Tuesday, 19 April 2011

भरीपूरी प्यास....! - 7

और... और यही वो दिन थे, जब तुमने कहा था कि – अब हमें इस खूबसूरत सपने को अपनी यादों में जिंदा रखना है।
मैंने चौंक कर पूछा था – क्या मतलब है इस बात का? – उस वक्त मेरा प्लेसमेंट हो चुका था, मुझे दो महीने बाद सिंगापुर जाना था औऱ मैं तुमसे शादी करके तुम्हारे साथ जाना चाहता था, मैं तुम्हें ये बता भी चुका था, लेकिन तुम... तुम्हारे अंदर पता नहीं क्या चल रहा था?
मतलब... बिल्कुल साफ है... प्यार रात का सपना है, यदि उसे शादी में कंवर्ट कर दो तो वो टूट जाएगा। न वो बचेगा न उसकी खुशनुमा यादें... हम शादी में कंवर्ट करके उसे सड़ा नहीं सकते हैं। - तुमने कहा था।
मतलब तुम मुझसे शादी नहीं करना चाहती हो? – मैं तिलमिला गया था।
नहीं... – तुमने कहा था, आँखों में आँसू उतर आए थे, तुम्हारी, फिर भी तुम दृढ़ थीं।
मैंने एक तरह से तुम्हारी चिरौरी की थी, - मैं तुम्हारे पापा से बात कर लूँगा ना... हैव फेथ ऑन मी।
नहीं... मैं तुमसे शादी करना ही नहीं चाहती... – तुमने बहुत संयत होकर कहा था
मुझ पर पागलपन सवार होने लगा था। - क्यों – मैं लगभग चीखने लगा था - तुम मुझे क्या समझती हो? क्या मैं खिलौना हूँ, जब तक तुम्हें मेरा साथ अच्छा लगा मेरे साथ रही, फिर एकाएक एक दिन कह देती हो कि अब बस...। मैडम ये फैसला तुम अकेली नहीं ले सकती हो...।
तुम बहुत संयत होकर सुनते रही। कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, मैं बहुत देर तक चीखता रहा और फिर थककर चुप हो गया। तुम्हें पता है, वो शायद पहली और आखिरी बार हुआ है कि मुझे तुम्हारे कपड़ों का रंग याद नहीं है।
थोड़ी देर बाद तुम खड़ी हो गई... मैं अपना सिर पकड़कर तुम्हारे सामने बैठा था, मुझे नहीं पता चला कि तुम खड़ी हो गई हो, तुमने कहा – तो ठीक है, शादी का फैसला भी तुम अकेले नहीं ले सकते हो..., मैं नहीं करना चाहती हूँ, अब बोलो तुम क्या करने वाले हो?
मैं अवाक था... और अब मजबूर भी... लेकिन क्यों? आई प्रॉमिस मैं कुछ भी नहीं सड़ने दूँगा, कुछ भी नहीं टूटने दूँगा। भरोसा तो रखो...
नहीं...- फिर तुमने सीधे मेरी आँखों में झाँका और कहा – तुम चाहो तो मुझे भोग सकते हो...
मेरे बदन में आग लग गई। चेहरा लाल हो गया और कान तपने लगे, मैं झटके से खड़ा हुआ और तुम्हें जोर से धक्का दिया और तेजी से वहाँ से चला गया। फिर कभी मैंने पलट कर तुम्हें नहीं देखा न ही तुम्हारे बारे में जानना चाहा और न ही सुनना...।
क्रमश: