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Sunday, 10 November 2013

अनुभवों के इस पार...

माँ को हमेशा ही ये दुख रहा है कि इस लड़की का घर के किसी काम में मन नहीं लगता है। कभी उन्हें बेटी की माँ होने का सुख भी नहीं मिला। अपनी छोटी बहन की छोटी-छोटी बेटियाँ घर का काम करती और माँ को आराम देती, लेकिन उनकी बेटी घर के काम में जरा भी हाथ नहीं बँटाती थी। कोई पढ़ने-लिखने में ऐसा तीर भी नहीं मार रही थी कि लगे चलो, घर के काम नहीं तो कम-से-कम पढ़ाई में तो अव्वल आ रही है। उसने माँ को किसी भी मोर्चे पर गर्व करने का मौका नहीं दिया। बाद के सालों में हमेशा उसे ये महसूस होता रहा। अक्सर त्यौहारों के मौकों पर जब घर का काम बढ़ जाता, तब माँ को बहुत ही ज्यादा इस बात का अहसास होता कि काश उनकी बेटी भी उनके काम में हाथ बँटाए तो उन्हें थोड़ी राहत हो। जब कभी माँ ने उससे ये कहा... उसने ये कह कर माँ को चुप करा दिया कि आपसे जितना बने आप उतना ही क्यों नहीं करती हैं? दुनिया में सब काम मोल होता है। सब काम आप खुद ही क्यों करना चाहती हैं?
समझ में तो माँ को भी नहीं आता कि उन्हें ऐसी क्या ज़िद्द होती है कि वो घर का हर काम खुद करना चाहती हैं? अब दीपावली के कामों को ही देख लो... सफाई के बाद भी कितने काम ऐसे होते हैं, जो दीपावली के ऐन दिन तक चलते हैं या फिर उसी दिन किए जाते हैं। न तो वो किसी काम को मिस करती है और न ही किसी और से करवाती है। यहाँ तक कि एक बार खुद पापा ने कहा था कि इतने हैक्टिक शेड्यूल में रंगोली बनाना कोई जरूरी तो नहीं है, मत बनाओ...। तो माँ ने चिढ़कर कहा था कि ‘तो क्या दीपावली बिना रंगोली के ही निकल जाने दूँ?’ दादी ने सुझाया कि ‘बाजार में इतनी बड़ी-बड़ी रंगोली तैयार मिलती है, (उनका मतलब स्टिकर से था) वो ही लाकर लगा देते हैं। दो घंटे कमर और गर्दन तोड़कर बनाती हो और अगले दिन उसे झाड़ू से साफ कर दो... ये भी कोई बात हुई भला’, लेकिन माँ ने कभी किसी का कहा माना है जो अब मानती...! हर दीपावली पर यही सब कुछ दोहराया जाता...। यूँ रोली को बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन जब माँ रोली पर खिझती थी, तब उसे लगता था कि जब माँ से होता नहीं है तो इतना सब करती ही क्यों है? माँ खुद ही नहीं जानती रोली को क्या बताती... बस सब ऐसा ही चलता रहा।
शादी होकर ससुराल आई तो सासूमाँ को भी ऐसा ही सब कुछ करते देखा। माँ की तरह सासूमाँ से भी उसने यही कहा कि चूँकि ‘मैं मदद नहीं करा सकती है, इसलिए क्यों नहीं हम सब मोल करवा-मंगवा ले...।’ लेकिन माँ की ही तरह सासूमाँ ने भी इंकार कर दिया। उनके पास अपने तर्क थे... ‘घर का शुद्ध होता है’, ‘जिस तरह से हम कर सकते हैं, कामवाले थोड़ी करते हैं’, ‘पैसा कितना लगता है’, ‘बाजार से कितना और क्या-क्या आएगा’, ‘फिर त्यौहार पता ही कैसे लगेगा’ या फिर ‘जो कुछ पारंपरिक तौर पर बनता है, वो सब थोड़ी बाजार में मिल जाता है’। रोली का अब भी घर के कामों में बहुत मन नहीं रमता था। हालाँकि थोड़ा-थोड़ा करने लगी थी, लेकिन बहुत ज्यादा तब भी नहीं। फिर सासूमाँ ने उस पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी डाली भी नहीं थी। जिंदगी बहुत मजे में कट रही थी। उसने माँ और सासूमाँ की एप्रोच को ‘दुनिया की सारी माँओं’ के एक जैसे होने के खाँचे में डाल दिया था, क्योंकि आखिर माँ और सासूमाँ में बहुत सारी असमानताएँ थी, लेकिन इस मामले में दोनों ही एक-जैसी निकलीं।
उस साल दिवाली पर सब कुछ गड़बड़ हो गया। बरसात कुंवार के आखिर तक खिंचती चली आई... बरसात-गर्मी, गर्मी-बरसात में सासूमाँ बीमार हो गई। सफाई जैसे-तैसे कामवालों के भरोसे खींची... बस खींच ही ली थी। वो भी समझ रही थीं, कैसे हो सकता है। मुश्किल नौकरी के बीच घर के काम और उस पर त्यौहार के अतिरिक्त काम, उनकी बेबसी ये कि वे खुद कोई मदद कर पाने की स्थिति में नहीं थी। अक्षत भरसक मदद कर रहे थे, लेकिन वो भी बार-बार वही कह रहे थे, जो कुछ अब तक रोली कहती आई थी। जितना हो, बस उतना ही करो... लेकिन रोली थी कि जाने से पहले बहुत कुछ निबटा कर जाती और देर से आती तब भी आकर भिड़कर काम करती। थककर सोती और सुबह उठकर फिर से वही चक्की। दिन-रात, रात-दिन एक कर उसने बहुत सारे काम किए...। आखिर में मिठाई बनाने की बारी आई, जाने कैसी हुलस थी कि हर चीज़ खुद बनाना चाही थी रोली ने। सासूमाँ और अक्षत दोनों ने ही उससे कितना कहा कि बाज़ार से जो चाहो खरीदा जा सकता है। बहुत मत बनाओ... उस शाम मठरी, चक्की, चिवड़ा, चकली, सेंव, लड्डू, शकरपारे की थालियाँ भरकर जब उसने डायनिंग टेबल पर सजाई तो जाने कैसा संतोष का भाव उभरकर आया, उसे जो महसूस हुआ उसके लिए उसके पास शब्द नहीं थे, बस भाव थे... तृप्त, संतृप्त...। सबकुछ उसने अक्षत की मदद से बनाया, कुछ बहुत अच्छा बना और कुछ में कसर रह गई... लेकिन उसने बनाया। लेकिन रंगोली रह गई... अरे, रंगोली के बिना दिवाली कैसी... ? अगली सुबह जल्दी उठकर उसने रंगोली बनाई, बंदनवार सजाए... सोफा-कवर, कुशन-कवर, पर्दे और चादरें बदलीं... और सुकून से सबकुछ को निहारने लगी तो लगा बहुत दिन बाद वो खुद के बहुत आकर बैठी। इतने वक्त में उसे खुद का ख़याल ही नहीं आया। उसने खुद से सवाल किया ‘आखिर, कितने सालों से पहले वह माँ को फिर सासूमाँ को कहती आई कि इतना मर-भिड़कर त्यौहार मनाने का फायदा क्या है? सारा बाज़ार आखिर क्यों सजा होता है, त्यौहार के लिए? और अब खुद ने भी वही सब किया...!’ रोली उलझ गई... इतने दिनों से लगी रही और अब जब त्यौहार के मुहाने पर खड़ी है, सवाल आ खड़ा हुआ, ‘जिस सबका उसने विरोध किया, वही सब उसने भी किया... क्यों???’ चैतन्यता में पैदा हुआ सवाल रात भर में छनकर अवचेतन में उतर गया। नींद एक तरफ अवचेतन की प्रक्रिया दूसरी तरफ... नींद में ही जवाब भी उभरा था। खुद करने के बाद जो मिलता है उसे ही आनंद कहा जा सकता है। बिना किए आनंद की सृष्टि नहीं होती। पहली बार उसे महसूस हुआ था कि वो खुद दीवाली मना रही है। जो कुछ माँ और सासूमाँ करती रहीं, उसका सार अब समझ में आया। कर्म से ही आनंद की उत्पत्ति होती है, अकर्मण्यता सिर्फ उदासीनता को ही पोसती है। नरक चौदस की सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह बहुत हल्की-फुल्की थी... सबकुछ उसने अपने मन-मुताबिक कर डाला था। बस गिफ्ट्स नहीं खरीद पाई थी। ओ... चलो, जल्दी खाना निबटाकर ये भी आज कर डालूँ, आखिर कल ही तो है दीपावली...। शरीर की अनिच्छा के बावजूद मन तरंगित था और उसी की तरंग में उसने बिस्तर छोड़ दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र 151
कर्म से ही रस की निष्पत्ति संभव है.


Friday, 5 April 2013

बेखुदी का बड़ा सहारा है....


तू नींद की गोलियां कब से लेने लगी?
अरे... मैं पूर्वा के क्लिनिक में हूं। आजकल वो खुद को ही चौंकाने लगी है। कभी रात-रात भर जाग कर निकालने में... कभी ऑफिस में पागलों की तरह काम करते हुए, जब सब चले जाते हैं और ऑफिस बंद करना होता है तब प्युन आकर कहता है, ऑफिस बंद करना है, तो कभी 60 की स्पीड पर पुल चढ़ती गाड़ी में रिवर्स गियर लगाते हुए या फिर चलती गाड़ी में न्यूट्रल गियर लगाते हुए...। अब तो वो इतनी चौंकने लगी है कि जब वो नहीं चौंकाती है तब भी चौंकती है।

कितनी देर से बालों में कंघी घुमाती जा रही है उसे खुद भी याद नहीं.... रक्षा जब घर भर की सफाई करके जाने लगी तब उसने ही टोका... दीदी, क्या हुआ?
क्या हुआ!
तब से कंघी कर रही हैं?
ओह... कुछ नहीं ऐसे ही।
क्या कहती... ! कि आजकल धुन-सी सवार रहती है। टहलने निकलती है तो याद ही नहीं पड़ता कि कितनी दूर निकल आई है। चलती ही चली जाती है, बस...। नहाती है तो घंटा-घंटा भर... पानी ही उँडेला करती है। कई बार किताब हाथ में होती है और नज़रें शून्य में, कितनी ही देर तक वो यूँ ही बैठी रहती है।

जानती है कि यदि फोन आएगा तो बजेगा, लेकिन फिर भी चाहे कोई काम कर रही हो, लौट-लौटकर फोन के पास आती है। फोन पास हो तो उठा-उठा कर की-पैड अनलॉक करती है और देखती है कि कहीं ऐसा न हो कि वो काम में मशगूल हो गई हो और कोई मैसेज ही आया हो। अब तो जानने भी लगी है कि अब न तो फोन आएगा... न मैसेज... पर कोई आस है जो उसे मानने से रोके हुए है। दिन में हजार बार फोन के कांटेक्ट नंबर तक जाती है... मैसेज बॉक्स के न्यू मैसेज पर जाती और फिर लौट आती है। दिन में कई-कई बार वो फोन को बंद करती है और खुद से वादा करती है कि अब घंटे भर तक शांति से काम करेगी... घंटे भर बाद फोन चालू करेगी। काम करना शुरू करती है, लेकिन नज़रें घड़ी पर टिकी रहती है... फिर खुद ही को समझाती है ‘यदि किसी और का अर्जेंट कॉल होगा तो...!’ और 10 मिनट नहीं गुज़रते फोन चालू हो जाता...। नहीं... उसे अब उसकी जरूरत नहीं है, आखिर मान क्यों नहीं लेती... वो ही तो कहता था कि ‘मान लो तो आसानी होती है।‘ लेकिन बस मान ही तो नहीं पा रही है। खुद से सवाल पूछती है... आखिर वो क्या कहे, जिससे उसे समझ आए कि अब ये सब खत्म है... क्या और कैसे कहे? वो किन शब्दों में कहेगा, तब तुझे समझ आएगी... किन शब्दों में तू सुनना चाहती है? या कब तक उसकी जिंदगी से जौंक की तरह चिपकी रहना चाहती है, कब तक उसका खून पीते रहना चाहती है, कब तक?
वो समझाती है खुद को... हाँ, अब ये सब खत्म है। आगे सोच, अब क्या? लेकिन वो मान ही नहीं पाती है। उसने ही तो कहा था कि उसकी चिता वो खुद सजाएगा... अरे, ये सब किसी भावुक क्षण में कह दिया, तो क्या उसे जीवन भर ढोएगा... क्यों ढोएगा?

कितने दिनों तक ये होता रहा कि वो रास्ते भर लोगों की शक्लें देखते हुए गंतव्य तक पहुंचती... शायद वो रास्ते में ही नज़र आ जाए। पहले की तरह, जब वो नाराज़ हुआ करती थी तो गाड़ी के सामने खड़ा होकर लिफ़्ट मांगता था। उफान आता था और फिर एकदम बैठ जाता था। नहीं... अब कभी-कभी ऐसा नहीं होगा... वो खुद को समझाना चाहती है। दुखी लोगों की, पात्रों की हिम्मत को नज़ीर बनाती... फिर ज़ब्त छूट जाता। नहीं जानती कब से ऐसा होने लगा है, लेकिन उसे लगता है कि अनंतकाल से ऐसा ही होता आ रहा है।
ये तो सबसे पहले ही तय हो चुका था कि यदि किसी की जिंदगी में भी कोई और दाखिल होगा तो अच्छे दोस्तों की तरह हम एक-दूसरे को बता देंगे... यदि ऐसा कुछ है तो वो मुझे बता सकता था। इस तरह की उदासीनता उसे खोखला कर रही है और ये बात भी उसने कई बार कही है कि झगड़ लो... खींच लो मुझे अपनी तरफ, लेकिन ठंडापन नहीं। नहीं बर्दाश्त होता है... न जाने कितनी बार उसने ख़यालों में फांसी लगा ली है। न जाने कितनी बार उसने ये शहर, ये घर, ये मोबाइल नंबर छोड़ने की योजना बना ली है... लेकिन बस कुछ हो ही नहीं पाता।
पहले तो उसने मैसेज भी किए... फोन भी। वो या तो जवाब नहीं देता, या जवाब ऐसे देता कि वो तिलमिला जाती। धीरे-धीरे उसने हर चीज ज़ब्त करना शुरू कर दी। वो इस रिश्ते को हर हाल में बचाना चाहती थी। जान रही थी कि कुछ सड़ रहा है बहुत बुरी तरह से... अब उसके लिए वो वैसी नहीं बची है। उसकी कोई भी चीज उसे लुभाती नहीं है। बल्कि तो हर चीज उसे चिढ़ाती है... खिझाती है या जाने ऊबाने ही लगी हो। वो सहज थी उदास होती थी तो उसके सामने रो लिया करती थी और उत्साह में होती थी तो नजर आने लगती थी। उसके हर सुख-दुख से उसको वास्ता था, अब वो दुख में तड़प-तड़प कर रह जाती है और उस तक हल्की-सी आँच भी नहीं पहुँचती... यदि वो खुश होती है तब भी वो उदासीन ही बना रहता है। पहले उसकी उदासी, उसका रोना, उसका भटकाव.... उसकी इच्छा, उसका कहा हर चीज का मतलब हुआ करता था। धीरे-धीरे हर मतलब खत्म होने लगा। उसने देखा, लेकिन अनदेखा करती रही।

प्रेम केमिकल लोचा है... तो क्या इसका कोई इलाज नहीं है? ये कभी ठीक नहीं होता? दुनिया में लोग क्या-क्या सह लेते हैं? और मुझसे इतना-सा दुख सहा नहीं जा रहा है! सारे सहने वाले लोग एक-एक कर सामने आते हैं... उसे लगता है कि उनसे पूछे कि कैसे सह लिया...? मुझी से क्यों नहीं सहा जा रहा है? उसे याद आ रहा है कहीं पढ़ा हुआ... सहना ही सच है। और दुख जब घेरता है तो सारे रास्ते पहले ही अवरूद्ध कर देता है। हम दुख के सामने हमेशा ही निहत्थे होते हैं।

वो बार-बार उस दिन की घटना को रिवाइज करती है। उसने खुद को पूरी तरह से खोल कर रख दिया था, नहीं जानती थी गलती कर रही है। बताया था... हाँ उसे टीनएज में एक लड़के से प्यार हुआ था, जिसे वो आज खुद ही प्यार होना नहीं कह पाती है। फिर इस उम्र में किसे प्यार नहीं होता... ? प्यार क्या कहो... बस एक गड़बड़... वो लड़का उसे पसंद करता था। जाहिर है कोई आपको पसंद करे और आप उससे संपर्क में रहें तो थोड़ा बहुत सॉफ्ट कॉर्नर तो हो ही जाता है... बस। ये उस वक्त का सच था। आज वो उससे पूरी तरह से बाहर आ गई है। वो उसके सामने आ खड़ा हो तो उसके भीतर कोई नया परिवर्तन नहीं होगा। यदि इसकी कोई माप है तो माप कर देख लें। एक कॉमन दोस्त उसे कुछ दिन पहले मिला था, और कुछ दिनों से वो उससे संपर्क में है।
उसे लगता है कि उससे संपर्क कहीं न कहीं उसके बारे में जानने के लिए ही है। जबकि वो ये सवाल खुद अपने आप से बीसियों बार पूछ चुकी है कि क्या वो उस लड़के के बारे में कुछ भी जानना चाहती है? वो नहीं जानना चाहती है। ऐसा भी नहीं है कि वो उस लड़के का नाम ही नहीं लेना चाहती है और न ही ऐसा है कि वो उसके बारे में कुछ जानना चाहती हो या उससे मिलना चाहती हो... बस। इतना ही तो कहा था उसने कि ‘तुम जो चाहो समझो, मेरा दिल जानता है कि मुझे उसके बारे में कुछ भी जानने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है। ये कतई जरूरी नहीं है कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, बस वही मेरे साथ भी होता हो... आखिर मेरी बनावट और बुनावट तुमसे अलग है।’ बस... इतना ही तो कहा था और चली आई थी वो...। उसके बाद न तो उसने फोन किया, न मैसेज... मिलना तो खैर रात का सपना ही हो चला है। इन सारे दिनों में उसने खुद से बहुत सारे वादे कर लिए हैं। वो अब किसी बात पर रिएक्ट नहीं करेगी। उसकी नीयत पर, किरदार पर, जीवन पर, दर्शन पर, कर्म पर, रिश्तों पर, जीने-पहनने-खाने के तरीकों पर... किसी भी चीज पर किसी कमेंट का वो बुरा नहीं मानेंगी... यदि मानेंगी तो न तो प्रतिकार करेगी और न ही कहेगी... लेकिन सोचती है कि आखिर इन सारे वादों का हासिल क्या है? ये सब तो तब होगा न जब वो लौटेगा... और अब वो नहीं लौटेगा... कभी नहीं। तुझे खुद ही खुद को संभालना है। यही तुझमें बुराई है कि तू बहुत जल्दी अपनी भावनात्मक निर्भरता खो बैठती है। खो दी है... अब... अब क्या ये सोच...।
सोच चल रही है, गाड़ी चल रही है... खुली खिड़की से गर्म हवा के थपेड़े पड़ रहे हैं। न जाने कब से रेडियो में वो गाना चल रहा है, जिसे वो सख्त नापसंद करती है... लेकिन आजकल उसे कुछ भी नहीं लगता... न अच्छा-न बुरा... लगे तो तब न... जब वो खुद हो पाए। घर बस पहुँचने ही वाली है... बहुत दूर से उसे ‘उसकी’ गाड़ी दिख गई। बहुत सारे भाव आते गए-जाते गए... आसपास दुनिया जैसे सरसरा कर निकलती रही लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सुनाई नहीं दे रहा था सिवाय बिल्डिंग के नीचे खड़ी उस गाड़ी के...। ओ... ओ.... ओ.... गफलत में उसका पैर ब्रेक की बजाए एक्सीलरेटर पर पड़ गया... ओह... सड़क पार करता बच्चा बच गया... न जाने कैसे, तुरंत उसे अपनी गलती समझ आई और पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिया। बच्चे की माँ के साथ-साथ सारे लोग उसकी गाड़ी के आसपास जमा हो गए.... हंगामा होने लगा। सारे लोग कुछ-कुछ कह रहे हैं, लेकिन उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा है उसे बस वो गाड़ी दिखाई दे रही है। वो इस भीड़ को चीरकर उसकी तरफ भागना चाह रही है, लेकिन फँस गई है। उसकी पूरी चेतना बस उस गाड़ी पर लगी हुई है। तभी उसने उसे देखा। वो गाड़ी में बैठकर चला गया...। निराशा गाढ़ी हो गई... लेकिन नीत्शे याद आ गए ‘जो कुछ सड़ रहा है, उसे एक धक्का और दो’... एकसाथ निराशा और स्थिरता चलने लगी है... सोचा देखें कौन जीतता है। उसका ज़हन जैसे युद्धभूमि बना हुआ है... कटे सिर, कटे हाथ-पैर, चिथड़ा और लहूलुहान शरीर... कितना दर्द, कहाँ से आता है और आता है तो जाता क्यों नहीं है? अब किसी भी सवाल-जवाब, सोच-विचार का कोई मतलब नहीं है, वो जा चुका है। उसने भीड़ से माफी माँगी तब छूटी।

वो लगातार सिर पर चल रहे पंखे को घूर रही है। आँखों को कोरों से आँसू बहते जा रहे हैं और वो बस पंखे को एकटक देखती जा रही है। उसने सुना कि फोन बज रहा है, लेकिन ये ध्वनि उस तक पहुँच नहीं पा रही है... फोन बस बजता ही जा रहा है।
कहानी का मॉरल – सूत्र 142
दुख विकल्पहीन है.

Wednesday, 5 September 2012

निर्भरता अभिशाप है

उस दिन फिर दीदी मुझे चकमा देकर निकल गई। बहुत देर तक मैं उनके पीछे लगा रहा, फिर वो मेरे साथ खेलने लगीं जब मैं खेल में डूब गया तो वे धीरे से पिछले दरवाजे से निकल गई। थोड़ी देर बाद जब मैं खेल से उकता गया तो याद आया कि दीदी तो मेरे साथ ही थी। फिर घऱ भर में उन्हें ढूँढा, जब नहीं मिली तो पक्का यकीन हो गया कि वो मुझे छोड़कर चली गई है। मुझे बहुत तेज गुस्सा आया, क्यों तो पता है, लेकिन किस पर पता नहीं। खुद पर या फिर दीदी पर....?
जिद्द पकड़ ली मुझे दीदी के पास जाना है। पहले सबने समझाने की कोशिश की कि दीदी तो डॉक्टर के पास गई है, लेकिन मैं समझ गया कि सब मुझे बहला रहे हैं। नहीं वो अर्पिता दीदी के यहाँ गई है, मुझे पता है। पापा ने कहा - हो सकता है, लेकिन मुझे नहीं मालूम अर्पिता का घर कहाँ है?
मुझे पता है। - मैं बस अड़ गया था। पापा को लेकर जब मैं अर्पिता दीदी के घर पहुँचा तो दीदी उनके साथ बातों में मशगूल थीं और मुझे देखते ही उनके चेहरे पर झुँझलाहट तैर गई। हाँ अर्पिता दीदी जरूर मुझे देखकर खुश हुईं लेकिन मुझे दीदी का झुँझलाना पसंद नहीं आया। पापा मुझे वहाँ छोड़कर लौट गए। फिर मैंने वहाँ क्या किया वो तो कुछ याद नहीं हाँ ये याद रहा कि दो-एक घंटे बाद दीदी के साथ ही घर लौटा।
हम दोनों के बीच एक तो उम्र का फासला था, दूसरे जैसाकि होता है लड़की होने के नाते दीदी जल्दी बड़ी और समझदार हो गई और तीसरा दीदी हमेशा अपने से बड़ी लड़कियों के साथ ही रही इससे हुआ ये कि मैं तो अपनी गति से बड़ा हो रहा था, लेकिन दीदी अपनी उम्र की तुलना में तेज गति से बड़ी हो रही थी, मानसिक और भावनात्मक तौर पर... तो जाहिर है हम दोनों के बीच का फासला कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा था।
फिर पता नहीं कैसे हम दोनों के बीच संवाद की वजहें बनने लगीं। मैं कॉलेज में पहुँच गया था और दीदी कांपीटीटिव एक्जॉम्स की तैयारी करने लग गई थीं। उन्हें पढ़ना पंसद हैं और थोड़ी ज्यादा जागरूक और ज्यादा विचारशील भी हैं। तो दुनिया जहान की बातें होने लगीं हम दोनों के बीच। हम दोनों साथ पढ़ने बैठते तो थे, लेकिन पढ़ते कम और बातें ज्यादा करते थे। दीदी को देर रात तक पढ़ने की आदत थीं और मुझे रात में जल्दी नींद आने लगती थीं, तो जब मुझे नींद आने लगती तब मैं तो सो जाता और दीदी पढ़ने लगतीं।
हम दोनों के बीच एक बाँड-सा बनने लगा था। दुनिया-जहान की बातें, कॉलेज और दोस्तों के अनुभव... रोजमर्रा से जुड़ी बातें, फिर इसमें धीरे से म्यूजिक भी जुड़ने लगा। पता नहीं मुझे वैसा म्यूजिक पसंद है, जैसा दीदी सुनती है या फिर चूँकि दीदी सुनती है इसलिए मुझे भी वैसा सुनने की आदत औऱ फिर शौक लग गया, लेकिन हम दोनों ही साथ-साथ गज़लें और क्लासिकल म्यूजिक सुनते हुए बड़े हुए। साथ-साथ खरीदी करते, हम दोनों एक-दूसरे के साथ कपड़े खरीदने में बड़े कंफर्टेबल हुआ करते थे। तो बाहर घूमना-फिरना भी हम दोनों साथ-साथ करते थे। कह सकते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे के दोस्त भी बन चुके थे।
ये वैसा नया नहीं तो शायद नहीं ही होगा कि मेरे सारे दोस्त सिगरेट और शराब का शौक फरमाते थे। मेरे लिए वो इसलिए भी नया था कि परिवार के साथ-साथ पूरे-पूरे खानदान में मैंने किसी को सिगरेट या शराब पीते हुए नहीं देखा... यही पारिवारिक संस्कार हुआ करते हैं, शायद। लेकिन मैंने घर में कभी किसी से ये सच नहीं छुपाया कि मेरे दोस्त क्या-क्या करते हैं और उल्टे दीदी से तो मैं हमेशा बहुत डिटेल में सब कुछ शेयर करता रहा हूँ।
वो बारिश की ही कोई रात रही होगी। दीदी के डबल कैसेट प्लेयर में जगजीत-चित्रा की बहुत पुरानी गज़लें चल रही थीं... दिल को क्या हो गया खुदा जाने/ क्यूँ है ऐसा उदास क्या जाने... वो आँखें मूँदे डूब कर सुन रही थीं। बाहर तेज बारिश होने लगीं तो जैसे वो समाधि से लौटी थीं। उन्हें कॉफी पसंद है और वो घोंटकर बनाया करती है। मैंने फरमाइश की थी... आयडिया दीदी को भी पसंद आया। वो चीनी, कॉफी और एक छोटा चम्मच दूध को लगभग आधे से एक घंटे तक घोंटती रहती थी, तब तक, जब तक कि चीनी पूरी तरह से घुल ना जाए और कॉफी का रंग गोल्डन ना हो जाए... मुझे भी पता नहीं क्या सूझा था, उसी दौरान मैंने दीदी से पूछ लिया था – यदि किसी दिन मैं भी ड्रिंक करके घर आ जाऊँ तो आपको कैसा लगेगा?
वो एकदम निर्विकार थी, उसी तन्मयता से कॉफी घोंट रही थी, बिना मेरी ओर देखे ही उन्होंने जवाब दिया था – मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।
मैं अवाक्, निरूत्तर दीदी की ओर देख रहा था। समझा नहीं पाऊँगा, उस एक वाक्य से क्या कुछ अंदर घटा था, शब्द नहीं है उसके लिए... उस वक्त मुझे भी सूझ नहीं रहा था क्या कहूँ! बहुत देर तक हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला बस कप के अंदर चम्मच के चलने की आवाजें आती रही। कुछ हम दोनों के बीच से सरसरा कर गुजर गया था। फिर अचानक दीदी ने सिर उठाकर मेरी तरफ गंभीर नजरों से देखा... वैसे यदि कभी तू ट्राय करना चाहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा। फिर उन्होंने गर्दन झुकाकर उसी तन्मयता से कॉफी घोंटते हुए कहा, जिंदगी में अनुभव लेना बुरा नहीं है, किसी भी चीज की निर्भरता बुरी है... अब वो खड़ी हो गईं थीं। मैं उनके कहे को उसी तरह घोंट रहा था, जिस तरह उन्होंने कॉफी घोंटी थी। उन्होंने मेरे बालों में हाथ घुमाते हुए कहा था, चल कॉफी बनाते हैं। उस रात उनके हाथ की खूब सारे झाग वाली कॉफी पीते हुए याद नहीं किन-किन विषयों पर बात हुई, लेकिन ये वाकया कहीं इतने गहरे धँसा हुआ था इसका अंदाजा मुझे आज हुआ।
ऐसा नहीं है कि पीने वाले दोस्तों के साथ मैं पहली बार बैठा था आज... पहले भी कई बार मैं अपने दोस्तों के साथ पीने की पार्टी मनाता था। हमेशा सभ्य दोस्तों को लेकर जाता और नशे में संभालकर लाता रहा था। एक बार मैंने भी सोचा कि आखिर ये शराब क्या बला है पीकर देखी तो जाए, तो घर में बाकायदा मुनादी कर ठसके से गया तो था, लेकिन जिन जैसी लेडिज ड्रिंक को लिम्का की पूरी बोतल में मिलाने के बाद भी उसका स्वाद मैं पचा नहीं पाया था और उसे शौकीन दोस्तों ने खत्म किया। शायद वो मेरा पहला और आखिरी प्रयास था। आज भी अपने कलिग्स के साथ ऐसी ही पार्टी में बैठा था... सर्व हो रही थी और नए ज्वाइन हुए कलिग ने एक पैग मेरे सामने भी रख दिया था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा... मन हुआ कि आज पी ही लूँ... एक बार और कोशिश कर के देखूँ, कैसा लगता है? एकाएक कुछ कौंधा... एकाग्रता से कॉफी घोंटती दीदी का वो निर्विकार चेहरा याद आया जब उन्होंने कहा था – ‘मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।‘ और मैंने मुस्कुराते हुए उस पैग को पड़ोसी के सामने सरका दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र १४०
विश्वास भी बंधन है.

Sunday, 20 May 2012

दर्द की तासीर

बात तो बहुत छोटी थी, लेकिन वहाँ जाकर लगी, जहाँ की जमीन कांक्रीट थी, गहरे जाकर गड़ी थी। पता नहीं किस विषय पर शुरू हुई बहस बढ़ते-बढ़ते झगड़े तक जा पहुँची और सुकेतु ने चिल्ला कर कह दिया कि – ‘तुम मेरे घर से निकल जाओ... अभी....।’ आँखें भर आई थी अश्लेषा की.... वो अवाक् थी... एक-साथ कई चीजें उमड़ी थी... मतलब जिस घर को मैंने अपनी पूरी ऊर्जा, इच्छा और आकांक्षा दे डाली वो मेरा नहीं है...। मतलब कि औरत का कभी कोई घर नहीं होता...! मतलब कि औरत चाहे जो कुछ हो जाए, वो मालिक नहीं हो सकती...! मतलब कि पुरुष जब चाहे उसका अपमान कर सकता है.... मतलब... मतलब... मतलब....।
उस वक्त सुकेतु को अश्लेषा की भरी हुई आँखें, गहरी चोट और पीड़ा नजर ही नहीं आई, वो तो बेहद गुस्से से भरा हुआ था और उसी गुस्से में वो घर से बाहर चला गया था... इससे पहले कि अश्लेषा संभले... धड़ाक् आवाज हुई और सुकेतु बाहर... उसे उसी हाल में छोड़कर। लगातार-लगातार वही-वही विचार उसके जेहन में उठ रहे थे और उसे मथे जा रहे थे। चोट इतनी गहरी थी, कि आँखों के सामने अँधेरा था, विचार और विचार-शून्यता के बीच एक ठहरा हुआ वक्त था। वो कुछ कर रही थी, क्या और क्यों उसे खुद भी नहीं पता था। बस शरीर यंत्र की तरह चल रह था चाय के गिलास साफ कर रही थी, उस बेकली में ही... काँच का गिलास उसे तड़का हुआ नजर आया, लेकिन ना तो उसके अंदर कोई विचार आया, और न ही कोई प्रतिरोध हुआ और उसने उस तड़के हुए गिलास में हाथ डाल दिया... जैसे ही उसने उसमें हथेली घुमाई, तड़के हुए हिस्से से गिलास टूट गया और गिलास का टूटा हुआ हिस्सा अँगूठे और उँगलियों के बीच के हिस्से में घुस गया। खून बहने लगा, लेकिन अश्लेषा को कोई अहसास ही नहीं हुआ, जब गिलास साफ कर डस्टबिन में डाला तब गिलास के उपर गिरी लाल बूँदों से थोड़ी-सी चेतना लौटी... लाल बूँदों के गिरने का स्रोत देखा...। एकाएक भीतर से कुछ थमता महसूस हुआ। दर्द तब भी महसूस नहीं हुआ... खून रिसकर हथेली तक आ गया... उसे कुछ ठंडा और मीठा-सा अहसास होने लगा। बिस्तर पर हाथ टिका दिया और लेट गई। धीरे-धीरे खून की बूँदें चादर पर फैलने लगी...। उसे खून देखकर मजा आने लगा.... खासतौर पर अपना...। खून देखते हुए बार-बार उसकी आँखें भरती-टपकती रही...। पहली बार उसे अपने आँसुओं की भाषा अनजानी लगी, भाव तो फिर भी पकड़ लिया था... दर्द का अहसास नहीं था, खुशी की कोई वजह नहीं थी, उदासी थी, गहरी, अपमानजनित, प्यार-विश्वास से परे... दिल पर लगी चोट का अहसास था, लेकिन खून के टपकने से जैसे किसी तृप्ति का अहसास हो रहा था, कोई वहशी-सी खुशी... जैसे वो वो नहीं है कोई और है, या फिर रिसता खून उसका नहीं किसी और का है, पहली बार उसने जाना कि अपमान का घाव आत्मपीड़न से भी भरा जा सकता है। खून का धब्बा चादर पर फैलने लगा था, पंखे की ठंडी हवा, उन्माद का उतरना, तीखे दर्द के बाद की उदासीनता और गहरे संघर्ष के बाद की थकान थी... रिसते खून और फैलते धब्बों को देखते हुए उसे नींद आ गई...।

ये क्या है? – पता नहीं उसने नींद में सुना था या फिर हकीकत में।
तड़ाक... गाल पर एक भरपूर चाँटा पड़ा था और वो नींद से लौट आई थी। फिर से अपमानित हुई – ये क्या कर रही थीं...? – सुकेतु लौट आया था, खून देखकर बावला हो गया था। कॉटन... डेटॉल... बैंडज... कहाँ है, वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ ढूँढ रहा था। ये सारी चीजें तो अश्लेषा ही संभालती है तो उसे कैसे मिलती... ?
क्या किया...? वो फिर चिल्लाया। - क्या किया...?
हो गया...
हो गया... कैसे?
गिलास का काँच घुस गया।
अश्लेषा ने उसे निर्विकार होकर जवाब दिया... सुकेतु से बर्दाश्त नहीं हुआ.... उसकी गोद में सिर रख लिया वो सिसकने लगा, अश्लेषा की दबी-घुटी सिसकी उभरी तो उसने अपने सीने में उसे समेट लिया... क्या किया ये... क्यों? अश्लेषा चुप...। सिर उठाकर उसने हाथ दिखाया... देखो... कितना अच्छा लग रहा है... खून... हम क्यों डरते हैं? कितना खूबसूरत रंग है... है ना...!
सुकेतु ने उसे देखा, गहरे अर्थ से... - यदि ये मेरा होता तो...?
अश्लेषा बिखर गई... बाँध टूट गया, घुटी हुई सिसकी रूदन में बदल गई...।
सुकेतु ड्रेसिंग करता रहा, अश्लेषा रोती रही।
कहानी का मॉरल – सूत्र-137
आत्मपीड़ा में भी सुख है.


Wednesday, 20 April 2011

भरीपूरी प्यास....! - समापन किश्त

वसंत-पतझड़
हॉल में काफी गहमा-गहमी थी। स्टेज पर चलने वाले कार्यक्रमों की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं था। हर कोई अपने पुराने दिनों को पुराने रिश्तों और दोस्तों के बीच जिंदा कर लेना चाहता था। पता नहीं सलोनी को क्यों उम्मीद नहीं थी कि तन्मय आएगा। और तन्मय को भी ये उम्मीद नहीं थी कि सलोनी आएगी। लेकिन कोई आस तो होगी, तभी तो दोनों इस अलम्नाई मीट में आए थे। तो जब तन्मय संजना के हस्बैंड से बात कर रहा था, तभी उसकी नजर गेट की तरफ पड़ी थी। सलोनी... पीली कांजीवरम में...। पता नहीं कैसे कदम उसी ओर बढ़ गए। ये बेखुदी थी... तो क्या दूरियों में भी कुछ ऐसा रह जाता है, जो दिल की तरह ही लगातार धड़कता रहता है, लेकिन हमें उसकी इतनी आदत होती है, कि हम उसका धड़कना महसूस ही नहीं कर पाते। वो बहुत बेखयाली में वहाँ पहुँच तो गया था, लेकिन सामने जाते ही समझ नहीं पाया कि क्या करे तो थोड़ी दूर ही ठिठक गया...। सलोनी ने आगे बढ़कर उसे बाँहों में ले लिया। तन्मय के अंदर कुछ पिघलकर बह निकला।
कितने सालों बाद... – वो बुदबुदाया था, लेकिन सलोनी ने सुन लिया था।
पंद्रह... – वो उसी तरह खिलखिलाई थी। - देखो अभी तक सेंसेज वैसे ही हैं।
तुम... सचमुच नहीं बदली। अभी भी वैसी ही हो।
क्यों... ?- उसने आँख मारकर पूछा था – बदल जाना चाहिए था?
तन्मय ने थोड़ा झेंपते हुए कहा था – पता नहीं, लेकिन इतने सालों में सब बदल जाते हैं। तो यही एक्सपेक्टेड होता है ना... ?
वो फिर खुलकर हँसी। - और यदि ऐसा नहीं हो तो... – सीधे आँखों में झाँका था। - निराशा होती है... ? – जवाब का इंतजार किया थोड़ी देर, फिर बोली - तुम भी तो नहीं बदले। - फिर थोड़ा हट कर उसे तौलती नजरों से देखा, फिर बोली – पहले ही बड़े-बड़े लगते थे, अब थोड़ा और बड़े लगने लगे हो... ।
धीरे-धीरे सारे दोस्तों ने आकर उसे घेर लिया। अकेली आई हो? – राजवीर ने पूछा था।
नहीं... अनिरुद्ध और बिहाग भी है, दोनों आ रहे हैं।
दिनभर दोस्तों से मिलने का क्रम चलता रहा। शाम को कल्चरल प्रोग्राम था, स्थानीय वोकल क्लासिकल आर्टिस्ट गाने वाले थे। अनिरुद्ध और बिहाग ने सलोनी से अलग अपना प्रोग्राम बनाया था। रात के खाने के बाद कैंपस के लॉन में ही सारे पुराने दोस्त जमा हुए थे। अलग-अलग गुजरे अपने वक्तों की जुगाली करते हुए। तभी राहुल ने गाना शुरू किया था – हम हैं राही प्यार के हमसे कुछ ना बोलिए...। धीरे-धीरे सभी उसके गाने में शामिल होते चले गए और फिर ये सामूहिकता सोलो गानों की माँग में बदल गई। सलोनी और प्रियंका साथ में बैठी थीं। सलोनी ने ब्लैक कलर का सलवार कमीज पहना था। तन्मय ने उसे पहली बार ब्लैक कपड़ों में देखा था, वो सोचने लगा था कि उन दिनों सलोनी ब्लैक कलर क्यों नहीं पहनती थी, जबकि उस पर ये रंग अच्छा लग रहा है। अरे...! कभी मुझे भी तो नहीं सूझा कि मैं उससे पूछूँ कि तुमने काले रंग को क्यों छोड़ रखा है, जबकि रंगों के प्रति तो यूँ भी सलोनी बड़ी खुली थी। राजबीर ने सीटी से आए तुम याद मुझे गाना शुरू किया।
प्रियंका ने सुनाया ओ सजना बरखा बहार आई.... तन्मय सोच रहा था, सलोनी क्या गाएगी और कैसा, क्योंकि इससे पहले कभी सोचा ही नहीं कि सलोनी गाती होगी, गा सकती होगी या कैसा गाती होगी...? सलोनी ने सुनाया – एक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवां रहने दिया/ जानकर हमने उन्हें नामेहरबां रहने दिया.... तन्मय कहीं डूब गया, सलोनी का गला तो मीठा है, लेकिन वो सुरीली भी है, ये आज पता चला। वो सोच रहा है कि हम समझते हैं कि हमने किसी को पूरा जान लिया, लेकिन ये बड़ा भ्रम होता है, क्योंकि जान लेना अभी है, जबकि हर क्षण कुछ नया जुड़ता-बढ़ता या घटता है। फिर क्या किसी का होना क्या इतना ही होता है कि अपनी समझ के दायरे में समा ही जाए? हम अपने होने को खुद भी नहीं जान पाते हैं.... ये तुम ही कहती थीं ना सलोनी.... फिर वहीं आकर अटक गया वो ...। तन्मय की बारी आई तो उसने सबको सैड कर दिया बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी... गाकर। तन्मय के खतम करते न करते तपन ने शुरू कर दिया - ओए तू रात खड़ी थी छत पे नी मैं समझा के चाँद निकला... और सारे ही झूमने लगे। वक्त गुजर रहा था, सबने एक-दूसरे का पता लिया, कांटेक्ट नंबर लिए और फिर से मिलने का वादा किया, सब अपने-अपने रास्ते चले गए। सलोनी पता नहीं किस चीज का इंतजार कर रही थी और तन्मय भी।
रात बहुत घनी हो गई थी। सलोनी थोड़ा आगे बढ़ी तो सूखे पत्तों की चर्रमर्र हुई। तो... – तन्मय ने उसकी तरफ देखा। सलोनी ने हाथ आगे बढ़ाया और तन्मय ने थाम लिया। दोनों साथ-साथ चलने लगे। तुमने मुझे अपना कांटेक्ट नंबर नहीं दिया – तन्मय ने बहुत सहजता से पूछा।
सलोनी ने सुबह वाली मुस्कान बिखेर कर कहा – मैंने लिया भी तो नहीं...!
उसे ध्यान आया, अरे हाँ... – तो ले लो...
नहीं, मन... वो सब इसलिए नहीं हुआ था कि फिर बूँद-बूँद खुद को भरते रहे। - वो बहुत गंभीर थी।
हुआ नहीं था, किया था... – तन्मय न चाहते हुए भी तल्ख हो गया था।
ठीक है, किया था, और मैंने ही किया था। क्या तुम्हारी जिंदगी में अब भी कुछ कम है? - उसका हाथ तन्मय के हाथ में पसीज रहा था। - बहुत सोचकर जवाब देना।
कभी-कभी लगता है, हाँ है...
और अक्सर....
अक्सर तो... – तन्मय हड़बड़ा गया
रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है, यही ना... ! – सलोनी ने उसकी बात पूरी की।
तन्मय जवाब नहीं दे पाया, लेकिन उसने सलोनी के चेहरे की तरफ देखा। वो गर्दन झुकाए थी, कुछ बचा रही थी या फिर ...?
हाँ, कहो... क्योंकि यही सच है। मन, .... मैं नहीं चाहती थी कि हम एक-दूसरे की जीवन में बस यूँ ही रह जाए। रूटीन की तरह... बिना किसी उष्मा, गर्माहट या फिर तड़प के...।
लेकिन हम अब भी ऐसे ही हैं ना... मैं आरती के साथ और तुम अनिरूद्ध के साथ... ? – तन्मय ने जान-बूझकर चोट की थी।
हाँ, यही तो... यही तो मैं नहीं चाहती थी कि जो उन्माद वैसे जिया है, वो रूका हुआ पानी हो जाए। हम एकदूसरे को जब भी याद आते हैं, तब तीखी तड़प महसूस होती है.... होती है ना...! – सलोनी तन्मय के बिल्कुल सामने आ खड़ी हुई। वो हड़बड़ा गया।
हाँ... – एकाएक उसका मन हुआ कि सलोनी को बाँहों में ले लें, लेकिन फिर रूक गया।
बस... क्योंकि याद... ख्वाहिश... और उम्मीद, यही तो वो चीजें है, जिनके सिरे पकड़कर जिंदगी रंग-बिरंगी होती है, हर दिन नई होती है। पता है, सपने पूरे हो जाने का मतलब है उनका मर जाना। जिंदगी कभी मरती नहीं है, हर मरे हुए सपने की कब्र पर एक नया सपना जन्म लेता है। मैं तुम्हारी जिंदगी में मरा हुआ सपना बन कर नही रहना चाहती थी, और न ये चाहती थी कि तुम्हारे साथ ऐसा हो...। – उसका गला रूँध गया, वो चुप हो गई।
लेकिन इसकी कितनी बड़ी कीमत दी है, मैंने, तुमने सोचा है? कितनी रातें, कितने मौसम...
तो क्या मैं इससे अलग रही?- सलोनी ने बीच में से ही बात लपक ली।
बहुत देर तक दोनों ही चुपचाप चलते रहे। रात गुजरती जा रही थी और दोनों अँधेरे के बीच अपने-अपने जज्बातों को कुछ खोलते, कुछ छुपाते एक-दूसरे का हाथ थामे चलते रहे। एकाएक वो उनींदे अँधेरे से निकलकर सड़क की धुँधली-शांत रोशनी में आ खड़े हुए। कैम्पस से निकलकर मुख्य सड़क पर... यहाँ दूर-दूर तक शांति थी। सूनी-सी सड़क के दोनों ओर जल रही स्ट्रीट लाइट और दूर-दूर तक फैला सन्नाटा...।
सलोनी ने ही चुप्पी तोड़ी – मन... सोचो, यदि हम पति-पत्नी होते तो बच्चों की पढ़ाई, उनका भविष्य, तुम्हारे भाई की शादी, मेरी माँ की बीमारी, हमारे भविष्य की प्लानिंग, राशन की किटकिट, बिजली का बिल, टेलीफोन का बिल, मकान की किश्त, हमारे ईगो, हमारे सामाजिक संबंध, रसोई गैस के खत्म होने से लेकर ट्रांसफर या फिर प्रमोशन जैसी कितनी गैर-जरूरी चीजों से हमारा सरोकार हो जाता और मूल चीज कहीं हाशिए पर चली जाती। सपना मर जाता.... हम बस सामाजिक संबंधों के दायरे में कैद हो जाते, ख्वाहिशें मर जाती और हकीकत ही हमारे बीच रह जाती। अभी हम ये सोच तो सकते हैं कि यदि हम साथ होते तो कैसा होता... तब हो सकता है, हम ये सोचने की बजाए शायद ये सोचते कि ये यदि ये नहीं होता तो हमारा जीवन कैसा होता... यदि साथ रहते हुए हम ये सोचते तो कितना बुरा होता... सोचो....।
मुझे पता नहीं है, शायद तुम ही सही हो, लेकिन दिल कहता है कि यदि वैसा होता तो हम उसे मरने नहीं देते, दिमाग कहता है कि रूका पानी हर हाल में सड़ता ही है... मैं अभी निश्चित नहीं हूँ, कि तुम सही हो। - तन्मय ने जवाब दिया।
और मेरे सही या गलत होने को लेकर क्या कहना है आपका... – सलोनी फिर मस्ती में लौट आई।
तुम गलत हो.... – तन्मय ने हाथ की पकड़ कड़ी कर कहा।
तो... माफ कर सकते हो?
कर दिया यार... माफ करना भी मजबूरी है, प्यार जो... - तुरंत सलोनी ने उसके होंठों पर हाथ रखकर उसे रोक दिया। दोनों चलते-चलते शहर के उस होटल के नीचे आ खड़े हुए जहाँ सलोनी ठहरी हुई है।
दोनों एक दूसरे के सामने थे। तन्मय जानता था कि अब पता नहीं कब मिले, मिलें या कि नहीं मिले। - केन आई हग यू...? – तन्मय ने पूछा था
सलोनी ने बाँहें फैला दी... – अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले... वो बुदबुदा रही थी। तन्मय की आँखों में पानी तैरने लगा था। वो देख नहीं पाया कि सलोनी की आँखों में भी वही उतर गया था। दोनों अलग हुए, सलोनी तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ गई... तन्मय ने उसे आखिर तक जाते हुए देखा और फिर उस सूनी सड़क पर चल दिया... जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले... सलोनी की छोड़ी हुई लाइन को गुनगुनाते हुए।
समाप्त
कहानी का मॉरल सूत्र – 85
जिंदगी प्यास है, तृप्ति मौत

Sunday, 17 April 2011

भरीपूरी प्यास...! - 5

सर्दी
शाम को मैं ऑफिस से जल्दी घर आ गया था, थोड़ा बुखार-सा लग रहा था तो डॉक्टर से दवा लेता हुआ पहुँचा था। आरती पीहू को लेकर अपनी माँ के घर गई हुई हैं, तो खुद ही बीमार और खुद ही तीमारदार होना है। मैं पहुँचा तो कुसुम खाना बना रही थी, उससे खिचड़ी बनवाई, खाई और दवा लेकर जल्दी ही सो गया। तेज बुखार से बदन दर्द कर रहा था। दवा के असर होने तक तो दर्द में पूरी तरह से डूब ही चुका था। पता नहीं रात का कौन-सा समय रहा होगा, जब तेज गर्मी और पसीने के साथ बुखार उतर गया और दर्द भी चला गया। तेज दर्द के बाद की राहत और कड़े परिश्रम से पाई सफलता की अनुभूति एक-सी ही होती है। एक धुला-पुँछापन होता है, कुछ गरिमा से सह लिए जाने का गौरव... खुद को प्रति विश्वास और आस्था के साथ ही बड़ा सात्विक-सा अहसास होता है... अरे...! ये सब कहाँ से आ रहा है... ओह लूनी... ये तुम हो।
खासी ठंड के बीच सुबह से ही बादलों का जमघट था। ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी। जब कुसुम आई तो उससे तेज अदरक वाली कड़क चाय बनवाई और खिड़की के पर्दे खोल दिए। बारिश शुरू हो चली थी। ऐसा भी कब होता है? दर्द से निकलने के बाद गहरी, सात्विक शांति... साफ-सुथरा और उदास-सा सौंधापन... तुम अक्सर कहती थी, बीमारी के बाद हम बिल्कुल नए हो जाते हैं... नए-नकोर... सब पुराना जो हमारे अंदर जंक होता है, बह जाता है और जो काम का होता है, वो भी धुल-पुँछकर चमकने लगता है। सच तुमसे अलग होने के बाद आज पहली बार उसे मैं ठीक उस तरह से महसूस कर पा ऱहा हूँ, जिस तरह से तुमने कहा है। कितनी अजीब तरह का पागलपन था तुम्हारे अंदर ... पता नहीं कहाँ हो और उस पागलपन का क्या करती होगी? कभी-कभी खुद से ही पूछता हूँ – क्या वो आँच अब भी तुम्हारे चेहरे पर नजर आती है? क्या कोई आग अब भी तुम्हारे अंदर दहकती है?
मुझे याद आ रहा है जब हम सब अपने प्रोजेक्ट से सिलसिले में राहुल के गाँव गए थे। यही दिन थे, राहुल ने हमें अपने और अपने रिश्तेदारों के खेत दिखाए। हम सब खेत में ही मटर खा रहे थे, तब तुमने पूछा था – तुम्हारे गाँव में कोई फूलों की खेती करता है?
हम सबने एक साथ पूछा था – फूलों की खेती...!
हाँ
राहुल ने जबाव दिया था – हाँ एक परिवार करता है, लेकिन हम उस तरफ नहीं जाते हैं, कुछ पारिवारिक झगड़े हैं।
लेकिन मुझे वो खेत देखना है, क्या वो रजनीगंधा लगाते हैं? – तुम अब जिद्द पर आ गई थी।
हाँ, शायद...- राहुल ने जवाब दिया था।
तब तो मुझे उस खेत में जाना ही है। हम सबने तुम्हें बहुत समझाया, लेकिन तुम अपनी जिद्द पर अड़ी रही। तुमने कहा - ठीक है, मैं खुद ही उन लोगों से मिल लूँगी। और... और तुम गईं थीं वहाँ... औऱ जब लौटी थी तो हाथ में रजनीगंधा के स्टिक्स लेकर... बिल्कुल बौराई-बौराई सी। और फिर... जब उनका लड़का शहर आया था, तब तुमसे मिलने कॉलेज भी आया था और ... तन्मय को हँसी आ गई थी। फिर वो बार-बार तुमसे मिलने आने लगा था, तुम खीझी भी थी दो-एक बार लेकिन उसका आना बंद नहीं हुआ था। जब मैंने तुमसे कहा था कि वो तुम पर चांस मार रहा है तो तुम कितने दिनों तक मुँह फुलाए रही थी...? बोलो लूनी क्या तुम उन दिनों का हिसाब मुझे दो सकती हो...? अचानक तन्मय उदास हो गया, फिर मैंने भी तुम्हें मनाने की कोशिश कहाँ की... तुम ही क्यों मेरे पास भी तो उन दिनों का हिसाब नहीं है।
क्रमशः