Tuesday, 19 April 2011

भरीपूरी प्यास...! - 8

करीब साल भर बाद तुम्हारा एक लेटर मिला था, जिसमें तुमने अपना पक्ष रखा था और कहा था कि – ‘हमने रिश्ते को शिद्दत से जिया है और हम अब इसे एक मीठी कसक और मधुर याद के साथ अपने साथ रखें। बस इतना ही मैंने चाहा था, यदि ये गलत है तो फिर मुझे माफ कर देना, क्योंकि मुझे यही सही लगा था।‘
मेरे लिए तुम्हारे इस पत्र का कोई औचित्य ही नहीं बचा था, तुम मुझे अकेला छोड़कर चली गईं थी, अपनी जिद्द और कथित सपनों के लिए। बहुत साल मुझे तुमसे शिकायत रही, लेकिन उसका फायदा क्या रहा, तुम्हारे बारे में बाद में मुझे कभी कुछ भी सुनने को नहीं मिला। बल्कि यूँ कहूँ कि हकीकत ये है कि मैंने ही तुम्हारे बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। मैंने वो शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया और फिर कभी-कभी पलट कर वहाँ नहीं गया। बल्कि मैंने हर उस शख़्स से अपना रिश्ता तोड़ दिया, जो कभी तुमसे जुड़ा हुआ था। आज मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ, क्योंकि मैं स्थिर हो गया हूँ, अब तुम मुझे जब भी याद आती हो, बहुत मीठा-सा कुछ लगने लगता है। शायद उम्र ने सारी कड़वाहट धो डाली है। सुनो लूनी गज़ल चल रही है – तुम भी उस वक्त याद आते हो, जब कोई दूसरा नहीं होता...। अब तो यूँ भी सब कुछ ठहर गया है, शायद इसलिए यादों की जुगाली ही बाकी रह जाती है, भविष्य में कुछ होता नहीं और वर्तमान पूरी तरह से ठहरा हुआ है...। कभी-कभी मैं भी तुम-सा हो जाता हूँ, सच अब भी...। उम्र के फासलों के इस पार फिर मैं वही मैं हो जाता हूँ और तुम वही तुम...। सारा गुजरा वक्त कहीं गुम हो जाता है, मेरी दुनिया जो दिखाई देती है, वो भी कहीं अदृश्य हो जाती है, तुम्हारी दुनिया का तो मुझे कोई पता ही नहीं है तो वो तो कोई मसला ही नहीं है, तुम वैसी ही बेलौस, बिंदास और खुली हुई-सी मेरे साथ होती हो, जैसी हुआ करती थी। मेरा दिमाग कहता है कि तुम सही थी, क्योंकि तुमने वो देखा था, जिसे मैं नहीं देख पाया। तुम्हें मैं किसी भी तरह याद कर सकता हूँ, जी सकता हूँ, साथ हो सकता हूँ। साथ होती तो शायद ये संभव नहीं हो पाता..., लेकिन दिल नहीं मानता है। वो कहता है तुमने अपनी जिद्द को जिंदा रखने के लिए मेरे साथ खिलवाड़ किया है, पता नहीं कौन सही है?
क्रमशः