Monday, 22 August 2011

बदलते दौर में.... (तीसरी और समापन किश्त)

गतांक से आगे...

मॉल के उस रेस्टोरेंट में इत्तफाक से रेलिंग से लगी वही टेबल खाली मिली, जहाँ बैठकर पिछले हफ्ते ही सौम्या और श्वेता ने साथ खाना खाया था। बाकी पूरा रेस्टोरेंट भरा हुआ था, क्यों न हो लंच टाइम जो ठहरा। सौम्या अपने से बाहर पहुँच गई थी... धीरे-धीरे उसकी नजरों के साथ ही वह भी बाहर परसने लगी थी। नीचे-उपर के रिटेल आउटलेट्स पर क्या-क्या, कैसा-कैसा बिक रहा है। कोई परिचित चेहरा यहाँ है या नहीं... और भी पता नहीं क्या-क्या। क्षितिज ने बड़ी उदासिनता से मैन्यू कार्ड पर नजर डाली और सौम्या के सामने सरका दिया। सौम्या ने पूछा – क्या लेना पसंद करोगे?
तो क्षितिज ने लापरवाही से कंधे उचका दिए – कुछ भी...।
सौम्या का असमंजस बढ़ गया फिर भी उसने ऑर्डर कर दिया। वो फिर बाहर पसरने लगी, तभी क्षितिज ने उससे साकेत के बारे में पूछकर कर उसे उसकी अँधेरी खोह में पटक दिया। उसने एक छटपटाहट-सी महसूस की, लेकिन फिर हू नोज... जैसे जैस्चर्स देकर उसने इस प्रसंग से मुक्ति पानी चाही। हालाँकि कहीं गड़ तो गया था वो....।
क्षितिज बहुत गौर से उसकी तरफ देख रहा था, शायद वो बहुत कुछ का अनुमान भी लगा चुका था। तो क्या वो भी तुम्हें बिना बताए कहीं गया है? – क्षितिज ने निहायत ही व्यक्तिगत सवाल कर डाला था। सौम्या इससे थोड़ी असहज हो चली थी और इस स्थिति से बचना चाह रही थी और शायद वो भी उसके इस प्रयास को समझ कर खुद में सिकुड़ गया था। सौम्या श्वेता के तर्कों पर विचार करने लगी थी। श्वेता बहुत साफगो है और उसने अपनी भावुकता पर पूरी तरह से विजय पा ली थी। उस दिन जब दोनों इसी टेबल पर बैठे थे, श्वेता ने उससे कहा था – पता है सुमि... प्यार जो है ना लड़कियों के लिए पूरा जीवन हो जाता है। लड़का प्यार करते हुए एकसाथ कई सारी चीजें हैंडल कर लेता है और लड़की... वो प्यार करती है तो बस प्यार ही करती है, कुछ और वो साध ही नहीं पाती... प्यार उसके पूरे जीवन पर छा जाता है। सोते-जागते, हँसते-रोते हर वक्त वो उसी में जीती है। इसलिए चाहे जितनी भी प्रतिभाशाली हो लड़की... प्यार होते ही वो नाकारा होती चली जाती है।
सौम्या ने उससे पूछा था – तो माई डियर फ्रेंड नाकारा नहीं होना चाहतीं?
उसने नजरें झुका ली थी, जैसे वो कोई चोरी कर रही थी – हाँ... मैंने अपनी भावुकता पर महत्वाकांक्षा को सवार कर दिया है। मैं इस शहर में खुद को कुछ देने के लिए आई हूँ, टूटने-बिखरने के लिए नहीं।
लेकिन...तुझे नहीं लगता कि तू जिंदगी से डर रही है और क्या तू उस होने को रोक पाएगी? – सौम्या ने पूछा।
उसने मुस्कुराते हुए कहा था – हो सकता है, मैं डर रही हूँ, लेकिन भावनाओं के नाम पर खुद को कुर्बान नहीं करना चाहती...- थोड़ा रूककर उसने आगे कहा - खुद को उस होने तक पहुँचने ही नहीं दूँगी।

ऑर्डर लेकर वेटर आया तो वो फिर से रेस्टोरेंट में लौट आई। क्षितिज पूछ रहा है – क्या हुआ?
कुछ नहीं... – पता नहीं क्यों वो अनमनी हो गई।
क्षितिज को सूझ ही नहीं रहा था कि क्या बात करें और सौम्या कल औऱ आज के बीच झूल रही थी। तभी क्षितिज ने पूछा – श्वेता कब तक आने वाली है। एक्चुली मेरे पेरेंट्स मुझपर शादी का दबाव बना रहे हैं। यू नो लास्ट वीक मेरे जीजाजी बिना इंर्फामेशन के आए थे... मेरा फ्लैट-ऑफिस और दोस्तों से मिले और फिर रात में मुझसे मिलने आए।
सौम्या ने उसे आश्चर्य से देखा – क्यों?
अब तमाम तरह के डर होते हैं अपनों के... कहीं मैं लिव-इन में या फिर... गे... – कहते-कहते उसने अपनी बात वहीं समेट ली।
सौम्या के अंदर उत्सुकता जागी – फिर
फिर... जब वो सब तरफ से सेटिस्फाई हो गए तो कल पापा ने शादी की बात की। वे कहने लगे कि यदि तूने कोई पसंद नहीं कर रखी है तो एक लड़की हमारी नजर में हैं। - क्षितिज ने बात पूरी की।
पता नहीं कैसे सौम्या की कड़वाहट सतह पर आ गई – तो तुम श्वेता से क्या चाहते हो? – फिर उसे खुद ही लगा कि क्यों वो साकेत की चिढ़ क्षितिज पर निकाल रही है!
मैं बस उससे सच जानना चाहता हूँ। यू नो कभी-कभी लगता है कि शी लव्स मी औऱ कभी-कभी लगता है कि नहीं... – उसने हवा में अपनी नजरें टिकाते हुए बहुत मायूसी से कहा।
शी डोंट लव यू... – पता नहीं कैसे मैंने ये कह दिया, कहने के बाद लगा कि मैं बहुत क्रुएल हो रही हूँ, मुझे इतने नाजुक मौके पर इतना कड़वा सच नहीं कह देना चाहिए था, लेकिन मैं कह चुकी थी। उसने बहुत उदासीनता से मेरी तरफ देखा... जैसे ये वो पहले से ही जानता था। मैं अंदर से सिकुड़ गई, फिर से लगा जैसे मैंने साकेत का गुस्सा बेचारे क्षितिज पर निकाल दिया। जो मैं साकेत से नहीं कह पाई, वो श्वेता के कंधे पर रखकर क्षितिज को कह दिया, जैसे... जैसे बदला निकाल लिया, साकेत का क्षितिज से... श्वेता के माध्यम से खुद की भड़ास निकाल ली। खुद पर गुस्सा आया, खीझ हुई, कहीं सुना था – जो दुखी है, वे दूसरों को सुखी नहीं देख सकते हैं... क्या मैं भी...? ओफ्फ... !
देखो क्षितिज... शी इज वेरी मच एंबीशियस, होता क्या है किसी में प्रेम बीज रूप में होता है, तो किसी में नहीं... ... – मैं थोड़ा रूकी, कहूँ न कहूँ का असमंजस... – हो सकता है ये गलत हो, लेकिन कहीं मुझे लगता है कि उसमें नहीं है... - मैं उसकी प्रतिक्रिया के लिए रूक गई।
वो कुछ भी नहीं बोला लेकिन उसकी आँखें जरूर सवाल कर गई, मेरे आगे बोलने के लिए इतना ही काफी था। मैंने कहा - वो प्यार और दुख दोनों के लिए तैयार नहीं है...। – लेकिन प्यार के साथ दुख कैसे आ गया...? नहीं ये उसने नहीं पूछा था, ये मेरा ही उठाया सवाल था। हाँ प्यार है तो दुख तो होना ही है ना...! ये मेरी ही उलझन है जो मैं खुद से ही सवाल-जवाब में डूब रही थी। वो तो निर्विकार बैठा हुआ था... गाजर के टुकड़े को गिलहरी की तरह कुतरता हुआ...। उसने अपनी नजरें मेरे कहने पर टिकाए हुए थी और खुद चुप था, इसलिए उसे पूरी तरह से कंविन्स करना अब मेरी जिम्मेदारी भी थी और जिद्द भी...।
देखो रिश्ते में यदि प्यार है तो दुख भी होगा ही... और श्वेता किसी भी रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। वो अपने लिए सिर्फ सुख चाहती है, जिस भी सुलभ और सरल तरीके से मिल जाए। भावना का निवेश उसके लिए बड़ा बेहूदा आयडिया है... वो तो केपिलट इन्वेस्टमेंट पर काम करती है। देखा जाए तो इसमें कुछ बुरा भी नहीं है। आखिर तो सुख ही जीवन का साध्य है... मेरे लिए भी और तुम्हारे लिए भी..., अब यदि वो उसी की साधना करती है तो इसमें क्या गलत है? वो क्यों बेवजह का संघर्ष चुने... महज भावनाओं के लिए...। – कड़वाहट हवाओं में तैर गई।
वो बहुत मायूस आँखों से मुझे एकटक देख रहा था। मैंने अपनी नजरें झुका लीं, मुझे अपने अंदर एक वहशियाना सुख महसूस हो रहा था... आश्चर्य है...!
समाप्त

कहानी का मॉरल सूत्र नंबर – 112
जो दुख के लिए खुले नहीं होते, उनका जीवन डर बन जाता है