Saturday, 2 April 2011

अहसास के आगे... अंतिम भाग

मौसा का हमारे ही शहर में ट्रांसफर हुआ था और माँ अपनी बहन को अपने ही करीब घर दिलाने के लिए कटिबद्ध...। इत्तफाक कुछ ऐसा हुआ कि पास ही का मकान खाली हुआ और मौसी-मौसा हमारे पड़ोसी हुए। चेतना मेरी मौसेरी बहन और हमउम्र... लेकिन स्वभाव में जमीन-आसमान का फर्क। मैं पढ़ाकू और वो खिलंदड़... फिर भी दोनों के बीच का रिश्ता गाढ़ा होने लगा। उसी की सहेली थी आद्या...। रंग थोड़ा दबा हुआ था, नाक थोड़ी बैठी हुई, बाकी चेहरा-मोहरा बुरा नहीं कहा जा सकता, लेकिन उसका एक पैर थोड़ा छोटा था, इसलिए वो थोड़ी-सी लचक कर चलती थी। चेतना के साथ-साथ उसके साथ भी अच्छी दोस्ती हो गई। हम घंटों बातें करते, फिल्में देखने जाते, कभी चेतना को या आद्या को पढ़ाई में कोई दिक्कत होती तो मैं मदद करता। मैं महसूस तो करता था कि आद्या मेरे साथ कुछ अतिरिक्त रूप से सजग और नर्म है, और सच पूछो तो मुझे अच्छा भी लगता था। जब इतना आद्या की तरफ से था तो जाहिर है थोड़ा सॉफ्ट कॉर्नर तो मेरे मन में भी था। लेकिन मुझे नहीं पता कब आद्या ने इसे मेरी पसंदगी या शायद फिर प्यार समझ लिया।
ये मेरी आदत थी कि चेतना के कमरे में घुसने से पहले उसे आवाज लगाता था। उस दिन जब मैंने उसे आवाज लगाई तो उसने कहा एक मिनट... फिर मुझे कमरे में बुलाया। पता नहीं उस दिन कैसे बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई और चेतना ने मुझसे पूछ लिया कि – तुझे आद्या कैसी लगती है?
अच्छी लड़की है। जैसी और लड़कियाँ होती है, लेकिन तू क्यों पूछ रही है?
नहीं, आपको पसंद है? – उसने सीधे ही मुझसे पूछा।
पसंद मतलब... – मैं समझ तो रहा था, लेकिन चाहता था कि वो सीधे ही पूछे, ताकि गफलत का कोई स्कोप न हो।
पसंद मतलब... आप उससे शादी करना चाहेंगे? – ये इतना सीधा था कि मैं तैश में आ गया।
तू पागल हुई है क्या? यदि वो दुनिया की आखिरी लड़की हो तब भी नहीं... – और मैं भड़भड़ाकर बाहर निकल आया। जब मैं अपने घर के मेन गेट से अंदर की तरफ घुसा तो चेतना के घर से तेजी से निकलता आद्या दिखी और उसके पीछे-पीछे चेतना भागती हुई। मैं अमरूद के पेड़ की आड़ में हो लिया, लेकिन एक थरथराहट मुझे महसूस हुई। आद्या ने मेरी बात सुन ली थी। उसके बाद लगभग साल भर मेरी और चेतना के बीच कोई बात नहीं हुई। आद्या को तो मैंने उस घटना के बाद आज देखा। जब मैं रियो के लिए निकल रहा था, तब चेतना ने अपनी चुप्पी तोड़ी थी। मेरी शादी में फिर चेतना से मुलाकात हुई थी, लेकिन तब भी आद्या के बारे में न उसने कुछ बताया और मेरे पूछने का तो सवाल ही कहाँ उठता है। और आज जब आद्या मिली है तो मैं थोड़ा-सा असहज महसूस कर रहा हूँ। शायद वो भी कर रही हो...!
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रात को दुल्हा-दुल्हन तो लगे थे फेरे लेने में और घराती-बाराती सोने की तैयारी कर रहे थे, हरेक अपने लिए कोने तलाशने में लगा था। मैंने देखा कि आद्या धीरे से उठी और नजरें बचाकर हॉल से बाहर चली गई। मैंने खुद को टटोला, मैं उससे बहुत सारी बातें करना चाहता हूँ, लेकिन क्या वो मेरा साथ पसंद करेगी? मैंने चांस लिया और मैं भी बाहर आ गया। बाहर टेंट वाले अपना सामान निकाल रहे थे इसलिए शाम की चकमक पता नहीं कहाँ गुल थी। वो स्टेज के पास आधे अँधेरे में चुपचाप बैठी हुई थी। मैं थोड़ा हिचका, फिर साहस बटोर कर उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।
होप आय एम नॉट डिस्टर्बिंग यू
अरे नहीं, प्लीज... बैठिए - उसने सामने की कुर्सी पर इशारा कर कहा। मैंने राहत महसूस की।
यहीं रहती हो...? - मैंने बातचीत शुरू करने की गरज से पूछा।
नहीं, फिलहाल तो एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में छत्तीसगढ़ में रह रही हूँ।
प्रोजेक्ट... ?
हाँ, एक एनजीओ है, उसका प्रोजेक्ट है। छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाके में हेल्थ और एज्युकेशन के लिए काम करते हैं। उसी के साथ मैं भी काम करती हूँ।
मींस सोशल वर्क...?
नॉट एक्जेक्टली... असल में मैं इस प्रोजेक्ट से इसलिए जुड़ी हूँ कि मैं इस समस्या की ग्राउंड रियलिटी को जानना चाहती हूँ। मैं एक नॉवेल लिखना चाह रही हूँ, इस पर...।
नॉवेल... ! – मैं चौंका था।
हाँ, इससे पहले मैंने जो भी काम किया, इज वॉज आल ए टेबल वर्क... तो इस बार मैंने सोचा कि थोड़ा फील्ड में जाकर भी देखा जाए। बस...। – वो अपनी ही रौ में बोल रही थी।
मतलब पहले भी तुमने लिखा है?
हाँ, दो कहानी-संग्रह हैं और एक नॉवेल हैं।
तुम पहले भी लिखती थीं, मुझे ऐसा याद नहीं पड़ता।
नहीं, लिख तो मैं बहुत पहले ही से रही हूँ, हाँ उन दिनों अपने लिखे को छपने के काबिल नहीं मान पायी थी। होता क्या था कि उन दिनों अपनी उबलन को बस कागज पर उतार देती थी, वैसी ही जैसी वो अंदर होती थी, वैसी ही बाहर भी, वही शब्द, उन्हीं भावनाओं को, ठीक उसी रूप में जिस रूप में जिया। ये तो बहुत बाद में पता चला कि हर जगह पॉलिशिंग की जरूरत होती है। - मैंने पाया कि वो थोड़ी कसैली हो गई। - तो पॉलिशिंग को आजमाया, और हो गई लेखक...। लोगों ने पढ़ा, पसंद किया, बस...। – उसने दोनों हाथों को हवा में लहराया और फिर छोड़ दिया।
फिर ये किसने बताया कि किस तरह पॉलिशिंग की जानी चाहिए? - मुझे उत्सुकता थोड़ी ज्यादा होने लगी और मैं इसे किसी भी तरह से दबा नहीं पा रहा था।
बहुत सालों तक लावा अंदर ही अंदर उबलता रहता है, फिर एक दिन ज्वालामुखी कैसे फटता है, बस वैसे ही...। मैंने कही पढ़ा था कि खुद पर मोहित होकर सृजन नहीं किया जा सकता है। सृजन की प्रक्रिया में थोड़ा बहुत दर्द तो होता ही है। बिना दर्द, अभाव, उद्वेलन या फिर कमी के अहसास के कुछ भी कैसे रचा जा सकता है? – मैं उसके कहने के अंदाज पर इतना मोहित हो गया कि कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे पाया, बस उसे देखता ही रह गया, तभी तो शायद उसे लगा कि मैं उसकी बात समझ नहीं पाया। वो थोड़ा रूकी, उसके चेहरे पर निराशा का भाव उभरा और फिर चमक निखर आई। कहा – इसे यूँ समझो... यदि मुझे भूख ही नहीं होगी तो फिर मैं खाने के बारे में सोचने तक का कष्ट नहीं करूँगी। आंतरिक भूख से ही सृजन संभव है। किसी कमी से उबरने, किसी अभाव को भरने का नाम ही रचना है, बस इतना ही...।
वो एकदम चुप हो गई...
तो तुम्हें कभी अपने अभाव के भरने, अपनी कमी से उबर पाने का अहसास होता है। - मुझे उससे बात करने में मजा आने लगा था।
मैंने कभी इस दिशा में सोचा ही नहीं। बस लगातार अपने अंदर एक माँग को, एक प्यास, एक आग को महसूस करती हूँ। कुछ करने पर उसके मंद होने, कम होने का अहसास होता है, थोड़े दिन ‘अंतर’ ऐसे ही शांत बना रहता है, फिर से वही सब कुछ भड़ककर आने लगता है। हो सकता है, ये सब कुछ ऐसा नहीं हो जैसा मैंने मान लिया है। उससे अलग भी हो सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि मेरे अंदर कहीं दबे हुए कोई अभाव, कोई कमी... – वो थोड़ा रूकी, थोड़ी हिचकी, कोई असमंजस उसके चेहरे पर उभरा और फिर एक निश्चय-सा उतर आया, फिर बोली – किसी अपमान का प्रतिकार हो मेरी ये आग, प्यास....।
तुमने मुझे माफ कर दिया या नहीं...- बहुत साहस की जरूरत थी, ये पूछने में, लेकिन पता नहीं कैसे बहुत तात्कालिक ढँग से मैंने इसे पूछ लिया।
नहीं... मुझे लगता है कि एक उसी घटना ने मुझे संबल दिया है। तुमसे मिला अपमान ही मेरे वजूद का सहारा है, तुम्हें माफ करके मैं खुद को खो दूँगी। - उसने बिना किसी रोष और भावुकता के बहुत संतुलन और दृढ़ता से मुझे खारिज कर दिया।
मेरे पास अब न कोई सवाल था और न ही कोई जिज्ञासा.... वो सामने देख रही थी, जहाँ से दूल्हा-दूल्हन के साथ परिवार के लोग आ रहे थे।
मुझे उसकी तरफ देखने का अवकाश-सा मिला। उसकी आँखें खूब शांत थी, जैसे खूब बरस कर बादल शांत हो जाते हैं। मैं उसके चेहरे पर उभरी तृप्ति के राज तक पहुँच पाया... ऐसा मुझे लगा। मैं खाली हो गया... या फिर शायद खाली ही था....। इस विचार ने मुझे बेचैन कर दिया।
कहानी का मॉरल – सूत्र 68
दुनिया का सारा सृजन या तो खुद से भागने की या खुद की कमी से उबरने की प्रक्रिया का परिणाम है।