Monday, 6 September 2010

दुख-सुख

पता है चाँद मेरे साथ-साथ चल रहा है।
लेकिन वो तो मुझसे बात कर रहा है।
ऐसा कैसे हो सकता है... वो मेरी आँखों के सामने है
वो मेरे सामने हैं और मैं उससे इश्क लड़ा रहा हूँ।
लेकिन वो तो मेरे साथ है।
नहीं, वो मेरे साथ है।
लेकिन, ऐसा कैसे हो सकता है? मैं उससे बातें कर रही हूँ।
अरे, मैं तुम्हारी बात कैसे मान लूँ, जबकि मैं तो उसे प्यार कर रहा हूँ।
रोली काँपी... ठीक वैसे ही जैसे किसी ने उसे छुआ हो....।

क्या हुआ....?
कुछ नहीं।
ऊँ हूँ.... कुछ तो हुआ है।
नहीं कुछ नहीं....
कुछ कैसे नहीं, तुम वैसी साउंड नहीं कर रही हो... सच बोलो कुछ हुआ क्या?
कहा ना, कुछ नहीं। चलो छोड़ो... खाना खाया।
खाना...!!! चाँद के बीच खाना कहाँ से आया? तुम बड़ी बोर हो...। लगता है सोशल एक्टिविस्टों के साथ रहने लगी हो, उन लोगों को चाँद में महबूबा का चेहरा नहीं रोटी नजर आती है। यार एक ही रात में कितनी बदल गई हो...?
हाँ होते तो दोनों ही गोल ही है ना... फिर चाँद तो गरीब के लिए रोटी की तरह ही है ना... जब उनकी जिंदगियों में अँधेरा होता है तो रोटी की तरह वो भी छोटा और दूर होता चला जाता है और अँधेरा और गहरा होने लगता है।

ट्रेन अपनी गति से चल रही थी। सारे मुसाफिर सो रहे थे और रोली चैट कर रही थी। खिड़की से बहुत देर से ठंडी हवा आ रह थी, उसे महसूस भी हो रही थी, लेकिन चैट करने में ऐसी मशगूल थी कि खिड़की बंद करने का ध्यान ही नहीं रहा। जब हल्की-हल्की फुहारें अंदर आने लगी तब उसे मजबूरन खिड़की बंद करनी पड़ी।

चलो, अब तुम सो जाओ.... सुबह जल्दी उठना है तुम्हें। गुड नाइट.... किस्सी.... बाय।
ओके....। – बिहाग ने कहा।

रोली ने चैट साइन-आउट किया और उठी, एक बार फिर से पूरे कंपार्टमेंट में जहाँ-जहाँ स्टूडेंट सो रहे थे, वहाँ का एक चक्कर लगाकर आई, फिर इत्मिनान से सो गई। सुबह सबसे पहले कल्पना ने आकर जगाया, मैडम चाय।
थैंक्स कल्पना, कब जागी... .?
बस 10-15 मिनट हुए होंगे।
सब जाग गए.?
जी मैम... सबने अपना सामान पैक कर लिया है। बस स्टेशन आने ही वाला है। - कहकर उसने रोली की शॉल घड़ी करने के लिए उठाई।
अरे... मैं कर लूँगी। - रोली ने उसके हाथ से शॉल ले ली।
रोली फ्रेश होकर लौटी और पर्स के कंघी निकाल कर अपने बालों को ब्रश किया। दुपट्टा ठीक किया और स्लीपर को बैग में रखा। ट्रेन की गति धीमी हो गई थी। डेविड सर ने आकर गुड मॉर्निंग किया औऱ सामान दरवाजे पर पहुँचाने लगे। रोली ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने कहा आप छोटा सामान ले लें। सारे स्टूडेंट्स का सामान दरवाजे तक पहुँच गया था। स्टेशन पर सबका सामान आराम से उतार लिया गया था। यहाँ तक बिना किसी परेशानी और विवाद के पहुँच जाने पर डेविड और रोली दोनों ने ही राहत की साँस ली।

सबको ठीक-ठाक रूम मिल गए थे। रोली के साथ साधना और शगुफ़्ता थीं। रोली ने पहले दोनों को तैयार होने के लिए कहा। वो जानती थीं कि लड़कियों को तैयार होने में समय लगेगा। जब वो नहा कर बाहर आई तब तक शगुफ़्ता ही तैयार नजर आ रही थी। रोली ने उससे कहा, जाकर देख आए, सारे लोग तैयार हो गए या नहीं। साधना कितनी देऱ लगती है तैयार होने में – रोली ने लाड़ से कहा, तो वो थोड़ा शरमा गईं।
मैडम बाल अभी तक सूखे नहीं हैं ना... मैं तो तैयार हूँ।
तो खुले ही छोड़ दे ना... कभी-कभी अच्छे लगते हैं। - रोली ने कहा। साधना के बाल लंबे और खूबसूरत है, लेकिन उसे कभी भी खुले बालों में नहीं देखा।
उसने एक बार फिर बालों में कंघी चलाई और रोली के सामने आकर खड़ी हो गईं – ठीक लगेगा मैम.... ?
अरे ठीक.... बहुत सुंदर लग रही हो। चलो अब मैं तैयार हो जाऊँ, यदि तुम लोगों को भूख लग रही हो तो नाश्त के लिए पहुँचो, मैं आती हूँ।
नहीं मैम, मैं रूकती हूँ ना, इतनी सुबह भूख नहीं लगती है।
यूथ फेस्टिवल के लिए यूनिवर्सिटी ने अच्छे इंतजाम किए हैं। नाश्ते के लिए जब रोली और साधना पंडाल में पहुँचे, तब तक वहाँ खासी भीड़ हो चुकी थी, रोली को समझ ही नहीं आया कि कहाँ से घुस कर नाश्ता लेकर आए...? तभी कल्पना आ गईं हाथ में दोसा की प्लेट लेकर... लीजिए मैम...।
रोली ने राहत की साँस ली – थैंक्स कल्पना, सो स्वीट।
थोड़े कोने में जगह देखकर रोली अपनी प्लेट लेकर चली गईं। इत्मीनान से टेबल-कुर्सी पर बैठकर वह नाश्ता कर रही थी।
हाय.... आय एम सरप्राइज्ड.... – सुनकर रोली ने गर्दन उठाई।
सुशील सामने खड़ा था.... सांभर का चम्मच बीच में ही अटक गया....। मन कहीं भटक गया और नजर कहीं ठहर गई.... साँस रूक गई।
तुम....?
तुम्हें यहाँ देखकर बहुत खुशी हुई रोली...।
लेकिन रोली कोई एक्सप्रेशन नहीं दे पाई... उसे लगा अभी रोना आ जाएगा। हमेशा की तरह फोन बजा... बिहाग का मुस्कुराता-सा फोटो उभरा और वह एक्सक्यूज मी कह कर एक झटके में बाहर आ गई।
फोन रिसीव किया तो वहीं चंचल आवाज- क्या कर रही हो स्वीटहार्ट?
नाश्ता कर रही थीं- पता नहीं कैसे आवाज का रूआंसापन बिहाग तक पहुँच गया था।
क्या हुआ.... साउंड नर्वस...- चिंतातुर होकर उसने पूछा था।
नथिंग... कहाँ हो? – रोली ने खुद को संभाल लिया था।
सुशील सामने ही बैठा था और बहुत गौर से रोली को टटोल रहा था। वो पुरानी रोली को ढूँढ रहा था, लेकिन उसे कहीं नजर नहीं आ रही थी।
अरे तुम्हारी तरह आलसी नहीं हूँ, ऑफिस पहुँच गया हूँ। अब ये मत पूछना नाश्ता हुआ या नहीं? अच्छे खासे मूड की बारह बजा देती हो, बीवियों की तरह...- उसने चिढ़ाया था – जबकि अभी बीवी तो हुई भी नहीं हो। चाँद की बातें कर रहे हो तो रोटी बीच में ले आती हो... बहुत बोर हो...।
रोली हँसी थी – पहले नहीं थी, अब हो गईं हूँ बहुत बोर – उसने सुशील की तरफ तीखी नजरों से देखा था। फिर पूछा – अप्पा आ गए?
अरे तुम भूल गई, अप्पा कल आने वाले हैं। देखना कहीं मुझे भी मत भूल जाना।
बिहाग, मजाक मत करो। मैं नाश्ता कर लूँ, तुम्हें फिर फोन करती हूँ।
अरे, आज दिन भर व्यस्त रहने वाला हूँ, इसलिए सुबह-सुबह ही फोन कर लिया। सीम्स यू आर बिजी... ओके। रात को फोन करता हूँ। बाय...।
इतनी देर बिहाग से बात कर रोली स्वस्थ हो आई थी, बल्कि उसका आत्मविश्वास लौट आया था। फोन रखकर उसने सीधे सुशील की आँखों में झाँक कर कहा - हाँ, तुम्हें सरप्राइज्ड तो होना ही था। यहीं हो या....
हाँ, यहीं हूँ... तुम तो टीम लेकर आई हो, रिस्पांसिबिलिटी... नहीं!
हाँ – रोली ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
तुम कब से हो हायर एज्यूकेशन में
बस, पिछले साल ही आईं हूँ।
किस सब्जेक्ट में – सुशील ने झिझकते हुए पूछा था।
म्यूजिक में.... ।
दोनों के बीच बातचीत खत्म हो गई। रोली ने दोसा आधा ही छोड़ दिया, खा नहीं पाई। अजीब-सी मनस्थिति में आ खड़ी हुई.... उधर सुशील को रोली का बेतरह बदल जाना बार-बार दिख रहा है। कहाँ हमेशा काजल से भरी आँखें, भडकीले कपड़े, मैचिंग ज्वेलरी, रंगे-पुते नाखून और हमेशा एक-ही से हाव-भाव में रहने वाली इर्रीटेटिंग नज़ाकत... उसके उलट कहाँ ये रोली....उसका ध्यान गया कि लिपस्टिक के बिना उसने रोली को पहली बार देखा... कोसा सिल्क की प्लेन साड़ी खादी के ब्लाउस के साथ पहनी थीं। कानों में छोटे-हीरे झिलमिला रहे थे। बाल खुले हुए हैं, लगता है कटवा लिए हैं। गले में कुछ भी नहीं था, इसलिए गर्दन की लंबाई उभर कर आ रही थी। कलाई में घड़ी के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। उसके रहन-सहन ने सुशील को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर डाला था। रोली बहुत असहज हो रही थी, तभी कल्पना ने आकर उसे उबारा – मैडम, चलें... रजिस्ट्रेशन के लिए...?
रोली ने राहत की साँस ली – हाँ... चलो। सुशील की तरफ देख कर बहुत यांत्रिक तरीके से कहा – बाय, फिर मिलते हैं।

दिन भर की औपचारिकता पूरी कर सुशील अपने क्वार्टर पर पहुँचा था, जानता था रात को फिर कैम्पस का चक्कर लगाना है... चाहता भी था, वो रोली से बात करना चाहता है। यूँ वह दिन भर बहुत कुछ करता रहा, लेकिन उसका पूरा ध्यान रोली पर अटका रहा, उसके ट्रांसफार्मेशन को लेकर वो बहुत अचंभित हो रहा था। उसे याद आ रही है वो अल्हड़, बिंदास और बहुत कुछ आत्मकेंद्रीत रोली... शॉपिंग के प्रति दीवानी और बेहद-बेहद सौंदर्य-सजग थी... कोई विशेष अवसर हो, उसकी तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती थी, कपड़े, गहने और दूसरी चीजें खरीदना... ऐसे मौकों पर ब्यूटी पार्लर जाना हर हाल में जरूरी होता था। रोली को खऱीदी का ख़ब्त था, सुशील अतीत और वर्तमान के बीच झूल रहा था, क्या आज भी वह वैसी ही है, जबकि वो उसे बेहद-बेहद बदला हुआ पा रहा था। तब उसे बहुत जल्दी रोली की आदतों से चिढ़ होने लगी थी। उसकी खूबसूरती से पहले-पहल वो आकर्षित हुआ था, लेकिन बाद में उसे उसी से चिढ़ होने लगी थी। वह उसे इंसान न लगकर हमेशा एक मादा-सी लगने लगी थी, शुरुआती दिनों का आकर्षण धीरे-धीरे कब विकर्षण में बदल गया, न रोली समझ पाई, न ही सुशील... फिर धीरे-धीरे सुशील रोली से दूर होने लगा... लेकिन रोली इस बात को भी नहीं भाँप पाई... फिर आखिरकार विस्फोट हो ही गया। साधना की सगाई वाले दिन रोली उसे पार्लर ले गई और दोनों बहुत देर से लौटी... बस सुशील का धैर्य जवाब दे गया। वैसे ये तो मात्र तात्कालिक घटना थी, इसके पीछे कारणों की लंबी शृंखला थी। रोली की तरफ से पैचअप के प्रयास हुए तो, लेकिन सुशील ने कोई रूचि नहीं दिखाई। उसके सामने यह स्पष्ट हो गया था कि उसके और रोली के बीच बहुत मानसिक दूरियाँ है, जो प्रारंभिक आकर्षण की वजह से महसूस नहीं हुई, लेकिन अब दोनों उस जगह पर पहुँच गए हैं, जहाँ से साथ चलने वाला रास्ता गुम हो चुका है, इसलिए साल भर के लिए अमेरिका जाने का मौका उसने तुरंत लपक लिया और चला गया। रिश्ता पूरी तरह से खत्म हो गया... और सात सालों के बाद उसे रोली मिली तो, इस तरह...!

डिनर के लिए जब सुशील पंडाल में पहुँचा, तब तक काफी लोग पहुँच चुके थे। जबकि वो सिर्फ रोली को ढूँढ रहा था। जब वो अपनी प्लेट लेकर बाहर निकल रहा था, तब रोली कुछ लड़कियों के साथ आती नजर आई। नवंबर बस शुरू ही हुआ था और हल्की सर्दी थी, वो काले सलवार कमीज पर मरून कलर की शॉल डाले हुए थीं। बाल सुबह की तरह ही खुले हुए थे। वो चलते-चलते रोली के सामने जा पहुँचा।
हाय...
हलो...।– रोली ने मुस्कुरा कर उसकी हाय का जवाब दिया।
डिनर...- सुशील ने अपनी प्लेट की तरफ इशारा किया।
मैं लाती हूँ...
इट्स ओके, हैव इट... मैं दूसरी ले आता हूँ। - और वो अपनी प्लेट रोली के हाथ में थमा कर जल्दी से अंदर चला गया। जब तक वो प्लेट लेकर लौटा तब तक रोली की स्टूडेंट अंदर जा चुकी थी। बाहर लगे टेबल-कुर्सी पर दोनों बैठ गए। रोली फिर से सुशील के ऑब्जर्वेशन का शिकार थी... दोनों चुपचाप खाना खाते रहे।
तुम बहुत-बहुत बदल गई हो।– सुशील से रहा नहीं गया
इज इट गुड ऑर नॉट?- रोली ने तल्खी पूछा था।
नो इट्स गुड... इनफैक्ट इट्स वंडरफुल... अमेजिंग...- और भी शब्द उसके मन में कौंध रहे थे, लेकिन अंदर ही कहीं घुल गए।
जीवन हमें वहाँ से रगड़ता है, जो जगह बहुत नाजुक होती है।– कह तो गई लेकिन आवाज भर्रा गई थी। सुशील अवाक होकर रोली की तरफ देखने लगा। आँखों में उतर आए आँसुओं को पलकें झुकाकर सुखाया और कहा – बदलना तो खैर था ही। कब तक इन्नोसेंट रह सकती थी? आखिर तो जीवन सिर्फ सपना नहीं है। ये ठोस हकीकत है, कँटीली और खुरदुरी। आत्ममुग्धता में जी पाना हर किसी के नसीब में नहीं होता। होगा किसी को नसीब... मुझे तो नहीं हुआ। - उसकी आवाज फिर डूब गई। सुशील में अपराध बोध भर गया। पता नहीं कैसे निकल गया - आय एम सॉरी
अरे नहीं... उस वक्त तुम्हें जो सही लगा वो तुमने किया... तुम क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति मुझ जैसी लड़की को सह नहीं सकता था। आज जब पलट कर देखती हूँ तो लगता है कि यदि वो सब कुछ नहीं हुआ होता, तो पता नहीं मुझे और कितना रोना पड़ता। - रोली अब तक स्वस्थ हो चली थी।
मे आय जॉइन यू – एक अजनबी आवाज सुनकर रोली ने सिर उठाया था, जबकि सुशील के चेहरे पर बुरा-सा भाव उभर आया था। ये सुशील का ही साथी था विपिन आर्य। रोली ने प्रश्नवाचक नजरों से सुशील की तरफ देखा तो उसने दोनों का परिचय कराया। विपिन के आने मात्र से दोनों के बीच बातचीत का सूत्र टूट गया और रोली ने राहत की साँस ली। खाना चल ही रहा था कि किसी ने विपिन को बुला लिया, लेकिन इस बीच दोनों के बीच बहुत सारी खाली जगह उभर आई थी।

रात को सारे स्टूडेंट पूरे उत्साह और मस्ती से भरे हुए थे। गाना, चुटकुले और हँसी मजाक चल रहा था, रोली ने वहाँ से उठना ठीक समझा। उसे उठते देखकर सुशील भी उसके साथ हो लिया।
मैं छोड़ दूँ? - सुशील ने पूछा
पैदल चल सकते हैं...?
ओके...।
दोनों साथ-साथ चलते रहे। सुशील किसी भी तरह संवाद शुरू करना चाहता था और रोली उससे बचना चाह रही थी। तुम गाती भी हो मुझे पता नहीं था। - सुशील ने आखिरकार सूत्र जुटा ही लिया।
मुझे भी कहाँ पता था। यूँ ही एक फ्रेंड की शादी में गुनगुनाया था, तभी अप्पा... मेरे गुरु ने मुझे संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया। बस... उस प्रेरणा ने मुझे बदल दिया, बल्कि यूँ कहूँ कि सब कुछ बदल दिया। फिर बिहाग की संगत में रहकर थोड़ा बहुत पढ़ने की आदत लगी।
बिहाग...- सुशील चौंका था
अप्पा का बेटा और...- कहते-कहते रूक गई रोली
ओ...- सुशील सब कुछ समझ गया। उसके अंदर कहीं कुछ भभक कर बुझ गया।
रोली गहरे उतर गई थी। - फिल्मी गानों को छोड़कर कभी और कुछ तो सुना नहीं था, लेकिन अप्पा ने बहुत धैर्य से मुझे संगीत में और संगीत को मुझमें ढाला। तब तक शायद मेरी मिट्टी गीली ही थी, तभी तो वे मुझे बना पाए... तुममें इतना धैर्य नहीं था। - अब वो खुद से ही बात करने लगी थी।– ठीक ही हुआ... मैं खुद को एक्सप्लोर ही नहीं कर पाती, यदि वो सब कुछ नहीं होता। न प्यार को समझ पाती न, दुख को... सब कुछ मनचाहा मिल जाने में भी क्या अच्छा होता है? कुछ छूट जाए... रह जाए तो लज़्ज़त बनी रहती है... नहीं...! – उसका पैर किसी पत्थर से टकराया और वो बाहर आ गई। - सॉरी... अब इस सबका कोई मतलब नहीं है।
नहीं... तुमने कहा तो मैंने तुम्हारा पक्ष भी तो जाना। ... रोली... तुमने मुझे माफ तो कर दिया ना...?
दरअसल तुमने कोई गलती की ही नहीं थी... हम बस यूँ ही साथ हो लिए थे। दो बेमेल लोग... अच्छा ही हुआ कि तुमने जल्दी ही समझ लिया कि हम साथ रह नहीं पाएँगें, देर हो जाती तो और भी बुरा होता। - रोली फिर से भर्रा आई थी, थोड़ा रूकी। - मैं आज देख पा रही हूँ, क्योंकि वहाँ पहुँच गई हूँ, जहाँ से खुद को ऑब्जेक्टिवली देखा जा सकता है। जब तक मैं बाहर को सहेजती और सँवारती रही, कभी भीतर नहीं पहुँच पाई। जान ही नहीं पाई कि बाहर से ज्यादा भीतर महत्वपूर्ण होता है, वही होता है और वही बनाता भी है, शायद तुम समझ पाओ कि एक लड़की अपने बचपन से जवानी तक जब यही सुनती रहे कि वो खूबसूरत है तो फिर वो उससे बाहर क्या तो सोच पाएगी, क्या देख पाएगी और क्या हो पाएगी...? बस यही मेरे साथ भी हुआ, तब लगता था कि यदि आपका दिखना चमकीला हो तो फिर सारी दुनिया जीती जा सकती है, होता भी कुछ ऐसा ही है, लेकिन शायद मेरे नसीब में ऐसा होना नहीं था। अच्छा ही हुआ... नहीं तो मैं जो आज हूँ, वो नहीं हो पाती। - फिर से उसकी आँखें छलछलाई – थैंक्स...।
सुशील भी भर आया। - मैंने कभी नहीं चाहा था कि तुम्हें कोई तकलीफ पहुँचाऊँ, लेकिन... – उसके पास शब्द खत्म हो गए, समझ नहीं पाया कि क्या कहे। दोनों देर तक चुप बने रहे।
बट रोली आय एक वेरी हैप्पी टू सी यू लाइक दिस... नाउ यू आर लाइक जेम, ब्यूटीफूल और प्रेशियस टू...।
थैंक्स, इट्स आल बिकास ऑफ यू... इफ इट वॉज नॉट...- और रोली का मोबाइल बजा। बिहाग मुस्कुराया।
हाय...
हाउ आर यू स्वीटहार्ट...।– वैसी ही खनक – मिस मी आर नॉट?
रोली भी खिलखिलाई – क्या लगता है तुम्हें?
अरे, तुमसे डर लगता है, तभी तो तुम्हारे आँखों से ओझल होते ही, बेचैन हो जाता हूँ, लगता है कि तुम बस अभी मुझे छोड़कर गईं...- उसकी आवाज भीग गई, लेकिन तुरंत वही खनक लौट आई – ऐ... कुछ गड़बड़ तो नहीं कर रही हो ना...!
बिहाग का भीगापन रोली तक आ पहुँचा और उसकी आँखों से उतर आया, उसने सुशील की तरफ देखा, जोर से हँसी – तुम पागल हो।
रोली का होस्टल आ गया था।

कहानी का मॉरल – सूत्र नंबर 96
आंतरिक ‘स्व’ के रिक्त होने पर हम भौतिकता की ओर प्रवृत्त होते हैं

4 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. गज़ब की कहानी…………………भावों का खूबसूरत संग्रह्।

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  3. sada aur vandana ji hosla badane ke liye shukriya...

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  4. होते तो दोनों ही गोल ही है ना... फिर चाँद तो गरीब के लिए रोटी की तरह ही है ना... जब उनकी जिंदगियों में अँधेरा होता है तो रोटी की तरह वो भी छोटा और दूर होता चला जाता है और अँधेरा और गहरा होने लगता है.................
    बाहर से ज्यादा भीतर महत्वपूर्ण होता है, वही होता है और वही बनाता भी है.....................
    बढ़िया रचना...

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