Sunday, 11 July 2010

सिस्टम की अफीम

सुबह ट्रेन से उतरते ही यूँ लगा कि बस नैनीताल फैलता हुआ मेरे स्वागत के लिए काठगोदाम तक आ पहुँचा है। मैं यहाँ पहली बार आया हूँ। बाहर निकलते ही होटल की गाड़ी मिल गई। रात भर के सफर के बाद नींद आँखों में किरकिरा रही थी। 30-40 मिनट के सफर के बाद मैं उस शहर में पहुँच जाने वाला हूँ, जिसके बारे में स्मिता बहुत रूमानी बातें करती थीं। कहीं एक ख़लिश सी होकर गुजर गई.... नहीं अब कुछ भी ऐसा नहीं जो उदास करें। आखिरकार मैंने वो सब पा लिया था, जिसके सपने देखे थे, 15 दिन पहले ऐसी ही एक चमकती सुबह आई थी, जब रातभर जागने के बाद भी न थकान थीं, न नींद और न ही अनमनापन... रात भऱ फोन पर फोन और फोन.... सुबह से ही दोस्तों रिश्तेदारों का आना-जाना.... खुद के साथ रहने की शिद्दत से प्यास के बीच लगातार खुद से दूर खींच लिया गया था। फिर सोचा... मेरी ये सफलता मेरी अकेले की तो नहीं है। ठीक है मेहनत मेरी है, लेकिन दुआएँ और आशीर्वाद तो सबके हैं, तो फिर इस पर उनका भी कुछ हक है। माँ से कह चुका था, 15 दिन के बाद मैं हफ्ते भर के लिए बाहर जाऊँगा। कुछ दिन अपने साथ रहूँगा। माँ से कहा नहीं था, लेकिन सोचा था, अपने जख़्म देखूँगा, वो सब देखूँगा जिसने मुझे तपाया....जलाया और आखिर कुंदन कर दिया, लेकिन कोई नहीं जानता है कि इस तपिश में कहाँ, क्या खोया है मैंने.... च्च फिर से वही.... नहीं। आईपीएस में सिलेक्शन के बाद के 15 दिन भारी व्यस्तताओं के बीच निकले। दोस्तों-रिश्तेदारों के बीच, माँ की मन्नतें पुरी करने और पिता की बहुत कुछ कहतीं भरी-भरी आँखों और मेरे सिर पर लगातार जाते उनके काँपते हाथों के बीच कभी मुझे बहुत जिम्मेदारी का अहसास होता तो कभी यूँ लगता कि मैं एक बहुत छोटा बच्चा हूँ, जिसे पापा के ऐसे ही स्पर्श की जरूरत है।
आखिरकार मैं अपने टूटे-फूटे अतीत को जैसे-तैसे गठरी में समेटे नैनीताल पहुँच ही गया। झील के ठीक सामने वाली होटल थी, इंटरनेट पर बुक की थी, इसलिए ज्यादा कुछ पता नहीं था, लेकिन लोकेशन पसंद आ गई, वेल बिगिन इज हाफ डन....। सामान रखा और पूरी दीवार पर पड़े उन भारी पर्दों को हटाया तो जैसे सुबह नैनी झील में मुस्कुरा रही थी, तबीयत खुश हो गई। कहीं नहीं जाना है..... कुछ दिन यहीं खिड़की के सामने कुर्सी लगाकर झील और उसके उस तरफ के पहाड़ों को निहारते ही निकल जाएँगें।

दोपहर खाना खाया और सो गया। सोकर उठा तो रूम सर्विस को चाय के लिए ऑर्डर दिया.... और खिड़कीसे पर्दे हटा दिए... शाम खिलखिलाती हुई-सी कमरे में आ घुसी। मुझे ये बिल्कुल जादू सा लगा.... फिर से पर्दे खींच दिए तो जैसे कमरे में रात घिर आई हो... फिर हटाए तो शाम झिलमिलाई, एकाएक मुझे खुद पर ही हँसी आ गई। कहाँ तो यहाँ आने के मैंने बहुत भारी-भरकम कारण अपने सामने रखे थे और कहाँ ये बचपना.... फिर से स्मिता याद आई- ग़म हो के ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं, फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है ना रोना है...तो क्या मैं रास्ते पर आ खड़ा हुआ हूँ? ख़ुशी चुक गई है? फिर सवाल सरसराया.... मैं आखिर यहाँ आया क्यों हूँ? खुद को कुरेदने.... नहीं.... बस, बहुत हो गया। मैंने पूरी ताकत से पर्दों को खींच दिया.... सर्रर्र की आवाज हुई और शाम अपने खुशनुमा रंग के साथ पूरे कमरे में आ पसरी। धीरे-धीरे झील के आसपास चहल-पहल बढ़ने लगी। झील में भी लोग बोटिंग कर रहे थे। सड़क पर लोग घुमते-टहलते नजर आ रहे थे। खूब हल्का-हल्का लग रहा था।


डिनर के लिए मैं लाउंज में ही आ गया था। सोच लिया था डिनर करने के बाद, जब सारी दुकानें बंद हो जाएगी तो झील के किनारे बैठूगाँ। अपनी प्लेट लेकर मैंने एक छोटी टेबल का रूख किया..... सामने बैठी लड़की को देखकर मैं अटक गया... यूँ बहुत आकर्षक तो नहीं है, फिर..... मैं खुद से उलझा.... अरे इसे तो कहीं देखा है। राइट ये तो सुचेता है। कुल तीन ही महीने तो साथ रही थी, फिर गुल हो गई थी। करूणा ने ही बताया था कि उसके भाई की डेथ हो गई है.... फिर वो लौटकर नहीं आई। कुछ भी पता नहीं चला कि वो कहाँ चली गईं। उन दिनों सबको अपने-अपने सपनों को पूरा करने का जुनून था, कौन किसकी खबर लेता। यूँ भी वो तीन महीने ही हमारे साथ पढ़ी, उसमें भी वो बहुत कम बोलती थी, बस एक ही बार सेक्स एज्यूकेशन के मामले पर इतना बोल्ड स्टेटमेंट दिया था कि सारे लड़के-लड़कियाँ हक्के-बक्के होकर एक-दूसरे को देखने लगे थे। फिर बहुत दिनों तक उसके जाने के बाद भी उसका स्टेटमेंट तमाम तनावों और दबावों के बीच भी हँसी की लहर ला देता था। उसे याद कर मैं थोड़ा असहज हो गया था। लेकिन उस बात से ही सुचेता मुझे याद रह गई थी, बस.... नहीं तो उसमें याद रहने जैसा कुछ था नहीं।
थोड़ी देर असमंजस में रहा.... खाना खत्म कर चुका था, सोचा जाऊँ, फिर सोचा पता नहीं पहचानेगी भी या नहीं! उन लोगों का भी खाना खत्म हो चुका था, वो अपने साथ बैठे लोगों के साथ ही उठकर बाहर चली गई। मैं भी डायनिंग हाल से बाहर आ गया। वेटिंग लाउंज में जाकर बैठ गया, एक चांस लिया.... यदि वो लौटकर आएगी तो फिर मैं उससे बात करूँगा, यदि चली गई तो फिर तो कोई बात ही नहीं है। ऐसा होता है... और हुआ... वो अपने साथियों को बाहर छोड़कर लौट आई... लिफ्ट की तरफ बढ़ रही थी कि मैं उसके सामने जा पहुँचा।
हाय.... पहचाना.... ? – मैंने पूछा
हाँ... सूरत तो पहचानी लग रही है, बट सॉरी.....- उसने कंधे उचकाते हुए वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
मैं गौतम त्रिपाठी... सक्सेस में हम साथ थे...
अरे हाँ... राइट.... गौतम, हाऊ आर यू? ऑन हनीमून? – उसने फिर से उतनी ही बेबाकी से पूछा। मैं फिर से सकुचा गया, इस लड़की की बोल्डनेस समय के साथ और शार्प हो गई है, इतने लंबे अर्से के बाद मिली फिर भी उसके तेवर उतने ही तीखे हैं।
नहीं.... जस्ट फार चेंज....। – कहा। उठा तो मेरे अंदर भी.... कि पूछूँ, ऑन...?. लेकिन मध्यमवर्गीय पारंपरिक संस्कारों ने मुझे अटका दिया। फिर भी मैंने पूछा – और तुम....?
मैं.... मैं यहाँ एक कांफ्रेंस में आई थी। फिर सोचा आई ही हूँ तो थोड़ा बहुत घुम भी लूँ। सो... उसने फिर से कंधे उचका दिए।
उसके हाव-भाव और कपड़ों से यूँ लगा कि वो किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करती हो। मैं सोच रहा था कि मैं उससे कैसे पूछूँ कि मेरे साथ घुमने चलोगी, तभी उसने पूछ लिया, सोने जा रहे हो....?
मैं फिर से थोड़ा हड़बड़ाया – नहीं सोच रहा था, थोड़ा झील के किनारे टहलूँगा, यू गो अहेड।
गुड मैं भी कुछ ऐसा ही सोच रही थी... मे आई....।
हाँ क्यों नहीं....।

मॉल रोड की सारी दुकानें बंद हो चली थी। सड़क के दोनों ओर विंडशीटर और लोअर-टीशर्ट के बड़े-बड़े पुट्टल खोले लड़के आ जमा हुए थे। दिन भर के थके हारे टूरिस्ट अपने-अपने डेस्टिनेशन की तरफ जा रहे थे। मौसम थोड़ा सर्द हो चला था। दुकानों के बंद होने से रोशनी भी कम हो गई थी। हम दोनों ही सड़क पर उतर आए थे। शाम की तुलना में रात में चहल-पहल थोड़ी कम और सर्दी थोड़ी ज्यादा हो गई थीं। जींस और फुल स्लीव्ज के टी-शर्ट पर उसने जैकेट पहन रखा था, और एकबारगी वो मुझे कुछ अजनबी लगी। यूँ तब भी मैंने उससे तीन या चार बार ही बातचीत की थी, लेकिन यहाँ पता नहीं मैं किस मनस्थिति में था कि उसके सामने जा खड़ा हुआ।
तुम किस चीज की कांफ्रेंस में आई थी?- मैंने पूछा
मैंनेजमेंट रिलेटेड...एक्चुली मैं एक एमएनसी के लिए काम कर रही हूँ। ये उसी का आयोजन था। इसलिए मेरा यहाँ होना जरूरी था। फिर सोचा एक्सपोजर का भी मौका था। आज शाम को ही मैंने अपना सारा पैंडिग वर्क निबटाया और यहाँ आ गई। - उसने कहा।
मतलब.... ?
मतलब.... रामपुर के होटल में कार्यक्रम था। तुम सुनाओ, तुम क्या कर रहे हो आजकल.... ? – आखिरकार उसने पूछा, मैं पता नहीं कब से इस सवाल का इंतजार कर रहा था।
मेरा आईपीएस में सिलेक्शन हो गया है.... अभी पोस्टिंग का इंतजार कर रहा हूँ। - बहुत कोशिश करके भी मैं अपनी जनरोसिटी का वाल्यूम वैसा नहीं रख पाया, जैसा मैं चाहता था।
ग्रेट.... वो खुशी से चीख ही दी थी.... पार्टी...- मुझे फिर अजीब लगा कि हम एक दूसरे को बहुत अच्छे से नहीं जानते हैं, लेकिन सुचेता कितनी सहजता से मेरे साथ है, मैं कहीं सहज नहीं हो पा रहा हूँ, लाख कोशिश करने के बाद भी..... कहीं.... मैंने कहा – एनी टाइम... कल लंच या फिर डिनर जो चाहो....।
अरे.... कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक... आज.... चलो फिलहाल तो वो रिक्शा स्टैंड पर कॉफी मिलती है, ना, यदि वो होगा तो कॉफी... पी तुमने..... गुड कॉफी। - उसने अपनी आँखें घुमाते हुए यूँ कहा जैसे वो अभी भी पी रही है।

दोनों कॉफी के कप हाथ में लेकर भूटिया मार्केट की तरफ बढ़ गए। मार्केट बंद हो गया था। झील के किनारे लगी बेंच पर जाकर वो बैठ गई। थक गए यार...। वो सवाल बहुत देर से मेरे अंदर कुलबुला रहा था। आखिरकार मैंने पूछ ही लिया – तुमने सिविल सर्विसेज की तैयारी क्यों छोड़ दी? – पता नहीं मैं क्या सुनना चाहता था।
यू नो उस दौरान मेरे जीवन में एक एक्सीडेंट हुआ था। मेरे भाई की डेथ हो गई थी। ही वाज डीएसपी और डेड इन कम्युनल राइट्स...- कहते कहते उदासी झील की सतह की तरह फैल गई थी।
हाँ, करूणा ने बताया था।
दैट एक्सीजडेंट वाज टर्निंग पाईंट ऑफ माय लाइफ। यू नो, हम उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे। मेरी दोस्त थी रोशनी, ही चोज हर टू मैरी, एंड वी आर वेरी हैप्पी विथ हिज डिसीजन। बट.... – उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। मैं सामने फैली कालिख में से झील ढूँढ निकालने की बेकार कवायद करने लगा। बात बहुत फैल गई थी, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें मेरा सवाल कहाँ गुम हो गया है। कभी-कभी हम बहुत संवेदनशील होते हुए भी बहुत निस्संग हो जाते हैं, जब हम खुद को देख पाते हैं तो सोचते हैं कि क्या हम ऐसे हो सकते हैं.... लेकिन हो जाते हैं। मुझे अपने अंदर के जमाव का अहसास हुआ।
तब मैं बहुत दिनों तक सो नहीं पाई.... मैंने खुद से बहुत सारे सवाल पूछे। क्योंकि मैं किसी और से पूछ नहीं सकती थीं। माँ उन्हें समझ नहीं सकती थीं और पापा.... पापा समझते तो, लेकिन चौंकते और हो सकता है, कहीं वो अपनी परवरिश को ही दोष दे डालते, इसलिए मैंने किसी से नहीं पूछा, वो सवाल.... खुद को ही कुरेदा और जवाब पाया। - वो कहते-कहते गुम हो चुकी थी।
बहुत देर तक हम दोनों ही चुप रहे। मेरी कॉफी खत्म हो चुकी थी, शायद उसकी ठंडी.... डस्टबीन में कप फेंक कर वो खड़ी हो गई। ऐसे जैसे वो कहीं और हो और ये शरीर कोई ओर.... मैं भी खड़ा होकर उसके साथ-साथ चलने लगा। ठंड और तीखी हो गई थी। थोड़ा चलने के बाद चिनार के पेड़ के नीचे लगी बेंच तक हम आए और वहाँ बैठ गए। तब तक वो थोड़ी स्वस्थ हो गई थी।
क्या होता है कि व्यवस्था को दो तरह के लोग ही जिंदा रखते हैं एक वो जो उसका शोषण कर सके और दूसरे वो जिसका व्यवस्था शोषण कर सके। -उसने बहुत स्थिरता से अपनी बात शुरू की। - अब शोषण करने के लिए स्वार्थी होने की जरूरत है और शोषित लोग अक्सर मध्यमवर्गीय भावुकता से संचालित होने वाले लोग होते हैं। नहीं तो सेना और पुलिस में हमें मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे नहीं मिलते..... । यदि आप स्वार्थी हैं तो आप ये जानते हैं कि कहाँ से क्या पाया जा सकता है, लेकिन यदि आप भावुक हैं तो फिर स्वार्थी लोग जानते हैं कि आपका कैसे शोषण किया जा सकता है। ये हर जगह की कहानी है। इफ यू रेड दैट थ्योरी ऑफ एलिट क्लास.... दोनों ही तरह के समूह में उत्तराधिकार चलता है। शोषक तो अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते हैं, और जो शोषित होते हैं, उनके लिए विकल्प ही नहीं होते हैं....।
लेकिन व्यवस्था से छुटकारा नहीं है.... – मैंने कहा।
हाँ, ये सही है, लेकिन बिना इमोशनल अटैचमेंट के काम किया जाना सबसे ज्यादा निरापद है। क्योंकि रोजगार का मामला तो गिव एंड टेक है ना....। फिर इसमें जान क्यों दी जाए, जबकि हमें जान दिए जाने की कीमत तक नहीं मिले। - उसने बहुत तीखी बात कहीं थी। - मैंने तय कर लिया था कि बिना किसी गिल्ट के मैं विशुद्ध रोजगार करूँगी। काम करूँगी, पैसा लूँगी, बस.... न इससे कम, न इससे ज्यादा। जब तक काम करूँगी 100 परसेंट दूँगी, जब काम छोड़ा सब खत्म.... क्योंकि यहाँ आपकी भावनाओं की जरूरत ही नहीं है, लेकिन इफ आई एम इन एडमिनिस्ट्रेशन दैन आई हैव टू इंवेस्ट इमोशंस ......यदि मैं ऐसा नहीं कर पाती तो गिल्ट होता.... क्यों मैं खुद को इतनी सारी परेशानियों में डालूँ....? मैं जानती हूँ कि मैं यहाँ भावुकता के तहत नहीं हूँ। इट इज माय कांशस डिसीजन....। मैं व्यवस्था के लिए मरने को तैयार नहीं हूँ। इट्स ए काइंड ऑफ प्रोफेशनलिज्म.... आप पैसे देते हैं, हम काम करते हैं, दैट्स इट..... नो भावुकता एट ऑल....। - उसने बहुत स्पष्ट होकर अपनी बात रखी।
मेरे पापा चाहते थे, मैं भी सिविल सर्विसेज में जाऊँ, भाई की डेथ से पहले मैं भी यही सोचती थी.... लेकिन उस सबने मुझे बड़ी उलझन में खड़ा कर दिया था, बहुत सारे सवाल थे.... और जवाब कोई नहीं दे सकता था। जब मैं जवाब तक पहुँची तो खुद मैं भी चौंकी थी..... लेकिन मुझे लगा कि मुझे रास्ता मिल गया है और मैंने अपना डिसीजन बदल डाला..... फादर हर्टेड विथ माय डिसीजन, बट.... इट्स.... - फिर से आँसू आँखों की कोरों तक आ पहुँचे। इस बीच बादल गरजने लगे थे।
मैं अपने काम और योग्यता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं देना चाहती थी.... भावना तो बिल्कुल भी नहीं। मार्क्स ने तो सिर्फ धर्म को अफीम कहा, मुझे तो सारी व्यवस्थाएँ अफीम लगती है। जितने खाँचों में हम बँटते हैं, वे सब अफीम का-सा नशा देते हैं। देखो न देश, जाति, धर्म तो है ही, राज्य और कभी-कभी सामूहिक पहचान तक के लिए जान ली और दी जाती है, युद्ध, धार्मिक उन्माद, जातिगत दंगे, राज्यों के बीच उपद्रव और हाँ ऑनर कीलिंग.... ये क्या है, नशे का ही तो एक रूप है, इतना बड़ा नशा कि हम जान ले भी सकते हैं और दे भी.... इससे मिलेगा क्या, व्यक्तिगत तौर पर तो कुछ नहीं, हाँ व्यवस्था का ही कुछ भला हो तो हो...? व्यवस्था का अस्तित्व जीवन को आसान बनाने के लिए है, लेकिन अब ये ही हमें खत्म करने पर तुली हुई है। आखिर भाई की मौत का नुकसान किसको हुआ? सिस्टम को तो कोई दूसरा मिल जाएगा। - वो फिर चुप हो गई। हवा चलने लगी थी, बिजली के कड़कने ने हमें चौकन्ना कर दिया था।
डोंट गेट मी राँग, इट्स माय पाइंट.... हो सकता है, तुम्हारा पाइंट कुछ और हो...., आय थिंक यू हर्ड व्हाट दुष्यंत कुमार सेड फॉर एक्सप्लायटेड पीपल कि –
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
आय एम नॉट रेडी फार दिस...। – उसने बात खत्म कर दी और चुप हो गई... बड़ी-बड़ी बूँदें, बौछारों के रूप लेने लगी थी। हम होटल की तरफ दौड़े..... मेरे अंदर आग लगी हुई थी।

कहानी का मॉरल
सूत्र – 92 – व्यवस्था का अस्तित्व स्वार्थ और भावना जैसी दो विपरीत प्रवृत्तियों पर टिका है।