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Friday, 5 April 2013

बेखुदी का बड़ा सहारा है....


तू नींद की गोलियां कब से लेने लगी?
अरे... मैं पूर्वा के क्लिनिक में हूं। आजकल वो खुद को ही चौंकाने लगी है। कभी रात-रात भर जाग कर निकालने में... कभी ऑफिस में पागलों की तरह काम करते हुए, जब सब चले जाते हैं और ऑफिस बंद करना होता है तब प्युन आकर कहता है, ऑफिस बंद करना है, तो कभी 60 की स्पीड पर पुल चढ़ती गाड़ी में रिवर्स गियर लगाते हुए या फिर चलती गाड़ी में न्यूट्रल गियर लगाते हुए...। अब तो वो इतनी चौंकने लगी है कि जब वो नहीं चौंकाती है तब भी चौंकती है।

कितनी देर से बालों में कंघी घुमाती जा रही है उसे खुद भी याद नहीं.... रक्षा जब घर भर की सफाई करके जाने लगी तब उसने ही टोका... दीदी, क्या हुआ?
क्या हुआ!
तब से कंघी कर रही हैं?
ओह... कुछ नहीं ऐसे ही।
क्या कहती... ! कि आजकल धुन-सी सवार रहती है। टहलने निकलती है तो याद ही नहीं पड़ता कि कितनी दूर निकल आई है। चलती ही चली जाती है, बस...। नहाती है तो घंटा-घंटा भर... पानी ही उँडेला करती है। कई बार किताब हाथ में होती है और नज़रें शून्य में, कितनी ही देर तक वो यूँ ही बैठी रहती है।

जानती है कि यदि फोन आएगा तो बजेगा, लेकिन फिर भी चाहे कोई काम कर रही हो, लौट-लौटकर फोन के पास आती है। फोन पास हो तो उठा-उठा कर की-पैड अनलॉक करती है और देखती है कि कहीं ऐसा न हो कि वो काम में मशगूल हो गई हो और कोई मैसेज ही आया हो। अब तो जानने भी लगी है कि अब न तो फोन आएगा... न मैसेज... पर कोई आस है जो उसे मानने से रोके हुए है। दिन में हजार बार फोन के कांटेक्ट नंबर तक जाती है... मैसेज बॉक्स के न्यू मैसेज पर जाती और फिर लौट आती है। दिन में कई-कई बार वो फोन को बंद करती है और खुद से वादा करती है कि अब घंटे भर तक शांति से काम करेगी... घंटे भर बाद फोन चालू करेगी। काम करना शुरू करती है, लेकिन नज़रें घड़ी पर टिकी रहती है... फिर खुद ही को समझाती है ‘यदि किसी और का अर्जेंट कॉल होगा तो...!’ और 10 मिनट नहीं गुज़रते फोन चालू हो जाता...। नहीं... उसे अब उसकी जरूरत नहीं है, आखिर मान क्यों नहीं लेती... वो ही तो कहता था कि ‘मान लो तो आसानी होती है।‘ लेकिन बस मान ही तो नहीं पा रही है। खुद से सवाल पूछती है... आखिर वो क्या कहे, जिससे उसे समझ आए कि अब ये सब खत्म है... क्या और कैसे कहे? वो किन शब्दों में कहेगा, तब तुझे समझ आएगी... किन शब्दों में तू सुनना चाहती है? या कब तक उसकी जिंदगी से जौंक की तरह चिपकी रहना चाहती है, कब तक उसका खून पीते रहना चाहती है, कब तक?
वो समझाती है खुद को... हाँ, अब ये सब खत्म है। आगे सोच, अब क्या? लेकिन वो मान ही नहीं पाती है। उसने ही तो कहा था कि उसकी चिता वो खुद सजाएगा... अरे, ये सब किसी भावुक क्षण में कह दिया, तो क्या उसे जीवन भर ढोएगा... क्यों ढोएगा?

कितने दिनों तक ये होता रहा कि वो रास्ते भर लोगों की शक्लें देखते हुए गंतव्य तक पहुंचती... शायद वो रास्ते में ही नज़र आ जाए। पहले की तरह, जब वो नाराज़ हुआ करती थी तो गाड़ी के सामने खड़ा होकर लिफ़्ट मांगता था। उफान आता था और फिर एकदम बैठ जाता था। नहीं... अब कभी-कभी ऐसा नहीं होगा... वो खुद को समझाना चाहती है। दुखी लोगों की, पात्रों की हिम्मत को नज़ीर बनाती... फिर ज़ब्त छूट जाता। नहीं जानती कब से ऐसा होने लगा है, लेकिन उसे लगता है कि अनंतकाल से ऐसा ही होता आ रहा है।
ये तो सबसे पहले ही तय हो चुका था कि यदि किसी की जिंदगी में भी कोई और दाखिल होगा तो अच्छे दोस्तों की तरह हम एक-दूसरे को बता देंगे... यदि ऐसा कुछ है तो वो मुझे बता सकता था। इस तरह की उदासीनता उसे खोखला कर रही है और ये बात भी उसने कई बार कही है कि झगड़ लो... खींच लो मुझे अपनी तरफ, लेकिन ठंडापन नहीं। नहीं बर्दाश्त होता है... न जाने कितनी बार उसने ख़यालों में फांसी लगा ली है। न जाने कितनी बार उसने ये शहर, ये घर, ये मोबाइल नंबर छोड़ने की योजना बना ली है... लेकिन बस कुछ हो ही नहीं पाता।
पहले तो उसने मैसेज भी किए... फोन भी। वो या तो जवाब नहीं देता, या जवाब ऐसे देता कि वो तिलमिला जाती। धीरे-धीरे उसने हर चीज ज़ब्त करना शुरू कर दी। वो इस रिश्ते को हर हाल में बचाना चाहती थी। जान रही थी कि कुछ सड़ रहा है बहुत बुरी तरह से... अब उसके लिए वो वैसी नहीं बची है। उसकी कोई भी चीज उसे लुभाती नहीं है। बल्कि तो हर चीज उसे चिढ़ाती है... खिझाती है या जाने ऊबाने ही लगी हो। वो सहज थी उदास होती थी तो उसके सामने रो लिया करती थी और उत्साह में होती थी तो नजर आने लगती थी। उसके हर सुख-दुख से उसको वास्ता था, अब वो दुख में तड़प-तड़प कर रह जाती है और उस तक हल्की-सी आँच भी नहीं पहुँचती... यदि वो खुश होती है तब भी वो उदासीन ही बना रहता है। पहले उसकी उदासी, उसका रोना, उसका भटकाव.... उसकी इच्छा, उसका कहा हर चीज का मतलब हुआ करता था। धीरे-धीरे हर मतलब खत्म होने लगा। उसने देखा, लेकिन अनदेखा करती रही।

प्रेम केमिकल लोचा है... तो क्या इसका कोई इलाज नहीं है? ये कभी ठीक नहीं होता? दुनिया में लोग क्या-क्या सह लेते हैं? और मुझसे इतना-सा दुख सहा नहीं जा रहा है! सारे सहने वाले लोग एक-एक कर सामने आते हैं... उसे लगता है कि उनसे पूछे कि कैसे सह लिया...? मुझी से क्यों नहीं सहा जा रहा है? उसे याद आ रहा है कहीं पढ़ा हुआ... सहना ही सच है। और दुख जब घेरता है तो सारे रास्ते पहले ही अवरूद्ध कर देता है। हम दुख के सामने हमेशा ही निहत्थे होते हैं।

वो बार-बार उस दिन की घटना को रिवाइज करती है। उसने खुद को पूरी तरह से खोल कर रख दिया था, नहीं जानती थी गलती कर रही है। बताया था... हाँ उसे टीनएज में एक लड़के से प्यार हुआ था, जिसे वो आज खुद ही प्यार होना नहीं कह पाती है। फिर इस उम्र में किसे प्यार नहीं होता... ? प्यार क्या कहो... बस एक गड़बड़... वो लड़का उसे पसंद करता था। जाहिर है कोई आपको पसंद करे और आप उससे संपर्क में रहें तो थोड़ा बहुत सॉफ्ट कॉर्नर तो हो ही जाता है... बस। ये उस वक्त का सच था। आज वो उससे पूरी तरह से बाहर आ गई है। वो उसके सामने आ खड़ा हो तो उसके भीतर कोई नया परिवर्तन नहीं होगा। यदि इसकी कोई माप है तो माप कर देख लें। एक कॉमन दोस्त उसे कुछ दिन पहले मिला था, और कुछ दिनों से वो उससे संपर्क में है।
उसे लगता है कि उससे संपर्क कहीं न कहीं उसके बारे में जानने के लिए ही है। जबकि वो ये सवाल खुद अपने आप से बीसियों बार पूछ चुकी है कि क्या वो उस लड़के के बारे में कुछ भी जानना चाहती है? वो नहीं जानना चाहती है। ऐसा भी नहीं है कि वो उस लड़के का नाम ही नहीं लेना चाहती है और न ही ऐसा है कि वो उसके बारे में कुछ जानना चाहती हो या उससे मिलना चाहती हो... बस। इतना ही तो कहा था उसने कि ‘तुम जो चाहो समझो, मेरा दिल जानता है कि मुझे उसके बारे में कुछ भी जानने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है। ये कतई जरूरी नहीं है कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, बस वही मेरे साथ भी होता हो... आखिर मेरी बनावट और बुनावट तुमसे अलग है।’ बस... इतना ही तो कहा था और चली आई थी वो...। उसके बाद न तो उसने फोन किया, न मैसेज... मिलना तो खैर रात का सपना ही हो चला है। इन सारे दिनों में उसने खुद से बहुत सारे वादे कर लिए हैं। वो अब किसी बात पर रिएक्ट नहीं करेगी। उसकी नीयत पर, किरदार पर, जीवन पर, दर्शन पर, कर्म पर, रिश्तों पर, जीने-पहनने-खाने के तरीकों पर... किसी भी चीज पर किसी कमेंट का वो बुरा नहीं मानेंगी... यदि मानेंगी तो न तो प्रतिकार करेगी और न ही कहेगी... लेकिन सोचती है कि आखिर इन सारे वादों का हासिल क्या है? ये सब तो तब होगा न जब वो लौटेगा... और अब वो नहीं लौटेगा... कभी नहीं। तुझे खुद ही खुद को संभालना है। यही तुझमें बुराई है कि तू बहुत जल्दी अपनी भावनात्मक निर्भरता खो बैठती है। खो दी है... अब... अब क्या ये सोच...।
सोच चल रही है, गाड़ी चल रही है... खुली खिड़की से गर्म हवा के थपेड़े पड़ रहे हैं। न जाने कब से रेडियो में वो गाना चल रहा है, जिसे वो सख्त नापसंद करती है... लेकिन आजकल उसे कुछ भी नहीं लगता... न अच्छा-न बुरा... लगे तो तब न... जब वो खुद हो पाए। घर बस पहुँचने ही वाली है... बहुत दूर से उसे ‘उसकी’ गाड़ी दिख गई। बहुत सारे भाव आते गए-जाते गए... आसपास दुनिया जैसे सरसरा कर निकलती रही लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सुनाई नहीं दे रहा था सिवाय बिल्डिंग के नीचे खड़ी उस गाड़ी के...। ओ... ओ.... ओ.... गफलत में उसका पैर ब्रेक की बजाए एक्सीलरेटर पर पड़ गया... ओह... सड़क पार करता बच्चा बच गया... न जाने कैसे, तुरंत उसे अपनी गलती समझ आई और पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिया। बच्चे की माँ के साथ-साथ सारे लोग उसकी गाड़ी के आसपास जमा हो गए.... हंगामा होने लगा। सारे लोग कुछ-कुछ कह रहे हैं, लेकिन उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा है उसे बस वो गाड़ी दिखाई दे रही है। वो इस भीड़ को चीरकर उसकी तरफ भागना चाह रही है, लेकिन फँस गई है। उसकी पूरी चेतना बस उस गाड़ी पर लगी हुई है। तभी उसने उसे देखा। वो गाड़ी में बैठकर चला गया...। निराशा गाढ़ी हो गई... लेकिन नीत्शे याद आ गए ‘जो कुछ सड़ रहा है, उसे एक धक्का और दो’... एकसाथ निराशा और स्थिरता चलने लगी है... सोचा देखें कौन जीतता है। उसका ज़हन जैसे युद्धभूमि बना हुआ है... कटे सिर, कटे हाथ-पैर, चिथड़ा और लहूलुहान शरीर... कितना दर्द, कहाँ से आता है और आता है तो जाता क्यों नहीं है? अब किसी भी सवाल-जवाब, सोच-विचार का कोई मतलब नहीं है, वो जा चुका है। उसने भीड़ से माफी माँगी तब छूटी।

वो लगातार सिर पर चल रहे पंखे को घूर रही है। आँखों को कोरों से आँसू बहते जा रहे हैं और वो बस पंखे को एकटक देखती जा रही है। उसने सुना कि फोन बज रहा है, लेकिन ये ध्वनि उस तक पहुँच नहीं पा रही है... फोन बस बजता ही जा रहा है।
कहानी का मॉरल – सूत्र 142
दुख विकल्पहीन है.

Sunday, 20 May 2012

दर्द की तासीर

बात तो बहुत छोटी थी, लेकिन वहाँ जाकर लगी, जहाँ की जमीन कांक्रीट थी, गहरे जाकर गड़ी थी। पता नहीं किस विषय पर शुरू हुई बहस बढ़ते-बढ़ते झगड़े तक जा पहुँची और सुकेतु ने चिल्ला कर कह दिया कि – ‘तुम मेरे घर से निकल जाओ... अभी....।’ आँखें भर आई थी अश्लेषा की.... वो अवाक् थी... एक-साथ कई चीजें उमड़ी थी... मतलब जिस घर को मैंने अपनी पूरी ऊर्जा, इच्छा और आकांक्षा दे डाली वो मेरा नहीं है...। मतलब कि औरत का कभी कोई घर नहीं होता...! मतलब कि औरत चाहे जो कुछ हो जाए, वो मालिक नहीं हो सकती...! मतलब कि पुरुष जब चाहे उसका अपमान कर सकता है.... मतलब... मतलब... मतलब....।
उस वक्त सुकेतु को अश्लेषा की भरी हुई आँखें, गहरी चोट और पीड़ा नजर ही नहीं आई, वो तो बेहद गुस्से से भरा हुआ था और उसी गुस्से में वो घर से बाहर चला गया था... इससे पहले कि अश्लेषा संभले... धड़ाक् आवाज हुई और सुकेतु बाहर... उसे उसी हाल में छोड़कर। लगातार-लगातार वही-वही विचार उसके जेहन में उठ रहे थे और उसे मथे जा रहे थे। चोट इतनी गहरी थी, कि आँखों के सामने अँधेरा था, विचार और विचार-शून्यता के बीच एक ठहरा हुआ वक्त था। वो कुछ कर रही थी, क्या और क्यों उसे खुद भी नहीं पता था। बस शरीर यंत्र की तरह चल रह था चाय के गिलास साफ कर रही थी, उस बेकली में ही... काँच का गिलास उसे तड़का हुआ नजर आया, लेकिन ना तो उसके अंदर कोई विचार आया, और न ही कोई प्रतिरोध हुआ और उसने उस तड़के हुए गिलास में हाथ डाल दिया... जैसे ही उसने उसमें हथेली घुमाई, तड़के हुए हिस्से से गिलास टूट गया और गिलास का टूटा हुआ हिस्सा अँगूठे और उँगलियों के बीच के हिस्से में घुस गया। खून बहने लगा, लेकिन अश्लेषा को कोई अहसास ही नहीं हुआ, जब गिलास साफ कर डस्टबिन में डाला तब गिलास के उपर गिरी लाल बूँदों से थोड़ी-सी चेतना लौटी... लाल बूँदों के गिरने का स्रोत देखा...। एकाएक भीतर से कुछ थमता महसूस हुआ। दर्द तब भी महसूस नहीं हुआ... खून रिसकर हथेली तक आ गया... उसे कुछ ठंडा और मीठा-सा अहसास होने लगा। बिस्तर पर हाथ टिका दिया और लेट गई। धीरे-धीरे खून की बूँदें चादर पर फैलने लगी...। उसे खून देखकर मजा आने लगा.... खासतौर पर अपना...। खून देखते हुए बार-बार उसकी आँखें भरती-टपकती रही...। पहली बार उसे अपने आँसुओं की भाषा अनजानी लगी, भाव तो फिर भी पकड़ लिया था... दर्द का अहसास नहीं था, खुशी की कोई वजह नहीं थी, उदासी थी, गहरी, अपमानजनित, प्यार-विश्वास से परे... दिल पर लगी चोट का अहसास था, लेकिन खून के टपकने से जैसे किसी तृप्ति का अहसास हो रहा था, कोई वहशी-सी खुशी... जैसे वो वो नहीं है कोई और है, या फिर रिसता खून उसका नहीं किसी और का है, पहली बार उसने जाना कि अपमान का घाव आत्मपीड़न से भी भरा जा सकता है। खून का धब्बा चादर पर फैलने लगा था, पंखे की ठंडी हवा, उन्माद का उतरना, तीखे दर्द के बाद की उदासीनता और गहरे संघर्ष के बाद की थकान थी... रिसते खून और फैलते धब्बों को देखते हुए उसे नींद आ गई...।

ये क्या है? – पता नहीं उसने नींद में सुना था या फिर हकीकत में।
तड़ाक... गाल पर एक भरपूर चाँटा पड़ा था और वो नींद से लौट आई थी। फिर से अपमानित हुई – ये क्या कर रही थीं...? – सुकेतु लौट आया था, खून देखकर बावला हो गया था। कॉटन... डेटॉल... बैंडज... कहाँ है, वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ ढूँढ रहा था। ये सारी चीजें तो अश्लेषा ही संभालती है तो उसे कैसे मिलती... ?
क्या किया...? वो फिर चिल्लाया। - क्या किया...?
हो गया...
हो गया... कैसे?
गिलास का काँच घुस गया।
अश्लेषा ने उसे निर्विकार होकर जवाब दिया... सुकेतु से बर्दाश्त नहीं हुआ.... उसकी गोद में सिर रख लिया वो सिसकने लगा, अश्लेषा की दबी-घुटी सिसकी उभरी तो उसने अपने सीने में उसे समेट लिया... क्या किया ये... क्यों? अश्लेषा चुप...। सिर उठाकर उसने हाथ दिखाया... देखो... कितना अच्छा लग रहा है... खून... हम क्यों डरते हैं? कितना खूबसूरत रंग है... है ना...!
सुकेतु ने उसे देखा, गहरे अर्थ से... - यदि ये मेरा होता तो...?
अश्लेषा बिखर गई... बाँध टूट गया, घुटी हुई सिसकी रूदन में बदल गई...।
सुकेतु ड्रेसिंग करता रहा, अश्लेषा रोती रही।
कहानी का मॉरल – सूत्र-137
आत्मपीड़ा में भी सुख है.


Friday, 15 April 2011

भरीपूरी प्यास....! -3

गर्मी
बहुत दिनों बाद सलोनी को ऐसी छुट्टी और ऐसा अकेलापन मिल पाया है। फागुन की शुरुआत है, लंबी-सी शाम को सलोनी ने इसी छोर से थाम लिया था। छत पर अपनी आराम कुर्सी पर आकर बैठी, चाय का कप... धीमी सी आवाज में चल रहा संतुर... पश्चिम की ओर उतरता सूरज और उसकी नर्म पड़ती धूप, हल्की शॉल सा गुनगुनापन बिखेर रही थी। शाम होते-होते तक सूरज की सारी तल्खियाँ झर गईं थीं, किरणों के ताप के गिर जाने से वो एक सिंदुरी रंग की बॉल सा नजर आ रहा था, उसका रंग बिल्कुल वैसा लग रहा था, जैसा उस दिन मैंने पहना था, जब तुमने मुझसे कहा था कि – मुझे हमेशा ऐसा लगता है लूनी कि तुम रंगों को नहीं रंग तुमको पहनते हैं।
मुझे पहली बार लगा था कि तुम भी मुझे प्यार करने लगे हो, वैसा ऐसा कुछ नहीं था मुझमें कि तुम्हें मुझसे प्यार हो जाए। लेकिन प्यार में कहाँ तर्क चल पाते हैं। इससे पहले तक तो मैं ये भी नहीं जानती थीं कि तुम्हारी जिंदगी में मैं कहाँ हूँ, क्या हूँ? आखिर तुम्हारी जिंदगी में स्मिता जैसी परी थी, जिसके साथ जब भी मैं तुम्हें देखती थी तो मुझे पता नहीं क्यों तुम पर दया आया करती थी, क्यों...? पता नहीं। शायद इसलिए कि स्मिता की वजह से सारे लड़के तुमसे खार खाए हुए नजर आते थे, और खुद स्मिता... हो सकता है, ये गलत हो, लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि वह खुद को प्रिंसेस की तरह प्रेजेंट करती थीं और तुम उसके ग़ुलाम... माफ करना, जैसे रज़िया सुल्तान का प्रेमी याकूत...सलोनी मुस्कुराने लगी थी।
शायद यही दिन थे, वो... तुम और मैं लायब्रेरी में ही बैठे थे, सब जा चुके थे और बाहर निकले तो सूनी सड़कें मिली थी। शाम बस उतर ही रही थी। तब मैंने तुम्हें कहा था कि तुम स्मिता के साथ याकूत की तरह लगते हो... मैंने रात को ही फिल्म देखी थी और तुमने शायद पहले ही देख रखी थीं... तुम झपटे थे मुझ पर, तेज गुस्से में... मेरा पैर उलझा था और मैं धड़ाम से गिरी थी पगडंडी से घास के मैदान पर... पीठ के बल... पता नहीं क्या वजह रही थी, सब कुछ इतना अप्रत्याशित हुआ कि गिर जाने से झटके से या फिर चोट लगने की वजह से भौंचक थी और मुझे रोना आ गया था। बड़े-बड़े आँसू निकल आए... तभी तुमने मेरी आँखों से गिरने वाले आँसुओं को अपने होंठों में समेट लिया और मेरा सिर तुम्हारी छाती से टिक गया...। थोड़ी देर तक हम वैसे ही रहे। मैं वैसे ही सिसक रही थी और तुम इतने फनी तरीके से मुझे मना रहे थे, जैसे बच्चों को मनाया जाता है। चॉकलेट... ओके आइसक्रीम... और मैं हँसी रोककर झूठमूट गुस्सा हो रही थी फिर मैंने जिद करते हुए कहा था नहीं बर्फ का गोला...। तुम्हारे चेहरे पर बहुत बुरे भाव उभरे थे और उसी में तुमने मुझे झिड़का था – बर्फ का गोला? पागल हुई हो क्या? पता भी है उसमें सैकरीन होता है,...
हाँ...हाँ पता है और ये भी पता है कि उससे गला खराब होता है... लेकिन मुझे वही खाना है। - मैंने फिर रूठने का नाटक करते हुए कहा था।
ओके...- तुमने हथियार डाल दिए। - लेकिन कहाँ मिलेगा...?
कैंपस में तो मिलने का सवाल ही नहीं उठता है। लेकिन कभी-कभी नियति भी हमें सरप्राइज कर देती है। हमें एक बर्फ के गोले वाला साइकल पर आते हुए मिला। वो भी यूनिवर्सिटी के पार्क के बाहर वाले रास्ते पर...। मैंने पूछा तुम लोगे... तुमने फिर बुरा-सा मुँह बनाया – नहीं, मैं नहीं खाता।
मैं जानती थी कि तुम ना ही कहोगे। तुम तो आइसक्रीम खाओगे... मटके की कुल्फी भी तुम्हें कहाँ पसंद आएगी। मैंने तुम्हें कहा था – मुझे बर्फ का गोला खाना इसलिए भी पसंद है क्योंकि जिस रंग का गोला हम खाते हैं ना होंठों का रंग वैसा ही हो जाता है।
तुमने मुझे कहा था – तुम कितनी बच्ची हो... ?
तो... मैंने तमककर पूछा था, क्या बच्चा होना बुरा है?
तुमने बाँहों में घेर लिया था। मैंने उससे ऑरेंज और खस बनाने को कहा। तुम बहुत आश्चर्य से मुझे देख रहे थे। हम गोला लेकर पार्क के अंदर आ गए। मैंने तुमसे पूछा भी था – हैव...?
लेकिन तुम वैसे ही बने हुए थे... मैंने चिढ़ाया था – बुड्ढे... तुमने मुझे भींच लिया था।
मैंने बड़े मजे से चुस्की ले-लेकर गोला खत्म किया। ये देखने के लिए कि अब होंठो का रंग कैसा हो गया है उन्हें थोड़ा आगे किया और आँखों की पुतलियों को नीचे झुकाया... तभी तुमने झटके से मेरे होंठो को चूम लिया था और मैं बुरी तरह से हड़बड़ा गई थी। पता है मैं तुम्हें कभी कह नहीं पाई कि तुमने कितनी बार मुझे चौंकाया है।
क्रमशः