Saturday, 12 March 2011

अपने बीहड़ की ओर...

दुपट्टा सफेद था और सीढ़ियाँ उतरते हुए वो लगातार जमीन से रगड़ खाता जा रहा था। मैं जानती थी वो रगड़ खा रहा है और मैला भी हो रहा है, लेकिन कोई बेखयाली थी कि जानते हुए भी कुछ नहीं किया। कई बार ऐसा होता है कि हम जानते हैं कि हमें ये नहीं करना है, फिर भी करते ही चले जाते हैं, यहीं कहीं दिल और दिमाग के बीच का फर्क... फासला उभर कर नजर आता है। मैं उतरती ही जा रही थी, बिना ये सोचे कि जितना नीचे जाऊँगी, उतना ही उपर आऩा होगा… और... औऱ चढ़ाव हमेशा ही मुश्किल होता है, तो क्या इसलिए हम उतरें नहीं? सवाल... सवाल और सवाल... बेतुके, बेमौके और बेजायके सवाल, हर कहीं खड़े होकर हमारे होने को चुनौती देते सवाल... ऐसे सवाल, जिनका कोई जवाब नहीं है और सवाल जिनके होने से निजात नहीं है।
न जाने कितनी सीढ़ियाँ उतर आई, लेकिन लगता है जैसे रास्ता ही भूल चुकी हूँ। इस बार इस तरफ बहुत दिनों बाद जो आना हुआ है। कितना कुछ बदल गया है, कैसा छोड़कर गई थी और कैसा हो गया?
कैसा हो गया... मैंने खुद ही सवाल पूछा था।
अरे बीहड़ छोड़कर गईं थी और वैसा ही तो है। - खुद ही जवाब भी दिया।
जंगल जैसे घना होता जा रहा है। कँटीली झाड़ियों से बदन खुरचने लगा था और कपड़ों में भी खोंपे आने लगे थे, लेकिन बस नशे-की-सी हालत में चलती चली जा रही हूँ। दिमाग की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए भी कि – क्या जरूरत है इस तरह बीहड़ों की तरफ जाने की? अब वहाँ क्या धरा है, जिसे लाने जा रही हो? ऐसा क्या है जो तेरी दुनिया में नहीं है और जिसकी तुझे जरूरत है। तर्क चल रहे हैं - क्या जरूरतों से ही काम किया जाना चाहिए? यदि जरूरतें ही हमें संचालित करती तो आविष्कार तो बहुत होते, विचार नहीं होते... विचारों की जरूरत जो कभी नहीं होती...। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? विचारों की सत्ता तो पदार्थ से पहले है... पहले विचार होगा फिर क्रिया और फिर परिणाम... मतलब पदार्थ... ऊँ...हू... ये बेकार के विचार है। पुराने पड़ चुके, जिनकी कोई उपयोगिता नहीं है, छोड़ो इन्हें। सही है विचार तो हमेशा ही बेकार रहते हैं ना...!
हाँ, ठीक है छोड़ो...। पहुँच गई हूँ, वहाँ, जहाँ पहुँचना, अच्छा भी लगता है और उदास भी करता है।
तो तू आ ही गई... इतने दिनों में तुझे मेरी याद नहीं आई...? – बहुत मान से उसने पूछा था।
आई तो थी, बल्कि आती ही रहती है, लेकिन... – मैं चुप हो गई। क्या कहूँ, कुछ कहने से उसे बुरा लग सकता है ना...!
हाँ, बोल... लेकिन क्या... ? फिर क्यों नहीं इतने दिनों तक आई? – उसने बहुत तरल होकर पूछा।
मैं भी बह गई – तू मुझे उदास करती है।
वो कहीं गुम हो गई, जब वो बोली तो उसकी आवाज बहुत उदास और थकी-सी लगी – केवल उदास... ?
मैं हड़बड़ा गई – नहीं, तुझसे मिलना मुझे अच्छा भी लगता है – मैंने वो शेर का टुकड़ा दोहरा दिया – तुझसे मिलना खुशी की बात सही, तुझसे मिलकर उदास रहता हूँ।
अबकी उसने सीधे ही आँखों में झाँका था – सच... ?
हाँ – लेकिन मैं थोड़ी तल्ख़ हो आई थी – इसमें खुश होने जैसी कोई बात नहीं है। जब कभी मैं तुझसे मिलने आती हूँ, तू मुझे बुरी तरह से झिंझोड़ देती है और फिर मैं बहुत दिनों तक उदास रहती हूँ।
वो बहुत मुग्ध हँसी हँसी थी – मैं तुझे झिंझोड़ती नहीं हूँ, तुझमें उगे काँटों को झराती हूँ। मैं तेरा पंचिग बैग हूँ। तेरी प्यास के लिए तृप्ति हूँ... तेरा सेफ्टी वॉल्व हूँ। तू सोच... यदि तू मुझसे नहीं मिले तो जो आग है, जो प्यास है उसे तू खुद सह पाएगी? विस्फोट नहीं होगा, मर नहीं जाएगी? अपनी आग... अपनी प्यास सौंप कर तू शांत नहीं हो जाती है, क्या?
मुझे उत्तर नहीं सूझा, प्रश्न उगा- क्यों है ये प्यास... ये आग...?
उसने भी साथ ही प्रश्न किया – तुझे पसंद नहीं है ये?
तू सवाल के जवाब में सवाल क्यों कर रही है, जवाब क्यों नहीं देती – इस बार मैं बुरी तरह से भड़क गई।
क्योंकि तेरे सवाल में ही तेरा जवाब है। - उसने जवाब दिया।
क्या ये आग ये प्यास तुझे कुछ नहीं देती है? … ले... फिर तू कहेगी कि मैं सवाल कर रही हूँ।
मैं अनमनी-सी हो गई। कैसे कहूँ कि ये मुझे नहीं चाहिए और कैसे ये कह दूँ कि ये मुझे चाहिए? क्योंकि ये प्यास मुझे चाहिए, आखिर इसके बाद ही मुझे तृप्ति का आनंद मिलता है और चूँकि ये प्यास बेचैन करती है, इसलिए ये मुझे नहीं भी चाहिए। मैं चुप थी, लेकिन ये तय था कि इस प्यास ने ही मुझे अपने होने की चेतना दी थी। और सच पूछें तो अब इसके बिना अपने होने की कल्पना ही नहीं हो पाती। अपना चित्र ही नहीं बन पाता, आदत कहो तो आदत और नशा कहो तो नशा... अब जबकि मैं बहुत दिनों बाद उतरी थी अपने अंदर, खुद के पास बैठने, बातें करने तो उदासी तो थी, लेकिन कुछ पा लिए जाने का सुकून भी था और गर्व भी..., फिर भी मैं उसे प्रकट में कुछ नहीं कह पाई। मैं चुप थी। बहुत देर तक वो मेरे जवाब के इंतजार करती रही।
सच बता तुझे नहीं लगता कि दो विपरित चीजों का अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़ा है। एक के बिना दूसरा हो ही नहीं सकता – उसने कहा।
मुझे चुहल सूझी – तू तो मार्क्स को जिंदा करने में लगी है। वो मर चुका है, अब तो उसका इतिहास तक मर चुका है। काहे उसके द्वंद्ववाद को हवा दे रही है।
मन में उभरा – जैसे प्यास और तृप्ति, जिंदगी और मौत, दिन-रात, खुशी-दुख... लेकिन प्रकट में कहा – जैसे तू और मैं... और हँसी थी। वो नहीं हँसी, वैसी ही गंभीर बनी रही और चुप्पा भी। मैं भी चुप हो गई। सवाल जवाब खत्म जो हो गए, हम दोनों एक-दूसरी की पीठ से पीठ लगाकर बैठ गईं। चाँद की मुस्कुराहट बड़ी प्यारी लग रही थी और रात... रात बस गुजर रही थी।


कहानी का मॉरल - सूत्र 105
प्यास और तृप्ति मिलकर जिंदगी का ‘कोरम’ पूरा करती है।