Wednesday, 20 April 2011

भरीपूरी प्यास....! - समापन किश्त

वसंत-पतझड़
हॉल में काफी गहमा-गहमी थी। स्टेज पर चलने वाले कार्यक्रमों की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं था। हर कोई अपने पुराने दिनों को पुराने रिश्तों और दोस्तों के बीच जिंदा कर लेना चाहता था। पता नहीं सलोनी को क्यों उम्मीद नहीं थी कि तन्मय आएगा। और तन्मय को भी ये उम्मीद नहीं थी कि सलोनी आएगी। लेकिन कोई आस तो होगी, तभी तो दोनों इस अलम्नाई मीट में आए थे। तो जब तन्मय संजना के हस्बैंड से बात कर रहा था, तभी उसकी नजर गेट की तरफ पड़ी थी। सलोनी... पीली कांजीवरम में...। पता नहीं कैसे कदम उसी ओर बढ़ गए। ये बेखुदी थी... तो क्या दूरियों में भी कुछ ऐसा रह जाता है, जो दिल की तरह ही लगातार धड़कता रहता है, लेकिन हमें उसकी इतनी आदत होती है, कि हम उसका धड़कना महसूस ही नहीं कर पाते। वो बहुत बेखयाली में वहाँ पहुँच तो गया था, लेकिन सामने जाते ही समझ नहीं पाया कि क्या करे तो थोड़ी दूर ही ठिठक गया...। सलोनी ने आगे बढ़कर उसे बाँहों में ले लिया। तन्मय के अंदर कुछ पिघलकर बह निकला।
कितने सालों बाद... – वो बुदबुदाया था, लेकिन सलोनी ने सुन लिया था।
पंद्रह... – वो उसी तरह खिलखिलाई थी। - देखो अभी तक सेंसेज वैसे ही हैं।
तुम... सचमुच नहीं बदली। अभी भी वैसी ही हो।
क्यों... ?- उसने आँख मारकर पूछा था – बदल जाना चाहिए था?
तन्मय ने थोड़ा झेंपते हुए कहा था – पता नहीं, लेकिन इतने सालों में सब बदल जाते हैं। तो यही एक्सपेक्टेड होता है ना... ?
वो फिर खुलकर हँसी। - और यदि ऐसा नहीं हो तो... – सीधे आँखों में झाँका था। - निराशा होती है... ? – जवाब का इंतजार किया थोड़ी देर, फिर बोली - तुम भी तो नहीं बदले। - फिर थोड़ा हट कर उसे तौलती नजरों से देखा, फिर बोली – पहले ही बड़े-बड़े लगते थे, अब थोड़ा और बड़े लगने लगे हो... ।
धीरे-धीरे सारे दोस्तों ने आकर उसे घेर लिया। अकेली आई हो? – राजवीर ने पूछा था।
नहीं... अनिरुद्ध और बिहाग भी है, दोनों आ रहे हैं।
दिनभर दोस्तों से मिलने का क्रम चलता रहा। शाम को कल्चरल प्रोग्राम था, स्थानीय वोकल क्लासिकल आर्टिस्ट गाने वाले थे। अनिरुद्ध और बिहाग ने सलोनी से अलग अपना प्रोग्राम बनाया था। रात के खाने के बाद कैंपस के लॉन में ही सारे पुराने दोस्त जमा हुए थे। अलग-अलग गुजरे अपने वक्तों की जुगाली करते हुए। तभी राहुल ने गाना शुरू किया था – हम हैं राही प्यार के हमसे कुछ ना बोलिए...। धीरे-धीरे सभी उसके गाने में शामिल होते चले गए और फिर ये सामूहिकता सोलो गानों की माँग में बदल गई। सलोनी और प्रियंका साथ में बैठी थीं। सलोनी ने ब्लैक कलर का सलवार कमीज पहना था। तन्मय ने उसे पहली बार ब्लैक कपड़ों में देखा था, वो सोचने लगा था कि उन दिनों सलोनी ब्लैक कलर क्यों नहीं पहनती थी, जबकि उस पर ये रंग अच्छा लग रहा है। अरे...! कभी मुझे भी तो नहीं सूझा कि मैं उससे पूछूँ कि तुमने काले रंग को क्यों छोड़ रखा है, जबकि रंगों के प्रति तो यूँ भी सलोनी बड़ी खुली थी। राजबीर ने सीटी से आए तुम याद मुझे गाना शुरू किया।
प्रियंका ने सुनाया ओ सजना बरखा बहार आई.... तन्मय सोच रहा था, सलोनी क्या गाएगी और कैसा, क्योंकि इससे पहले कभी सोचा ही नहीं कि सलोनी गाती होगी, गा सकती होगी या कैसा गाती होगी...? सलोनी ने सुनाया – एक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवां रहने दिया/ जानकर हमने उन्हें नामेहरबां रहने दिया.... तन्मय कहीं डूब गया, सलोनी का गला तो मीठा है, लेकिन वो सुरीली भी है, ये आज पता चला। वो सोच रहा है कि हम समझते हैं कि हमने किसी को पूरा जान लिया, लेकिन ये बड़ा भ्रम होता है, क्योंकि जान लेना अभी है, जबकि हर क्षण कुछ नया जुड़ता-बढ़ता या घटता है। फिर क्या किसी का होना क्या इतना ही होता है कि अपनी समझ के दायरे में समा ही जाए? हम अपने होने को खुद भी नहीं जान पाते हैं.... ये तुम ही कहती थीं ना सलोनी.... फिर वहीं आकर अटक गया वो ...। तन्मय की बारी आई तो उसने सबको सैड कर दिया बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी... गाकर। तन्मय के खतम करते न करते तपन ने शुरू कर दिया - ओए तू रात खड़ी थी छत पे नी मैं समझा के चाँद निकला... और सारे ही झूमने लगे। वक्त गुजर रहा था, सबने एक-दूसरे का पता लिया, कांटेक्ट नंबर लिए और फिर से मिलने का वादा किया, सब अपने-अपने रास्ते चले गए। सलोनी पता नहीं किस चीज का इंतजार कर रही थी और तन्मय भी।
रात बहुत घनी हो गई थी। सलोनी थोड़ा आगे बढ़ी तो सूखे पत्तों की चर्रमर्र हुई। तो... – तन्मय ने उसकी तरफ देखा। सलोनी ने हाथ आगे बढ़ाया और तन्मय ने थाम लिया। दोनों साथ-साथ चलने लगे। तुमने मुझे अपना कांटेक्ट नंबर नहीं दिया – तन्मय ने बहुत सहजता से पूछा।
सलोनी ने सुबह वाली मुस्कान बिखेर कर कहा – मैंने लिया भी तो नहीं...!
उसे ध्यान आया, अरे हाँ... – तो ले लो...
नहीं, मन... वो सब इसलिए नहीं हुआ था कि फिर बूँद-बूँद खुद को भरते रहे। - वो बहुत गंभीर थी।
हुआ नहीं था, किया था... – तन्मय न चाहते हुए भी तल्ख हो गया था।
ठीक है, किया था, और मैंने ही किया था। क्या तुम्हारी जिंदगी में अब भी कुछ कम है? - उसका हाथ तन्मय के हाथ में पसीज रहा था। - बहुत सोचकर जवाब देना।
कभी-कभी लगता है, हाँ है...
और अक्सर....
अक्सर तो... – तन्मय हड़बड़ा गया
रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है, यही ना... ! – सलोनी ने उसकी बात पूरी की।
तन्मय जवाब नहीं दे पाया, लेकिन उसने सलोनी के चेहरे की तरफ देखा। वो गर्दन झुकाए थी, कुछ बचा रही थी या फिर ...?
हाँ, कहो... क्योंकि यही सच है। मन, .... मैं नहीं चाहती थी कि हम एक-दूसरे की जीवन में बस यूँ ही रह जाए। रूटीन की तरह... बिना किसी उष्मा, गर्माहट या फिर तड़प के...।
लेकिन हम अब भी ऐसे ही हैं ना... मैं आरती के साथ और तुम अनिरूद्ध के साथ... ? – तन्मय ने जान-बूझकर चोट की थी।
हाँ, यही तो... यही तो मैं नहीं चाहती थी कि जो उन्माद वैसे जिया है, वो रूका हुआ पानी हो जाए। हम एकदूसरे को जब भी याद आते हैं, तब तीखी तड़प महसूस होती है.... होती है ना...! – सलोनी तन्मय के बिल्कुल सामने आ खड़ी हुई। वो हड़बड़ा गया।
हाँ... – एकाएक उसका मन हुआ कि सलोनी को बाँहों में ले लें, लेकिन फिर रूक गया।
बस... क्योंकि याद... ख्वाहिश... और उम्मीद, यही तो वो चीजें है, जिनके सिरे पकड़कर जिंदगी रंग-बिरंगी होती है, हर दिन नई होती है। पता है, सपने पूरे हो जाने का मतलब है उनका मर जाना। जिंदगी कभी मरती नहीं है, हर मरे हुए सपने की कब्र पर एक नया सपना जन्म लेता है। मैं तुम्हारी जिंदगी में मरा हुआ सपना बन कर नही रहना चाहती थी, और न ये चाहती थी कि तुम्हारे साथ ऐसा हो...। – उसका गला रूँध गया, वो चुप हो गई।
लेकिन इसकी कितनी बड़ी कीमत दी है, मैंने, तुमने सोचा है? कितनी रातें, कितने मौसम...
तो क्या मैं इससे अलग रही?- सलोनी ने बीच में से ही बात लपक ली।
बहुत देर तक दोनों ही चुपचाप चलते रहे। रात गुजरती जा रही थी और दोनों अँधेरे के बीच अपने-अपने जज्बातों को कुछ खोलते, कुछ छुपाते एक-दूसरे का हाथ थामे चलते रहे। एकाएक वो उनींदे अँधेरे से निकलकर सड़क की धुँधली-शांत रोशनी में आ खड़े हुए। कैम्पस से निकलकर मुख्य सड़क पर... यहाँ दूर-दूर तक शांति थी। सूनी-सी सड़क के दोनों ओर जल रही स्ट्रीट लाइट और दूर-दूर तक फैला सन्नाटा...।
सलोनी ने ही चुप्पी तोड़ी – मन... सोचो, यदि हम पति-पत्नी होते तो बच्चों की पढ़ाई, उनका भविष्य, तुम्हारे भाई की शादी, मेरी माँ की बीमारी, हमारे भविष्य की प्लानिंग, राशन की किटकिट, बिजली का बिल, टेलीफोन का बिल, मकान की किश्त, हमारे ईगो, हमारे सामाजिक संबंध, रसोई गैस के खत्म होने से लेकर ट्रांसफर या फिर प्रमोशन जैसी कितनी गैर-जरूरी चीजों से हमारा सरोकार हो जाता और मूल चीज कहीं हाशिए पर चली जाती। सपना मर जाता.... हम बस सामाजिक संबंधों के दायरे में कैद हो जाते, ख्वाहिशें मर जाती और हकीकत ही हमारे बीच रह जाती। अभी हम ये सोच तो सकते हैं कि यदि हम साथ होते तो कैसा होता... तब हो सकता है, हम ये सोचने की बजाए शायद ये सोचते कि ये यदि ये नहीं होता तो हमारा जीवन कैसा होता... यदि साथ रहते हुए हम ये सोचते तो कितना बुरा होता... सोचो....।
मुझे पता नहीं है, शायद तुम ही सही हो, लेकिन दिल कहता है कि यदि वैसा होता तो हम उसे मरने नहीं देते, दिमाग कहता है कि रूका पानी हर हाल में सड़ता ही है... मैं अभी निश्चित नहीं हूँ, कि तुम सही हो। - तन्मय ने जवाब दिया।
और मेरे सही या गलत होने को लेकर क्या कहना है आपका... – सलोनी फिर मस्ती में लौट आई।
तुम गलत हो.... – तन्मय ने हाथ की पकड़ कड़ी कर कहा।
तो... माफ कर सकते हो?
कर दिया यार... माफ करना भी मजबूरी है, प्यार जो... - तुरंत सलोनी ने उसके होंठों पर हाथ रखकर उसे रोक दिया। दोनों चलते-चलते शहर के उस होटल के नीचे आ खड़े हुए जहाँ सलोनी ठहरी हुई है।
दोनों एक दूसरे के सामने थे। तन्मय जानता था कि अब पता नहीं कब मिले, मिलें या कि नहीं मिले। - केन आई हग यू...? – तन्मय ने पूछा था
सलोनी ने बाँहें फैला दी... – अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले... वो बुदबुदा रही थी। तन्मय की आँखों में पानी तैरने लगा था। वो देख नहीं पाया कि सलोनी की आँखों में भी वही उतर गया था। दोनों अलग हुए, सलोनी तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ गई... तन्मय ने उसे आखिर तक जाते हुए देखा और फिर उस सूनी सड़क पर चल दिया... जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले... सलोनी की छोड़ी हुई लाइन को गुनगुनाते हुए।
समाप्त
कहानी का मॉरल सूत्र – 85
जिंदगी प्यास है, तृप्ति मौत