंट कॉल होगा तो...!’ और 10 मिनट नहीं गुज़रते फोन चालू हो जाता...। नहीं... उसे अब उसकी जरूरत नहीं है, आखिर मान क्यों नहीं लेती... वो ही तो कहता था कि ‘मान लो तो आसानी होती है।‘ लेकिन बस मान ही तो नहीं पा रही है। खुद से सवाल पूछती है... आखिर वो क्या कहे, जिससे उसे समझ आए कि अब ये सब खत्म है... क्या और कैसे कहे? वो किन शब्दों में कहेगा, तब तुझे समझ आएगी... किन शब्दों में तू सुनना चाहती है? या कब तक उसकी जिंदगी से जौंक की तरह चिपकी रहना चाहती है, कब तक उसका खून पीते रहना चाहती है, कब तक?
वो समझाती है खुद को... हाँ, अब ये सब खत्म है। आगे सोच, अब क्या? लेकिन वो मान ही नहीं पाती है। उसने ही तो कहा था कि उसकी चिता वो खुद सजाएगा... अरे, ये सब किसी भावुक क्षण में कह दिया, तो क्या उसे जीवन भर ढोएगा... क्यों ढोएगा?

कितने दिनों तक ये होता रहा कि वो रास्ते भर लोगों की शक्लें देखते हुए गंतव्य तक पहुंचती... शायद वो रास्ते में ही नज़र आ जाए। पहले की तरह, जब वो नाराज़ हुआ करती थी तो गाड़ी के सामने खड़ा होकर लिफ़्ट मांगता था। उफान आता था और फिर एकदम बैठ जाता था। नहीं... अब कभी-कभी ऐसा नहीं होगा... वो खुद को समझाना चाहती है। दुखी लोगों की, पात्रों की हिम्मत को नज़ीर बनाती... फिर ज़ब्त छूट जाता। नहीं जानती कब से ऐसा होने लगा है, लेकिन उसे लगता है कि अनंतकाल से ऐसा ही होता आ रहा है।
ये तो सबसे पहले ही तय हो चुका था कि यदि किसी की जिंदगी में भी कोई और दाखिल होगा तो अच्छे दोस्तों की तरह हम एक-दूसरे को बता देंगे... यदि ऐसा कुछ है तो वो मुझे बता सकता था। इस तरह की उदासीनता उसे खोखला कर रही है और ये बात भी उसने कई बार कही है कि झगड़ लो... खींच लो मुझे अपनी तरफ, लेकिन ठंडापन नहीं। नहीं बर्दाश्त होता है... न जाने कितनी बार उसने ख़यालों में फांसी लगा ली है। न जाने कितनी बार उसने ये शहर, ये घर, ये मोबाइल नंबर छोड़ने की योजना बना ली है... लेकिन बस कुछ हो ही नहीं पाता।
पहले तो उसने मैसेज भी किए... फोन भी। वो या तो जवाब नहीं देता, या जवाब ऐसे देता कि वो तिलमिला जाती। धीरे-धीरे उसने हर चीज ज़ब्त करना शुरू कर दी। वो इस रिश्ते को हर हाल में बचाना चाहती थी। जान रही थी कि कुछ सड़ रहा है बहुत बुरी तरह से... अब उसके लिए वो वैसी नहीं बची है। उसकी कोई भी चीज उसे लुभाती नहीं है। बल्कि तो हर चीज उसे चिढ़ाती है... खिझाती है या जाने ऊबाने ही लगी हो। वो सहज थी उदास होती थी तो उसके सामने रो लिया करती थी और उत्साह में होती थी तो नजर आने लगती थी। उसके हर सुख-दुख से उसको वास्ता था, अब वो दुख में तड़प-तड़प कर रह जाती है और उस तक हल्की-सी आँच भी नहीं पहुँचती... यदि वो खुश होती है तब भी वो उदासीन ही बना रहता है। पहले उसकी उदासी, उसका रोना, उसका भटकाव.... उसकी इच्छा, उसका कहा हर चीज का मतलब हुआ करता था। धीरे-धीरे हर मतलब खत्म होने लगा। उसने देखा, लेकिन अनदेखा करती रही।

प्रेम केमिकल लोचा है... तो क्या इसका कोई इलाज नहीं है? ये कभी ठीक नहीं होता? दुनिया में लोग क्या-क्या सह लेते हैं? और मुझसे इतना-सा दुख सहा नहीं जा रहा है! सारे सहने वाले लोग एक-एक कर सामने आते हैं... उसे लगता है कि उनसे पूछे कि कैसे सह लिया...? मुझी से क्यों नहीं सहा जा रहा है? उसे याद आ रहा है कहीं पढ़ा हुआ... सहना ही सच है। और दुख जब घेरता है तो सारे रास्ते पहले ही अवरूद्ध कर देता है। हम दुख के सामने हमेशा ही निहत्थे होते हैं।

वो बार-बार उस दिन की घटना को रिवाइज करती है। उसने खुद को पूरी तरह से खोल कर रख दिया था, नहीं जानती थी गलती कर रही है। बताया था... हाँ उसे टीनएज में एक लड़के से प्यार हुआ था, जिसे वो आज खुद ही प्यार होना नहीं कह पाती है। फिर इस उम्र में किसे प्यार नहीं होता... ? प्यार क्या कहो... बस एक गड़बड़... वो लड़का उसे पसंद करता था। जाहिर है कोई आपको पसंद करे और आप उससे संपर्क में रहें तो थोड़ा बहुत सॉफ्ट कॉर्नर तो हो ही जाता है... बस। ये उस वक्त का सच था। आज वो उससे पूरी तरह से बाहर आ गई है। वो उसके सामने आ खड़ा हो तो उसके भीतर कोई नया परिवर्तन नहीं होगा। यदि इसकी कोई माप है तो माप कर देख लें। एक कॉमन दोस्त उसे कुछ दिन पहले मिला था, और कुछ दिनों से वो उससे संपर्क में है।
उसे लगता है कि उससे संपर्क कहीं न कहीं उसके बारे में जानने के लिए ही है। जबकि वो ये सवाल खुद अपने आप से बीसियों बार पूछ चुकी है कि क्या वो उस लड़के के बारे में कुछ भी जानना चाहती है? वो नहीं जानना चाहती है। ऐसा भी नहीं है कि वो उस लड़के का नाम ही नहीं लेना चाहती है और न ही ऐसा है कि वो उसके बारे में कुछ जानना चाहती हो या उससे मिलना चाहती हो... बस। इतना ही तो कहा था उसने कि ‘तुम जो चाहो समझो, मेरा दिल जानता है कि मुझे उसके बारे में कुछ भी जानने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है। ये कतई जरूरी नहीं है कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, बस वही मेरे साथ भी होता हो... आखिर मेरी बनावट और बुनावट तुमसे अलग है।’ बस... इतना ही तो कहा था और चली आई थी वो...। उसके बाद न तो उसने फोन किया, न मैसेज... मिलना तो खैर रात का सपना ही हो चला है। इन सारे दिनों में उसने खुद से बहुत सारे वादे कर लिए हैं। वो अब किसी बात पर रिएक्ट नहीं करेगी। उसकी नीयत पर, किरदार पर, जीवन पर, दर्शन पर, कर्म पर, रिश्तों पर, जीने-पहनने-खाने के तरीकों पर... किसी भी चीज पर किसी कमेंट का वो बुरा नहीं मानेंगी... यदि मानेंगी तो न तो प्रतिकार करेगी और न ही कहेगी... लेकिन सोचती है कि आखिर इन सारे वादों का हासिल क्या है? ये सब तो तब होगा न जब वो लौटेगा... और अब वो नहीं लौटेगा... कभी नहीं। तुझे खुद ही खुद को संभालना है। यही तुझमें बुराई है कि तू बहुत जल्दी अपनी भावनात्मक निर्भरता खो बैठती है। खो दी है... अब... अब क्या ये सोच...।
सोच चल रही है, गाड़ी चल रही है... खुली खिड़की से गर्म हवा के थपेड़े पड़ रहे हैं। न जाने कब से रेडियो में वो गाना चल रहा है, जिसे वो सख्त नापसंद करती है... लेकिन आजकल उसे कुछ भी नहीं लगता... न अच्छा-न बुरा... लगे तो तब न... जब वो खुद हो पाए। घर बस पहुँचने ही वाली है... बहुत दूर से उसे ‘उसकी’ गाड़ी दिख गई। बहुत सारे भाव आते गए-जाते गए... आसपास दुनिया जैसे सरसरा कर निकलती रही लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सुनाई नहीं दे रहा था सिवाय बिल्डिंग के नीचे खड़ी उस गाड़ी के...। ओ... ओ.... ओ.... गफलत में उसका पैर ब्रेक की बजाए एक्सीलरेटर पर पड़ गया... ओह... सड़क पार करता बच्चा बच गया... न जाने कैसे, तुरंत उसे अपनी गलती समझ आई और पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिया। बच्चे की माँ के साथ-साथ सारे लोग उसकी गाड़ी के आसपास जमा हो गए.... हंगामा होने लगा। सारे लोग कुछ-कुछ कह रहे हैं, लेकिन उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा है उसे बस वो गाड़ी दिखाई दे रही है। वो इस भीड़ को चीरकर उसकी तरफ भागना चाह रही है, लेकिन फँस गई है। उसकी पूरी चेतना बस उस गाड़ी पर लगी हुई है। तभी उसने उसे देखा। वो गाड़ी में बैठकर चला गया...। निराशा गाढ़ी हो गई... लेकिन नीत्शे याद आ गए ‘जो कुछ सड़ रहा है, उसे एक धक्का और दो’... एकसाथ निराशा और स्थिरता चलने लगी है... सोचा देखें कौन जीतता है। उसका ज़हन जैसे युद्धभूमि बना हुआ है... कटे सिर, कटे हाथ-पैर, चिथड़ा और लहूलुहान शरीर... कितना दर्द, कहाँ से आता है और आता है तो जाता क्यों नहीं है? अब किसी भी सवाल-जवाब, सोच-विचार का कोई मतलब नहीं है, वो जा चुका है। उसने भीड़ से माफी माँगी तब छूटी।

वो लगातार सिर पर चल रहे पंखे को घूर रही है। आँखों को कोरों से आँसू बहते जा रहे हैं और वो बस पंखे को एकटक देखती जा रही है। उसने सुना कि फोन बज रहा है, लेकिन ये ध्वनि उस तक पहुँच नहीं पा रही है... फोन बस बजता ही जा रहा है।
कहानी का मॉरल – सूत्र 142
दुख विकल्पहीन है.

Wednesday, 5 September 2012

निर्भरता अभिशाप है

उस दिन फिर दीदी मुझे चकमा देकर निकल गई। बहुत देर तक मैं उनके पीछे लगा रहा, फिर वो मेरे साथ खेलने लगीं जब मैं खेल में डूब गया तो वे धीरे से पिछले दरवाजे से निकल गई। थोड़ी देर बाद जब मैं खेल से उकता गया तो याद आया कि दीदी तो मेरे साथ ही थी। फिर घऱ भर में उन्हें ढूँढा, जब नहीं मिली तो पक्का यकीन हो गया कि वो मुझे छोड़कर चली गई है। मुझे बहुत तेज गुस्सा आया, क्यों तो पता है, लेकिन किस पर पता नहीं। खुद पर या फिर दीदी पर....?
जिद्द पकड़ ली मुझे दीदी के पास जाना है। पहले सबने समझाने की कोशिश की कि दीदी तो डॉक्टर के पास गई है, लेकिन मैं समझ गया कि सब मुझे बहला रहे हैं। नहीं वो अर्पिता दीदी के यहाँ गई है, मुझे पता है। पापा ने कहा - हो सकता है, लेकिन मुझे नहीं मालूम अर्पिता का घर कहाँ है?
मुझे पता है। - मैं बस अड़ गया था। पापा को लेकर जब मैं अर्पिता दीदी के घर पहुँचा तो दीदी उनके साथ बातों में मशगूल थीं और मुझे देखते ही उनके चेहरे पर झुँझलाहट तैर गई। हाँ अर्पिता दीदी जरूर मुझे देखकर खुश हुईं लेकिन मुझे दीदी का झुँझलाना पसंद नहीं आया। पापा मुझे वहाँ छोड़कर लौट गए। फिर मैंने वहाँ क्या किया वो तो कुछ याद नहीं हाँ ये याद रहा कि दो-एक घंटे बाद दीदी के साथ ही घर लौटा।
हम दोनों के बीच एक तो उम्र का फासला था, दूसरे जैसाकि होता है लड़की होने के नाते दीदी जल्दी बड़ी और समझदार हो गई और तीसरा दीदी हमेशा अपने से बड़ी लड़कियों के साथ ही रही इससे हुआ ये कि मैं तो अपनी गति से बड़ा हो रहा था, लेकिन दीदी अपनी उम्र की तुलना में तेज गति से बड़ी हो रही थी, मानसिक और भावनात्मक तौर पर... तो जाहिर है हम दोनों के बीच का फासला कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा था।
फिर पता नहीं कैसे हम दोनों के बीच संवाद की वजहें बनने लगीं। मैं कॉलेज में पहुँच गया था और दीदी कांपीटीटिव एक्जॉम्स की तैयारी करने लग गई थीं। उन्हें पढ़ना पंसद हैं और थोड़ी ज्यादा जागरूक और ज्यादा विचारशील भी हैं। तो दुनिया जहान की बातें होने लगीं हम दोनों के बीच। हम दोनों साथ पढ़ने बैठते तो थे, लेकिन पढ़ते कम और बातें ज्यादा करते थे। दीदी को देर रात तक पढ़ने की आदत थीं और मुझे रात में जल्दी नींद आने लगती थीं, तो जब मुझे नींद आने लगती तब मैं तो सो जाता और दीदी पढ़ने लगतीं।
हम दोनों के बीच एक बाँड-सा बनने लगा था। दुनिया-जहान की बातें, कॉलेज और दोस्तों के अनुभव... रोजमर्रा से जुड़ी बातें, फिर इसमें धीरे से म्यूजिक भी जुड़ने लगा। पता नहीं मुझे वैसा म्यूजिक पसंद है, जैसा दीदी सुनती है या फिर चूँकि दीदी सुनती है इसलिए मुझे भी वैसा सुनने की आदत औऱ फिर शौक लग गया, लेकिन हम दोनों ही साथ-साथ गज़लें और क्लासिकल म्यूजिक सुनते हुए बड़े हुए। साथ-साथ खरीदी करते, हम दोनों एक-दूसरे के साथ कपड़े खरीदने में बड़े कंफर्टेबल हुआ करते थे। तो बाहर घूमना-फिरना भी हम दोनों साथ-साथ करते थे। कह सकते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे के दोस्त भी बन चुके थे।
ये वैसा नया नहीं तो शायद नहीं ही होगा कि मेरे सारे दोस्त सिगरेट और शराब का शौक फरमाते थे। मेरे लिए वो इसलिए भी नया था कि परिवार के साथ-साथ पूरे-पूरे खानदान में मैंने किसी को सिगरेट या शराब पीते हुए नहीं देखा... यही पारिवारिक संस्कार हुआ करते हैं, शायद। लेकिन मैंने घर में कभी किसी से ये सच नहीं छुपाया कि मेरे दोस्त क्या-क्या करते हैं और उल्टे दीदी से तो मैं हमेशा बहुत डिटेल में सब कुछ शेयर करता रहा हूँ।
वो बारिश की ही कोई रात रही होगी। दीदी के डबल कैसेट प्लेयर में जगजीत-चित्रा की बहुत पुरानी गज़लें चल रही थीं... दिल को क्या हो गया खुदा जाने/ क्यूँ है ऐसा उदास क्या जाने... वो आँखें मूँदे डूब कर सुन रही थीं। बाहर तेज बारिश होने लगीं तो जैसे वो समाधि से लौटी थीं। उन्हें कॉफी पसंद है और वो घोंटकर बनाया करती है। मैंने फरमाइश की थी... आयडिया दीदी को भी पसंद आया। वो चीनी, कॉफी और एक छोटा चम्मच दूध को लगभग आधे से एक घंटे तक घोंटती रहती थी, तब तक, जब तक कि चीनी पूरी तरह से घुल ना जाए और कॉफी का रंग गोल्डन ना हो जाए... मुझे भी पता नहीं क्या सूझा था, उसी दौरान मैंने दीदी से पूछ लिया था – यदि किसी दिन मैं भी ड्रिंक करके घर आ जाऊँ तो आपको कैसा लगेगा?
वो एकदम निर्विकार थी, उसी तन्मयता से कॉफी घोंट रही थी, बिना मेरी ओर देखे ही उन्होंने जवाब दिया था – मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।
मैं अवाक्, निरूत्तर दीदी की ओर देख रहा था। समझा नहीं पाऊँगा, उस एक वाक्य से क्या कुछ अंदर घटा था, शब्द नहीं है उसके लिए... उस वक्त मुझे भी सूझ नहीं रहा था क्या कहूँ! बहुत देर तक हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला बस कप के अंदर चम्मच के चलने की आवाजें आती रही। कुछ हम दोनों के बीच से सरसरा कर गुजर गया था। फिर अचानक दीदी ने सिर उठाकर मेरी तरफ गंभीर नजरों से देखा... वैसे यदि कभी तू ट्राय करना चाहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा। फिर उन्होंने गर्दन झुकाकर उसी तन्मयता से कॉफी घोंटते हुए कहा, जिंदगी में अनुभव लेना बुरा नहीं है, किसी भी चीज की निर्भरता बुरी है... अब वो खड़ी हो गईं थीं। मैं उनके कहे को उसी तरह घोंट रहा था, जिस तरह उन्होंने कॉफी घोंटी थी। उन्होंने मेरे बालों में हाथ घुमाते हुए कहा था, चल कॉफी बनाते हैं। उस रात उनके हाथ की खूब सारे झाग वाली कॉफी पीते हुए याद नहीं किन-किन विषयों पर बात हुई, लेकिन ये वाकया कहीं इतने गहरे धँसा हुआ था इसका अंदाजा मुझे आज हुआ।
ऐसा नहीं है कि पीने वाले दोस्तों के साथ मैं पहली बार बैठा था आज... पहले भी कई बार मैं अपने दोस्तों के साथ पीने की पार्टी मनाता था। हमेशा सभ्य दोस्तों को लेकर जाता और नशे में संभालकर लाता रहा था। एक बार मैंने भी सोचा कि आखिर ये शराब क्या बला है पीकर देखी तो जाए, तो घर में बाकायदा मुनादी कर ठसके से गया तो था, लेकिन जिन जैसी लेडिज ड्रिंक को लिम्का की पूरी बोतल में मिलाने के बाद भी उसका स्वाद मैं पचा नहीं पाया था और उसे शौकीन दोस्तों ने खत्म किया। शायद वो मेरा पहला और आखिरी प्रयास था। आज भी अपने कलिग्स के साथ ऐसी ही पार्टी में बैठा था... सर्व हो रही थी और नए ज्वाइन हुए कलिग ने एक पैग मेरे सामने भी रख दिया था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा... मन हुआ कि आज पी ही लूँ... एक बार और कोशिश कर के देखूँ, कैसा लगता है? एकाएक कुछ कौंधा... एकाग्रता से कॉफी घोंटती दीदी का वो निर्विकार चेहरा याद आया जब उन्होंने कहा था – ‘मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।‘ और मैंने मुस्कुराते हुए उस पैग को पड़ोसी के सामने सरका दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र १४०
विश्वास भी बंधन है.

Sunday, 20 May 2012

दर्द की तासीर

बात तो बहुत छोटी थी, लेकिन वहाँ जाकर लगी, जहाँ की जमीन कांक्रीट थी, गहरे जाकर गड़ी थी। पता नहीं किस विषय पर शुरू हुई बहस बढ़ते-बढ़ते झगड़े तक जा पहुँची और सुकेतु ने चिल्ला कर कह दिया कि – ‘तुम मेरे घर से निकल जाओ... अभी....।’ आँखें भर आई थी अश्लेषा की.... वो अवाक् थी... एक-साथ कई चीजें उमड़ी थी... मतलब जिस घर को मैंने अपनी पूरी ऊर्जा, इच्छा और आकांक्षा दे डाली वो मेरा नहीं है...। मतलब कि औरत का कभी कोई घर नहीं होता...! मतलब कि औरत चाहे जो कुछ हो जाए, वो मालिक नहीं हो सकती...! मतलब कि पुरुष जब चाहे उसका अपमान कर सकता है.... मतलब... मतलब... मतलब....।
उस वक्त सुकेतु को अश्लेषा की भरी हुई आँखें, गहरी चोट और पीड़ा नजर ही नहीं आई, वो तो बेहद गुस्से से भरा हुआ था और उसी गुस्से में वो घर से बाहर चला गया था... इससे पहले कि अश्लेषा संभले... धड़ाक् आवाज हुई और सुकेतु बाहर... उसे उसी हाल में छोड़कर। लगातार-लगातार वही-वही विचार उसके जेहन में उठ रहे थे और उसे मथे जा रहे थे। चोट इतनी गहरी थी, कि आँखों के सामने अँधेरा था, विचार और विचार-शून्यता के बीच एक ठहरा हुआ वक्त था। वो कुछ कर रही थी, क्या और क्यों उसे खुद भी नहीं पता था। बस शरीर यंत्र की तरह चल रह था चाय के गिलास साफ कर रही थी, उस बेकली में ही... काँच का गिलास उसे तड़का हुआ नजर आया, लेकिन ना तो उसके अंदर कोई विचार आया, और न ही कोई प्रतिरोध हुआ और उसने उस तड़के हुए गिलास में हाथ डाल दिया... जैसे ही उसने उसमें हथेली घुमाई, तड़के हुए हिस्से से गिलास टूट गया और गिलास का टूटा हुआ हिस्सा अँगूठे और उँगलियों के बीच के हिस्से में घुस गया। खून बहने लगा, लेकिन अश्लेषा को कोई अहसास ही नहीं हुआ, जब गिलास साफ कर डस्टबिन में डाला तब गिलास के उपर गिरी लाल बूँदों से थोड़ी-सी चेतना लौटी... लाल बूँदों के गिरने का स्रोत देखा...। एकाएक भीतर से कुछ थमता महसूस हुआ। दर्द तब भी महसूस नहीं हुआ... खून रिसकर हथेली तक आ गया... उसे कुछ ठंडा और मीठा-सा अहसास होने लगा। बिस्तर पर हाथ टिका दिया और लेट गई। धीरे-धीरे खून की बूँदें चादर पर फैलने लगी...। उसे खून देखकर मजा आने लगा.... खासतौर पर अपना...। खून देखते हुए बार-बार उसकी आँखें भरती-टपकती रही...। पहली बार उसे अपने आँसुओं की भाषा अनजानी लगी, भाव तो फिर भी पकड़ लिया था... दर्द का अहसास नहीं था, खुशी की कोई वजह नहीं थी, उदासी थी, गहरी, अपमानजनित, प्यार-विश्वास से परे... दिल पर लगी चोट का अहसास था, लेकिन खून के टपकने से जैसे किसी तृप्ति का अहसास हो रहा था, कोई वहशी-सी खुशी... जैसे वो वो नहीं है कोई और है, या फिर रिसता खून उसका नहीं किसी और का है, पहली बार उसने जाना कि अपमान का घाव आत्मपीड़न से भी भरा जा सकता है। खून का धब्बा चादर पर फैलने लगा था, पंखे की ठंडी हवा, उन्माद का उतरना, तीखे दर्द के बाद की उदासीनता और गहरे संघर्ष के बाद की थकान थी... रिसते खून और फैलते धब्बों को देखते हुए उसे नींद आ गई...।

ये क्या है? – पता नहीं उसने नींद में सुना था या फिर हकीकत में।
तड़ाक... गाल पर एक भरपूर चाँटा पड़ा था और वो नींद से लौट आई थी। फिर से अपमानित हुई – ये क्या कर रही थीं...? – सुकेतु लौट आया था, खून देखकर बावला हो गया था। कॉटन... डेटॉल... बैंडज... कहाँ है, वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ ढूँढ रहा था। ये सारी चीजें तो अश्लेषा ही संभालती है तो उसे कैसे मिलती... ?
क्या किया...? वो फिर चिल्लाया। - क्या किया...?
हो गया...
हो गया... कैसे?
गिलास का काँच घुस गया।
अश्लेषा ने उसे निर्विकार होकर जवाब दिया... सुकेतु से बर्दाश्त नहीं हुआ.... उसकी गोद में सिर रख लिया वो सिसकने लगा, अश्लेषा की दबी-घुटी सिसकी उभरी तो उसने अपने सीने में उसे समेट लिया... क्या किया ये... क्यों? अश्लेषा चुप...। सिर उठाकर उसने हाथ दिखाया... देखो... कितना अच्छा लग रहा है... खून... हम क्यों डरते हैं? कितना खूबसूरत रंग है... है ना...!
सुकेतु ने उसे देखा, गहरे अर्थ से... - यदि ये मेरा होता तो...?
अश्लेषा बिखर गई... बाँध टूट गया, घुटी हुई सिसकी रूदन में बदल गई...।
सुकेतु ड्रेसिंग करता रहा, अश्लेषा रोती रही।
कहानी का मॉरल – सूत्र-137
आत्मपीड़ा में भी सुख है.


Saturday, 24 December 2011

दुख का आश्वासन

थक चुकी थीं संघर्ष करते-करते.... पता नहीं कितने अरसे से वो इसी तरह जी रही है। अब सोचें तो याद ही नहीं आता है, अब क्या करें? छोड़ दे खुद को डूबने के लिए...., क्योंकि संघर्ष करते-करते न सिर्फ थक गई है वह बल्कि अब तो ऊब भी होने लगी है। यदि छोड़ दें खुद को तो... या तो डूब जाएगी या फिर ये प्रवाह कहीं लेजाकर छोड़ ही देगा। हाथ-पैर मारना छोड़ ही दिया, डूब रही है या फिर प्रवाह का हिस्सा हो रही है कह नहीं सकती। लड़ना छोड़ दो तो शांति होती है, नीरव... गहरी, काली-अँधेरी, गाढ़ी... बस थोड़ी ही देर डर लगता है, फिर... फिर उसमें नशा आने लगता है, तीखी सर्दी में लिहाफ़ के गुनगुनेपन की तरह, नर्म और सुविधाजनक होने लगती है ये उदासी...। आखिरकार थककर या फिर ऊबकर उसने लड़ना छोड़ दिया था। समय हर ज़ख्म की दवा है, हर घाव का मरहम... सुना है, आजमाकर भी देख ही लें।
शाम रात में तब्दील होने लगी थी। खिड़की से सड़क की रोशनी दाखिल हो रही थी, उसे होश ही नहीं है कि शाम खत्म हो गई है और रात होने लगी है। वो समय के परे जाकर खड़ी हो गई थी... नहीं डूब रही थी या फिर... शायद बह रही थी। अगरबत्ती का धुँआ कमरे में फैला हुआ था, जब मैं वहाँ दाखिल हुई थी। कोई उदास-सी धुन बज रही थी, अँधेरा घना और माहौल में घुटन थी। पलंग पर उसका सिर टिका हुआ था... और वो नीचे बैठी हुई थी। पता नहीं चल रहा था कि वो जाग रही है या सो रही है, निश्चल, निश्चेष्ट...।
ये क्या हो रहा है? – मैंने कड़कते हुए पूछा था।
उसने सिर के नीचे पड़े अपने हाथ को थोड़ी जुम्बिश दी थी, सिर तब भी नहीं उठाया था, बस ऐसे ही सिर रखे हुए बुदबुदाई थी... आजा....। उसकी बढ़ी हुई हथेली मैंने थामी तो लगा कि बर्फ का टुकड़ा हाथ आ गया है। - अँधेरा क्यों कर रखा है?
बस... रोशनी में खुद को बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी ना... इसलिए! – वाक्य का आखिरी सिरा घुटा हुआ सुनाई दिया।
हुआ क्या है? – मैंने खीझते हुए पूछा।
मुझे ही नहीं पता... – आँखें डबडबा आई थी – बस, खुद को सहने की कोशिश कर रही हूँ।
खुद को सहना... ये कौन सा तरीका है यार...!
अब सिर उठाया था, उसने – सारे तरीके आजमा चुकी हूँ। सोचा अब कोई तरीका नहीं... बस यूँ ही छोड़ दूँ खुद को, गुजर जाने दूँ, इस उन्माद को, हो जाने दूँ, सब कुछ को बरबाद...। आखिर विनाश के बाद ही तो सृजन होता है ना...! यही जाना-पढ़ा है।
मैं हतप्रभ हूँ...- इसका क्या मतलब है?
मतलब... – वो उदासी से मुस्कुराती है – मतलब...? बस यहीं तो मात खा जाती हूँ। मतलब पर ही तो अटक जाती हूँ। हर चीज और हर बात का मतलब होना ही चाहिए... कोई कारण, कोई तर्क और वो ही मेरे पास नहीं होता... । क्या करूँ...? – वो मुझसे ऐसा सवाल पूछ रही है, जिसका जवाब मेरे पास नहीं है... मैं कुछ नहीं कहती, एक बार फिर धुँधआता कमरा, गाढ़े अँधेरे में डूबती हर चीज, उदास और नशीले माहौल इस सबको नजर भर देखती हूँ। एक गहरी खामोशी पसरी है हम दोनों के बीच... बहुत देर तक हम दोनों ही छोटी-छोटी और बारीक ध्वनियों को सुनते रहे। फिर उसने सिर उठाया – मुझे देख... क्या मैं खूबसूरत लग रही हूँ! वो कहता था कि दुख इंसान को खूबसूरत बनाता है...। – वो जिस तरह से बैठी थी, वो मुझे किसी पेंटिंग फ्रेम-सा लग रहा था। वो दृश्य फ्रीज हो गया था मेरे ज़हन में...। मैंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा – तुम तो हमेशा ही खूबसूरत लगती हो, तुम्हें खूबसूरत होने के लिए दुख की जरूरत नहीं है। - लेकिन लगता है उसे मेरे कुछ भी कहने की दरकार नहीं है, और इसीलिए उसने कुछ सुना भी नहीं... – ये दुख कहाँ से आता है...! शरीर को कोई दुख नहीं है, बुद्धि कहती है कि ये बेकार है बर्बाद है... बस मन को दुख है... लेकिन मन कहाँ है...? कहीं इसका कोई सिर-सिरा मिलता क्यों नहीं है? न दुख का, न मन का...! बस कुछ सुलगता सा महसूस होता है... हर वक्त – उसने बुझती अगरबत्ती की तरफ डबडबाई आँखों से देखा था, फिर कहा - यदि मिले तो उसे ही जला डालें... कुछ दिन का शोक मना लें और फिर जिंदगी सरल हो जाए।
उसके सवालों के जवाब मेरे पास नहीं है – तू पागल हो गई है।
हाँ... मुझे भी लगने लगा है कि मैं पागल हो रही हूँ। पता है, वो कहता था कि दुख में दृष्टा हो जाना, उसे सह लेने का सबसे आसान तरीका है, लेकिन तू ही बता, अपने दुख से निस्संग होते हुए दृष्टा होना इतना आसान है क्या...? – मैं बस उसे सुन रही हूँ, मुग्ध भाव से, वो कहना जारी रखती है - लेकिन कभी-कभी मैं भी वहाँ पहुँच जाती हूँ, जहाँ मैं भोक्ता और दृष्टा दोनों हो उठती हूँ। और हकीकत में खुद को दुख में देखते हुए अच्छा लगता है... यू नो, नशा आता है। ऐसा लगता है कि जैसे ये जो दुख में है कोई और है और हम जो इसे देख रह हैं, कोई और है...। – चूँकि मेरे कुछ भी कहने की कोई गुंजाइश नहीं थी, इसलिए मैं चुप ही रही। - कभी ऐसा नहीं लगता है कि हममें से हरेक में एक सैडिस्ट होता है, जो खुद से बाहर को दुख में देखकर खुशी महसूस करता है। ... और जब हम दृष्टा हो जाते हैं तो हम भी खुद से बाहर चले जाते हैं...।
बहुत गहरी शांति है, कोई ध्वनि कहीं से नहीं आ रही है। लगता है रात गहरी हो गई है। हम दोनों ही एक-दूसरे का हाथ थामे मौन हैं, चुप हैं...। अँधेरा पहले भी था, लेकिन ठहरा हुआ-सा लग रहा था। अब महसूस हो रहा है कि वो हमारे बीच से गुजर रहा है। मुझे लगा उसे नींद आ गई है, लेकिन एकाएक उसकी ऊँगलियों की पकड़ मुझे हथेली पर कसती-सी लगी... उस गहरी निशब्दता में उसकी सिसकी की आवाज अपनी पूरी दहशत में उभरी थी... आँखों में जैसे समंदर उभरा था, उस अँधेरे में भी उसके चेहरे की सौम्यता चमक रही थी, वो मुझे बहुत स्थिर दृष्टि से देख रही थी – कुछ भी नहीं ठहरता है, सब कुछ बीत जाता है। बस कुछ निशान छूट जाते हैं...। ये उन्माद भी गुजर जाएगा, बस चाहती हूँ कि इसे पूरी गरिमा से सह लूँ... बिना आत्मदया के... सुबह हर हाल में होगी, ये बहुत बड़ा आश्वासन है दुख के दौर का..., जब हम इस आश्वासन को पा लेते हैं तो दुख को सहना आसान हो जाता है...- उसकी आँखों में मैंने बिजली कौंधती-सी देखी थी...।
अँधेरा गुजर रहा था, सुबह की दूधिया रोशनी कमरे में दाखिल हो रही थी...।
कहानी का मॉरल – सूत्र – 117
गहनतम दुख को भी इस उम्मीद से सह लिया जाता है कि भविष्य के गर्भ में खुशी छिपी है।