Sunday, 25 July 2010

छूटे किनारों के बीच...

माँ का हर बार का रोना... ऐसे आने का क्या मतलब है? सुबह आती है और शाम को निकल जाती है। थोड़ा सा रूक जा, आधे घंटे में खाना बन जाता है। शाम का खाना खाकर चले जाना।
मैंने घड़ी की तरफ देखा, माँ को झिड़का – माँ पाँच बजे कोई खाने का समय होता है क्या?
माँ ने फिर कहा – बस घोड़े पर सवार होकर आते हो, ठीक से बात तक नहीं हो पाती, एक समय के खाने में क्या-क्या तेरी पसंद का खिला सकती हूँ। फिर तू हर बात में तो मना-मना करती रहती है।
पापा की आँखें बरजती है, ऐसे मानो मिलने तो आ जाती है। लेकिन माँ की आँसुओं से धुँधलाई आँखें ये बरजना देख ही नहीं पाती है। आँसू तो यहाँ भी आ जाते हैं। अबीर अधीर होने लगे हैं और पापा भी... अबीर की अधीरता मेरी आँखों में आ पहुँचे आँसुओं को लेकर है तो पापा की समय को लेकर.... हमेशा सेफ साइड चलते हैं। बारिश का समय है, जल्दी निकल जाओ तो अच्छा है। माँ पैक करती जा रही है, लंगडा आम, देसी आम का रस, भुट्टे का हलवा, अबीर के लिए रबड़ी, नया बना अचार और मैं कह रही हूँ, इतना खाने का समय ही नहीं है। शेड्यूल इतना फिक्स है कि कहीं अलग से कुछ जुड़ नहीं पाता है। दादी कहती हैं – बेटा मिठाई तो खाने के साथ भी खा सकते हो दोनों टाइम खाना खाती है या नहीं... औऱ नया-नया अचार को बहन-बेटी को खिलाए बिना क्या गले से उतरे... ?
अब उनसे कैसे कहें कि मिठाई खाना कम कर दिया है। बैठे-बैठे का काम और उस पर मिठाई.... मोटे हो जाएँगें सो तो है ही, लेकिन बीमारी-सीमारी का भी तो डर...!
माँ हिदायत दे रही है – घर पहुँचते ही अचार को छोड़कर सब कुछ फ्रिज में रख देना, देख कुछ खराब नहीं हो जाए।
पापा अब चिढ़ने लगे हैं, बस....बस बहुत हो गया। चलो अब जाओ... देर करने से रात हो जाएगी। बारिश के दिन है और समय कैसा तो खराब चल रहा है!
माँ से गले मिली तो दादी ने दोनों को बाँहों में भर लिया। तुझे खुश देखकर मेरा जनम सार्थक हो गया। पापा और अबीर इस असहज स्थिति से बचने के लिए पहले ही गाड़ी के पास पहुँच गए थे।

आषाढ़ खत्म होने को है। दो-तीन दौर बारिश के हो चुके हैं तो हर जगह हरियाली नजर आ रही है। जगह-जगह धरती पर हरी घास उग आई है। पेड़-पौधे भी धुले-धुले चमक रहे हैं। बादल छाए हुए हैं, और शाम गहरी हो रही है। हम सफर में है, न तो माँ का घर साथ है और न ही अपना घर... दोनों ही घर के सिरे छूटे हुए हैं, ठेठ वर्तमान। माँ के घर की गर्माहट, बचपना और भावुकता से बाहर आ गई और अपने घर के अहसास से अभी बहुत दूर हूँ। गोकुल काका ने हाथ बढ़ाकर म्यूजिक सिस्टम ऑन कर दिया। गाना तैरने लगा – ये मौसम आया है... कितने सालों में... आजा खो जाए ख्वाबों-खयालों में.....। कहाँ हूँ, क्या हूँ, कहाँ जा रही हूँ, क्यों जा रही हूँ? जैसे सवालों से बहुत-बहुत दूर.....। शहर की सीमा से बाहर हुए तो अबीर कुछ सहज हुए... अभी तक हम दोनों के बीच मेरा पर्स पड़ा हुआ था, अब अबीर ने उसे उठा कर पीछे रख दिया और थोड़ा पास सरक आए....शायद शहर का भी लिहाज पाल रहे थे, मुझे हँसी आ गई, लेकिन अबीर का ध्यान नहीं गया। हाथ पर हाथ रखा – खुश.... ?
आँसू छलक आए, जवाब नहीं निकला, सिर हिला दिया। सीधे आँखों में उतर आए।
मुझे सहज करने की गरज से उन्हें हाथ को थोड़ा सहलाया.... और फिर बाहर देखने लगे.... थोड़ी देर में बड़ी-बड़ी बूँदें गिरने लगी.... अबीर ने अपना हाथ बाहर कर कुछ बूँदें हथेली पर ली और मेरी ओर उछाल दी। मैंने भी ऐसा ही किया... दोनों ही खिलखिला पड़े.... गाड़ी चलाते हुए गोकुल काका को भी हँसी आ गई। आधा रास्ता पार कर चुके थे।
एकाएक यूँ लगा कि ये सफर यूँ ही चलता रहे.... क्यों जरूरी है दुनिया का बीच में आ जाना.....? अंदर-बाहर जादू-सा फैला हुआ है, बाहर प्रकृति जादू कर रही है और अंदर अबीर....। गोकुल काका के होने का लिहाज है, फिर भी बार-बार उँगलियों से सिहरा रहे हैं। आश्चर्य है, अभी कुछ भी याद नहीं आ रहा है। अबीर को कल से जल्दी निकलना होगा, अम्मा तो कल डॉक्टर को दिखाना है, और मुझे कल से नया चैप्टर पढ़ाना है, जिसे इससे पहले मैंने कभी नहीं पढ़ा और घर पर थी तो बहुत चिंतित थी, यहाँ याद करके भी उस चिंता का अंश तक नहीं पकड़ पा रही हूँ। रिमझिम बारिश अब भी हो रही थी। गोकुल काका चाय पिएँगे....- अबीर के बोलने से मैं लौट कर आई।
और पकोड़े भी....- मैं शरारत से मुस्कुराई।
यहाँ मिलेंगे तो....- अबीर ने बाहर देखते हुए ही कहा।
नहीं मिलेंगे तो भी....
अबकी अबीर ने चौंक कर देखा.... क्यों क्या मेरी इतनी-सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते? – मैंने मान दिखाया।
वो मुस्कुराए, जो हुक्म रानी साहिबा... मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी।
गोकुल काका ने एक तरफ कर गाड़ी खड़ी की और पूछा – मैं चाय यहीं ले आऊँ भैयाजी? बाहर बारिश हो रही है।
तो क्या हुआ... गल थोड़े ही जाएँगें, चलेंगे....- अबीर ने कहा।
उस छोटी-सी गुमटी में इक्का-दुक्का लोग ही बैठे थे। लोहे की टेबलों और पत्थर की पट्टी से कुर्सी का काम लिया जा रहा है। मैं जाकर पट्टी पर बैठ गई.... तेल गर्म हो रहा था, अबीर ने जाकर पूछा – पकोड़े हैं क्या?
सामने खड़े एक मध्यवय के पुरुष ने कहा – नहीं है जी, अभी तो आलूबड़े तैयार हो रहे हैं।
अबीर ने कहा- बस इसी में थोड़ा-सा मसाला और प्याज डालकर पकोड़े बनाओ भैया।
मैं तब तक अबीर के पास जाकर खड़ी हो गई। - नहीं, आलूबड़े ही खाएँगे।
दुकानदार ने कहा – अभी बन जाते हैं जी पकोड़े.... क्या देर लगती है। अबीर ने भी हाँ में हाँ मिलाई।
ऊँ हू.... आलूबड़े ही खाने हैं।– मैंने ठुनकते हुए कहा। अबीर ने फिर चौंक कर मेरी तरफ देखा... अजीब हो, अभी तो पकोड़ों की फरमाई कर रही थीं और अब....।
अरे यार मुझे यदि आलूबड़े ही खाने हो तो..... – इस बार थोड़ी बनावटी चिढ़ दिखाई।
ओके....- अबीर ने हथियार डाल दिए।

लहसन डले गर्मागर्म आलूबड़े और अदरक वाली गर्म चाय.... दुकान के रेडियो पर बजता गाना – बैरिया वे.... ओ... ओ किया क्या कुसूर मैंने तेरा वे....., बारिश..... ओ गॉड.... बस इसी तरह सफर में जीवन कट जाए.... सपना, रोमांस.... सफर.....। निकलने लगे तो चिप्स का बड़ा सा पैकेट लाकर अबीर ने मेरे हाथ में थमाया.... आँखों से बहुत-सारा कुछ उमड़ा.... अबीर ने उसे अपनी आँखों से थाम लिया। बारिश थोड़ी तेज हो गई। गोकुल काका भागकर गाड़ी की तरफ गए और छाता लेकर आए। मुझे थोड़ी शर्म आई... अरे, इतनी बारिश नहीं हो रही है काका, पहुँच जाते। अबीर ने छाता खोलकर मुझे थमाया और खुद दौड़कर गाड़ी में जाकर बैठ गए।

मौसम कैसा तो साँवला-सुरमई हो रहा था, कोई पागल कैसे नहीं हो जाए.... फिर से गाना – मौसम-मौसम, लवली मौसम, कसक अनजानी ये मद्धम-मद्धम, चलो घुल जाए मौसम में हम.... हाँ... इसी मौसम में घुल जाए ये सफर.... ये सफर.... बस चलता रहे.... नहीं तो हम गुम हो जाएँ। ना जाने कहाँ से फिर आँसू निकल पड़े.....।
धीरे से बादलों के साथ रात भी जुगलबंदी करने आ पहुँची। अँधेरा थोड़ा गहराने लगा। अपने शहर की सीमा में दाखिल हो गए। ट्रेफिक, रोशनी और जाम.... छुट्टी के दिन का उन्मुक्त माहौल। गाड़ी अब रेंग-रेंग कर चल रही थी। कुल 8 किमी के रास्ते को पार करने में पूरा आधा घंटा लग गया।

कॉलोनी में घुसे तो अँधेरा.... घर के बाहर गाड़ी रूकी तो देखकर चौंक गए.... अँधेरा घुप्प पड़ा है। अम्माँजी बाहर ही इंतजार करती मिली। पैर छुए तो बजाय आशीर्वाद देने के फट पड़ी – ई देखो, मरा इनवर्टर भी गया। दोपहर से बिजली नहीं है। कब से अँधेरे में ही बैठी है। ऊ.... शकुन भी नहीं आई।
मैंने अबीर की तरफ देखा और अबीर ने मेरी तरफ... हम दोनों बेबसी में मुस्कुराए.... सफर के साथ ही रोमांस भी खत्म हो गया.... अब तो खाँटी दुनियादारी है....।

कहानी का मॉरल –
सूत्र – 89 - सफ़र रोमांस है, मंज़िल दुनियादारी