Wednesday, 5 September 2012

निर्भरता अभिशाप है

उस दिन फिर दीदी मुझे चकमा देकर निकल गई। बहुत देर तक मैं उनके पीछे लगा रहा, फिर वो मेरे साथ खेलने लगीं जब मैं खेल में डूब गया तो वे धीरे से पिछले दरवाजे से निकल गई। थोड़ी देर बाद जब मैं खेल से उकता गया तो याद आया कि दीदी तो मेरे साथ ही थी। फिर घऱ भर में उन्हें ढूँढा, जब नहीं मिली तो पक्का यकीन हो गया कि वो मुझे छोड़कर चली गई है। मुझे बहुत तेज गुस्सा आया, क्यों तो पता है, लेकिन किस पर पता नहीं। खुद पर या फिर दीदी पर....?
जिद्द पकड़ ली मुझे दीदी के पास जाना है। पहले सबने समझाने की कोशिश की कि दीदी तो डॉक्टर के पास गई है, लेकिन मैं समझ गया कि सब मुझे बहला रहे हैं। नहीं वो अर्पिता दीदी के यहाँ गई है, मुझे पता है। पापा ने कहा - हो सकता है, लेकिन मुझे नहीं मालूम अर्पिता का घर कहाँ है?
मुझे पता है। - मैं बस अड़ गया था। पापा को लेकर जब मैं अर्पिता दीदी के घर पहुँचा तो दीदी उनके साथ बातों में मशगूल थीं और मुझे देखते ही उनके चेहरे पर झुँझलाहट तैर गई। हाँ अर्पिता दीदी जरूर मुझे देखकर खुश हुईं लेकिन मुझे दीदी का झुँझलाना पसंद नहीं आया। पापा मुझे वहाँ छोड़कर लौट गए। फिर मैंने वहाँ क्या किया वो तो कुछ याद नहीं हाँ ये याद रहा कि दो-एक घंटे बाद दीदी के साथ ही घर लौटा।
हम दोनों के बीच एक तो उम्र का फासला था, दूसरे जैसाकि होता है लड़की होने के नाते दीदी जल्दी बड़ी और समझदार हो गई और तीसरा दीदी हमेशा अपने से बड़ी लड़कियों के साथ ही रही इससे हुआ ये कि मैं तो अपनी गति से बड़ा हो रहा था, लेकिन दीदी अपनी उम्र की तुलना में तेज गति से बड़ी हो रही थी, मानसिक और भावनात्मक तौर पर... तो जाहिर है हम दोनों के बीच का फासला कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा था।
फिर पता नहीं कैसे हम दोनों के बीच संवाद की वजहें बनने लगीं। मैं कॉलेज में पहुँच गया था और दीदी कांपीटीटिव एक्जॉम्स की तैयारी करने लग गई थीं। उन्हें पढ़ना पंसद हैं और थोड़ी ज्यादा जागरूक और ज्यादा विचारशील भी हैं। तो दुनिया जहान की बातें होने लगीं हम दोनों के बीच। हम दोनों साथ पढ़ने बैठते तो थे, लेकिन पढ़ते कम और बातें ज्यादा करते थे। दीदी को देर रात तक पढ़ने की आदत थीं और मुझे रात में जल्दी नींद आने लगती थीं, तो जब मुझे नींद आने लगती तब मैं तो सो जाता और दीदी पढ़ने लगतीं।
हम दोनों के बीच एक बाँड-सा बनने लगा था। दुनिया-जहान की बातें, कॉलेज और दोस्तों के अनुभव... रोजमर्रा से जुड़ी बातें, फिर इसमें धीरे से म्यूजिक भी जुड़ने लगा। पता नहीं मुझे वैसा म्यूजिक पसंद है, जैसा दीदी सुनती है या फिर चूँकि दीदी सुनती है इसलिए मुझे भी वैसा सुनने की आदत औऱ फिर शौक लग गया, लेकिन हम दोनों ही साथ-साथ गज़लें और क्लासिकल म्यूजिक सुनते हुए बड़े हुए। साथ-साथ खरीदी करते, हम दोनों एक-दूसरे के साथ कपड़े खरीदने में बड़े कंफर्टेबल हुआ करते थे। तो बाहर घूमना-फिरना भी हम दोनों साथ-साथ करते थे। कह सकते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे के दोस्त भी बन चुके थे।
ये वैसा नया नहीं तो शायद नहीं ही होगा कि मेरे सारे दोस्त सिगरेट और शराब का शौक फरमाते थे। मेरे लिए वो इसलिए भी नया था कि परिवार के साथ-साथ पूरे-पूरे खानदान में मैंने किसी को सिगरेट या शराब पीते हुए नहीं देखा... यही पारिवारिक संस्कार हुआ करते हैं, शायद। लेकिन मैंने घर में कभी किसी से ये सच नहीं छुपाया कि मेरे दोस्त क्या-क्या करते हैं और उल्टे दीदी से तो मैं हमेशा बहुत डिटेल में सब कुछ शेयर करता रहा हूँ।
वो बारिश की ही कोई रात रही होगी। दीदी के डबल कैसेट प्लेयर में जगजीत-चित्रा की बहुत पुरानी गज़लें चल रही थीं... दिल को क्या हो गया खुदा जाने/ क्यूँ है ऐसा उदास क्या जाने... वो आँखें मूँदे डूब कर सुन रही थीं। बाहर तेज बारिश होने लगीं तो जैसे वो समाधि से लौटी थीं। उन्हें कॉफी पसंद है और वो घोंटकर बनाया करती है। मैंने फरमाइश की थी... आयडिया दीदी को भी पसंद आया। वो चीनी, कॉफी और एक छोटा चम्मच दूध को लगभग आधे से एक घंटे तक घोंटती रहती थी, तब तक, जब तक कि चीनी पूरी तरह से घुल ना जाए और कॉफी का रंग गोल्डन ना हो जाए... मुझे भी पता नहीं क्या सूझा था, उसी दौरान मैंने दीदी से पूछ लिया था – यदि किसी दिन मैं भी ड्रिंक करके घर आ जाऊँ तो आपको कैसा लगेगा?
वो एकदम निर्विकार थी, उसी तन्मयता से कॉफी घोंट रही थी, बिना मेरी ओर देखे ही उन्होंने जवाब दिया था – मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।
मैं अवाक्, निरूत्तर दीदी की ओर देख रहा था। समझा नहीं पाऊँगा, उस एक वाक्य से क्या कुछ अंदर घटा था, शब्द नहीं है उसके लिए... उस वक्त मुझे भी सूझ नहीं रहा था क्या कहूँ! बहुत देर तक हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला बस कप के अंदर चम्मच के चलने की आवाजें आती रही। कुछ हम दोनों के बीच से सरसरा कर गुजर गया था। फिर अचानक दीदी ने सिर उठाकर मेरी तरफ गंभीर नजरों से देखा... वैसे यदि कभी तू ट्राय करना चाहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा। फिर उन्होंने गर्दन झुकाकर उसी तन्मयता से कॉफी घोंटते हुए कहा, जिंदगी में अनुभव लेना बुरा नहीं है, किसी भी चीज की निर्भरता बुरी है... अब वो खड़ी हो गईं थीं। मैं उनके कहे को उसी तरह घोंट रहा था, जिस तरह उन्होंने कॉफी घोंटी थी। उन्होंने मेरे बालों में हाथ घुमाते हुए कहा था, चल कॉफी बनाते हैं। उस रात उनके हाथ की खूब सारे झाग वाली कॉफी पीते हुए याद नहीं किन-किन विषयों पर बात हुई, लेकिन ये वाकया कहीं इतने गहरे धँसा हुआ था इसका अंदाजा मुझे आज हुआ।
ऐसा नहीं है कि पीने वाले दोस्तों के साथ मैं पहली बार बैठा था आज... पहले भी कई बार मैं अपने दोस्तों के साथ पीने की पार्टी मनाता था। हमेशा सभ्य दोस्तों को लेकर जाता और नशे में संभालकर लाता रहा था। एक बार मैंने भी सोचा कि आखिर ये शराब क्या बला है पीकर देखी तो जाए, तो घर में बाकायदा मुनादी कर ठसके से गया तो था, लेकिन जिन जैसी लेडिज ड्रिंक को लिम्का की पूरी बोतल में मिलाने के बाद भी उसका स्वाद मैं पचा नहीं पाया था और उसे शौकीन दोस्तों ने खत्म किया। शायद वो मेरा पहला और आखिरी प्रयास था। आज भी अपने कलिग्स के साथ ऐसी ही पार्टी में बैठा था... सर्व हो रही थी और नए ज्वाइन हुए कलिग ने एक पैग मेरे सामने भी रख दिया था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा... मन हुआ कि आज पी ही लूँ... एक बार और कोशिश कर के देखूँ, कैसा लगता है? एकाएक कुछ कौंधा... एकाग्रता से कॉफी घोंटती दीदी का वो निर्विकार चेहरा याद आया जब उन्होंने कहा था – ‘मुझे मालूम है तू ऐसा नहीं करेगा।‘ और मैंने मुस्कुराते हुए उस पैग को पड़ोसी के सामने सरका दिया।
कहानी का मॉरल- सूत्र १४०
विश्वास भी बंधन है.

Sunday, 20 May 2012

दर्द की तासीर

बात तो बहुत छोटी थी, लेकिन वहाँ जाकर लगी, जहाँ की जमीन कांक्रीट थी, गहरे जाकर गड़ी थी। पता नहीं किस विषय पर शुरू हुई बहस बढ़ते-बढ़ते झगड़े तक जा पहुँची और सुकेतु ने चिल्ला कर कह दिया कि – ‘तुम मेरे घर से निकल जाओ... अभी....।’ आँखें भर आई थी अश्लेषा की.... वो अवाक् थी... एक-साथ कई चीजें उमड़ी थी... मतलब जिस घर को मैंने अपनी पूरी ऊर्जा, इच्छा और आकांक्षा दे डाली वो मेरा नहीं है...। मतलब कि औरत का कभी कोई घर नहीं होता...! मतलब कि औरत चाहे जो कुछ हो जाए, वो मालिक नहीं हो सकती...! मतलब कि पुरुष जब चाहे उसका अपमान कर सकता है.... मतलब... मतलब... मतलब....।
उस वक्त सुकेतु को अश्लेषा की भरी हुई आँखें, गहरी चोट और पीड़ा नजर ही नहीं आई, वो तो बेहद गुस्से से भरा हुआ था और उसी गुस्से में वो घर से बाहर चला गया था... इससे पहले कि अश्लेषा संभले... धड़ाक् आवाज हुई और सुकेतु बाहर... उसे उसी हाल में छोड़कर। लगातार-लगातार वही-वही विचार उसके जेहन में उठ रहे थे और उसे मथे जा रहे थे। चोट इतनी गहरी थी, कि आँखों के सामने अँधेरा था, विचार और विचार-शून्यता के बीच एक ठहरा हुआ वक्त था। वो कुछ कर रही थी, क्या और क्यों उसे खुद भी नहीं पता था। बस शरीर यंत्र की तरह चल रह था चाय के गिलास साफ कर रही थी, उस बेकली में ही... काँच का गिलास उसे तड़का हुआ नजर आया, लेकिन ना तो उसके अंदर कोई विचार आया, और न ही कोई प्रतिरोध हुआ और उसने उस तड़के हुए गिलास में हाथ डाल दिया... जैसे ही उसने उसमें हथेली घुमाई, तड़के हुए हिस्से से गिलास टूट गया और गिलास का टूटा हुआ हिस्सा अँगूठे और उँगलियों के बीच के हिस्से में घुस गया। खून बहने लगा, लेकिन अश्लेषा को कोई अहसास ही नहीं हुआ, जब गिलास साफ कर डस्टबिन में डाला तब गिलास के उपर गिरी लाल बूँदों से थोड़ी-सी चेतना लौटी... लाल बूँदों के गिरने का स्रोत देखा...। एकाएक भीतर से कुछ थमता महसूस हुआ। दर्द तब भी महसूस नहीं हुआ... खून रिसकर हथेली तक आ गया... उसे कुछ ठंडा और मीठा-सा अहसास होने लगा। बिस्तर पर हाथ टिका दिया और लेट गई। धीरे-धीरे खून की बूँदें चादर पर फैलने लगी...। उसे खून देखकर मजा आने लगा.... खासतौर पर अपना...। खून देखते हुए बार-बार उसकी आँखें भरती-टपकती रही...। पहली बार उसे अपने आँसुओं की भाषा अनजानी लगी, भाव तो फिर भी पकड़ लिया था... दर्द का अहसास नहीं था, खुशी की कोई वजह नहीं थी, उदासी थी, गहरी, अपमानजनित, प्यार-विश्वास से परे... दिल पर लगी चोट का अहसास था, लेकिन खून के टपकने से जैसे किसी तृप्ति का अहसास हो रहा था, कोई वहशी-सी खुशी... जैसे वो वो नहीं है कोई और है, या फिर रिसता खून उसका नहीं किसी और का है, पहली बार उसने जाना कि अपमान का घाव आत्मपीड़न से भी भरा जा सकता है। खून का धब्बा चादर पर फैलने लगा था, पंखे की ठंडी हवा, उन्माद का उतरना, तीखे दर्द के बाद की उदासीनता और गहरे संघर्ष के बाद की थकान थी... रिसते खून और फैलते धब्बों को देखते हुए उसे नींद आ गई...।

ये क्या है? – पता नहीं उसने नींद में सुना था या फिर हकीकत में।
तड़ाक... गाल पर एक भरपूर चाँटा पड़ा था और वो नींद से लौट आई थी। फिर से अपमानित हुई – ये क्या कर रही थीं...? – सुकेतु लौट आया था, खून देखकर बावला हो गया था। कॉटन... डेटॉल... बैंडज... कहाँ है, वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ ढूँढ रहा था। ये सारी चीजें तो अश्लेषा ही संभालती है तो उसे कैसे मिलती... ?
क्या किया...? वो फिर चिल्लाया। - क्या किया...?
हो गया...
हो गया... कैसे?
गिलास का काँच घुस गया।
अश्लेषा ने उसे निर्विकार होकर जवाब दिया... सुकेतु से बर्दाश्त नहीं हुआ.... उसकी गोद में सिर रख लिया वो सिसकने लगा, अश्लेषा की दबी-घुटी सिसकी उभरी तो उसने अपने सीने में उसे समेट लिया... क्या किया ये... क्यों? अश्लेषा चुप...। सिर उठाकर उसने हाथ दिखाया... देखो... कितना अच्छा लग रहा है... खून... हम क्यों डरते हैं? कितना खूबसूरत रंग है... है ना...!
सुकेतु ने उसे देखा, गहरे अर्थ से... - यदि ये मेरा होता तो...?
अश्लेषा बिखर गई... बाँध टूट गया, घुटी हुई सिसकी रूदन में बदल गई...।
सुकेतु ड्रेसिंग करता रहा, अश्लेषा रोती रही।
कहानी का मॉरल – सूत्र-137
आत्मपीड़ा में भी सुख है.


Saturday, 24 December 2011

दुख का आश्वासन

थक चुकी थीं संघर्ष करते-करते.... पता नहीं कितने अरसे से वो इसी तरह जी रही है। अब सोचें तो याद ही नहीं आता है, अब क्या करें? छोड़ दे खुद को डूबने के लिए...., क्योंकि संघर्ष करते-करते न सिर्फ थक गई है वह बल्कि अब तो ऊब भी होने लगी है। यदि छोड़ दें खुद को तो... या तो डूब जाएगी या फिर ये प्रवाह कहीं लेजाकर छोड़ ही देगा। हाथ-पैर मारना छोड़ ही दिया, डूब रही है या फिर प्रवाह का हिस्सा हो रही है कह नहीं सकती। लड़ना छोड़ दो तो शांति होती है, नीरव... गहरी, काली-अँधेरी, गाढ़ी... बस थोड़ी ही देर डर लगता है, फिर... फिर उसमें नशा आने लगता है, तीखी सर्दी में लिहाफ़ के गुनगुनेपन की तरह, नर्म और सुविधाजनक होने लगती है ये उदासी...। आखिरकार थककर या फिर ऊबकर उसने लड़ना छोड़ दिया था। समय हर ज़ख्म की दवा है, हर घाव का मरहम... सुना है, आजमाकर भी देख ही लें।
शाम रात में तब्दील होने लगी थी। खिड़की से सड़क की रोशनी दाखिल हो रही थी, उसे होश ही नहीं है कि शाम खत्म हो गई है और रात होने लगी है। वो समय के परे जाकर खड़ी हो गई थी... नहीं डूब रही थी या फिर... शायद बह रही थी। अगरबत्ती का धुँआ कमरे में फैला हुआ था, जब मैं वहाँ दाखिल हुई थी। कोई उदास-सी धुन बज रही थी, अँधेरा घना और माहौल में घुटन थी। पलंग पर उसका सिर टिका हुआ था... और वो नीचे बैठी हुई थी। पता नहीं चल रहा था कि वो जाग रही है या सो रही है, निश्चल, निश्चेष्ट...।
ये क्या हो रहा है? – मैंने कड़कते हुए पूछा था।
उसने सिर के नीचे पड़े अपने हाथ को थोड़ी जुम्बिश दी थी, सिर तब भी नहीं उठाया था, बस ऐसे ही सिर रखे हुए बुदबुदाई थी... आजा....। उसकी बढ़ी हुई हथेली मैंने थामी तो लगा कि बर्फ का टुकड़ा हाथ आ गया है। - अँधेरा क्यों कर रखा है?
बस... रोशनी में खुद को बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी ना... इसलिए! – वाक्य का आखिरी सिरा घुटा हुआ सुनाई दिया।
हुआ क्या है? – मैंने खीझते हुए पूछा।
मुझे ही नहीं पता... – आँखें डबडबा आई थी – बस, खुद को सहने की कोशिश कर रही हूँ।
खुद को सहना... ये कौन सा तरीका है यार...!
अब सिर उठाया था, उसने – सारे तरीके आजमा चुकी हूँ। सोचा अब कोई तरीका नहीं... बस यूँ ही छोड़ दूँ खुद को, गुजर जाने दूँ, इस उन्माद को, हो जाने दूँ, सब कुछ को बरबाद...। आखिर विनाश के बाद ही तो सृजन होता है ना...! यही जाना-पढ़ा है।
मैं हतप्रभ हूँ...- इसका क्या मतलब है?
मतलब... – वो उदासी से मुस्कुराती है – मतलब...? बस यहीं तो मात खा जाती हूँ। मतलब पर ही तो अटक जाती हूँ। हर चीज और हर बात का मतलब होना ही चाहिए... कोई कारण, कोई तर्क और वो ही मेरे पास नहीं होता... । क्या करूँ...? – वो मुझसे ऐसा सवाल पूछ रही है, जिसका जवाब मेरे पास नहीं है... मैं कुछ नहीं कहती, एक बार फिर धुँधआता कमरा, गाढ़े अँधेरे में डूबती हर चीज, उदास और नशीले माहौल इस सबको नजर भर देखती हूँ। एक गहरी खामोशी पसरी है हम दोनों के बीच... बहुत देर तक हम दोनों ही छोटी-छोटी और बारीक ध्वनियों को सुनते रहे। फिर उसने सिर उठाया – मुझे देख... क्या मैं खूबसूरत लग रही हूँ! वो कहता था कि दुख इंसान को खूबसूरत बनाता है...। – वो जिस तरह से बैठी थी, वो मुझे किसी पेंटिंग फ्रेम-सा लग रहा था। वो दृश्य फ्रीज हो गया था मेरे ज़हन में...। मैंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा – तुम तो हमेशा ही खूबसूरत लगती हो, तुम्हें खूबसूरत होने के लिए दुख की जरूरत नहीं है। - लेकिन लगता है उसे मेरे कुछ भी कहने की दरकार नहीं है, और इसीलिए उसने कुछ सुना भी नहीं... – ये दुख कहाँ से आता है...! शरीर को कोई दुख नहीं है, बुद्धि कहती है कि ये बेकार है बर्बाद है... बस मन को दुख है... लेकिन मन कहाँ है...? कहीं इसका कोई सिर-सिरा मिलता क्यों नहीं है? न दुख का, न मन का...! बस कुछ सुलगता सा महसूस होता है... हर वक्त – उसने बुझती अगरबत्ती की तरफ डबडबाई आँखों से देखा था, फिर कहा - यदि मिले तो उसे ही जला डालें... कुछ दिन का शोक मना लें और फिर जिंदगी सरल हो जाए।
उसके सवालों के जवाब मेरे पास नहीं है – तू पागल हो गई है।
हाँ... मुझे भी लगने लगा है कि मैं पागल हो रही हूँ। पता है, वो कहता था कि दुख में दृष्टा हो जाना, उसे सह लेने का सबसे आसान तरीका है, लेकिन तू ही बता, अपने दुख से निस्संग होते हुए दृष्टा होना इतना आसान है क्या...? – मैं बस उसे सुन रही हूँ, मुग्ध भाव से, वो कहना जारी रखती है - लेकिन कभी-कभी मैं भी वहाँ पहुँच जाती हूँ, जहाँ मैं भोक्ता और दृष्टा दोनों हो उठती हूँ। और हकीकत में खुद को दुख में देखते हुए अच्छा लगता है... यू नो, नशा आता है। ऐसा लगता है कि जैसे ये जो दुख में है कोई और है और हम जो इसे देख रह हैं, कोई और है...। – चूँकि मेरे कुछ भी कहने की कोई गुंजाइश नहीं थी, इसलिए मैं चुप ही रही। - कभी ऐसा नहीं लगता है कि हममें से हरेक में एक सैडिस्ट होता है, जो खुद से बाहर को दुख में देखकर खुशी महसूस करता है। ... और जब हम दृष्टा हो जाते हैं तो हम भी खुद से बाहर चले जाते हैं...।
बहुत गहरी शांति है, कोई ध्वनि कहीं से नहीं आ रही है। लगता है रात गहरी हो गई है। हम दोनों ही एक-दूसरे का हाथ थामे मौन हैं, चुप हैं...। अँधेरा पहले भी था, लेकिन ठहरा हुआ-सा लग रहा था। अब महसूस हो रहा है कि वो हमारे बीच से गुजर रहा है। मुझे लगा उसे नींद आ गई है, लेकिन एकाएक उसकी ऊँगलियों की पकड़ मुझे हथेली पर कसती-सी लगी... उस गहरी निशब्दता में उसकी सिसकी की आवाज अपनी पूरी दहशत में उभरी थी... आँखों में जैसे समंदर उभरा था, उस अँधेरे में भी उसके चेहरे की सौम्यता चमक रही थी, वो मुझे बहुत स्थिर दृष्टि से देख रही थी – कुछ भी नहीं ठहरता है, सब कुछ बीत जाता है। बस कुछ निशान छूट जाते हैं...। ये उन्माद भी गुजर जाएगा, बस चाहती हूँ कि इसे पूरी गरिमा से सह लूँ... बिना आत्मदया के... सुबह हर हाल में होगी, ये बहुत बड़ा आश्वासन है दुख के दौर का..., जब हम इस आश्वासन को पा लेते हैं तो दुख को सहना आसान हो जाता है...- उसकी आँखों में मैंने बिजली कौंधती-सी देखी थी...।
अँधेरा गुजर रहा था, सुबह की दूधिया रोशनी कमरे में दाखिल हो रही थी...।
कहानी का मॉरल – सूत्र – 117
गहनतम दुख को भी इस उम्मीद से सह लिया जाता है कि भविष्य के गर्भ में खुशी छिपी है।

Wednesday, 5 October 2011

‘जो भी है बस यही एक पल है’

शरद की मीठी-सी शाम का मजा खराब कर रहे थे लाउड-स्पीकर पर भजन के नाम पर बज रही पैरोडी। एक तरफ घर पहुँचने की हड़बड़ी, दूसरी तरफ जाते हुए कुछ जरूरी काम निबटाने की मजबूरी और उस पर ट्रेफिक की समस्या और ये दिमाग का फ्यूज उड़ा देने वाला शोर...। घट-स्थापना का दिन और चारों ओर त्योहार का उल्लास... हरेक को जैसे कहीं जाने की जल्दी थी... मुझे भी थी, घर पहुँचने की। घर पहुँची तो पोर्च की कुर्सी भी खाली थी और झूला भी... दादी नहीं थी।
कहाँ है दादी?
तबीयत ठीक नहीं है, आराम कर रहीं हैं। - जवाब मिला।
मेरे कमरे के सामने की तरफ ही है दादी का कमरा... कमरे से निकलते हुए यदि उनके कमरे का दरवाजा खुला हो तो वो नजर आ ही जाती है। आज शाम के वक्त उन्हें बिस्तर पर लेटे देखकर कुछ खटका हुआ। जाकर देखा तो चेहरा सुस्त नजर आया, लगा कि तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब है। करवट लेने की ताकत भी नहीं नजर आई... तुरंत गाड़ी निकाली... अस्पताल ले जाने के लिए...।
वैसा ही माहौल था, बल्कि बढ़ती रात में गहराते उत्सव का शबाब अपने चरम की ओर बढ़ रहा था। हवा में खुनक आ घुली थी और मौसम में उत्साह... लेकिन यहाँ मन में कुछ गहरे जाकर अटक गया था। पता नहीं किस वक्त वो नामालूम-सा पल दबे पाँव आया और आकर गुजर गया और दादी 'होने' से 'न-होने' में बदल गई। हम न उस पल को देख सके, महसूस कर सके तो उसे रोक पाना तो यूँ भी संभव नहीं था।
गए थे एक भरे-पूरे इंसान को लेकर, लौटे एक खाली बर्तन-से शरीर के साथ...। आत्मा (मुझे यकीन नहीं है आत्मा पर, जिसे देख नहीं सकते, छू नहीं सकते, महसूस भी नहीं कर सकते। जिससे न प्यार किया जा सकता हो, न नफरत... तो फिर उसके होने का यकीन कैसे किया जा सकता है? ) नहीं थी... मैं सहमत नहीं हूँ – जान चली गई थी। अंदर दादी का पार्थिव शरीर था और बाहर उन्हीं की आरामकुर्सी पर मैं थी। सभी दादी के साथ की अपनी-अपनी यादों की जुगाली कर रहे थे। कुछ यादें रात के उस काले कैनवस पर चमकती और बुझ रही थी।
उधर यादें, इधर विचार... क्या जीवन का अर्थ इतना ही है? बस... जान निकलते ही सब खत्म... यदि आत्मा ही सच है तो फिर वो कहाँ है... हम उसे देख, छू, महसूस तो कर ही नहीं पाते हैं, उसके तो बस किस्से ही किस्से हैं... और यदि शरीर सच है तो फिर जो पार्थिव देह हमारे सामने पड़ा है वो क्या है? हम उसी से प्यार करते हैं, वही सारी भावनाओं, सारी अभिव्यक्तियों का माध्यम है... सारे प्यार, विचार, कर्म के लिए कर्ता... लेकिन क्या कम हो जाता है जिसे हम मरना कहते हैं! तो बुद्धि कहती है कि आत्मा सच नहीं है, अनुभव कहता है कि शरीर सच नहीं है, तो फिर सच है क्या...? या फिर कुछ भी सच नहीं है... जब जीवन ही सच नहीं है तो फिर हर चीज भ्रम है... और कितनी अजूबा-सी बात है कि ये एक भ्रम कितने भ्रमों की रचना करता है और उसे पोषित करता है। सालों-साल जिसे हम जीवन कहते हैं, चलता है और हम सारी दुनियादारी उसी के सहारे निभाते चलते हैं, एक क्षण बिना ये सोचे कि एक दिन... बल्कि एक क्षण... वो कोई भी क्षण हो सकता है, आएगा और बे-आवाज गुजर जाएगा... एक जीता-जागता जीवन, मौत में बदल जाएगा। जिसे सारे जीवन सच माना उसे वह एक क्षण भ्रम में बदल देगा...।
हम 'हैं' से 'थे' हो जाएँगें। तो न गुजरा वो सच है और भविष्य तो भ्रम है ही... फिर सच क्या है? चाहे दुनिया का सारा दर्शन इस एक प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता हो, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है। हम जानते हैं कि वो एक क्षण हम सबके जीवन के सच को भ्रम बना देगा, फिर भी हम अपने होने को पूरा सच मानकर चलते हैं, उस नासमझी... उस मासूमियत को सालों-साल खींचते चलते हैं और एक क्षण... बस एक क्षण उस सालों से संचित विचार और सच को झटके से झूठ में बदल देता है। मृत्यु जीवन से अर्थ छीन लेती है, तो फिर जीवन का होना क्या... लेकिन जितनी फिलॉसफी पढ़ी है और तर्कों से जितना जाना है वो तो यह कहता है कि कुछ नहीं होने का अस्तित्व कुछ होने से ही है... तो पहले हम हैं तभी तो हम नहीं होंगे...। फिर-से सब गड्ढमड्ढ... रात गुजर रही थी और विचारों का बोझ लगातार बढ़ता रहा था। कहीं कोई सिरा नजर नहीं आ रहा था। उलझते-उलझते लगा कि जीवन की तरह ही ये विचार भी अर्थहीन है, क्योंकि इनकी कोई मंजिल नहीं है। फिर एक सवाल... तो क्या जीवन की कोई मंजिल है? मान ही लें कि जीवन की मंजिल मौत है... सवाल खत्म... विचार भी खत्म...।
रात गहरी होने लगी थी... अँधेरा घना और सन्नाटा तीखा हो चला था। शरद की खुनक का अहसास अब गाढ़ा हो चला था...। आसमान खुला था और गहराते अँधेरे में तारों की टिमटिमाहट ने न जाने कैसे बचपन को जिंदा कर दिया था। गर्मियों की रातों में जब देर रात तक जागती आँखें एकटक तारों को ही देखती थी। याद आती थी कोई पहेली... सिर पर मोतियों का थाल जैसी और लगता कि हाँ आसमान ठीक वैसा ही तो है। किसी तारे पर यूँ ही आँखें ठहर गई... नींद का खुमार, उदासी का बुखार, ठंड़ी होती रात और गाढ़े होते अँधेरे में यूँ ही एक पल फिर से आया... न जो गुजरा वो सच है और न जो आएगा वो सच होगा... ‘जो भी है बस यही एक पल है’...। सांत्वना सी महसूस हुई... और पता नहीं कैसे नींद आ गई।
कहानी का मॉरल – सूत्र 130
मृत्यु ‘होने’ और ‘न-होने’ के बीच का महज एक क्षण है.

Tuesday, 27 September 2011

खूबसूरती के साइडइफेक्ट्स...!

रात का गहरा नशा और उसकी खुमारी थी... नींद इतनी गहरी थी कि मंजरी की किलकारी सुनकर हड़बड़ा कर जागा था... क्या हुआ? – बहुत घबराकर पूछा तो वो रात में इतनी जोर से खिलखिलाई कि मुझे अपने होंठों से उसके होंठों को सिलना पड़ा। उसने वैसे ही अपना हाथ रजाई से निकालकर खिड़की की तरफ बढ़ाया... और दूसरे हाथ से मुझे धकियाकर अलग किया।
देखो बर्फ...।
खिड़की के शीशों के उस पार स्ट्रीट लाइट की पीली-उदास रोशनी में नजर आया जैसे आसमान से रूई के फाहे बरस रहे हों...। उसने झटके से उठकर खिड़की खोली तो तीखी-बेधती सर्दी कमरे में दाखिल हो गई। उसने जल्दी से खिड़की बंद की और रजाई में घुस गई। मैंने उसे तब तक जकड़कर रखा, जब तक कि उसकी कँपकँपी कम नहीं हुई। हाथों में उसके बालों का रेशम था और सीने पर उसकी साँसों की तपिश...। उसकी लंबी बरौनियाँ आँखों के खुलने-बंद होने से मेरे कंधों को सहला रही है। मैं खुश हूँ... बहुत-बहुत...। इतनी खूबसूरत पत्नी को पाकर...। पिछले साल इन्हीं दिनों से शुरू हुआ सिलसिला इस साल एक मंजिल पर पहुँच गया। ममेरे भाई की शादी में मंजरी को देखते ही लगा कि बस यही मेरी बीबी हो सकती है। दूधिया गोरा रंग और कंजी-बड़ी आँखें... लंबे बाल और लंबा कद... बहुत-बहुत खूबसूरत...। 6 महीने में सगाई और साल भर में शादी...। मनाली में हनीमून के लिए आए और आज दूसरा दिन है। पता नहीं क्यों लगा कि प्रकृति ने भी मेरी खुशियों के लिए अपना खजाना खोल लिया है। हम दोनों यूँ ही रजाई में एक-दूसरे के साथ खेलते हुए खिड़की पर आँखें गड़ाए आसमान से रूई का झरना देखते रहे... कब सुबह हुई पता ही नहीं चला।
बर्फ अब भी गिर रही थी... बिस्तर छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा था। मंजरी ने सिरहाने पड़ा कोट उठाया और तुरंत पलंग से उतर गई।
उठिए, हम यहाँ कमरे में कैद रहने के लिए नहीं आए हैं। - बहुत लाड़ से कहा था। मैंने झपट्टा मारा तो मेरे हाथ में उसकी कलाई आ गई और मैंने उसे फिर से बिस्तर पर खींच लिया। - मैं तो बस यही करने आया हूँ। - वो फिर खिलखिलाई और हाथ छुड़ाकर दूर चली गई।
मैं रजाई में से निकलने का बार-बार मन बनाता और बार-बार बाहर की सर्दी के डर से दुबक जाता। बहुत देर से मंजरी बाथरूम में थी। मैंने आवाज लगाई – जानूं क्या कर रही हो! मैं यहाँ सर्दी के मारे मर रहा हूँ...।
तभी वो बाहर निकल आई। नहाकर आई थी, बालों पर तौलिया था। उसने शरारत से भरकर पलंग के दूसरे हिस्से से जो रजाई खींची तो सर्दी के मारे में सिहराकर चीखा... – सर्दी लग रही है ना...! क्या कर रही हो...।
उठ जाओ, पानी खूब गर्म है, नहा लोगे तो अच्छा लगेगा। - स्कूल मास्टर की तरह उसने आदेश दिया। मैं बुदबुदाया – स्साली मास्टरनी...।
उसने प्यारभरी मुस्कुराहट बिखेरी...।
जब मैं नहाकर लौटा तब वो काजल लगा रही थी और लगभग तैयार हो चुकी थी। बाल खुले थे और कानों में डायमंड के झूमर से पहने हुए थे। मैं मुग्ध भाव से उसे देखने लगा तो उसने करीब आकर मेरे गीले बालों को अपनी ऊँगलियों से झटका... मैंने फिर से उसे खींच लिया।
चलो... तैयार हो जाओ जल्दी।
बर्फ गिरना बंद हो चुकी थी और ठंड तेज हो गई थी। घड़ी में 10 बज रहे थे। भूख तेज हो गई थी। नाश्ते के लिए रेस्टोरेंट में पहुँचे। ऑर्डर करने के बाद मैंने आसपास नजर घुमाई। काउंटर पर मैनेजर के पास बैठा लड़का बड़ी बेशर्मी से मंजरी को घूर रहा था। मंजरी इस सबसे बेखबर मेन्यू कार्ड पढ़ने में उलझी हुई थी। मुझे एकाएक समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ। अब देखना तो कोई जुर्म नहीं है, मैं मंजरी के पास की सीट छोड़कर उसके सामने की सीट पर बैठ गया, ताकि मेरी आड़ में वो मंजरी को देख ना पाए। जैसे-तैसे नाश्ता हुआ। मेरे तो गले से कौर ही नहीं उतर रहे थे।

रेस्टोरेंट से निकलने के बाद भी मैं वहीं रह गया था, या फिर मुझे लगा कि वो लड़का मेरे साथ-साथ चलने लगा था। अब स्थिति ये हो गई थी कि मैं अपने सामने से गुजरते हरेक शख्स की नजरों का जायजा लेने लगा था। एक तरफ जहाँ मंजरी पहाड़ों पर जमी बर्फ का मजा ले रही थी। उस सारे दृश्य को महसूस कर रही थी, वहीं मैं न जाने किस गर्त में उतर रहा था।

बाहर टँगे वूलन कुर्ते को देखकर मंजरी ने कहा था – कितना सुंदर है ना। चलो देखते हैं।
दुकान में पहुँचकर मैंने दुकानदार को बाहर टँगे कुर्ते के बारे में बताया तो उसने तुरंत अंदर से उसी तरह का कुर्ता लाकर मंजरी के सामने रख दिया। वो हर चीज मंजरी को ही दिखा रहा था, उसे ही कन्विंस करने की कोशिश कर रहा था। मुझे चिढ़ आई और मैंने सख्ती से मंजरी की कलाई पकड़ी और दुकान से बाहर आ गया। वो समझ ही नहीं पाई कि आखिर हुआ क्या है! मैं भी कहाँ समझ पा रहा था।
शाम उतर रही थी। हम दोनों ही थकने लगे थे। यूँ भी 6-6 इंच मोटी बर्फ पर गम बूट पहन कर घूमना खासा थकाने वाला काम था। हिमाचल टूरिज्म ऑफिस के बाहर की कॉफी शॉप में जा घुसे। ओपन एयर शॉप से मनाली मॉल रोड पर घूमते पर्यटक, जोड़े नजर आ रहे थे। मैं जब कॉफी लेकर लौटा तो मंजरी मॉ़ल रोड की तरफ मुँह घुमाए बैठी थी। उसकी पीठ की तरफ कुछ पर्यटकों का झुंड बैठा हुआ था। शायद दिल्ली के लड़के थे सारे। उनमें एक सरदार कुछ इस तरह से बैठा था कि वो मंजरी को देख सके। वो थोड़ी-थोड़ी देर में कनखियों से मंजरी की तरफ देख रहा था। फिर से मेरा गुस्सा बढ़ने लगा था। जब मैंने ये महसूस किया कि मुझे मंजरी पर भी गुस्सा आ रहा है तो मेरी बुद्धि ने मुझसे पूछा कि – उस पर क्यों?
वो मॉल रोड पर घूमते जोड़ों को देखने में मगन थी और मैं अपनी उधेड़बुन में... कि मैंने देखा कि बादल कतरों में उसके बालों और कंधों पर जमा हो रहे हैं। उसने अपनी आँखें गोल-गोल की और किलकारी मारी – बर्फ...। कॉफी का जल्दी-जल्दी खत्म किया और व्यग्रता से खड़ी हो गई।
चलो...
मैंने पूछा – कहाँ?
अरे बर्फ में घुमेंगे...। यही तो मजा है, यहाँ इस मौसम में आने का। - ये कहती हुई वो गेट से बाहर निकल गई। मैंने फिर कनखियों से लड़कों के उस झुंड की तरफ देखा। उस लड़के की नजर अब भी मंजरी पर थी। मेरी मनस्थिति मेरे नियंत्रण से बाहर थी। दूसरी ओर मंजरी मासूमियत से गिरती बर्फ को आँखों में, हाथों में और जहन में समेट रही थी। मैं अनमना-सा उसके साथ घिसट रहा था। कितना.... खूबसूरत है ना सब कुछ...! – उसने बिल्कुल डूबते हुए कहा था। लेकिन मैं न जाने कहाँ था। तभी सामने की दुकान से निकलते हुए एक मध्यवय से सज्जन को कहते सुना – परेशान हो गए हैं। महीना भर हो गया, यही चल रहा है। न तो सर्दी से निजात है और न ही बर्फबारी से...। देखो बर्फ गिरते ही सारे पर्यटक चले जाते हैं। धंधा चौपट हुआ जा रहा है।
मंजरी से ने मेरी तरफ देखा। यार दुनिया में कुछ भी निरापद नहीं है। हम जिस चीज के लिए यहाँ आए, ये लोग तो उसी से उकता गए। - बर्फ पर जमा-जमाकर पैर रखते हुए उसने पूछा – क्या हरेक के लिए खूबसूरती के मायने अलग होते हैं?
मेरे पास जवाब नहीं था। एक सवाल था, क्या दुनिया में कुछ भी निरापद नहीं है, खूबसूरती भी नहीं। मैं चुप था और मंजरी के लाल होते चेहरे, चमकती आँखें और मादक अदाओं को देख रहा था।
कहानी का मॉरल - सूत्र 113
सौंदर्य निरापद (risk-free) नहीं होता.

Monday, 5 September 2011

दुख-सुख का तराजू जीवन

यार तुम्हारी राईटिंग में इतनी निगेटिविटी क्यों रहती है? – बहुत झल्लाया हुआ-सा स्वर था। वो मेरे पोट्रेट पर काम कर रहा था। उसे व्यक्तिगत तौर पर खिलते और चटख रंग पसंद है, इसलिए उसकी सारी की पेंटिग्स में बहुत खुले और खूबसूरत रंग हुआ करते हैं। जैसे ही उसने ब्रश का पहला स्ट्रोक दिया... मटमैला-सा रंग कैनवस पर छिटक गया... उसने बहुत उखड़े मन से ब्रश को पानी में डुबोया और कपड़े के हल्के स्ट्रोक्स से उसे सूखाने लगा। मटमैले रंग ने उसका मन खराब कर दिया था... मुझे लगा कि उसके ब्रश को भी मेरी बीमारी लग गई, मैं और उदास हो गई। उसने झल्ला कर मेरे कंधें झिंझोड़े... बोलती क्यों नहीं? – मुझे समझ नहीं आया कि अभी इस वक्त उसे क्या याद आया होगा कि इस विचार ने उसकी एकाग्रता को भंग कर दिया। अभी हमारे बीच कुछ भी साझा नहीं है... कोई अंकुरण तक नहीं हुआ है... फिर भी उसने पता नहीं कैसे मेरी जमीन पर हक जमा लिया है। मैं घबराकर विषयांतर करती हूँ – कला का लक्ष्य क्या है?
उसकी चिढ़ जस-की-तस है – ब्यूटी, सौंदर्य, खूबसूरती... - थोड़ी देर का पॉज देने के बाद – तुम्हें क्या लगता है?
मैंने खुद को पूरी तरह से संतुलित किया – मेरे हिसाब से व्यक्तित्व का परिष्कार...।
बात पूरी होने से पहले ही उसने झपट ली – ... और तुम्हें लगता है कि ये सिर्फ ट्रेजेड़ी और निगेटिविटी से ही हो सकता है!
मैं फिर निरूत्तर...। कहीं से दिमाग में कुछ क्लिक हुआ... – मैंने बहुत सारी जगह पढ़ा-सुना है ऐसा। शैली ने भी कहा है ना कि – ‘अवर स्वीटेस्ट सांग आर दोज विच दैट टेल ऑफ सेडेस्ट थॉट...’ या फिर ‘है सबसे मधुर वो गीत जिसे हम दर्द के सुर में गाते हैं...’- मैंने थोड़ा-सा चिढ़ाते हुए कहा।
बकवास है... कोरी बकवास... जीवन सिर्फ दुख ही दुख नहीं है। योर एप्रोच इज वन साइडेड... – उसकी झल्लाहट बरकरार थी।
मैंने मुस्कुराकर कहा – दूसरी साइड के लिए तुम और तुम्हारे जैसे तमाम लोग हैं ना...! देखो कितने खूबसूरत रंग होते हैं तुम्हारी पेंटिग्स से... फुल ऑफ लाइफ...। – मैंने उसे पटरी पर लाने की कोशिश की, कुछ हद तक सफल रही ही होऊँगी तभी तो कंम्प्युर-मोबाइल में आने वाले स्माईली की तरह हल्की सी मुस्कुराहट उसके होंठों के कोनों से झरी थी, लेकिन वो पूरी तरह से मेरी बात से मुत्तमईन नजर नहीं आया। उसने अपने स्टूडियो की लाइट बुझा दी थी... इशारा था यहाँ से बाहर चलने का। बाहर आते ही सफेद रोशनी आँखों पर पड़ी थी, उसकी बड़ी-खुली बॉलकनी मुझे हमेशा ही फेसिनेट करती रही है, और उस पर पड़ा बेंत का झूला... उसके घर में मेरी सबसे पसंदीदा जगह... तुरंत पहुँचकर कब्जा कर लिया। वो शायद उसी विचार में डूब-उतरा रहा था।


मुझे नहीं लगता कि दुख को जीवन का मूल स्वर होना चाहिए। - उसकी सुई वहीं अटकी पड़ी है।
मैंने अनमने होकर जवाब दिया – मुझे लगता है दुख संभावना है... सब कुछ के एक दिन ठीक होने की... ये प्रवाह है, गति है।
और सुख....? – मुझे पता नहीं क्यों ये यकीन हुआ कि वो मेरी बात से प्रभावित हुआ।
सुख... – मैंने थोड़ा सोचते हुए कहा – वो अंत है, रूका हुआ पानी... क्योंकि उसमें बेहतर होने की संभावना नहीं है। - मैं इस विषय से थोड़ा ऊब गई थी – पता है संभावना है तो ही जीवन है। जिस दिन ये खत्म, जीवन खत्म... तो सुख के कुछ समय बाद ही जीवन की ढलान शुरू हो जाती है। इस दृष्टि से सुख वर्तमान है और दुख भविष्य... – मैं अपने ही निष्कर्ष पर मुग्ध हो गई... शायद वो भी... – ओ... ।
लेकिन सुख और दुख जीवन का ही हिस्सा है। - उसने फिर से विचार का सिरा मुझे थमा दिया।
हाँ... अब ये अलग मामला है कि किसी को कुछ तो किसी को कुछ आकर्षित करता है। - मैंने बात को बंडल बनाते हुए कहा।
उसने सवाल किया, तीखा, चुभता हुआ – तो तुम्हें दुख आकर्षित करता है...! – उसने फिर से उसे खोलकर फैला दिया। मुझे लगा मैं एक गहरी खाई के मुहाने पर खड़ी हूँ। मैं चुप हो गई। बहुत देर तक वो मेरे जवाब का इंतजार करता रहा। मुझे अच्छा लगा कि उसने मुझे हारने के अहसास से बचा लिया, वो बहुत मीठे से मुस्कुराया – ठीक है तुम दुख हो मैं सुख... तुम संभावना हो, मैं अंत... तुम मेरा भविष्य हो मैं तुम्हारा वर्तमान...- पता नहीं कैसे वो एक जटिल-से संबंध को इतनी सरलता से परिभाषित कर गया।
मुझे लगा कि इस बहाने उसने जीवन की परिभाषा तय कर डाली...। मैंने दूर क्षितिज पर नजरों की कूची फेरी तो... सूरज का निचला हिस्सा धरती में धँस गया। शाम उतर आई थी।

कहानी का मॉरल – सूत्र नं. 127
दुख भविष्य है, सुख वर्तमान

Monday, 22 August 2011

बदलते दौर में.... (तीसरी और समापन किश्त)

गतांक से आगे...

मॉल के उस रेस्टोरेंट में इत्तफाक से रेलिंग से लगी वही टेबल खाली मिली, जहाँ बैठकर पिछले हफ्ते ही सौम्या और श्वेता ने साथ खाना खाया था। बाकी पूरा रेस्टोरेंट भरा हुआ था, क्यों न हो लंच टाइम जो ठहरा। सौम्या अपने से बाहर पहुँच गई थी... धीरे-धीरे उसकी नजरों के साथ ही वह भी बाहर परसने लगी थी। नीचे-उपर के रिटेल आउटलेट्स पर क्या-क्या, कैसा-कैसा बिक रहा है। कोई परिचित चेहरा यहाँ है या नहीं... और भी पता नहीं क्या-क्या। क्षितिज ने बड़ी उदासिनता से मैन्यू कार्ड पर नजर डाली और सौम्या के सामने सरका दिया। सौम्या ने पूछा – क्या लेना पसंद करोगे?
तो क्षितिज ने लापरवाही से कंधे उचका दिए – कुछ भी...।
सौम्या का असमंजस बढ़ गया फिर भी उसने ऑर्डर कर दिया। वो फिर बाहर पसरने लगी, तभी क्षितिज ने उससे साकेत के बारे में पूछकर कर उसे उसकी अँधेरी खोह में पटक दिया। उसने एक छटपटाहट-सी महसूस की, लेकिन फिर हू नोज... जैसे जैस्चर्स देकर उसने इस प्रसंग से मुक्ति पानी चाही। हालाँकि कहीं गड़ तो गया था वो....।
क्षितिज बहुत गौर से उसकी तरफ देख रहा था, शायद वो बहुत कुछ का अनुमान भी लगा चुका था। तो क्या वो भी तुम्हें बिना बताए कहीं गया है? – क्षितिज ने निहायत ही व्यक्तिगत सवाल कर डाला था। सौम्या इससे थोड़ी असहज हो चली थी और इस स्थिति से बचना चाह रही थी और शायद वो भी उसके इस प्रयास को समझ कर खुद में सिकुड़ गया था। सौम्या श्वेता के तर्कों पर विचार करने लगी थी। श्वेता बहुत साफगो है और उसने अपनी भावुकता पर पूरी तरह से विजय पा ली थी। उस दिन जब दोनों इसी टेबल पर बैठे थे, श्वेता ने उससे कहा था – पता है सुमि... प्यार जो है ना लड़कियों के लिए पूरा जीवन हो जाता है। लड़का प्यार करते हुए एकसाथ कई सारी चीजें हैंडल कर लेता है और लड़की... वो प्यार करती है तो बस प्यार ही करती है, कुछ और वो साध ही नहीं पाती... प्यार उसके पूरे जीवन पर छा जाता है। सोते-जागते, हँसते-रोते हर वक्त वो उसी में जीती है। इसलिए चाहे जितनी भी प्रतिभाशाली हो लड़की... प्यार होते ही वो नाकारा होती चली जाती है।
सौम्या ने उससे पूछा था – तो माई डियर फ्रेंड नाकारा नहीं होना चाहतीं?
उसने नजरें झुका ली थी, जैसे वो कोई चोरी कर रही थी – हाँ... मैंने अपनी भावुकता पर महत्वाकांक्षा को सवार कर दिया है। मैं इस शहर में खुद को कुछ देने के लिए आई हूँ, टूटने-बिखरने के लिए नहीं।
लेकिन...तुझे नहीं लगता कि तू जिंदगी से डर रही है और क्या तू उस होने को रोक पाएगी? – सौम्या ने पूछा।
उसने मुस्कुराते हुए कहा था – हो सकता है, मैं डर रही हूँ, लेकिन भावनाओं के नाम पर खुद को कुर्बान नहीं करना चाहती...- थोड़ा रूककर उसने आगे कहा - खुद को उस होने तक पहुँचने ही नहीं दूँगी।

ऑर्डर लेकर वेटर आया तो वो फिर से रेस्टोरेंट में लौट आई। क्षितिज पूछ रहा है – क्या हुआ?
कुछ नहीं... – पता नहीं क्यों वो अनमनी हो गई।
क्षितिज को सूझ ही नहीं रहा था कि क्या बात करें और सौम्या कल औऱ आज के बीच झूल रही थी। तभी क्षितिज ने पूछा – श्वेता कब तक आने वाली है। एक्चुली मेरे पेरेंट्स मुझपर शादी का दबाव बना रहे हैं। यू नो लास्ट वीक मेरे जीजाजी बिना इंर्फामेशन के आए थे... मेरा फ्लैट-ऑफिस और दोस्तों से मिले और फिर रात में मुझसे मिलने आए।
सौम्या ने उसे आश्चर्य से देखा – क्यों?
अब तमाम तरह के डर होते हैं अपनों के... कहीं मैं लिव-इन में या फिर... गे... – कहते-कहते उसने अपनी बात वहीं समेट ली।
सौम्या के अंदर उत्सुकता जागी – फिर
फिर... जब वो सब तरफ से सेटिस्फाई हो गए तो कल पापा ने शादी की बात की। वे कहने लगे कि यदि तूने कोई पसंद नहीं कर रखी है तो एक लड़की हमारी नजर में हैं। - क्षितिज ने बात पूरी की।
पता नहीं कैसे सौम्या की कड़वाहट सतह पर आ गई – तो तुम श्वेता से क्या चाहते हो? – फिर उसे खुद ही लगा कि क्यों वो साकेत की चिढ़ क्षितिज पर निकाल रही है!
मैं बस उससे सच जानना चाहता हूँ। यू नो कभी-कभी लगता है कि शी लव्स मी औऱ कभी-कभी लगता है कि नहीं... – उसने हवा में अपनी नजरें टिकाते हुए बहुत मायूसी से कहा।
शी डोंट लव यू... – पता नहीं कैसे मैंने ये कह दिया, कहने के बाद लगा कि मैं बहुत क्रुएल हो रही हूँ, मुझे इतने नाजुक मौके पर इतना कड़वा सच नहीं कह देना चाहिए था, लेकिन मैं कह चुकी थी। उसने बहुत उदासीनता से मेरी तरफ देखा... जैसे ये वो पहले से ही जानता था। मैं अंदर से सिकुड़ गई, फिर से लगा जैसे मैंने साकेत का गुस्सा बेचारे क्षितिज पर निकाल दिया। जो मैं साकेत से नहीं कह पाई, वो श्वेता के कंधे पर रखकर क्षितिज को कह दिया, जैसे... जैसे बदला निकाल लिया, साकेत का क्षितिज से... श्वेता के माध्यम से खुद की भड़ास निकाल ली। खुद पर गुस्सा आया, खीझ हुई, कहीं सुना था – जो दुखी है, वे दूसरों को सुखी नहीं देख सकते हैं... क्या मैं भी...? ओफ्फ... !
देखो क्षितिज... शी इज वेरी मच एंबीशियस, होता क्या है किसी में प्रेम बीज रूप में होता है, तो किसी में नहीं... ... – मैं थोड़ा रूकी, कहूँ न कहूँ का असमंजस... – हो सकता है ये गलत हो, लेकिन कहीं मुझे लगता है कि उसमें नहीं है... - मैं उसकी प्रतिक्रिया के लिए रूक गई।
वो कुछ भी नहीं बोला लेकिन उसकी आँखें जरूर सवाल कर गई, मेरे आगे बोलने के लिए इतना ही काफी था। मैंने कहा - वो प्यार और दुख दोनों के लिए तैयार नहीं है...। – लेकिन प्यार के साथ दुख कैसे आ गया...? नहीं ये उसने नहीं पूछा था, ये मेरा ही उठाया सवाल था। हाँ प्यार है तो दुख तो होना ही है ना...! ये मेरी ही उलझन है जो मैं खुद से ही सवाल-जवाब में डूब रही थी। वो तो निर्विकार बैठा हुआ था... गाजर के टुकड़े को गिलहरी की तरह कुतरता हुआ...। उसने अपनी नजरें मेरे कहने पर टिकाए हुए थी और खुद चुप था, इसलिए उसे पूरी तरह से कंविन्स करना अब मेरी जिम्मेदारी भी थी और जिद्द भी...।
देखो रिश्ते में यदि प्यार है तो दुख भी होगा ही... और श्वेता किसी भी रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। वो अपने लिए सिर्फ सुख चाहती है, जिस भी सुलभ और सरल तरीके से मिल जाए। भावना का निवेश उसके लिए बड़ा बेहूदा आयडिया है... वो तो केपिलट इन्वेस्टमेंट पर काम करती है। देखा जाए तो इसमें कुछ बुरा भी नहीं है। आखिर तो सुख ही जीवन का साध्य है... मेरे लिए भी और तुम्हारे लिए भी..., अब यदि वो उसी की साधना करती है तो इसमें क्या गलत है? वो क्यों बेवजह का संघर्ष चुने... महज भावनाओं के लिए...। – कड़वाहट हवाओं में तैर गई।
वो बहुत मायूस आँखों से मुझे एकटक देख रहा था। मैंने अपनी नजरें झुका लीं, मुझे अपने अंदर एक वहशियाना सुख महसूस हो रहा था... आश्चर्य है...!
समाप्त

कहानी का मॉरल सूत्र नंबर – 112
जो दुख के लिए खुले नहीं होते, उनका जीवन डर बन जाता है