Monday, 5 July 2010

एनर्जी मैनेजमेंट

मैं उसके तर्कों के आगे पूरी तरह से निरूत्तर थी, और इसने मुझे बुरी तरह से उदि्वग्न कर दिया था। मैं वहाँ से निकल आई थी, प्रकट में मैंने नहीं माना, लेकिन अंदर कहीं वो बात कहीं अटक गई कि स्त्रियाँ इतनी प्रतिभासंपन्न नहीं होती है, माना तो वहाँ भी नहीं था, लेकिन यूँ कहा जा सकता है, जैसे मुझे एक हाइपोथिसिस मिल गई थी। अब घटनाएँ, परिस्थितियाँ और लोग इसी हाइपोथिसिस पर रखे जाएँगें, लेकिन ये सब तो बहुत बाद की बात थी, उस वक्त तो अपना सारा पढ़ा-लिखा, जाना, सोचा और विश्लेषित किया हुआ बेकार लगा था। बहुत याद करने के बाद भी मैं इतिहास से कोई उदाहरण नहीं ला पाई थी। वो सारे नाम जो उसने गिनाए थे, पुरुष थे, हर क्षेत्र के धुरंधर.....मैं बस इतना ही कह पाई थी कि स्त्री पुरुष को बनाने और उसके घर को सँवारने में ही खुद को होम कर देती हैं।
उसने चिढ़ाती-सी हँसी से पूछा था – किसने कहा.... उन्हें ये सब करने के लिए, किसी ने कोई जबरदस्ती तो नहीं की, वे खुद ही अपनी मर्जी से करती हैं, न करें। कुछ होकर दिखाए।
स्त्री को जीवन से सब कुछ चाहिए, इसलिए वो कुछ देकर सबकुछ पाना चाहती है। - मैंने ऐसा कहा तो उसने तो इस पर भी उपहास ही किया - अच्छा.... तो फिर शोषण की दुहाई क्यों देती हैं?
क्योंकि वे पुरुष को बनाती है, लेकिन पुरुष उन्हें सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करता है और फिर फेंक देता है। उनके त्याग के लिए कभी भी उनका आभारी नहीं रहता है। - मैंने जवाब दिया था
यही तो.... यही तो मैं कहना चाहता हूँ। त्याग क्यों करती है? जब उनका कोई प्रतिदान उन्हें नहीं मिलता है। देखो, थोड़े ठंडे दिमाग से सोचो..... यदि वेग होता है, तो फिर उसे किसी भी तरह से रोका नहीं जा सकता है, यहाँ वेग की ही कमी है। - उसने बहुत संयत हो कर कहा था।
एक बार फिर से मैं निरूत्तर थी। एकबारगी गुस्सा उन स्त्रियों पर आया था, जिन्होंने अपना उजला करियर अपने पति और बच्चों के नाम कुर्बान कर दिया था.... और मेरे पास प्रतिभासंपन्न स्त्री के उदाहरण के नाम पर कुछ भी नहीं रहने दिया था। आँसू उमड़-उमड़ कर बाँध तोड़ने की ताक में थे.... उसी झोंक में मैं वहाँ से बाहर आ गई थी। इतना बुरा मूड लेकर मुझे घर नहीं जाना था, यूँ भी आज माँ का जन्मदिन हैं और भाभी ने इसके लिए एक सरप्राइज पार्टी रखी है। मूड ठीक करने और माँ के लिए कुछ खऱीदने के उद्देश्य से मैं मॉल में आ गई।
भाभी को फोन कर पूछा कि बाजार से कुछ लाना तो नहीं है...? उन्होंने कुछ छोटी-मोटी चीजें लाने के लिए कहा और याद दिलाया कि एक बार संजू को फोन कर कह दें कि आज थोड़ी जल्दी घर आ जाए। मैंने पूछा कि – भाई को मालूम नहीं है क्या?
भाभी हँसी थीं..... – अरे मर्दों को इस तरह की चीजें कहाँ याद रहती है।
कुछ चट से कौंधा.....और पापा... – मैंने पूछा था
हो सकता है पापा को याद हो, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ जाहिर नहीं होने दिया। - भाभी ने जवाब दिया- अच्छा तू जल्दी से बाजार का काम कर घर आ।
घर पहुँची फिर भईया को फोन किया। भाई ने पूछा - क्यों, कुछ खास काम है क्या?
हाँ थोड़ा जरूरी काम है, बस तू आजा।
घर पहुँची तो भाभी ने दरवाजा खोला था। माँ कहाँ हैं? – मैंने पूछा था, क्योंकि दरवाजा हमेशा माँ ही खोलती हैं।
भाभी ने मीठा-सा मुस्कुराते हुए इशारे से बताया उपर..... हम दोनों को ही समझ में आ गया था कि माँ थोड़ी उदास, थोड़ी नाराज है। आखिर घर में किसी ने भी उन्हें जन्मदिन की बधाई जो नहीं दी।
शाम को जो हुआ, उससे माँ की आँखें भर आईं और वो उन्हीं भरी-भरी आँखों से भाभी को निहारती रहीं। हमारे घर की धुरी हैं भाभी.... यदि मैं यूँ कहूँ कि परिवार किसे कहते हैं, इसका अहसास हमें भाभी ने कराया है, तो ज्यादा नहीं होगा। भाई-भाभी की लव मैरिज है। माँ थोड़ी नाराज थी, लेकिन पापा ने हाँ कर दी थी, तो माँ को भी मानना ही पड़ा था। अब तो माँ जैसे भाभी की ही माँ हैं और सच पूछो तो मुझे भी भाभी ने माँ का ही सा प्यार दिया। अब हो सकता है ये मानना थोड़ा मुश्किल हो, लेकिन आज भी हमारे समाज में ऐसे घर हैं। कह सकते हैं कि स्त्री को जीवन की मूल चीजों की समझ है, हाँ..... फिर से कुछ कौंधा।

सावन खत्म होने को था.... आज सुबह जब मैं घर से निकली तो मौसम धूप-छाह का हो तो रहा था, लेकिन ऐसा नहीं लगा था कि इतनी बारिश होगी.... करीब 2 बजे से लगातार बादल बरस रहे हैं और एक घड़ी को भी नहीं लगा कि थके हो.... बहुत देर लायब्रेरी में बैठने के बाद.... आखिर मैंने तय किया कि अपनी गाड़ी कॉलेज में रखकर ऑटो से घर चली जाती हूँ। जब मैं लायब्रेरी से बाहर निकली तो राहुल को सामने से आता देखा....मैंने अपनी चाल थोड़ी धीमी कर ली, सोचा निकल जाए, फिर मैं बाहर निकलती हूँ, लेकिन पता नहीं मुझे क्यों लगा कि वो भी धीरे-धीरे चलने लगा.... दोनों एक-दूसरे के सामने आ खड़े हुए..... आप अभी तक गईं नहीं.... ? – राहुल ने पूछा
उस दिन के बाद से मैं उससे थोड़ा कटने लगी थीं, पता नहीं क्यों मुझे ये लगने लगा था कि स्त्री की योग्यता का तर्क कहीं न कहीं मुझसे भी आकर जुड़ता है। फिर भी जब उसने सवाल पूछा तो जवाब तो देना ही ठहरा, आखिर इतनी बदतमीज तो नहीं ही हो सकती हूँ।
हाँ इंतजार कर रहीं थी कि बारिश कम हो तो निकलूँ, लेकिन बहुत देर हो गई, अब तो जाना ही होगा। - मैंने मायूस होकर कहा।
चलिए मैं आपको छोड़ देता हूँ। - राहुल ने सौजन्यता दिखाई
नहीं, आपको तो दूसरी तरफ जाना होगा। आई विल मैनेज....- मैंने कहा।
आप मुझे अपने घर नहीं ले जाना चाहतीं हैं? – उसने सीधे ही गोला दागा
अरे नहीं.... – मैं थोड़ा हड़बड़ाई - ऐसी कोई बात नहीं है, आप क्यों बेकार में तकलीफ करें, इसलिए...
कहीं मुझे यूँ लगा कि ये खामख्वाह ही घर आना चाहता है, लेकिन अब इतना कहने के बाद मेरे पास उसके साथ जाने के अलावा और कोई विकल्प बचा नहीं था। उसने जेब से चाभी निकालते हुए मुझसे कहा – आप इंतजार करें, मैं गाड़ी निकालकर लाया।
घर पहुँचे तो भाभी ने दरवाजा खोला...... – भाभी.... ये – मैं तो अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी, कि राहुल चहका.... राजी दी.... आप यहाँ?
भाभी भी चौंकी – अरे राहुल, तुम यहाँ कब से हो?
मतलब आप एक-दूसरे को जानते हो.... ? – मैं दोनों को आश्चर्य से देख रही थी।
हाँ, राहुल और रोनित दोनों बचपन के दोस्त थे... फिर एकाएक भाभी की आँखों में उदासी घिर आई। रोनित भाभी का भाई था, प्यार के चक्कर में उसने अपनी जान ले ली और उसके मरने के बाद घरवालों को पता चला कि दरअसल हुआ क्या था?
एक तरह से अच्छा ही हुआ कि भाभी और राहुल दोनों एक-दूसरे को इतने अच्छे से जानते हैं, मुझे थोड़ा सा अवकाश मिल गया।
जब मैं चेंज कर लौटी तब तक भाभी नाश्ता लगा चुकी थीं। मैं चाय बनाने चली गईं तो दोनों पुरानी यादें ताजा करने में लग गए। शनिवार था, भाई भी जल्दी घर आ गया। भाभी ने राहुल का परिचय भाई से कराया। चाय का कप सबको पकड़ाकर मैं भाभी की बगल में बैठ गई। राहुल भाभी से पूछ रहा था – आपके म्यूजिक का क्या हुआ?
कहाँ यार.... शादी के बाद दो-तीन साल तो चला फिर मुश्किल आने लगी तो छोड़ दिया। कभी-कभी घर पर ही रियाज कर लेती हूँ। - भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा
भाई को पता नहीं क्यों लगा कि कहीं वह इसके लिए दोषी न ठहराया जाए तो उसने कहा – मैंने तो कहा था कि इसे कंटीन्यू रखो, लेकिन राजी ने ही बंद कर दिया।
अब देखो ना घर-परिवार, नौकरी और सबसे खास बिहाग, उसकी पढ़ाई लिखाई, जरूरतें और फिर संस्कार... इस सबके बीच हम कहाँ अपने शौक पूरे सकते हैं? फिर यही जीवन है।– भाभी ने एक तरह से भाई को बरी कर दिया।
..... फिर कुछ कौंधा..... अपनी हाइपोथिसिस याद आ गई। मैं फिर से खुद में उलझ गईं....।

भाई को एक पार्टी में जाना था, तो मैं और भाभी कॉफी का कप लेकर छत पर चले आए। दिन भर बरस-बरस कर बादल रीत गए थे, रात ज्यादा स्याह हो गई थी और थोड़ी ठंडी भी...।
भाभी आपने संगीत सीखना क्यों छोड़ दिया? आपको नहीं लगता कि आपको इसे जारी रखना चाहिए था? – मेरे अंदर वो चुभन कम हो ही नहीं रही थी....
लगता है कभी-कभी, लेकिन फिर हमें अपने जीवन में कई चीजें तय करनी होती हैं, यू नो प्रायरीटिज.... हमें तय करना होता है, कि हमें क्या चाहिए और किस कीमत पर....। मुझे अपना परिवार चाहिए, हर कीमत पर ; तो बात खत्म हो जाती है, फिर ऐसा भी नहीं था कि मैंने सबकुछ को मैनेज करने की कोशिश नहीं की... की, लेकिन.... सबकुछ कर पाने के बाद भी समय तो उतना ही है ना? बस.... – भाभी बहुत स्पष्ट है, अपने तईं।
आपको क्या लगता है, भाई ने आपके लिए क्या या छोड़िए, परिवार के लिए क्या छोड़ा? – मैं थोड़ी तीखी हो आई...।
देखो, मैंने शायद तुम्हें पहले भी कहा था कि पुरुष भागता है, बस..... उसे समझ नहीं है कि आखिर उसकी खुशी किसमें हैं? औरत जानती है कि उसे कौन-सी चीज खुश करती है, वो जिंदगी की मूल चीजों को बहुत बचपन से पहचान जाती है। बिना बेटी के परिवार कभी भी बँधा हुआ नहीं रह सकता है। क्यों? क्योंकि औरत ये जानती है कि आखिर खुशियों का मूल कहाँ है, उसका स्रोत कहाँ है? – कह कर भाभी कॉफी का आखिरी घूँट भरने लगीं।
मुझे हमेशा से लगता आया है कि भाभी कितनी निर्द्वंद्व रहतीं हैं, कभी भी उन्हें किसी भी तरह के द्वंद्व में नहीं पाया, अब भी नहीं हैं।

आज अंतिम लैक्चर के दौरान ही गले में तकलीफ बढ़ गई। लैक्चर बीच में ही छोड़ा और प्रिसिंपल को बता कर घर आ गई। भाभी अभी तक ऑफिस से लौटी नहीं थीं। चाय के दौरान माँ ने बताया प्रज्ञा आई हुई है, कल तुम लोग जल्दी आकर उससे मिल आना। भाभी घर लौटी तो प्रज्ञा दी के लिए कुछ गिफ्ट लेकर.... एकाएक मुझे लगा कि वो तो हमारी बहन हैं, लेकिन भाभी..... शायद इसे ही तो स्त्री की ऊर्जा कहते हैं.....। तमाम जिम्मेदारियाँ संभालते, अपना, अपने पति, बच्चे, करियर और शौक के लिए जूझते, करते और संघर्षरत रहने के बाद भी अपने सराउंडिंग को लेकर इतना सजग रहना तो एक औरत के बूते की ही बात है। भाभी सही है, पुरुष एक समय में एक ही काम में अपनी ऊर्जा लगाते हैं।
रात होते-होते तक तो बुखार आ गया और चार दिन तक उसी में पड़ी रही। इस बीच राहुल ने भाभी को फोन किया।
राजी दी, अदिति की तबीयत कैसी है?
डॉक्टर ने वायरल बताया है, हफ्ता तो कम से कम स्वस्थ होने में लगेगा ही।
और उसी शाम राहुल घर आ गया। इस बीच मैं अपनी हाइपोथिसिस पर बहुत सारा काम कर चुकी थी। बहुत सारा कुछ सोच चुकी थी। क्या करूँ कि बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं उस सबसे उबर नहीं पा रही थी।
राहुल तुम्हारी पेंटिंग का क्या हुआ? – भाभी ने भी भूली हुई सी बात को याद कर पूछा, यूँ लगा मुझे जैसे सब कुछ मेरे ही लिए बुना गया हो।
अरे दी.... पढ़ाई और करियर में सबकुछ बह गया। और अब जब सब कुछ ठीक है तो समय ही नहीं मिलता। - उसने सफाई दी
मैं तो जैसे भरी हुई ही थी – क्यों टाइम मैनेजमेंट का क्या हुआ?
टाइम मैनेजमेंट.... ? – एकसाथ सभी चौंके
हाँ, उस दिन आपने ही तो कहा था कि टाइम मैनेजमेंट करना होता है, सब कुछ किया जा सकता है। - पहली फायरिंग
राहुल ने माइल्ड करने के लिए कहा – कौन कहता है राजी दी कि अदिति बीमार है, लड़ने के लिए कैसी तैयार बैठी है? कोई बीमार आदमी इस तरह से लड़ पाएगा...
मैं हँसी - हाँ आदमी तो नहीं, लेकिन औरत तो लड़ सकती है।
अरे....- सारे लोग हँसने लगे।
भाई ने कहा – अरे, इसमें आदमी औरत कहाँ से आते हैं?
आते हैं भाई, आते हैं....औरत के पास ऊर्जा का असीमित स्रोत होता है, आपको नहीं पता होगा कि बिहाग को कौन सी ड्रेस अच्छी लगेगी, भाभी को पता होगा, आपको नहीं पता होगा कि फीमेल फैशन के ट्रेंड्स क्या है, भाभी को पता होगा कि मेल फैशन ट्रेंड्स क्या होंगे? आपको नहीं पता कि कॉलोनी के नुक्कड़ पर कौन-सी नई दुकान खुली है, हमें पता होगा। हमारे पास भी उतना ही समय होता है, जितना आपके पास, हमारे पास उल्टे दबाव ज्यादा होते हैं। हर जगह हम सिद्ध होने की चुनौती का सामना करते हैं। कभी कर भी पाते हैं और कभी नहीं भी, लेकिन जब नहीं कर पाते हैं तो हमें माफी नहीं मिलती है। - मैं बोलते-बोलते हाँफ गईं थीं।
भाभी मुस्कुराई.... अदिति भरी बैठी है क्या?
थोड़ा स्वस्थ होने के बाद मैंने फिर बोलना जारी रखा – मैं बहुत दिनों से इस बारे में सोच रही थी.... दरअसल जब आपके पास चीजें सीमित होती है तो आप उसे बहुत सोच समझ कर मैनेज करते हैं और इसलिए वो बहुत अच्छे से यूज हो पाती है। टाइम और मनी मैनेजमेंट को ही लो... जब इनकी कमी लगी तभी तो इन्हें मैनेज करने का विचार आया। तो औरतों के पास ऊर्जा की इफरात होती है और इसलिए उस ऊर्जा को बाहर आने के लिए बहुत सारे रास्तों की जरूरत होती है। और वे उसका ठीक से उपयोग नहीं कर पाती हैं। इसे इस तरह से समझे जब गर्मियों में पानी की किल्लत होती है तो हम पानी को किस किफायत और समझदारी से इस्तेमाल करते हैं, और बारिश में..... उसी पानी को खूब बर्बाद करते हैं, तो इन शॉर्ट पुरुष के पास सीमित ऊर्जा होती है, इसलिए वे उसका ठीक से उपयोग करते हैं, जो काम कर रहे होते हैं, उस पर पूरा ध्यान लगाकर करते हैं और सफल हो जाते हैं। - मैं पानी पीने के लिए थोड़ा रूकी।
राहुल ने कोई प्रतिवाद नहीं किया, मुझे आश्चर्य हुआ। भाई आश्चर्य से मुझे देख रहा था, पूछा – मामला क्या है?
राहुल ने पूरा मामला समझाया तो भाई ने एक नई बात कही – ओशो कहते हैं कि पुरुष में एक किस्म की बेचैनी होती है, और स्त्रियों में एक किस्म का ठहराव....। बेचैनी उससे बहुत कुछ करवाती है, स्त्री का ठहराव उसे कुछ भी करने के लिए प्रेरित नहीं करता है।
हाँ तो ठीक है, अब इस दौर की स्त्रियों ने भी उस ठहराव को त्याग दिया है। आधुनिक दौर के लांछन सहते-सहते कि उन्होंने मानवता के लिए कुछ नहीं किया, अब वे करने पर उतरीं हैं, लेकिन देखना अब जो होगा, वो मानवता के लिए ज्यादा बुरा होगा। स्त्री जब जागेगी तो सबसे पहले समाज का विघटन होगा, क्योंकि उसी के क्षरण पर समाज का किला खड़ा है। - मैं चुप हो गईं
भाभी ने सभी के हाथ में चाय के कप पकड़ा दिए थे।

कहानी का मॉरल
सूत्र - 93 - पुरुष की उपलब्धियों का राज उसकी 'सीमित' ऊर्जा में हैं